Author Archives: Romesh Chander Sharma

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्री पराशर भट्टर्

पराशर, व्यास वेदवल्ली और अतुलाय के साथ अण्डाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु : स्वागत बच्चो | आज हम अगले आचार्य जी जिनका नाम नन्जीयर् स्वामीजी है जो भट्टर स्वामीजी के शिष्य थे उनके बारे में जानेंगे | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया था की नन्जीयर् स्वामीजी जिनका जन्म श्रीमाधवार जी के रूप में हुआ उनको सम्प्रदाय में रामानुज स्वामीजी की दिव्या आज्ञा के अनुसार पराशर भट्टर स्वामीजी सम्प्रदाय में लेकर आये थे | हमनें देखा कैसे भट्टर स्वामीजी पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए | वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

व्यास : दादी, अगर रामानुज स्वामी जी और भट्टर स्वामी जी जैसे आचार्य दूसरे सम्प्रदाय को मानाने वाले जैसे यादव प्रकाश (जो बाद में गोविन्द जीयर बने), गोविंदा पेरुमल ( जो एम्बार स्वामी जी कहलाएं), यज्ञ मूर्ति ( जो अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति) कहलायें) और माधवर (जो नन्जीयर स्वामीजी कहलाये), उन्होंने शैव मत के राजाओं को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की जिनके कारण उनको कठिनाईओं का सामना करना पड़ा? वह शैव राजाओं से दूर क्यों रहे ?

दादी : व्यास हमारे पूर्व आचार्य जानते थे की किसको सुधारा जा सकता है किसको नहीं? उक्त आचार्य के मामले में, एक बार जब वे जानते थे कि प्रतिद्वंद्वी सही था, तो उन्होंने गरिमा के साथ हार स्वीकार कर ली और न केवल उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उन्होंने पेरिय तिरुमलई नम्बि, रामानुज स्वामी और श्री भट्टर स्वामी जी के चरण कमलो में समर्पण कर दिए और श्री वैष्णव संप्रदाय स्वीकार किये | हालाँकि, शैव राजा न तो एक उचित तर्क के लिए तैयार थे और न ही उन्होंने हार मानने के लिए पर्याप्त सम्मान दिया और श्रीमान नारायण की सर्वोच्चता के शाश्वत सत्य को महसूस किया | जैसा कि पुरानी कहावत है, “केवल जो सो रहा है उसे जगाना संभव है, जो सोने का बहाना कर रहा है उसे जगाना असंभव है”। हमारे पूर्वाचार्य जानते थे कि वास्तव में कौन सो रहा था और कौन केवल दिखावा कर रहा था। इसलिए उनके फैसले अलग-अलग थे। इसके अलावा, ऐसे व्यक्तियों के दोषों के बावजूद, हमारे पूर्वाचार्यों ने भी उनकी मदद करने के लिए वास्तव में प्रयास किया है, लेकिन बाद में दूसरी तरफ से बहुत अधिक प्रतिरोध छोड़ दिया।

पराशर : दादी, माधवार स्वामीजी को नन्जीयर नाम कैसे मिला |?

दादी : भट्टर स्वामी ने माधवर स्वामी को शास्त्रार्थ में पराजित किये और श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा – माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए । श्रीभट्टर स्वामी जी के चले जाने के बाद, माधवर को अपने फैसले से कोई समर्थन नहीं मिला। श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धन–संपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है – संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्य–भक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर “नम्–जीयर” से सम्भोधित करते है और तबसे नम्–जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए । भट्टर और नन्जीयर् आचार्य–शिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर् सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । उनकी आचार्य भक्ति की कोई सीमा नहीं थी | नन्जीयर् कहते थे – वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुःख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयर् को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर् – तिरुनारायणपुरं

अतुलाय : दादी, हमें नन्जीयर् स्वामीजी जी की भक्ति के बारे में कुछ कथा बताये ?

दादी : एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर् अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर् से कहे की नन्जीयर् आपको यह सन्यासाश्रम उचित नहीं लगता, आपको मुझे नहीं उठाना चाहिए | नन्जीयर् स्वामीजी कहते है अगर मेरा त्रिदण्डं मेरे कैंकर्य में रूकावट बन रहा है तो में इसे तोड़ देता हूँ और अपना सन्यासाश्रम छोड़ देता हूँ |

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर् से शिकायत किए । नन्जीयर् ने कहा – यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर् के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर् स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

वेदवल्ली : अभी जो वार्तालाप हुआ क्या आपको पसंद आया ?

दादी (मुस्कुराते हुए ) : हाँ, हमारी चर्चा पसंद आयी लेकिन बहुत रोचक चर्चा थी |

एक बारे नन्जीयर स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा – क्यों सारे आळ्वार भगवान श्री–कृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है – जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभी–अभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।

एक और बार नन्जीयर् स्वामी जी भट्टर स्वामीजी से पूछते है की राजा महाबली पाताल लोक में क्यों गए और उनके गुरु शुक्राचार्य जी की आँख कैसे खो गयी ?
भट्टर स्वामीजी कहते है जब उनके गुरु शुक्राचार्य जी राजा महाबली को उनका बचन पूर्ण करने के लिए रोकते है जो उन्होंने उस समय वामन भगवान जी से किया था, उसी कारण उनकी आँख चली गयी और जैसे राजा महाबली ने अपने आचार्य की आज्ञा नहीं मानी इसीलिए उन्हें पाताल लोक जाने का दंड मिला | इसलिए, यहाँ, भट्टर स्वामीजी इस बात पर जोर देते हैं कि किसी के अपने आचार्य का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। उनके बीच कई ऐसी दिलचस्प बातचीत हुई। इन वार्तालापों ने नन्जीयर् को उनके लिखित कार्यों में भी मदद की।

एक दिन नन्जीयर् स्वामीजी चाहते थे उनके लिखे हुए काम की प्रतियां बनायीं जाये और अपने शिष्यों से पूछा की कौन इस कैंकर्य को करने योग्य है | नम्बुर वरदराजार स्वामीजी का नाम प्रस्तावित किया | नन्जीयर् स्वामीजी ने पहले सम्पूर्ण तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान का कालक्षेप वरदराज स्वामीजी को दिए और फिर उन्हें व्याख्यान की मूल प्रति प्रधान की | वरदराज स्वामीजी ने निर्णय लिए की वह अपने मूल ग्राम जो कावेरी नदी की किनारे पड़ता था वहां जाकर लेखन पर ध्यान केंद्रित कर सके और इसे जल्दी से समाप्त कर सके । नदी पर करते समय अकस्मात बाढ़ आ गयी और वरधराजर स्वामीजी तैरने लगे । ऐसा करते समय, मूल ग्रन्थम उसके हाथ से फिसल जाता है और वह तबाह हो जाता है। अपने मूल स्थान पर पहुंचने के बाद, वह अपने अचर्यन और उसके द्वारा दिए गए अर्थों पर ध्यान देते है और तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान को फिर से लिखना शुरू करते है। चूंकि वे तमिल भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ थे, इसलिए जहाँ भी उनको लगता, अच्छे अर्थ जोड़ते हैं और जब अंत में नन्जीयर् स्वामीजी के पास वापस लौटते हैं तो उनको हस्त लिखित ग्रन्थ प्रस्तुत करते हैं। नन्जीयर् स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान देखकर समझ जाते है कि मूल ग्रन्थ से कुछ परिवर्तन हुआ है , और पूछते है यह कैसे हुआ ? वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वाला प्रतिनिधि होगा । नन्जीयर् स्वामीजी ने भी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की महिमा का गुणगान किये जब नम्पिळ्ळै स्वामीजी नन्जीयर स्वामीजी से बहुत सुन्दर बेहतर स्पष्टीकरण देते है तो नन्जीयर् स्वामीजी प्रसन्न होते है | यह नन्जीयर् स्वामीजी की महिमा को प्रकाशित करता है | भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर् ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर् की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

व्यास : दादी, हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में बताइये |

दादी : में आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में और उनकी महिमा की बारे में कल बताउंगी | अभी देरी हो रही है | अभी आपको घर चाहिए |

बच्चे भट्टर स्वामीजी, नन्जीयर् स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में चिंतन करते हुए घर जाते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-nanjiyar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री पराशर भट्टर्

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

पराशर और व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो ! आज हम दूसरे आचार्य जी के बारे में बात करेंगे जिनका नाम श्री पराशर भट्टर् जी था, जो एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी के शिष्य थे और उनका एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और एम्पेरुमानार जी के प्रति बहुत स्नेह भक्ति रखते थे | जैसे मैंने आपको बताया की एम्पेरुमानार जी श्री पराशरजी और महर्षि व्यास जी की प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कुरेशा स्वामीजी की दोनों पुत्रो का नाम श्री पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते है | यह उन तीन वचनों में से एक वचन था जो उन्होंने अपने गुरूजी श्री आळवन्दार् स्वामीजी से पूरा करने के लिए किया था | श्री पराशर और वेद व्यास भट्टर जी का जन्म श्रीरंगम के श्रीनाथ पेरिय पेरुमाल जी से प्रसाद रूप में कुरेशा जी और उनकी पत्नी अण्डाल जी से हुए थे |

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

पराशर : दादी, क्या मेरा और व्यास का नाम आचार्य जी के नाम पर रखा गया ?

