Monthly Archives: June 2019

Posters – dhivya prabandhAmrutham – thamizh

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

தனியன்கள் – https://drive.google.com/open?id=1HC1da6Mn_iOC4maqrgZMB4SUM-gqtE3S

Thanks to SrI nArAyAnan for preparing the posters.

श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और नायनार

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै शिष्य

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ प्रवेश करते हैं। बच्चे दादी माँ को तिरुप्पावै का पाठ करते हुए देखते हैं और उसके खत्म होने तक प्रतीक्षा करते हैं। दादी ने अपना पाठ समाप्त किया और बच्चों का स्वागत किया।

दादी : स्वागत बच्चो !

व्यास : दादी, पिछली बार जब आपने कहा था कि आप वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के बेटों के बारे में बताएंगे। कृपया हमें उनके बारे में बताएं।

दादी: हाँ व्यास । आज हम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के दो महान बेटों के बारे में बात करेंगे। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था कि उनके आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) और नंपेरुमाळ की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) को दो बेटों अर्थात् पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के साथ आशीर्वाद दिया गया था। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते हैं।

नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) परमपदधाम पहुंचने के बाद, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए और आगे बढ़ते हुए अपने बेटों को उन सभी अर्थों को सीखाते है जो उन्होंने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) से सीखे थे। कुछ समय बाद वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) ने अपनी आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) के बारे में अपने आचार्य कैंकर्य करते हुए अपनी तिरुमेनी को त्याग दिया और परमपद को प्राप्त किया, जिसके बाद उनके पुत्र पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए ।

अतुळाय : दादी , मैंने सुना है कि पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे।

कत्तालागीय पेरुमाल कोयिल में कालक्षेप करते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगम

दादी: अतुळाय आपने सही सुना। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) अपने अंतिम दिनों के दौरान ज्योतिष्कुडी में, नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) को हमारे संप्रदाय के अगला आचार्य घोषित करते है और तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) को व्याख्यान सिखाने का निर्देश देते हैं।  जब तिरुमलै अलवार कांचीपुरम में देव पेरुमल जी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, तो देव पेरुमल सीधे नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) से बात करते हैं, जो उनके पास में खड़े थे और कहते हैं “जैसा कि मैंने ज्योतिष्कुडी में उल्लेख किया है कि आपको तिरुमलै अलवार को अरुळिच्चयल के सभी अर्थ सिखाना चाहिए”।

वेदवल्ली: दादी, पिल्लै लोकाचार्य ने ज्योतिष्कुडी नामक स्थान पर अपने अंतिम दिन क्यों बिताए? क्या उनका जन्म श्री रंगम में नहीं हुआ था?

दादी: पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) एक महान आचार्य थे जिन्होंने एक और सभी के लाभ के लिए आसान तमिल भाषा में अलवार पाशुरम पर सुंदर ग्रन्थ लिखे। उस समय  सभी संस्कृत या तमिल में पारंगत नहीं थे । उन लोगों के लिए जो भाषाओं से बहुत अच्छी जानकारी नहीं रखते, लेकिन फिर भी पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने हमारे पूर्वाचार्यों की कृतियों को सीखने और लाभ पाने की इच्छा रखने वालो के लिए उन्होंने बड़ी दया के साथ अपने आचार्यों से सरल और कुरकुरी भाषा में जो कुछ भी सुना, उसे प्रलेखित किया।   श्री वचन भूषण दिव्या शास्त्र उनका बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ है जिसमे हमारे संप्रदाय के अर्थों का विवरण है। इस प्रकार वह मुख्य आचार्य थे जिन्होंने प्रमाणं रक्षणं (हमारे सम्प्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा / पोषण) किया था।

पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगं

पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने न केवल हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा की, बल्कि हमारे सम्प्रदाय के मूल – श्रीरंगम के नंपेरुमाळ जी की भी।  जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे । वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । इस प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य ने नम्पेरुमाळ की सुरक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।   यदि उन्होंने और हजारों अन्य श्री वैष्णव जन, जिन्होंने अपने जीवन के  बलिदान नहीं किया होता , तो आज हम श्रीरंगम में नम्पेरुमाळ जी की पूजा और दर्शन नहीं कर पाते ।

ज्योतिष्कुडि – पिळ्ळै लोकाचार्य परमपद स्थल

पराशर : कोई आश्चर्य नहीं कि वह स्वयं देव पेरुमाळ का अवतार थे, अत्यंत बलिदान का प्रतीक !

