बालपाठ – श्री महालक्ष्मी जी की मातृ प्रकृति

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बालपाठ

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अगले दिन दादी, पराशर और व्यास को उत्तर गली के माध्यम से श्री रंगम मंदिर तक ले जाती हैं । जैसे ही वे मंदिर में प्रवेश करते हैं व्यास और पराशर को उनके दाहिने तरफ एक सन्निधि मिलती है ।

व्यास: दादी, यह किसकी सन्निधि है?

आण्डाल दादी: व्यास, यह श्री रंगनायकी (श्रीमहालक्ष्मी) जी की सन्निधि है।

पराशर: दादी, लेकिन हमने केवल भगवान् श्रीरंगानाथ को जुलूस में देखा था।

आण्डाल दादी: हां, पराशर । यह सही है । ऐसा इसलिए है, क्योंकि श्री रंगानायकी तायार अपने संनिधि से बाहर नहीं आती हैं । भगवान् श्रीरङ्गनाथ को स्वयं स्वभार्या का दर्शन करना पड़ता है जब भी उनको देखने की इच्छा हो ।

पराशर: ओह! ठीक है दादी इसका मतलब है, हमें उनको पास हर समय जाना चाहिए । अब, हमारे पास मंदिर का दौरा करने का एक और कारण है, जब भी हम श्रीरंगम में हैं |

श्री रंगानायकी तायर के दर्शन के बाद, वे सानिधि से बाहर निकलते हैं ।

आण्डाल दादी: मुझे आप दोनों को एक प्रश्न पूछने दो । जब आप दोनों खेल खेलने के बाद शाम को घर लौटते हैं, तो आपके पिता श्री कैसी प्रतिक्रिया करते है?

व्यास: दादी, उस समय वे गुस्सा हो जाते हैं |

आण्डाल दादी: क्या तुम्हारे पिताजी आपको सज़ा देते हैं?

पराशर: दादी हम शायद ही कभी दंड मिला हो| जब भी वह नाराज होते है, तो हमारी मां हमें दंड देने से रोक देती है |

आण्डाल दादी: उसी तरह, हम कुछ ऐसे गलत काम करते हैं जो भगवान चाहते है कि हम गलत काम न करें तथा वह हमें इसके लिए दंड देने की तरह महसूस करते है, उन दिनों के दौरान, माँ लक्ष्मी हमेशा हमें दंडित होने के लिए भगवान से बचाती है।

पराशर: दादी आप सही हैं, वह हमारी मां की तरह है |

आण्डाल दादी: कम से कम, भगवान् जी हथियार उठाते हैं हालांकि यह हमारी सुरक्षा के लिए है, लेकिन मां लक्ष्मी कमल के फूलों पर बैठते हैं क्योंकि वह बहुत नरम-स्वभाव वाली है। भगवान् जी तक पहुंचने के लिए आपको रंग-रंग गोपुर पार करने की आवश्यकता है, फिर प्रवेश द्वार, फिर गरुड़ संनिधि, ध्वजस्थम्भ और उसके बाद श्री रंगानाथ सन्निधि। लेकिन जैसे ही आप उत्तर उत्र गेट से प्रवेश करते हैं, आप मां लक्ष्मी सन्निधि तक पहुंचते हैं। वह हमसे इतनी नज़दीक है ।

व्यास: हाँ दादी |

आण्डाल दादी: यहां तक कि माता सीता के रूप में, उन्होंने श्री राम से काकासुर को बचाया था । इन्द्र के पुत्र काकासुर ने एक कौवा का रूप लिया और भगवती सीता देवी को परेशान किया । भगवान् श्री राम उसे सज़ा देने जा रहे था । लेकिन मां लक्ष्मी ने कृपापूर्वक भगवान् श्री राम से काकासुरा को बचा लिया । इसी तरह, अशोक वन में माता सीता ने जब भगवान् श्री राम ने रावण का वध किया, तब भगवान श्री राम से सभी राक्षसों को बचाया था । हनुमान सभी राक्षसों को मारना चाहते थे जो हमारी मां को परेशान करते थे । लेकिन माँ सीता उन्हें बचाती है और हनुमान को बताती हैं कि वे उस समय असहाय थे और रावण के आदेशों का पालन करती थी। इस तरह मातृभाव से, वह लगातार हर एक की रक्षा करने की कोशिश करती है |

मां सीता काकासुरा को बचाती है

मां सीता काकासुरा को बचाती है

मां सीता राक्षसों द्वारा घिरे हुए है

पराशर और व्यास: दादी आशा है कि मां लक्ष्मी हमें हर समय बचा लेंगे |

आण्डाल दादी: वह निश्चित रूप से करेंगे | वह हमेशा हमारी रक्षा करने के लिए भगवान जी से अनुग्रह करती जो कि उनका प्राथमिक कर्तव्य है।

पराशर: दादी माँ क्या वह सभी कुछ करती है हैं? मेरा मतलब है मेरा मतलब भगवान् जी के साथ हमारे पक्ष में बात करना है?

आण्डाल दादी: ठीक है। वह तब तक ऐसा करती है जब तक भगवान जी हमें स्वीकार नहीं करते । लेकिन एक बार भगवान जी हमें स्वीकार करते है, मां लक्ष्मी भी भगवान् जी के साथ बैठती है और उनके प्रति हमारी भक्ति और सेवा का आनंद लेती है ।

व्यास: दादी, वह कैसे?

आण्डाल दादी: इसको समझना बहुत आसान है। जब आप अपने माता-पिता की सेवा करते हैं, क्या तुम सिर्फ अपने पिता की सेवा करते हो??

पराशर: नहीं, दादी, माता और पिता दोनों समान रूप से हमारे लिये प्रिय हैं । हम उन दोनों की सेवा करना चाहते हैं ।

आण्डाल दादी: हाँ – तुमने सही समझा । इसी तरह, मां लक्ष्मी हमें प्रभु तक पहुंचने के लिए मदद करती है । लेकिन एक बार जब हम प्रभु तक पहुंच जाते हैं, तो वह हमारी प्रेमपूर्ण भक्ति को प्रभु के साथ स्वीकार करती है।

मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु- एक साथ फाल्गुन उत्तर नक्षत्र के दिन

पराशर और व्यास: वाह ! दादी यह समझने में बहुत आसान है और अगली बार हम और सुनने की उम्मीद करते हैं। हम बाहर जाना चाहते हैं और कुछ समय के लिए खेलना चाहते हैं।

पराशर और व्यास फिर खेलने के लिए बाहर चले जाते है!

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/08/beginners-guide-sri-mahalakshmis-motherly-nature/

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