दादी : हाँ, पराशर ! बच्चो का नाम आचार्य जी के नाम पर ही रखा जाता है या फिर भगवान के नाम पर ताकि बच्चो को बुलाते हुए हमें भगवानजी और आचार्यजी का दिव्य नाम लेने का अवसर प्राप्त हो | इसी कारण से हम अपने बच्चो का नाम भगवान, श्रीलक्ष्मीजी या आचार्यजी के नाम पर रखते है ताकि हम उनका पवित्र नाम लेकर बच्चो को पुकारे और हमें समय मिले की हम अपने आचार्य जी और भगवानजी के बारे में और दिव्य गुणों के बारे में विचार कर सके| अन्यथा इस कार्यरत संसार में किसके पास इतना समय नहीं होगा की समय निकाल कर भगवानजी के बारे में और उनके दिव्य नामो के बारे में सोच सके ? लेकिन वर्तमान में हालत बदले हुए है| जीव फैशन परस्त नामों को प्रयोग में लाते है जिसका कोई तर्क नहीं बनताजिससे हमें भगवान, श्रीमहालक्ष्मीजी, हमारे आचार्य जी का भी स्मरण नहीं होता |

श्रीरंगम आने के बाद एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

व्यास : दादी, एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के आचार्य कैसे बने?

दादी : दोनों बच्चों  के जन्म के बाद, एम्पेरुमानार एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी को दोनों बच्चों  लाने के लिए भेजते है ताकि वह उन बच्चों  अपनी दृष्टि डाल सके | एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जैसे ही दोनों बच्चों  को देखा उन्हें ज्ञात हो गया यह बच्चों  का जन्म संप्रदाय के लिए हुआ है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बच्चों  के मुख पर महान तेज देखा और तत्काल बच्चों  की रक्षा के लिए द्वय महा मंत्र का जाप किया ताकि बच्चों  को किसी की बुरी नजर न लगे | एम्पेरुमानार जी ने बच्चों  को देखा और तत्कालिक निर्णय लिया की दोनों  को द्वयं मंत्र के द्वारा सम्प्रदाय में लाया जाये | एम्पेरुमानार जी के पूछने पर श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बताया की उन्होंने बच्चों  की रक्षा के लिए पहले ही द्वयं मंत्र का उच्चारण किया | तब से  श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी को उन दोनों बच्चों  का आचार्य नियुक्त किये गए जब उन्होंने दोनों को द्वयं मंत्र उच्चारण करके उनको दीक्षित किया | दोनों बच्चे एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और अपने पिताजी से सीखते हुए बढ़े हुए | जैसे बच्चों  का जन्म भगवान के आशीर्वाद से हुआ था, उसी तरह दोनों बच्चे पेरिय पेरुमल और पेरिय पिराट्टी के प्रति स्नेह भावना रखते थे | एम्पेरुमानार जी भी आलवान स्वामीजी से कहते थे की वह अपना बेटा पराशर भट्टर जी एम्पेरुमानार जी को पेरिया पेरुमल का बेटा समझ कर सौंप दे और आलवान स्वामीजी ने ऐसा ही किया | ऐसा कहा जाता है की भट्टर स्वामीजी जब वह बच्चे थे  श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनका  पालन – पोषण करती थी | | इस तरह का प्रेम और संबंद्व था श्री भट्टर स्वामी का पेरिय पेरुमाल और पिरट्टि के बीच | जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरिय पेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे  | रामानुज स्वामीजी भट्टर स्वामी में अपने आप को देखते थे | रामानुज स्वामी जानते थे भट्टर स्वामी ही आगामी दर्शन प्रवर्तकार होंगे |भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे | उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाने वाली कई कहानियाँ हैं।

अत्तुलाय : दादी, हमें उसकी बुद्धि के बारे में कुछ कहानियाँ बताएं ?

दादी : एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नाम से जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगं में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं। भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |

वेदवल्ली : यह एक अच्छा जवाब था।

दादी : यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।

व्यास : जैसे पिता वैसे पुत्र !

दादी ( मुस्कुराते हुए ) : सही ! भट्टर अपने पिता आलवान स्वामी जैसा ज्ञान और मेधा शक्ति रखते थे | श्री रंग राज: स्तवं में,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि मंदिर को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं । इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं । उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।

वेदवल्ली: दादी, जब श्री रंग नाच्चियार् जी ने भट्टर जी का पालन- पोषण किया, क्या तब भट्टर जी पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे जैसे थिरुकाची नम्बि जी देव पेरुमल जी से करते थे ?

दादी : हाँ, वेदवल्ली तुम ठीक कह रही हो | भट्टर जी भी श्रीरंगम में पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे | क्या आप जानते हो वर्ष में एक बार वैकुण्ठ एकादशी से एक दिन पहले, पगल पथु उत्सव के दसवें दिन, नम्पेरुमाळ जी नाच्चियार अम्मा जी की वेश वूशा धारण करते है? नम्पेरुमाळ जी श्रीरंग नाच्चियार जी के अलंकार धारण करते है और बहुत सुंदरता से श्रीरंग नाच्चियार जी की तरह इस दिन बैठते है | एक दिन नम्पेरुमाळ जी भट्टर स्वामीजी को बुलाकर पूछते है की क्या वह श्रीरंग नाच्चियार जी जैसे दीखते है | भट्टर स्वामीजी जो माता लक्ष्मी जी की तरफ अपना पक्ष रखते, नम्पेरुमाळ जी की तरफ प्रीति से देख कर कहते की प्रभु जी सब अलंकार बहुत सुन्दर है लेकिन जो करुणा लक्ष्मी माता जी के नेत्रों में है वह आपके कमल नयनो में नहीं | इस प्रकार का वात्सल्य था भट्टर स्वामीजी का माँ श्रीरंग नाच्चियार जी की प्रति |

हालाँकि, भट्टर जी के सैकड़ों अनुयायी थे, जो नियमित रूप से उनके  कालक्षेप को सुनते थे और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होते थे, फिर भी बहुत कम लोग थे जो भट्टर जी को नापसंद करते थे। यह महान लोगों के लिए बहुत आम है। यह  रामानुज स्वामीजी  के साथ भी हुआ। एक बार, भट्टर जी को नापसंद करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें ईर्ष्या और घृणा से डांटना शुरू कर दिया। अगर कोई आप पर चिल्लाता है, तो आप क्या करेंगे?

व्यास :  मैं उस पर वापस चिल्लाऊँगा। मैं क्यों चुप रहूं?

दादी: यह वास्तव में हम में से अधिकांश ऐसे होते है , यहां तक ​​कि वयस्क भी ऐसा ही करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भट्टर जी ने क्या किया? उन्होंने अपने गहने और महंगे शॉल उस व्यक्ति को भेंट किए, जो उन पर चिल्लाया था। भट्टर जी ने यह कहकर उनका धन्यवाद किया कि “हर श्रीवैष्णव को दो काम करने चाहिए – एम्पेरुमान जी की महिमा गाओ और अपने स्वयं के दोषों के बारे में भी विलाप करो। मैं एम्पेरुमान जी की महिमा को गाने में इतनी गहराई से डूब गया कि मैं अपने दोषों के बारे में विलाप करना भूल गया। अब आपने अपना कर्तव्य पूरा करके मुझ पर बड़ा उपकार किया है, इसलिए मुझे केवल आपको पुरस्कृत करना चाहिए ”। ऐसी थी उनकी विशालता।

पराशर : दादी , मुझे स्मरण है की आप कह रही थी की रामानुज स्वामीजी ने ही भट्टर स्वामीजी को आदेश दिया था की नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को सम्प्रदाय में लेकर आये | भट्टर स्वामीजी ने ऐसा कैसे किया होगा ?

दादी : मुझे बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार की पराशर तुम्हे यह सब स्मरण है | हाँ, जैसा रामानुज दिव्य आज्ञा में बताया गया है, भट्टर स्वामीजी तिरुनारायणपुरम जाते है और नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आते है | हमने इस जगह के बारे में पहले से सुना हुआ है ? क्या किसी को स्मरण है कब ?