दादी: हाँ पराशर, यही कारण है कि देव पेरुमाळ जी को ही हमारे संप्रदयाप के पेरुमाळ कहलाते है । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने केवल प्रमाण रक्षण (ग्रन्थों के रूप में हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार का संरक्षण) ही नहीं किया था, वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करके एक श्री वैष्णव का असली गुणों को प्रकशित किये | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की तरह, जो एम्पेरुमान जी की तिरुमेनि के बारे में चिंतित रहते थे और उन्होंने तिरुपल्लाण्डु गाया, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य जी ने नम्पेरुमाळ जी की अर्चा मूर्ति में एक बच्चे को देखा और पितृत्व प्रेम और देखभाल करते हुए, नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की और अपने जीवन का बलिदान किये पर मुस्लिम आक्रमणकारियों को नम्पेरुमाळ जी को नहीं लेने दिए ।  इसलिए, अगली बार जब आप पेरुमाळ मंदिर जाते हैं, तो याद रखें कि हमारे पास जो संप्रदाय है, वह आज हमारे सामने हजारों श्री वैष्णव द्वारा किए गए निस्वार्थ बलिदान द्वारा बनाया गया है। उन्होंने संप्रदाय और नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां, उनके श्रम के फल का आनंद ले सकें। हम इतने समर्थ नहीं की ऐसे श्री वैष्णव जन जिन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया उनको कुछ दे सके, सिवाय इसके की हम सभी श्री वैष्णव जन के बलिदान का स्मरण रखे और अपने सम्प्रदाय द्वारा दिए गए मूल्यों और ज्ञान को हम आगे लेकर जाये, और आने वाली पीढियों तक यह मूल्य और ज्ञान पहुंचा सके|

अतुळाय : दादी, हमें पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नयनार के बारे में अधिक बताएं।

nayanar

अळगिय मनवाळ पेरुमाळ नायनार

दादी: नायनार ने हमारे संप्रदाय के आवश्यक सिद्धांतों पर अद्भुत ग्रन्थ लिखे, जिनमे से मुख्य आचार्यहॄदयम् ग्रन्थ है । उनको आचार्य पेरियवाच्चान् पिळ्ळै जी के समान महान आचार्य माना जाता है जिनको हमारे सम्प्रदाय और दिव्य प्रभंद का गहरा ज्ञान था |  नायनार को महान आचार्य के रूप में सराहा जाता है । वह “जगत् गुरुवरानुज – पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई” के रूप में लोकप्रिय हैं। नायनार ने कम उम्र में अपनी तिरुमेनि को छोड़ने का फैसला किया और पिळ्ळै लोकाचार्य को पीछे छोड़कर परमपद को गमन किये । उनकी रचनाएँ ज्ञान रत्न के अलावा और कुछ नहीं हैं, जिसके बिना हमारे संप्रदाय के जटिल अर्थ और विवरण आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाते। मामुनि स्वामी जी नायनार स्वामीजी का महिमामंडन करते हुए कहते है कि पेरियवाच्चन पिळ्ळै स्वामीजी के बाद नायनार स्वामीजी ही है जिन्होंने अपने कामों से बहुत योगदान दिया है। जब नायनार स्वामीजी परमपदम पहुंचते है, तो पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दुःख के सागर में गिर जाते हैं और नायनार स्वामीजी के तिरुमुडी (सिर) को अपनी गोद में रखते हुए रोते हैं। वह नायनार स्वामीजी को एक असाधारण श्री वैष्णव के रूप में देखते है जिसे दुनिया ने बहुत कम समय में खो दिया है।

व्यास : दादी माँ, पिळ्ळै लोकाचार्य और नायनार का जीवन सुनने के लिए बहुत ही रोचक और भावनात्मक है।

दादी: हाँ व्यास । जब हम अपने आचार्यों और उनके जीवन के बारे में बात करना शुरू करते हैं, तो हमें समय बीतने का कभी पता नहीं चलता। बाहर अंधेरा हो रहा है। आप बच्चों को अब अपने घरों को चले जाना चाहिए। अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं आपको पिळ्ळै लोकाचार्य के शिष्यों के बारे में बताउंगी ।

बच्चे अपने-अपने घरों को वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी), पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी), अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नायनार और उनके शानदार जीवन के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-pillai-lokacharyar-and-nayanar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

