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बालपाठ – कुलशेखर आळ्वार

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श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

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kulasekarazhwar

व्यास और पराशर आण्डाल दादी के पास जाते हैं और उन्हें आऴ्वार स्वामीजी की कथाओं को जारी रखने के लिए कहते हैं।

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर! आज मैं आपको एक राजा के बारे में बताने जा रही हैं जो एक आऴ्वार स्वामीजी हैं।

पराशर:दादी वोह कौन हैं? उनका नाम क्या है? उनका जन्म कब और कहाँ हुआ? उनके विशेष गुण क्या हैं?

आण्डाल दादी: उनका नाम श्रीकुलशेखराळ्वार् है। उनका जन्म माघ मास, पुनर्वसु नक्षत्र और आवतार स्थल: तिरुवंजिक्कलम है  जो केरला में स्थित है| उनका जन्म एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था।

पराशर: दादी क्षत्रिय से क्या मतलब है?

आण्डाल दादी: क्षत्रिय का मतलब प्रशासक है आमतौर पर, जैसे राजा, सम्राट, आदि है । वे राज्य पर शासन करते हैं, नागरिकों की रक्षा करते हैं, आदि।

पराशर: ओह, हमारे रंगराजा की तरह, जो श्रीरंगम में राज करते हैं और हमारी श्रीरंगम में रक्षा करते हैं |

आण्डाल दादी: हाँ, हमरे पेरुमल सभी के लिए राजा हैं | लेकिन प्रत्येक क्षेत्र पर राजा का शासन होता है और इन लोगों को स्थानीय लोगों द्वारा बहुत सम्मान मिलता है। अब हम इतिहास पर वापस जाते हैं, जैसा कि वोह क्षत्रिय परिवार में पैदा हुआ थे, वोह महसूस कर रहे थे कि वोह नियंत्रक थे, पूरी तरह से स्वतंत्र, इत्यादि । लेकिन श्रीमन्नारायण की कृपा से, उन्हे पूरी तरह से एहसास हो गया कि वोह पूरी तरह से भगवान पर निर्भर थे और भगवान की महिमा को सुनने के लिए महान उत्सुकता विकसित किया; और पेरुमल के भक्तों की भी देखभाल करते थे।

पराशर: दादी, मुझे याद है कि आप कह रही थी कि हमें मधुरकवि आळ्वार (श्री मधुरकवि स्वामीजी) की तरह होना चाहिए ताकि भगवान के भक्तों की सेवा कर सकें, दादी, क्या वोह उसी तरह भगवान को पसंद करता थे?

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा पराशर| हाँ, श्रीकुलशेखराळ्वार् को श्रीरामायण के प्रति महान लगाव था | देखें, हमारे संप्रदाय में “श्री राम” को प्यार से “पेरुमल” कहा जाता है। श्रीरामायण और पेरुमाळ (श्री राम) के प्रति इनकी भक्ति और लगाव के कारण इन्हें “कुलशेखर पेरुमाळ” के नाम से भी जाना जाता है। वोह हर दिन महान विद्वानों से श्रीरामायण के बारे में सुनते थे और श्रीरामायण की घटनाओं में डूब जाते थे । एक बार जब उन्होंने सुना कि श्रीराम पर 14000 राक्षसों ने हमला किया था, तो वोह बहुत परेशान हो गए और अपनी सेना को भगवान श्री राम की सहायता करने के लिए बुलाया।।
तब भगवान के भक्तों ने उन्हे शांत कर दिया और उन्हे बताया कि श्रीराम पहले से ही अकेले राक्षसों को हरा दिया था |

व्यास:   अगर वह पूरी तरह से भगवान के बारे में सुनने में लगे हुए थे, तो दादी, उन्होनें राज्य पर कैसे शासन किया?