वेदवल्ली : मुझे याद है | तिरुनारयणपुरम मंदिर उन सब मंदिरो में से एक है जहाँ रामानुज स्वामीजी ने सुधार किया था | रामानुज स्वामीजी ने श्री मेलकोटे मंदिर में व्यवस्था लागू की |

दादी : बहुत अच्छे वेदवल्ली | रामानुज स्वामीजी ने तिरुनारायणपुरम मंदिर में शेल्वपिळ्ळै भगवान जी की उत्सव मूर्ति मुस्लिम अक्रान्ताओ से छुड़ाकर वापिस मंदिर में पुनः स्थापित की थी | भट्टर स्वामीजी जिस कक्ष में माधवाचार्य (नन्जीयर स्वामीजी का असली नाम ) प्रसाद वितरित कर रहे होते है, सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर स्वामीजी का नम्पेरुमाळ जी और श्रीरंग नाच्चियार जी के दिव्य विग्रहो के प्रति बहुत अनुराग था | भट्टर स्वामीजी कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । एक बार कुरेश स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा अगर परमपदनाथ के दो या चार हाथ हुए तो, भट्टर स्वामीजी जवाब देते है की अगर परमपदनाथ जी के दो हाथ होंगे तो वह पेरिया पेरुमल जैसे दिखेंगे और अगर उनके चार हाथ होंगे तो वह हमारे नम्पेरुमाळ जी जैसे दिखेंगे | भट्टर स्वामीजी कभी भी अन्य जीवों को देखकर भी उनमे नम्पेरुमाळ जी ही को देखेंगे | वह भगवान जी के सब दिव्य मंगल विग्रह को नम्पेरुमाळ ही बताते थे | । जब नम्पेरुमाळ जी उनको मोक्ष प्रधान करते है,भट्टर स्वामीजी अपनी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त करके इस संसार को छोड़ कर परमपद में जाकर अपने आचार्यो जी के साथ मिलते है ताकि वहां एम्पेरुमान जी का नित्य कैंकर्यं कर सके | कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

अतुलहाय : दादी, श्री भट्टर स्वामीजी का जीवन सुनाने में बहुत रूचि पूर्ण था | जो भक्ति उनमे दिखती थी नम्पेरुमाळ जी के प्रति और उनका संबंद्व मन को छू लेता है | अण्डाल अम्मा जी भी कितनी भाग्यशाली होंगी ऐसा महान पति पाकर और ऐसे महान बच्चे पाकर |

दादी : तुम बहुत ठीक कह रही हो अतुलहाय | अंडाल बहुत भाग्यवान समझेगी अपने आप को | कल में आपको नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) के बारे में बताउंगी जो की आगामी आचार्य थे | अब आप फल लो और घर जाओ |

बच्चे श्री भट्टर स्वामीजी और उनके दिव्य जीवन के बारे में सोचते हुए अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अंडाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो | अपने हाथ और पॉंव दो लो | में कुछ प्रसाद लेकर आती हूँ | क्या आप जानते हो कल कौन सा दिन है ? कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्रम, उत्तराषाढ नक्षत्र, का दिन है | यहाँ पर कौन आळवन्दार् स्वामीजी का स्मरण करता है?

अतुलहाय : मुझे याद है की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने देव पेरुमल जी से प्रार्थना करके रामानुज स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आये थे |

व्यास : हाँ | उनके परमपदम जाने के बाद उनके दिव्या शरीर के तीन उंगलिया मुड़ी हुई थी जो यह सूचित करती थी की उनकी अंतिम तीन मनोरथ अधूरे रह गए थे और रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए थे उनको पूर्ण करेंगे | जैसे ही रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए उसी समय तीनो मुड़ी हुई उंगलियां सीधी हो गयी |

पराशर : दादी हमें स्मरण है जब आपने कहा था की रामानुज स्वामीजी और आळवन्दार् स्वामीजी का संबंध मन और आत्मा का है और जो शारीरक इन्द्रियों से परे है |

दादी : वास्तव में, कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्र है | यह लीजिये प्रसाद | कल मंदिर जाना भूल मत जाना और महान आचार्य जी को अपना सम्मान देना जिन्होंने रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लेकर आये | आज आगे चलते है और चलो अपने दूसरे आचार्य एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) के बारे में जानते है | गोविन्द पेरुमाळ कमल नयन भट्टर् और श्री देवी अम्माळ को मधुरमंगलम में पैदा हुए । ये गोविन्द भट्टर, गोविन्द दास और रामानुज पदछायर के नामों से भी जाने जाते हैं । कालान्तर में ये एम्बार् के नाम से प्रसिध्द हुए । ये एम्पेरुमानार के चचेरे भाई थे जिन्होंने जब यादव प्रकाश एम्पेरुमानार की हत्या करने की कोशिश की तब ये साधक बनकर उन्हें मरने से बचाया ।

वेदवल्ली : दादी क्या मारा? मैंने सोचा था की रामानुज स्वामीजी का जीवन उस समय खतरे में था जब कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) स्वामीजी और पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) ने उनके प्राण बचाये थे | दादी कितनी बार उनके जीवन खतरे में था ?

दादी : बहुत बार | में आपको सब बताउंगी जैसी ही समय आएगा | उनका जीवन पहली बार तब खतरे में आया जब उनके गुरु यादव प्रकाश जी ने उनको मारना चाहा | रामानुज स्वामीजी और यादव प्रकाश जी में मत भेद था जब भी वेदो के श्लोको का अर्थ को बताना होता | श्रीयादवप्रकाश शास्त्रों में वर्णित श्लोकों का गलत अर्थ / तात्पर्य बतलाते । रामानुज स्वामीजी वेदो के श्लोको का गलत अर्थ / तात्पर्य सुनते बहुत बुरा अनुभव करते और तब श्री रामानुज स्वामीजी अन्य उदाहरण देकर श्लोकों का सही अर्थ बतलाते हुये श्रीयादवप्रकाश को सही तात्पर्य समझाने की कोशिश करते थे जैसे हमारे श्री विशिष्टाद्वैत संप्रदाय में अर्थ दिए हुए है | यादव प्रकाश जो की अद्वैत वादी थे कभी भी रामानुज स्वामीजी के द्वारा दिए गए अर्थो से प्रसन्न नहीं थे | वह जानते थे की जो अर्थ अनुवाद रामानुज स्वामीजी देते है वह ज़्यादा सार्थक है और इसीलिए प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव करने लगे | यादव प्रकाश जी सोचते थे की रामानुज स्वामीजी उनको आचार्य की पदवी से मुक्त कर देंगे जब की रामानुज स्वामीजी का ऐसा कोई उद्देश नहीं था | इसी कारण से यादव प्रकाश जी अपने मन में रामानुज स्वामीजी से द्वेष की भावना रखते थे | यादवप्रकाश भगवत रामानुज स्वामीजी से छुटकारा पाने अपने अन्य शिष्यों के साथ विचार विमर्श कर , रामानुज स्वामीजी को काशी यात्रा पर ले जाकर वही समाप्त कर देने की योजना बना कर, काशी यात्रा के लिए जाते है। यादवप्रकाश की इस योजना का , भगवत रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई गोविंदाचार्य (एम्बार) को पता चल जाता है । गोविंदाचार्य श्री रामानुज स्वामीजी को यादवप्रकाश की इस योजना से अवगत कराते हुए कांचीपुरम भेज देते हैं और इस तरह से गोविंदाचार्य (एम्बार) रामानुज स्वामीजी के प्राण बचा लेते है |

व्यास : दादी, क्या एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) यादव प्रकाश जी के शिष्य थे ?