अंडाल दादी रसोई घर में खाना बना रही होती है जब पराशर, वेद व्यास, वेदवल्ली और अतुळाय साथ में दादी के घर में प्रवेश करते है। दादी बच्चों की बात सुनके, बच्चों के स्वागत के लिए लिविंग रूम के अंदर आती है।

दादी : स्वागत बच्चो | अपने हाथ पावं दो लो | मंदिर का प्रसाद लीजिये | पिछली बार, हमने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में जाना | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया, आज हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों के बारे में जानेंगे | वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि उनके कुछ प्रमुख शिष्य थे |

व्यास : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कई शिष्य थे | क्या आप हमें उनके बारे में बताएंगी |

दादी : हाँ, चलो हम उनके बारे में एक एक करके जानते है | सबसे पहले हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्य जिनका नाम व्याख्यान चक्रवर्ती, पेरियवाच्चान पिळ्ळै जी के बारे में जानते है | पेरियवाच्छान पिळ्ळै, सेंगणूर मे, श्री यामुन स्वामीजी के पुत्र “श्री कृष्ण” के रूप मे अवतरित हुए और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के नाम से मशहूर हुए । नम्पिळ्ळै के प्रधान शिष्यों में से वे एक थे और उन्होंने सभी शास्त्रार्थों का अध्ययन किया । नम्पिळ्ळै के अनुग्रह से पेरियवाच्चान पिळ्ळै सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध आचार्य बने । पेरिय तिरुमोळि ७. १०. १० कहता है कि – तिरुक्कण्णमंगै एम्पेरुमान की इच्छा थी कि वे तिरुमंगै आळ्वार के पाशुरों का अर्थ उन्हीं से सुने| अतः इसी कारण, तिरुमंगै आळ्वार नम्पिळ्ळै बनके अवतार लिए और एम्पेरुमान पेरियवाच्छान पिळ्ळै का अवतार लिए ताकि अरुलिचेयळ के अर्थ सीख सके ।

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – सेंगानूर

व्यास : दादी, पेरियवाच्चान पिळ्ळै स्वामीजी को व्याख्यान चक्रवर्ती क्यों कहा जाता था ?

दादी : पेरियवाच्छान पिळ्ळै जी ही हमारे सम्प्रदाय के एक ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने अरुळिचेयळ की व्याख्या लिखी है | इनकी अरुळिचेयळ और श्री रामायण में निपुणता का प्रमाण इनसे लिखे गए पाशुरपड़ि रामायण ही है जिस में वे केवल अरुळिचेयळ के शब्द उपयोग से पूरे श्री रामायण का विवरण सरल रूप मे प्रस्तुत किया है। देखा जाये तो यह उनका काम नहीं था, कोई भी अरुळिचेयल के आंतरिक अर्थों के बारे में नहीं बोल सकता है और न ही समझ सकता है। उनका कार्य हमारे सभी पूर्वाचार्य के ग्रन्थों को समाहित करता है।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे मुख्य शिष्य जी का नाम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै था | श्री रंगम में श्री कृष्ण पादर के रूप में जन्मे, वह पूरी तरह से आचार्य निष्ठा में डूबे हुए थे। अपने आचार्य नम्पिळ्ळै की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, क्योंकि पुत्र का जन्म उसके आचार्य नम्पिळ्ळै (जिसे लोकाचार्य भी कहा जाता है) के आशीर्वाद से हुआ था। मुझे आशा है कि आप सभी को नम्पिळ्ळै के पीछे की कहानी को लोकाचार्य के नाम से याद किया जाएगा।

व्यास : हाँ, दादी | वह कंदाडै तोळप्पर ही थे जिन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी को लोकाचार्यार नाम से संभोदित किया था | हमें वह कथा स्मरण है |

वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै – काँचीपुरम

दादी : जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने अपने बेटा का नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने बच्चे के नामकरण अऴगिय मणवाळ मामुनि के अपने इरादे का खुलासा किया | जल्द ही, नंपेरुमळ, एक और बेटे के साथ वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को आशीर्वाद देते हैं और दूसरे बेटे का नाम अऴगिय मणवाळ मामुनि पेरुमल नायराज रखा गया क्योंकि वह अऴगिय मणवाळ मामुनि (नामपेरुमल) की कृपा से पैदा हुए थे, जिससे नम्पिळ्ळै की इच्छा पूरी हुई। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते है | वे दोनों एक ही समय में हमारे संप्रदाय के महान आचार्य जैसे कि नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, पिल्लई, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, आदि का आशीर्वाद और मार्गदर्शन पा रहे थे।