आण्डाल दादी: हाँ। यह एक बहुत ही अच्छा सवाल है | वोह राज्य पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ थे| उनके मंत्रियों ने भागवतों के प्रति उनके लगाव को खत्म करने की योजना बनाई, जो पेरुमल के भक्त थे| उन्होनें महल में अपने मंदिर से पेरुमल का हार चुरा लिया और उनसे कहा कि यह भागवतों द्वारा चोरी हो गया है | उन्होंने मंत्रियों के शब्दों पर विश्वास नहीं किया | यह उन शब्दों को साबित करने का एक प्राचीन अभ्यास था अपने हाथ एक बर्तन में डाले जिसमें साँप है | ऐसा करने के लिए किसी को सच्चाई और बहादुर पर बहुत विश्वास होना चाहिए | उन्होंने उनसे एक बर्तन लाने के लिए कहा, जिसमें सांप था | उन्होंने साहसपूर्वक बर्तन के अंदर अपना हाथ रख दिया और घोषित किया कि भागवत निर्दोष हैं|

पराशर: दादी, यह बहुत अच्छा है |

आण्डाल दादी: हां, यह भी, जैसे श्रीराम का पेरिया पेरुमल (श्रीरंगनाथ) के प्रति महान लगाव था, कुलशेखराळ्वार् को भी पेरिया पेरुमल और श्रीरंगम से बहुत लगाव था।

व्यास:दादी, श्री राम और पेरिया पेराममल का क्या संबंध है?

आण्डाल दादी: पेरिया पेरूमल, अयोध्या में श्री राम की थिरुवाराधन वाले स्वामी थे। थिरुवाराधन पेरूमल का अर्थ है पेरुमल जिसका हम घर पर पूजा करते हैं। इसलिए, अपने महल में श्री राम ने पेरिया पेरुमल की पूजा की| लेकिन उन्होंने अपने पेरुमल जी को विभीषण को उपहार के रूप में दिया था जो उनके प्रिय भक्त थे| जब विभीषण पेरिया पेरुमल को लंका के लिए ले जा रहे थे, तो वोह श्रीरंगम में संध्या वंदनम करने के लिए रुके। अपने संध्या वंदनम के बाद, जब वोह अपनी यात्रा को लंका के लिए जारी रखना चाहता थे, पेरिया पेरुमल ने विभीषण से कहा कि वोह इस जगह को बहुत पसंद करते हैं और सिर्फ दक्षिण की तरफ देखना चाहते हैं जहां लंका है| विभीषण प्रभु के साथ सहमत थे, और भगवान जी के बिना लंका चले गए| इस प्रकार, पेरिया पेरूमल श्रीरंगम में पहुंचे और अब तक यहिन पर रहते हैं।

पराशर: ओह!दादी यह सुनना के लिए बहुत अच्छा है| हम पेरुमल (श्री राम) और पेरिया पेरुमल के बीच के इस संबंध को पहले नहीं जानते थे।

आण्डाल दादी: तो, कुलशेखराळ्वार् को भी श्रीरंगम और पेरिया पेरुमल से बहुत लगाव था। वोह अपने राज्य से हर रोज श्रीरंगम का दौरा करना चाहते थे और अपने राज्य को छोडना चाहते थे| लेकिन उनके मंत्रियों ने उन्हे किसी कारण या किसी अन्य कारण से रोक दिया ताकि वोह राज्य मैं रेहकर राज्य पर शासन कर सकें। आखिरकार, उन्होंने अपना राज्य छोड़ दिया और श्रीरंगम पहुंच गए । वोह भगवान की महिमा में पेरूमल थिरुमोली का पाठ करते हैं और कुछ समय के लिए श्रीरंगम में रहता हैं । अंत में, वह इस दुनिया से निकलते हैं और परमपदम तक पहुंचते हैं ताकि वह हमेशा के लिए प्रभु की सेवा कर सके|

व्यास:दादी, जितना अधिक हम आऴ्वार स्वामीजी के बारे में सुनते हैं, उतना ही हम पेरुमल के बारे में जानते हैं क्योंकि उनका जीवन पूर्ण रूप से पेरूमल पर केंद्रित है।

आण्डाल दादी: हाँ। हमें अपने जीवन को पेरूमल और उनके भक्तों पर भी केंद्रित करना चाहिए। अब, हम कुलशेखराळ्वार् सन्निधि में जाते हैं और अपने कुलशेखराळ्वार् का दर्शन करते हैं|

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी आइये अब चलें।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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