एम्बार् – मधुरमंगलं

दादी : हाँ व्यास ! रामानुज स्वामीजी और गोविन्द स्वामीजी दोनों यादव प्रकाश जी से वेद अध्यन सीखने जाते थे | यद्यपि रामानुज स्वामीजी को अपने आप को बचाने के लिए दक्षिण भारत की तरफ यात्रा करनी थी, गोविन्द स्वामीजी यात्रा जारी रखते हैं और कालहस्ती पहुँचकर शिव भक्त बन जाते हैं जिससे उनको उल्लंगै कोंडा नयनार के नाम से जाने जाना लगे । उन्हें सही मार्ग दर्शन करने के लिए एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि को उनके पास भेज देते हैं ताकि गोविन्द स्वामीजी को सम्प्रदाय में वापिस ला सके । पेरिया नम्बि कालहस्ती जाते है और नम्माळ्वार जी के पासुर और आलवन्दार स्वामीजी के स्तोत्र रत्नम के श्लोको द्वारा गोविन्द पेरुमाळ को परिवर्तिन कर सके | गोविन्द पेरुमाळ जी को अपनी गलती की अनुभूति हुई और फिर वह संप्रदाय में वापिस आ जाते है | इसीलिए बच्चो आलवन्दार स्वामीजी परमपदम जाने के बाद भी इतने प्रभावशाली थे की केवल रामानुज स्वामीजी को ही सम्प्रदाय में नहीं लेकर आये बल्कि उनके मुसेरे भाई गोविन्द पेरुमाल जी को भी सम्प्रदाय में लेकर आये | जैसे पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को सम्प्रदाय में वापिस लेकर आते है इसीलिए वह उनके आचार्य भी थे और उन्होंने गोविन्द पेरुमाल जी का पञ्च संस्कार भी किया था | जैसे ही पेरिय थिरुमलई नम्बि गोविन्द पेरुमाल जी के साथ तिरुपति से वापिस आते है और गोविन्द पेरुमाल जी अपने आचार्य जी के कैंकर्य में लग जाते है | जहाँ एक विषय महत्वपूर्ण है जो आप सब ने देखा होगा | आपने देखा होगा की रामानुज स्वामीजी और पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी ही गोविन्द पेरुमाल जी के पास उनके परिवर्तन के लिए जाते है न की गोविन्द पेरुमाल जी अपने सुधार के लिए रामानुज स्वामीजी और पेरिय नम्बि स्वामीजी के पास जाते है | ऐसे आचार्य जो अपने शिष्यों के पास इसीलिए पहुँचते है की उनका बेहतर सुधार कर सके और उनके भलाई के लिए ही चिंतित रहते है उनको कृपा मातृ प्रसनाचार्य कहा जाता है | वह स्वयं अपने शिष्यों के पास शुद्ध भाव से पहुँच कर उन पर निर्हेतुक कृपा करते है जैसे एम्पेरुमान करते है | रामानुज स्वामीजी और पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी दोनों गोविन्द पेरुमाल जी के लिए कृपामात्र प्रसनाचार्य थे |

पराशर : दादी हमें गोविन्द पेरुमाल जी के बारे में और बताइये | उन्होंने कौन कैंकर्यं किया था ?

दादी : ऐसे बहुत सी घटना है जो गोविन्द पेरुमाल जी के ऊपर पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी का आचार्य अभिमान दर्शाती है | एक बार गोविन्द पेरुमाल जी पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी के लिए बिस्तर बना रहे थे, तो उन्होंने अपने आचार्यं जी के लेटने से पहले बिस्तर का निरक्षण किया | जब नम्बि स्वामीजी ने उनसे पूछा अपने ऐसा क्यों किया तो गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी उत्तर देते है की वह जानते है की इससे उनको नरक भोगना पड़ेगा, उनको नरक भोगना बुरा नहीं होगा जब तक आचार्य जी का बिस्तर सुरक्षित है और लेटने के लिए आरामदायक है | इससे उनके आचार्य अभिमान का गुण प्रकाशित होता है जहाँ पर गोविन्द पेरुमाल जी स्वयं के बारे में न सोचकर अपने आचार्य की तिरुमेनि (शारीर) की रक्षा करने में वे चिंतामग्न हैं । यह समय तब आया जब रामानुज स्वामीजी तिरुपति आते है ताकि वह पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी से श्रीरामायण का मूलतत्त्व सीख सके | रामानुज स्वामीजी जब एक वर्ष नम्बि स्वामीजी से सीखने के बाद वापिस जाते है, नम्बि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी को कुछ भेंट देने चाहते थे | रामानुज स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी को मांग लेते है और नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी को कैंकर्यं करने के लिए उनको सौंपने को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करते है | यह सुनकर गोविन्द पेरुमाल जी दुःखी होते है के उनको पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी को छोड़कर जाना पड़ेगा |

व्यास : दादी, नम्बि स्वामीजी ने गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों दे दिया ? गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों जाना पड़ा जब के वह आचार्यं कैंकर्यं करने में खुश थे ?

दादी : व्यास, गोविन्द पेरुमाल संप्रदाय में एक बड़ी भूमिका क्रियान्वित करते है जिससे वह रामानुज स्वामीजी के लिए विभिन्न कैंकर्यं कर सके । बचपन से ही, गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी के प्रति बहुत स्नेह और प्रेम भावना रखते थे |  रामानुज स्वामीजी के परमपदम पहुँचने के बाद, उन्होंने रामानुज स्वामीजी के दूसरे शिष्य और पराशर भट्टर जी का भी मार्गदर्शन किया | इतनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना जो उनका इंतज़ार कर रही थी जिससे उनको अपने आचार्य पेरिय थिरुमलई नम्बि जी को छोड़ना पड़ा और रामानुज स्वामीजी को अपना गुरु और मार्गदर्शक मानना पड़ा |  बाद में गोविन्द पेरुमाल जी ने रामानुज स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और सुंदर पासुर रचा जिस में रामानुज स्वामीजी की दिव्या शरीर की सुंदरता का वर्णन किया | इसको एम्पेरुमानार वाड़ीवालागु पासुर सुनाते है | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था , जब संप्रदाय पर बात आती है , बहुत अच्छे कारण के लिए आपको त्याग करना पड़ेगा और ऐसा ही गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने किया |

अतुलाहय : क्या गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने विवाह किया था ? क्या उनके बच्चे भी थे ?

दादी : गोविन्द पेरुमाल जी तो भगवद विषयम में लगन थी की उनको हर जगह और हर वस्तु में एम्पेरुमान दिखते थे | विवाह होने के बाद भी जब हम गोविन्द पेरुमाल जी का भगवद विषय की तरफ उठा हुआ जीवन देखते है, एम्पेरुमानार स्वामीजी स्वयं उन्हें सन्याश्रम प्रादान करते हैं और एम्बार् का दास्यनाम देकर उनके साथ सदैव रहने के लिए कहते हैं । अपने जीवन के अंतिम दिनों में एम्बार् स्वामीजी श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश देते है की श्रीवैष्णव संप्रदाय का प्रचार और प्रसार कर सके | उन्होंने श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश दिया की सदैव एम्पेरुमानार जी के चरण कमलो में प्रीती रखे और सदैव एम्पेरुमानार थिरुवडिगले शरणम् मंत्र का जाप करे | अपने आचार्यं रामानुज स्वामीजी के चरण कमलो में ध्यानमग्न रहते हुए और अपने आचार्य जी से ली हुई प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए, एम्बार परमपदम पहुँच जाते है ताकि वह अपने आचार्य जी के प्रति कैंकर्यं कर सके | श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी ने भी आचार्य आज्ञा का आदेश मानते हुए श्रीवैष्णव संप्रदाय परम्परा को और आगे प्रचार और प्रसार करने के लिए कैंकर्य किये |

वेदवल्ली : दादी, हमें श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी : में आपको श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताउंगी जब हम अगली बार मिलेंगे | अभी आप घर जाये, बाहर अँधेरा हो रहा है | और कल मंदिर जाना मत भूल जाना क्यूंकि कल आलवन्दार तिरुनक्षत्र है |

बच्चे अपने घर को आळवन्दार् स्वामीजी, पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी, रामानुज स्वामीजी और एम्बार स्वामीजी के बारे में सोचते हुए प्रस्थान करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 1

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अथुलाय के साथ अंडाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

पराशर : दादी, कल आपने हमसे कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और उनके शिष्यों के बारे में बताएंगी|

दादी : हाँ | रामानुज स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताने से पहले, हमें रामानुज स्वामीजी एक विशेष जानकारी होनी चाहिए | वह यह है की उनके अवतरण लेने से पहले ही श्री शठकोप स्वामी जी ने मधुरकवि आलवार स्वामीजी और नाथमुनि स्वामीजी को ५००० वर्ष पहले ही बता दिए थे | एक बहुत ही श्रेष्ट ग्रन्थ है चरमोपाय निर्णयम, जिसमे रामानुज स्वामीजी के वैभव के बारे में बताते है – इस ग्रन्थ में नम्माळ्वार स्वामीजी का नाथमुनि स्वामीजी के साथ वार्तालाप और रामानुज स्वामीजी का अवतार प्रकटीकरण पर बताते है | जो दिव्या विग्रह नम्माळ्वार स्वामीजी ने मधुरकवि आळ्वार स्वामीजी को अर्चन करने के लिए दिया था आज भी अलवारतिरुनगरी में भविष्यदाचार्य की दिव्य मूर्ति को संरक्षित उसका अर्चन आज भी सन्निधि में होता है |

रामानुज स्वामि – अलवारतिरुनगरी

व्यास: उत्कृष्ट | इसीलिए अलवार स्वामी जी और कुछ आचार्य जी रामानुज स्वामीजी के अवतार के बारे में पहले से जानते थे | यह तो बहुत उत्तम है दादी जी | दादी जी आप उनके जीवन के बारे प्रकाश जारी रखे |

दादी : हाँ, रामानुज स्वामीजी ने समस्त भारत का भ्रमण करते हुए श्री वैष्णव धर्म का प्रचार किए | चाहे उनको संघर्ष न करना पड़ा हो, लेकिन कोई न कोई विरोध किसी न किसी तरफ से अवश्य हुआ | रामानुज स्वामीजी ने सर्वजन का ह्रदय अपने ज्ञान और वात्सल्य से जीता | जब स्वामीजी कांचीपुरम में थे, उनका पाणिग्रहण थन्जाम्मा जी से हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने भगवान वरदराज की कृपा से सन्यास धारण किये | जब रामानुज स्वामीजी ने सन्यास धारण किया, तो उन्होंने अपनी सर्व निजी संपत्ति को त्याग दिया एक सिर्फ अपने भतीजे मुधलियांदान को छोड़ कर |

व्यास : दादी, उन्होंने विवाह क्यों किया और फिर सन्यास धारण कर लिए? उन्होंने गृहस्थ आश्रम क्यों नहीं स्वीकार किया और सर्व कैंकर्य उन्होंने क्यों नहीं किये ?