एक बार, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने तिरुमालीगई (श्री वैष्णव के घरों को तिरुमालीगई कहते है ) के लिए तदीयराधन के लिए नम्पिळ्ळै स्वामीजी को आमंत्रित किया और नम्पिळ्ळै ने स्वीकार किया और उनके तिरुमालीगई में गए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी खुद तिरुअराधनम की शुरुआत करते हैं और कोयल आळ्वार (पेरुमल सानिधि) में, नम्माळवार स्वामीजी की पाशुरम के सभी उपदेशों और व्याख्यानों को बड़ी सुंदरता एवं सरल अर्थो में ताड़ के पत्तों के गुच्छो में देखते हैं। रूचि होने के कारण, वह उनमें से कुछ को पढ़ना शुरू कर देता है और वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी से पूछते है कि वह क्या था। वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी बताते है कि हर रात, उनकी बात सुनने के बाद उन्होंने नम्पिल्लई के व्याख्यान को रिकॉर्ड किया। नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी से पूछते हैं कि उन्होंने उनकी अनुमति के बिना ऐसा क्यों किया और पूछते हैं कि क्या उन्होंने पेरियवाच्चान पिळ्ळै व्याख्यानम (आळ्वार पाशुरम के अर्थों का विस्तृत विवरण) के साथ प्रतियोगिता के रूप में यह सब किया । वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी दोषी महसूस करते है और तुरंत नम्पिल्लई स्वामीजी के चरण कमलो में गिर जाते है और बताते है कि उन्होंने इसे केवल भविष्य में संदर्भित करने के लिए लिखा था। उनकी व्याख्याओं से सहमत होकर, नम्पिल्लई स्वामीजी ने विद्यानम का महिमामंडन किया और अपने काम के लिए वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी की प्रशंसा की। ऐसा विशाल ज्ञान और आचार्य अभिमान था वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी का ।

पराशर : उस व्याख्यान का क्या हुआ ? क्या वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी उसको पूर्ण कर पाए ?

दादी : हाँ, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने उसको पूर्ण किया और तिरुवायमोली का यह व्याख्यान को प्रसिद्ध ईडु ३६००० पड़ी से संबोध्दित करते है | नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है यह व्याख्यान ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी को प्रधान करे जो की वह अपने वंशजों को उपदेश कर सके |

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – ईयुण्णि माधव पेरुमाळ द्वितीय पंक्ति में

वेदवल्ली : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी द्वारा दिया गए व्याख्यान को ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी ने क्या किया ?

दादी : ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् अपने पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् को यह सिखाते हैं। ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का जन्म नक्षत्र स्वाति है । ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् इसे अपने प्रिय शिष्य नालूर् पिळ्ळै को सिखाते हैं।  इस तरह इसे एक आचार्य से उचित तरीके से अपने शिष्य के पास सिखाया जाता रहा | नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, नालूर् पिळ्ळै के पुत्र और प्रिय शिष्य थे। उनका जन्म धनु-भरणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें देवाराज आच्चान् पिळ्ळै, देवेसर, देवादिपर और मैनाडू आच्चान् पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने 36000 पद ईदू का अध्ययन अपने पिताश्री के चरण कमलों के सानिध्य में किया था। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी के बहुत शिष्य थे, उनके शिष्यों में से एक थे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै स्वामीजी । नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै भी कांचीपुरम पहुँचते हैं। वे सभी देव पेरुमाल के समक्ष एक दूसरे से मिलते हैं। उस समय देव पेरुमाल, अर्चकर के माध्यम से बात करके, बताते हैं कि पिळ्ळै लोकाचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं और नालूर् पिळ्ळै को आदेश करते हैं कि वे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै को ईडु व्याख्यान का उपदेश दें। परंतु नालूर् पिळ्ळै देव पेरुमाल से पूछते हैं कि क्या वे ठीक तरह से उन्हें उपदेश कर पाएंगे (अपनी अधिक उम्र की वजह से)? इस पर देव पेरुमाल कहते हैं “तब आपके पुत्र (नालूर् आच्चान् पिळ्ळै) उन्हें उपदेश कर सकते हैं। उनका उपदेश करना आपके उपदेश करने के समान ही है”। इस तरह से तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै अन्य श्री वैष्णवों के साथ नालूर् आच्चान् पिळ्ळै से ईदू व्याख्यान का अध्ययन करते हैं और कालांतर में आलवार तिरुनगरी लौटकर उसे मणवाल मामुनिगल को सिखाते हैं, जो ईत्तू पेरुक्कर (जिन्होंने ईदू व्यख्यान का पोषण किया) के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस तरह नम्पिळ्ळै स्वामीजी जानते थे की ईडु व्याख्यान हस्तांतरित होते हुए मणवाल-मामुनि तक पहुंचा और इसीलिए उन्होंने इसे ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् स्वामीजी को दिया ।

अतुळाय : दादी, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् एवं ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् में ईयुण्णि शब्द का क्या अभिप्राय है ?

