Monthly Archives: June 2019

Posters – dhivya prabandhAmrutham – thamizh

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

தனியன்கள் – https://drive.google.com/open?id=1HC1da6Mn_iOC4maqrgZMB4SUM-gqtE3S

Thanks to SrI nArAyAnan for preparing the posters.

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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