दादी : व्यास, इसके कई कारण है | एक, उनके अपनी पत्नी के बारे में कुछ विचारो को लेकर भेद था और दूसरा, आपको तत्पर रहना चाहिए बड़े मनोरथ को लेकर कुछ भी त्याग करने के लिए | जैसे हम सब जानते है की उनके कंधो पर दायित्व था सम्पूर्ण भारत वर्ष में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का प्रचार कर सके | जैसे की हमारे देश के सिपाही हमारे देश की रक्षा करते है, अपने परिवार और सम्बन्धी जन को छोड़ कर क्यूंकि उनके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है | अपने देश का रक्षण करना एक महान कार्य है | इसी तरह रामानुज स्वामीजी के मन में भी विशेष विचार था | उनको ज्ञात था की उनका उद्देश्य वेदो का सार प्रकाशित करने में है | इसीलिए उन्होंने सन्यास आश्रम धारण किये | एक महान सन्यासी बनने के बाद, मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी) और कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे महान विद्वान रामानुज स्वामीजी के शिष्य बने |

अथुलाय : क्या इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी लेना बोझ नहीं है? रामानुज स्वामी जी ने यह सब अकेले कैसे किया होगा ?

दादी : नहीं अथुलाय | यह कभी भी एक बोझ नहीं था | जब आप अपने कर्म को भावुकता से करते है तो आपको कभी यह बोझ नहीं लगेगा | इसके अतिरिक्त रामानुज स्वामीजी कभी भी एकमात्र नहीं थे | स्वामीजी हमेशा अपने मुख्य शिष्य जैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी),मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी),एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी),अनन्ताळ्वान् (श्री अनन्ताचार्य स्वामीजी),किडाम्बि आच्चान् (श्री प्रणतार्तिहर स्वामीजी),वडुग नम्बि (श्री आंध्रपूर्ण स्वामीजी),पिळ्ळै उऱन्गाविल्लिदासर् (श्री धनुर्दास स्वामीजी) जिन्होंने दिन रात स्वामीजी के सेवा करते है | उनके सभी शिष्य उनकी जीवन यात्रा में सदैव उनके साथ रहे | रामानुज स्वामीजी की जीवन यात्रा में उनको नुक्सान पहुंचाकर जहाँ तक की उनके प्राण तक लेने का बहुत बार प्रयत्न किया गया | ऐसे समय में एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) एवं कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे शिष्यों ने अपने प्राण खतरे में डाल कर स्वामीजी के प्राणो का रक्षण किये | आप सब को जानकारी होगी की कैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) एवं पेरिया नम्बि स्वामीजी शैव राजा के दरबार में चले गए और अपनी आँखे खो दी ? ऐसे महान शिष्यों उनके साथ रहते थे , रामानुज स्वामीजी ने बहुत निष्ठा पूर्वक सभी मंदिरो का प्रशासन को ठीक ढंग से चलने के लिए नियम रूपांतर किये |

रामानुज स्वामी – श्रीरंगम

वेदवल्ली : हाँ दादी जी , मैंने सुना है सभी मंदिरो की नियमावली और उत्सव जैसे श्रीरंगम मंदिर में और तिरुपति मंदिर में रामानुज स्वामीजी की द्वारा स्थापित किये गए | क्या आप हमें इसके बारे में विस्तार से बता सकते है ?

दादी : बिलकुल ठीक है वेदवल्ली | उन्होंने रीति-रिवाज को फिर से आगे बढ़ाया जैसा की वेदो में कहा गया है | उन्होंने देखा की सभी रीति-रिवाज इस तरह से पालन किये जाते है जैसे उन्होंने बताया और बहुत ध्यान पूर्वक उनका स्थापन किया| श्रीरंगम मंदिर पेरिया कोयिल नंबी द्वारा संरक्षित किया गया था। जैसा कि मैंने पहले कहा था, रामानुज स्वामीजी को मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए पेरिया कोयिल नंबी की तत्काल मंजूरी नहीं मिली थी। रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) को पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी के पास भेजा ताकि कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के मूल तत्व और मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन के लिए शिक्षित कर सके | कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी के समझाने के बाद पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी ने परिवर्तन स्वीकार करके रामानुज स्वामीजी की शरणागति की और बाद में तिरुवरन्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी) के नाम से सम्बोधित किये जाने लगे | बाद में श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी पर श्रीरामानुजनूत्तंदादि (१०८ पाशुर) लिखते हैं और उसे रंगनाथ भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्पण करते हैं। क्या आप जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित रामानुज स्वामीजी ही करते है और उस समय और भी मतावलम्बियों इस विष्णु भगवन जी अर्चा विग्रह को अपनी परिभाषा से सम्बोधित करते थे |

रामानुज स्वामी – तिरुमल

पराशर : क्या ? हम सभी जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान और कोई नहीं स्वयं भगवान् श्री विष्णु जी ही है | उन सबको इस पर संशय कब हुआ ?

दादी : हाँ|अथुलाय | तिरुवेन्गडमुडैयान ही स्वमयं व्यक्त साक्षात् भगवान् विष्णु जी है | उस समय कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसको अपने भगवान के नाम से कहते थे | कुछ पंडित जान कहते यह शिव है और कुछ विद्वान जन उनको कार्तिक स्वंय के नाम से कहते थे | एम्पेरुमानार तीर्थयात्रा पर निकलते है और अंत में तिरुमलै पहुँचते है, इतर मतावलम्बियों से विवाद में विजयी हो , तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित करते है , स्वयं भगवान के आचार्य बन भगवान को शंख और चक्र धारण करवाते है । (तिरुमला में भगवद्रामानुजाचार्य ज्ञान मुद्रा से विराजमान होकर दर्शन देते है। ) इसीलिए तिरुपति में रामानुज स्वामीजी मंदिर प्रशासन स्थापित के अलावा और बहुत कुछ किया| उन्होंने तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् की पहचान की स्थापना की। तभी से तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् जी ने रामानुज स्वामीजी को आचार्य पद से उनका वैभव प्रकाशित किये | यह वही जगह है, जहां रामानुज स्वामी जी अपने मामा पेरिया थिरुमलाई नंबी स्वामीजी से रामायण का सार सीखते हैं। वह थिरुणारायण पुरम मंदिर के साथ अन्य प्रमुख मंदिरों में मंदिर कर्तव्यों को स्थापित करने के लिए आगे बढ़ते है |

रामानुज स्वामी – तिरुनारायणपुरं

अथुलाय : दादी, मैंने सुना है की उन दिनों जैन मतावलम्बियों ने रामानुज स्वामीजी के लिए समस्या खड़ी कर दी थी ?

व्यास : मैंने सुना है की थिरुनरायणा पुरम मंदिर के भगवान् जी का अर्चा विग्रह उस समय मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था |

दादी : यह सत्य है | रामानुज स्वामी जी को उन सुधारों के बारे में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो वह मंदिरों और हमारे संप्रदायम के सुधार के लिए स्थापित करने के इच्छुक थे। हालांकि, परिवर्तन ऐसा कुछ था की ज्यादा तर विद्वान लोगो ने उन परिवर्तनों का स्वागत नहीं किया | सभी पुराने रीति-रिवाजों, चाहे वह सही हो या गलत में ही सुरक्षित महसूस करते थे और कभी भी बदलाव स्वीकार नहीं करते थे और न ही उस व्यक्ति को जो बहुत आवश्यक परिवर्तन लाने की कोशिश करता है। यह समाज का आम दृष्टिकोण है। आज का समय में भी, परिवर्तन मुश्किल है, इसलिए 1000 साल पहले कल्पना करें, जब रूढ़िवाद प्रथा और विश्वास इतने कठोर थे, रामानुज स्वामीजी को कोई सकारात्मक परिणाम लाने से पहले इतना प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जैन विद्वान हमारे विशिष्टाद्वैत सिद्धांत दर्शन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे। रामानुज स्वामीजी को 1000 जैन विद्वानों द्वारा 1000 प्रश्नों के उत्तर देने के लिए चुनौती दी गई थी। सहस्त्र फनो वाले आदि शेष भगवान् के रुप में रामानुज स्वामीजी अपना मूल रूप धारण करते है और सभी प्रश्नो का उत्तर देते है और एक साथ बहस जीतते हैं |