दादी : तमिळ में “ईथल” का अर्थ है परोपकार । “उन्नुथल” का अर्थ है भोजन करना । ईयुण्णि का अर्थ है – वह जो बड़े परोपकारी है, जो अन्य श्री वैष्णवों को भोजन कराने पर ही स्वयं भोजन करता है ।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे प्रमुख शिष्य पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी थे | जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की | ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है | पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्यारे शिष्यों में थे इसीलिए उनको पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् कहा जाता था | उन्होंने अपना जीवन आचार्यो के प्रति बहुत सम्मान प्रतिष्ठा के साथ एक सत्य श्री वैष्णव की तरह जिये | उनका आचार्य अभिमान बहुत ही प्रसिद्व है |

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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् – नम्पिळ्ळै के चरण कमलों में

पराशर: दादी, आज अपने नम्पिळ्ळै स्वामीजी और उनके शिष्यों के बीच हुई बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताया | कृपया उनके बीच हुई कुछ रोचक बातचीत बताएं।

दादी : हमारे सभी पूर्व आचार्यो ने भगवत् विषयम और भागवत् कैंकर्यं संबंधी को ही प्रकाशित किया | एक बार जब पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् बीमार थे, तो वह अन्य श्री वैष्णव से पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के शीघ्र स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहते हैं। आम तौर पर हमारे संप्रदाय में, श्री वैष्णव को किसी भी चीज़ के लिए भगवान् जी से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए – यहाँ तक कि बीमारी से उबरने के लिए भी नहीं । यह देखकर, नम्पिळ्ळै के शिष्यों ने इसके बारे में नम्पिळ्ळै से पूछ ताछ की। नम्पिळ्ळै पहले कहते हैं, ” आप एंगल अलवान स्वामीजी के पास जाओ और उनसे पूछो जो सभी शास्त्रों के विशेषज्ञ है | एंगळ अळवान स्वामीजी ने उत्तर दिया “वह श्री रंगम से जुड़ा हो सकते है और वह कुछ और समय के लिए यहां रहना चाहता है”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तब अपने शिष्यों से अममांगी अम्माल से यह पूछने के लिए कहा कि “कौन होगा जो नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कालक्षेपं को छोड़ना चाहता है, वह प्रार्थना कर रहे होंगे ताकि वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कालक्षेपं को सुन सके”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी अंत में खुद जीयर स्वामीजी से पूछते है। जीयर स्वामीजी जवाब देते है, “यद्यपि आप वास्तविक कारण जानते हैं, फिर भी आप चाहते हैं कि यह मेरे द्वारा प्रकट हो। चलिए में कहता हूँ की मैं यहां क्यों रहना चाहता हूं। प्रतिदिन, आप स्नान करने के बाद, मुझे आपके रूप के दिव्य दर्शन प्राप्त होते है और पंखा आदि लगाकर आपकी सेवा करने का अवसर मिलता है। मैं उस सेवा को कैसे छोड़ सकता हूं और अभी कैसे परमधाम जा सकता हूं? ”। इस प्रकार, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शिष्य के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते है और कहते है की एक शिष्य , स्वयं के आचार्य के दिव्य रूप में पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए | यह सब सुनकर शिष्यों को जीयर स्वामीजी की नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति भक्ति देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ। पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् को नम्पिळ्ळै स्वामीजी से इतना लगाव था कि वह परमपद पर जाने का विचार भी त्याग देते थे । पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के आचार्य में गहरी निष्ठा थी |

अंत में, हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के एक और शिष्य के बारे में देखते हैं जिनका नाम
नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् | प्रारंभ में, नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् स्वामीजी का नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति अनुकूल रवैया नहीं था। अपनी समृद्ध पारिवारिक विरासत (कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) और पराशर भट्टर के परिवार में आने के कारण) उनको अभिमान हो गया था और नम्पिळ्ळै स्वामीजी का सम्मान नहीं करते थे । एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है कि कैसे उन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलो में शरणागति की ।

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् तृतीय पंक्ति में

व्यास : यह कैसी विडंबना है कि कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के वंशज में गर्व और अहंकार के गुण थे। दादी हमें कहानी बताओ!