थिरुनरायण पुरम मंदिर के श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था और यह विग्रह अक्रान्ताओ के राजा की पुत्री के महल के कक्ष में थी जो उस उत्सव विग्रह से खेलती और उससे अनुराग करती थी | जब रामानुज स्वामीजी श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह को वापिस श्री मेलकोट मंदिर में ले जाने के लिए आये तब मुस्लिम राजा की पुत्री उस्तव विग्रह से अपना वियोग सहन न कर सकी |

अथुलाय : ठीक वैसे जैसे की अंडाल अम्मा जी ( श्री गोदम्बा माता जी ) भगवान् श्री कृष्ण जी से अपना वियोग सहन न कर सके |

दादी : हाँ जैसे अंडाल अम्मा जी जैसे | एम्पेरुमानार तिरुनरायणपुरम मंन्दिर के उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै को एक मुस्लिम राजा की बेटी से प्राप्त कर तिरुनारायणपुरम मे उनकी स्थापना करते है उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै के प्रेम में मगन मुस्लिम राजकुमारी के उत्सव पेरुमाळ के पीछे तिरुनारायणपुरम आने के बाद सेल्वपिळ्ळै और मुस्लिम राजकुमारी का विवाह सम्पन्न करवाते है । यह भक्ति की पराकाष्ठा है और वह अपने परम प्रभु जी के प्रति प्रेम जो न जाती देखता है न पंथ (मज़हब) |

कूरत्ताळ्वान् – रामानुज स्वामी – मुदलियान्डान

व्यास : दादी, अपने हमें कभी यह नहीं बताया की रामानुज स्वामीजी ने आलवन्दार स्वामीजी के ३ मनोरथ कैसे पूर्ण किये |

दादी : कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जी के दो पुत्र रतन हुए | रामानुज स्वामीजी ने दोनों का नाम व्यास और पराशर रख कर दो महान ऋषियों की महानता को स्वीकार करते हुए आलवन्दार स्वामी जी का पहला वचन पूरा करते है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी जिनको बाद में एम्बार् के नाम से जाने जाना लगा, एम्बार के भाई सिरियगोविन्दपेरुमाळ को एक पुत्र की प्राप्ति होती है और उसका नाम एम्पेरुमानार परांकुशनम्बि रखकर आळवन्दार के दूसरा वचन पूरा करते है । बाद में रामानुज स्वामीजी श्री भास्यम लिखकर आलवन्दार स्वामीजी का तीसरा वचन पूर्ण करते है | श्री भास्यम लिखने के लिए रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के साथ कश्मीर तक यात्रा की |

दादी : रामानुज स्वामीजी कश्मीर की यात्रा करते है जिससे उनको एक पुराणी लिखा ग्रन्थ जिसका नाम बोधायनवृत्ति था लेकर श्रीभाष्य ग्रन्थ लिख सके | राजा को प्रसन्न कर बोधायनवृत्ति ग्रन्थ प्राप्त कर, वापस श्रीरंगम की लिये प्रस्थान करते है, किसी आशंका के चलते कश्मीरी विद्वान अपने अनुचरों के सहायता से यह ग्रंथ रामानुज स्वामीजी से वापस ले लेते है ।

व्यास : कितना निर्दयी |

दादी : हाँ | बुरे लोगो द्वारा ग्रन्थ वापिस लेने से पहले कुरेशा स्वामी जी ने ग्रन्थ को इस तरह से कंठस्त कर लिया था की श्री भास्यम ग्रन्थ लिख सके |

व्यास : क्या पूरा ग्रन्थ कंठस्त कर लिया था ? यह कैसे संभव है दादी ? इच्छा है कि मैं भी अपनी पूरी विषय की पुस्तकों को याद कर सकता!

दादी ( मुस्कराते हुए ) : कुरेशा स्वामी जी रामानुज स्वामीजी के एक आम शिष्य नहीं थे | वह एक महान संपत्ति और रामानुज स्वामीजी के लिए एक आशीर्वाद थे | जब सभी जन अपने उद्धार के लिए रामानुज स्वामी जी की शरणागति ले रहे थे उस समय रामानुज स्वामीजी ने स्वंयम कहा की उनका उद्धार कुरेशा स्वामी जी से जुड़ने से हुआ है | इस तरह के एक महान विद्वान होने के बावजूद, कुरेश आलवार के शुद्ध दिल में अहंकार का एक भी हिस्सा नहीं था जिसमे रामानुज स्वामीजी निवास करते है। श्रीकूरत्ताळ्वान की सहायता से श्रीएम्पेरुमानार आळवन्दार को दिए हुए वचन ( श्री भाष्यं के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि) पूरी करते है । श्री रंगम में शैव राजा के देहांत के बाद रामानुज स्वामीजी श्री रंगम वापिस आ गए |

अंततः, वैकुण्ठ धाम पहुंचने से पहले और लीला विभूति को छोड़ने से पहले, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने किया था, रामानुज स्वामीजी ने निर्णय लिया की उनके जाने के बाद कौन आचार्य हमारे सम्प्रदाय का ध्यान रखेंगे, उन्होंने कुरेश स्वामीजी के यशस्वी पुत्र पराशर भट्टर को सम्प्रदाय का आचार्य घोषित किया | रामानुज स्वामीजी ने पराशर भट्टर और कुछ शिष्यों को निर्देशित किया की एम्बार (गोविन्दाचार्य स्वामीजी) की शरण में जाये और सम्प्रदाय सिधान्तो को सीखने के लिए उनका मार्ग दर्शन ले | उन्होंने शिष्यों को आज्ञा किये वह पराशर भट्टर स्वामीजी का भी वैसे ही आदर सम्मान करे जैसे वह एम्पेरुमानार का करते है | उन्होंने पराशर भट्टर स्वामीजी को भी आज्ञा किये की नन्जीयर स्वामीजी को सम्प्रदाय में ले आये, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने पेरिया नम्बि जी को दायित्व दिया था रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लाने का | अपने आचार्य श्री चरणों का ध्यान करते हुए, पेरियनम्बि स्वामीजी और आलवन्दार स्वामीजी का , एम्पेरुमान स्वामीजी इस लीला विभूति को छोड़ते है ताकि स्वामीजी श्रीमन्न नारायण का कैंकर्य नित्य वैकुण्ठ धाम में कर सके | उसी समय रामानुज स्वामीजी से वियोग को न सहते हुए गोविन्दाचार्य स्वामीजी भी वैकुण्ठ धाम को चले जाते है |

पराशर : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामीजी का पार्थिव शरीर आज भी श्री रंगम मंदिर में संरक्षित किया हुआ है | क्या यह सत्य है ?

दादी : हाँ! पराशर, यह सत्य है और जब हम अपने महान आचार्यो के बारे में बात करते है, हमें उनके श्री शरीर का वैसे ही स्मरण करना है जैसे हम भगवान् जी के श्री दिव्या विग्रह का करते है | यह वास्तव में सच है कि रामानुज स्वामीजी की थिरुमेनी श्री रंगम मंदिर के अंदर संरक्षित है, जो कि रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के ठीक नीचे है। आज हम जो रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के रूप में देखते हैं, वे एक समय श्रीरंगम में श्री रंगनाथन भगवान जी का वसंत मंडप था | अब हम भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के श्री चरणों में और भगवान श्री रंगनाथ अब, हम सभी हमारे आचार्यों और उनकी महिमाओं के बारे में और जानने के लिए श्री रामानुज स्वामीजी और भगवान श्री रंगनाथ के श्री चरणों में प्रार्थना करते हैं। अब, आप सभी को छोड़ना चाहिए क्योंकि आपको देर हो रही है । अगली बार जब हम मिलेंगे, मैं आपको रामानुज स्वामीजी के विभिन्न शिष्यों के बारे में , उनकी महिमा और रामानुज स्वामीजी की विजय यात्रा में उनके योगदान के बारे में बताउंगी |

बच्चे रामानुज स्वामीजी के बारे में उनके विभिन्न कैंकर्य में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों और कैसे हमारे संप्रदायम के महान आचार्य के रूप में उभरे, के बारे में सोचते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् शिष्य – भाग 2

पराशर, व्यास ने अंडाल दादी के घर में वेदवल्ली और अथथुले के साथ प्रवेश किया।

दादी : स्वागत बच्चों | अपने हाथ और पैर धो लो। थिरुआदिप पुरम उत्सव त्यौहार का प्रसाद यहां है, यह हमारे मंदिर में हुआ था। आज, हम अंडल पिराट्टी से बहुत प्रिय किसी पर अपनी चर्चा शुरू करेंगे, जिसे वह अपने भाई के रूप में बुलाती है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह कौन है ?

व्यास : नहीं दादी , अंडाल जी के भाई कौन थे ? क्या अंडाल जी का कोई भाई भी था ?

दादी : हाँ, वह उसका भाई था, जन्म से नहीं बल्कि प्यार और स्नेह से। उन्हें गोदाग्रज या कोयिल अन्नन कहा जाता था, जो हमारे रामानुजर के अलावा कोई नहीं है! अग्रजन का अर्थ संस्कृत में बड़े भाई होता है । गोदा जी द्वारा उनको बड़ा भाई मानना, इसीलिए उनको गोदाग्रज कहते है| स्वयं श्रीअनन्तशेष के अवतार, भगवत रामानुज स्वामीजी के पिता श्री केशवदीक्षितार और माता श्रीमती कान्तिमति देवी थी । भगवत रामानुज स्वामीजी का जन्म दक्षिणात्य चैत्र मास के आर्द्रा नक्षत्र के दिन वर्तमान तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदुर नामक गांव में हुआ। श्रीपेरूंबुदूर मैं श्री तिरुवल्लिक्केणि के श्री पार्थसारथी भगवान के अंशावतार के रूप मैं जन्म हुआ ।

पाराशर : दादी, क्या गोदा जी का अवतरण रामानुज स्वामीजी से पहले नहीं हुआ था? फिर रामानुज स्वामीजी गोदा जी के बड़े भाई कैसे हुए ?

दादी : पाराशर, बहुत अच्छा प्रश्न है | जैसे मैंने कहा था, रामानुज स्वामीजी गोदा जी के जन्म से भाई नहीं थे बल्कि अपने कर्मो के द्वारा उनके भाई थे | अंडाल, भगवान जी के प्रति उनका प्रेम स्नेह बहुत था, इसीलिए उनकी इच्छा थी की, भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग लगाए | लेकिन उस समय गोदा जी बाल्या अवस्था में होने से अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकी | रामानुज स्वामीजी नाच्चियार थिरुमोलही पाशुरम का पाठ करते है जहाँ गोदा जी अपनी इच्छा को पूरा करने की इच्छा प्रकट करती है | फिर रामानुज स्वामीजी १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को गोदाजी की और से लगाते है | भगवान जी को भोग लगाने के बाद रामानुज स्वामीजी जब श्रीविल्लिपुत्तूर जाते है और श्रीविल्लिपुत्तूर पहुँच कर, गोदाजी उनका अभिनन्दन करती है और उनको अपना श्रीरंगम से बड़ा भाई बोल कर संबोधित करती है, इसीलिए रामानुज स्वामीजी का एक नाम कोयिल अन्नन है | गोदाजी रामानुज स्वामीजी को बड़ा भाई इसीलिए कह कर संबोधित करती है क्यूँकि भाई वह होता है जो बहन का ध्यान रखे और अपनी बहन की इच्छा और मनोरथ पूर्ण करे |

अतुलाय, क्या आप तिरुप्पावै के पाशुरम का उच्चारण कर सकते हो ? मुझे स्मरण है की आप स्कूल बहुरूप पोशाक प्रतियोगिता में अभिनीत किया था और कुछ पाशुरम का उच्चारण भी किया था ?

(फिर अतुलाय कुछ पाशुरम का उच्चारण करती है )

दादी : क्या आप जानते है की मैंने क्यों आपको आज उच्चारण के लिए कहा था ? क्योंकि, रामानुज स्वामीजी को भी तिरुप्पावै जीयर के नाम से जाना जाता है | रामानुज स्वामीजी सदैव प्रतिदिन तिरुप्पावै का उच्चारण करते थे | महान विद्वान होने के बाबजूद भी, रामानुज स्वामीजी तिरुप्पावै को अपने मन के पास थी और उसका प्रतिदिन उच्चारण करते थे | क्या आपको मालूम है क्यों ?

वेदावल्ली : इसीलिए यह सिखने में सरल है ? मुझे सभी ३० पाशुरम आते है |

दादी (मुस्कराते हुए ) : वेदावल्ली, यह तो बहुत अच्छा है | तिररुप्पवाई सीखना सरल ही नहीं, परन्तु ३० पाशुरम में हमारे संप्रदाय का सार है | तिरुप्पावै का ज्ञान वेदो में जो ज्ञान है उसके समान है | इसीलिए इसको “वेदं अनैतत्तुक्कुम विठ्ठागुम” —- ३० पाशुरम में सर्व वेदो का सार निहित है |

अतुलाय : दादी, रामानुज स्वामीजी के तो बहुत सारे नाम थे | पहले अपने इळयाळ्वार कहा, फिर रामानुज, और अब कोयिल अन्नन और तिरुप्पावै जीयर |

दादी : हाँ | उनके यह सब नाम हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो ने, गोदा जी ने और भगवान जी ने स्नेह पूर्वक दिए | हमने रामानुज स्वामीजी के सभी आचार्यो के बारे में जाना और उनका रामानुज स्वामीजी के जीवन में योगदान जो उन्होंने दिया | चलिए रामानुज स्वामीजी के विभिन्न प्रकार के नाम देखते है और देखे की यह नाम उनको किस किस ने दिए है |

उनमे कुछ नाम इस प्रकार है,

१) इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे ।

२) श्रीरामानुज – उनके आचार्य श्रीपेरियनम्बि(श्री महापूर्ण स्वामीजी) ने दीक्षा के समय दिये थे।

३) यतिराज और रामानुज मुनि – श्री देवपेरुमाळ (भगवान वरदराज, कांची) ने उनके सन्यास दीक्षा के समय दिये थे।

४) उडयवर – नम्पेरुमाळ (भगवान रंगनाथ, श्रीरंगम ) ने दिया था।

५) लक्ष्मण मुनि – तिरुवरंगपेरुमाळ अरयर(श्री वाररंगाचार्य स्वामीजी) ने दिया था।

६) एम्पेरुमानार – जब श्रीरामानुजाचार्य ने गुरु से प्राप्त मन्त्र वहां उपस्थित सारे लोगों को बिना पूछे ही बतला दिया था तब श्री तिरुक्कोष्टियूर नम्बि(श्री गोष्टिपुर्ण स्वामीजी) ने यह नाम दिया था ।

७) शठगोपनपोन्नडि (शठकोप स्वामीजी की पादुका) – तिरुमलय अण्डाण(श्री मालाकार स्वामीजी) ने दिया था ।

८) कोयिल अन्नन – भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग लगाकर जब श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी ने माँ गोदाम्बाजी का प्रण पुरा करके, श्रीविल्लिपुत्तूर दर्शन के लिए आये तब माँ गोदाम्बजी ने दिया था।

९) श्रीभाष्यकार – कश्मीर में शारदा पीठ में श्रीभाष्य पर रामानुज स्वामीजी के विवेचन पर प्रसन्न हो सरस्वती देवी ने प्रदान किया था।

१०) भूतपूरीश्वर – श्रीपेरुम्पुदुर के श्रीआदिकेशव भगवान ने दिया था।

११) देषिकेन्द्रार – श्रीतिरुवेण्कटमुदयन(श्री वेंकटेश भगवान) ने यह नाम प्रदान किये थे ।

इस तरह से, यह संक्षेप में वह सब नाम है जो रामानुज स्वामीजी को बहुत सारे आचार्यो ने प्रदान किये जिन्होंने रामानुज स्वामीजी का ध्यान रखा और उनका ज्ञान संवर्धन किया ताकि हमारा सम्प्रदाय और बढ़ सके और आलवन्दार स्वामीजी के बाद रामानुज स्वामीजी इसको आगे ले जा सके | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के विशेष अनुग्रह के द्वारा उनको सबसे पहले तिरुक्काच्चिनम्बि (श्री काँचीपूर्ण स्वामीजी) से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के बारे में बतलाते है, बाद में श्री पेरियनम्बि(श्री महापूर्ण स्वामीजी), इळयाळ्वार को पंचसंस्कार दीक्षा प्रदान करते हैं, तिरुवायमोली का अनुसंधान थिरुमलाई अण्डाण जी से सीखते है, हमारे सम्प्रदाय का सार थिरुवरंगपेरुमल अरैयर जी से सीखते है, तिरुक्कोष्टियुरनम्बि (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी) से श्रीसम्प्रदाय के गोपनीय मंत्र सीखते है एवं रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन अपने मामाजी पेरिया थिरुमलाई नम्बि जी से सीखते है | इस प्रकार, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के ६ मुख्या शिष्यों ने अपने गुरूजी के प्रति अपनी सेवा कैंकर्य किये |

रामानुज स्वामीजी – श्री पेरुम्बुदूर

वेदावल्ली : दादी, जब आप आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में बता रही थी, अपने कहा था रामानुज स्वामीजी आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के शिष्य नहीं बन सके पर रामानुज स्वामीजी ने प्रण लिए था की वह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के मनोरथो की पूर्ति करेंगे | वह क्या थी ? रामानुज स्वामीजी को कैसे पता चला की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के क्या अभिलाषाएँ थी |