दादी : हाँ, लेकिन अनचाहा गर्व लंबे समय तक नहीं रहता ! सब के बाद, वह कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के ही पोते थे ! एक बार, नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) राजा के दरबार में जा रहे थे । वह रास्ते में पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से मिलते है और उन्हें राजा के दरबार में जाने के लिए आमंत्रित करते है। राजा उनका स्वागत करता है, उनका सम्मान करता है और उन्हें एक अच्छा पद बैठने के लिए प्रदान करता है। अच्छी तरह से सीखा हुआ राजा को नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) की बुद्धि का परीक्षण करना चाहते हैं, वह उनसे श्रीरामायण के बारे में सवाल पूछते हैं। श्री राम स्वयं कहते हैं कि वह सिर्फ एक इंसान हैं और राजा दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। लेकिन जटायु के अंतिम क्षणों के दौरान, श्री राम जी उनको वैकुण्ठ तक पहुँचने का आशीर्वाद दिया।  अगर वह एक सामान्य इंसान थे , तो वह किसी को वैकुंठ तक पहुंचने के लिए कैसे आशीर्वाद दे सकते है? ”। भट्टर स्वामी जी अवाक थे और किसी भी सार्थक स्पष्टीकरण के साथ प्रतिक्रिया नहीं दिए । संयोग से, राजा का ध्यान किसी अन्य कार्य में चला जाता है। उस समय, भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तरफ देखकर कहते है की नम्पिळ्ळै स्वामीजी ही आपको यह प्रकाशित करेंगे की कैसे एक सत्यवान पुरष पुरे विश्व को वश में कर सकता है | भट्टर स्वामीजी राजा को उस समय समझाते है कि जब राजा उन पर ध्यान केंद्रित करता है। राजा, एक बार उत्तर सुनकर सहमत हो जाता है और भट्टार को बहुत धन के साथ सम्मानित करता है। भट्टर स्वामी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति के प्रति महान कृतज्ञता दर्शाते हुए कहते है वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तिरुमोळि में जाते है और जो धन उनको राजा से मिला है उसको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के श्री चरणों में समर्पित करते है | भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी को यह कहते है की मुझे आपकी शिक्षाओं में से सिर्फ एक छोटी सी व्याख्या करने से ये सारी दौलत मिली। सभी के साथ, मैंने आप के मूल्यवान संघ / मार्गदर्शन को खो दिया है। अब से, मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि मैं आपकी अच्छी तरह से सेवा करूँ और आपसे संप्रदाय के सिद्धांत सीखूँ। ” नम्पिळ्ळै स्वामीजी भट्टर स्वामी जी को आलिंगन करते है और उन्हें हमारे संप्रदाय के सभी सार सिखाते हैं। तो बच्चों, आप इस कहानी से क्या सीखते हैं?

वेदवल्ली : मैंने अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से यह सीखा है, पराशर भट्टर स्वामीजी सही गंतव्य पर पहुंच गए।

अतुल्हे : मैंने नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामीजी) की महानता और उनके ज्ञान के बारे में सीखा।

दादी: तुम दोनों सही हो। लेकिन एक और सबक है जो हम इस कहानी से सीखते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि श्रीमन्न नारायण भगवानजी हमें तभी स्वीकार करते है जब हम अपने आचार्यों के माध्यम से उनसे संपर्क करते हैं, और आचार्य तक पहुंचना हो तो श्री वैष्णव जन के साथ दिव्य सम्बन्ध होना चाहिए | इसी को हम श्री वैष्णव सम्बन्ध या अडियरगळ सम्बन्ध कहते हैं। यहाँ, ऐसा कौन श्री वैष्णव होगा जिन्होंने पराशर भट्टर को नम्पिळ्ळै से जोड़ा था?

दादी: हाँ! इससे हमें भागवत सम्बन्ध का महत्व पता चलता है।  जीयर स्वामीजी, नम्पिल्लई के प्रिय शिष्य होने के नाते, आचार्य ज्ञान (प्राप्ति) और संबंध के साथ भट्टार को आशीर्वाद दिया। आइए हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलों और उनकी साधनाओं पर ध्यान दें।

बच्चे विभिन्न आचार्यों और उनकी दिव्य सेवाओं की महानता के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-nampillais-sishyas/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-nampillai/

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