दादी : एक बहुत सुन्दर प्रश्न है | जब आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने पेरिया नम्बि स्वामीजी को रामानुज स्वामीजी को श्री रंगम में लाने आज्ञा दिए, तो पेरिया नम्बि स्वामीजी कांचीपुरम जाते है | जब तक पेरिया नम्बि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के साथ श्री रंगम से लौट कर आते है, तब तक आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) वैकुण्ठ गमन कर इस संसार को छोड़ देते है| श्री रंगम पहुंचने पर, पेरिया नम्बि स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी को जब इसके बारे में पता चलता है | जब रामानुज स्वामीजी आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का दिव्या रूप देखे, उन्होंने उनके एक हाथ की ३ उंगलिया मुड़ी हुयी (बंद) देख अचंभित होते हैं। इळयाळ्वार् भी यह देख उपस्थित शिष्य और वैष्णव समूह से चर्चा कर इसका कारण जानने का प्रयास करते है , सबकी सुन इस निर्णय पर पहुँचते है की आलवन्दार स्वामी की ३ इच्छाएँ अपूर्ण रह गयी , रामानुज स्वामीजी उसी समय प्रण लेते है की वह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) इच्छाएँ पुराण करेंगे | वे इच्छाएँ इस प्रकार थी, :
१. व्यास और पराशर ॠशियों के प्रति सम्मान व्यक्त करना ।
२. नम्माल्वार् के प्रति अपना प्रेम बढ़ाना ।
३. विशिष्टा द्वैत सिद्धान्त के अनुसार व्यास के ब्रह्म सूत्र पर श्रीभाष्य की रचना करना (विश्लेष से विचार/चर्चा करना ) लिखना । श्रीभाष्य टिका (व्याख्या) हेतु श्री कूरत्ताळ्वान के साथ कश्मीर यात्रा पर जाते है, बोधायनवृत्ति ग्रन्थ प्राप्त कर श्री बादरायण के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि पूरी करते है |

तब इळयाळ्वार् प्रण लेते है की, आलवन्दार स्वामी के यह ३ इच्छाएँ वह पूर्ण करेंगे, इळयाळ्वार् के प्रण लेते ही आळवन्दार् स्वामी की तीनो उंगलिया सीधी हो जाती हैं । यह देखकर वहां एकत्रित सभी वैष्णव, और आलवन्दार स्वामी के शिष्य अचंभित हो खुश हो जाते हैं और इळयाळ्वार् की प्रशंसा करते हैं। आळवन्दार् स्वामी की परिपूर्ण दया, कृपा कटाक्ष और शक्ति उन पर प्रवाहित होती हैं। उन्हें श्री वैष्णव संप्रदाय दर्शन के उत्तराधिकारी पद पर प्रवर्तक/ निरवाहक चुन लिये जाते हैं । इळयाळ्वार् को आळवन्दार् स्वामी का दर्शन का सौभाग्य प्राप्त न होने का बहुत क्षोभ हुआ, वे दुखित मन से सब कैंकर्य पूर्ण करके , बिना पेरिय पेरुमाळ् के दर्शन किये कान्चिपूर् लौट जाते हैं ।

व्यास : लेकिन दादी, किसी का शरीर ऐसे कैसे उत्तर दे सकता है जैसे की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की मुड़ी हुयी उंगलिया रामानुज स्वामीजी की प्रतिज्ञा सुन कर ?

दादी : व्यास, जो संबंध रामानुज स्वामीजी का और आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) था वह शारीरिक अनुभव से बहार थी | यह संबंध ऐसे था जैसे मन और आत्मा का संबंध जैसा | क्या आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने रामानुज स्वामीजी को अपनी अंतिम ३ इच्छाएँ बताई थी ? यह कैसे हो सकता है ? व्यास, इस प्रकार का संबंध होता है | ठीक उस प्रसंग की तरह जहाँ वरदराज भगवान जी रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान करते है बिना रामानुज स्वामीजी के बताये की उनकी शंकाएँ क्या है | ऐसे संबंध मन और आत्मा से सम्पन होते है और न की शरीर के द्वारा | इस तरह का संबंध था रामानुज स्वामीजी का और आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का |

अब तक हमने रामानुज स्वामीजी और विभिन्न आचार्यो ने जो उनके जीवन से संबंध रखते थे, वह सब देखा | में आपको कल वह सब बताउंगी की कैसे रामानुज स्वामीजी एक महान आचार्य बने और कैसे बहुत से शिष्यों ने रामानुज स्वामीजी के जीवन में उनका अनुसरण किया |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् के शिष्य – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् शिष्य – भाग 1

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

tirukkachinambi

गोश्टि पूर्ण और् कान्ची पूर्ण

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं ! वह अपने मित्र वेदवल्ली, अत्तुज़्हाय् और् श्रीवत्सांगन्. के साथ जाते हैं !

दादी (मुस्कराते हुए ) : आओ बच्चों | व्यास, आप तो सभी मित्रों को साथ लेकर आये हो जैसा मैंने कल कहा था |

व्यास : जी दादी, पराशर और मैं स्वामी रामानुज जी और उनके आचार्य की कहानी बता रहे थे श्रीवत्सांगन्. को और वह चाहता था की आज इसको आपसे सुने !!

दादी : यह तो बहुत बढ़िया है | आईए , बैठे | आज में आपको तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) और् तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में बताउंगी,  इन दोनों महान आचार्यो का हमारे सम्प्रदाय में बहुत विशेष स्थान है |

श्रीवत्सांगन् : दादी, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी का जनम चेन्नई के पास पूविरुन्तवल्लि में वहां हुआ था जो श्रीपेरुम्बूतूर् जाने के रास्ते में आता है| हम उस मंदिर में पिछले साल गर्मी की छुटियों में गए थे |

दादी : बहुत अद्धभुत | यह ठीक है | तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) श्री देव पेरुमाळ को पंखा करने की सेवा से जाने गए है और उसी कारण प्रसिद्ध भी हुए है । इसके अतिरिक्त वे भगवान श्री देव पेरुमाळ और स्वयं के बीच मे आम तौर पर होने वाले वार्तालाप से भी प्रसिद्ध हैं | जब रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम आये, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) प्रथम आचार्य थे जिनकी शरण में रामानुज स्वामी जी आये और उन्होंने ही रामानुज स्वामीजी को भगवान् जी के प्रथम कैङ्कर्य करने के लिए निर्देशत किया |

व्यास : दादी जी रामानुज स्वामी जी ने क्या कैङ्कर्य किये ?

दादी : श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) पास पहुँचे और उनके मार्गदर्शन के लिये निवेदन किया । नम्बि जी इळयाळ्वार को तिरुमंजन तीर्थ कैंकर्य सौंपते हैं ( निकट मे स्थित कुँए से लाया जाने वाला पानी जो भगवान के स्नान के लिये उपयोग किया जाता था ) । इळयाळ्वार खुशी खुशी स्वीकर किये और यह कैंकर्य वह प्रतिदिन करने लगे । शास्त्रों और भगवान के प्रति उनके प्यार के प्रति उनका ज्ञान उत्कृष्टता थी। तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के प्रति अत्यधिक आकर्शित होकर श्री इळयाळ्वार उनके चरण कमलों का आश्रय लेते हुए उनसे विनती करते हैं कि वो उन्हे पंञ्चसंस्कार दे और उन्हे शिष्य के रूप मे स्वीकार करे ।

पराशर : लेकिन दादी, क्या आपने नहीं कहा था की पेरिया नम्बि स्वामीजी ने रामानुज स्वामीजी का मधुरान्तकं में पञ्च संस्कार किया था ?

दादी : हाँ पराशर | मुझे प्रसन्नता है की तुम्हे सब याद है |परन्तु वेदों और शास्त्रों का निरूपण देते हुए कहते हैं कि वह कदाचित भी उन्हे पंञ्चसंस्कार दे नही सकते और उसके वो काबिल नही क्योंकि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) अब्राह्मण वर्ण के थे जिसके कारण वे नियमानुसार दीक्षाचार्य नही हो सकते (परन्तु वो श्री इळयाळ्वार को शिक्षा गुरु के तौर से उपदेश देने के सक्षम हैं और यहि कायम रखेंगे) । यह जानकर इळयाळ्वार बहुत निरुत्साहित हुए परन्तु वेदों और शास्त्रों मे दृध विश्वास होने की वजह से, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के निश्चित निर्णय को पूर्ण तरह से स्वीकार किये । तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी रामानुज स्वामीजी की हमारे सम्प्रदाय के प्रति शंकाओं और प्रशनो का निवारण करते है | यह एक बहुत रोचक कहानी है की कैसे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी भगवान् जी के साथ वार्तालाप करते है जिससे रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान हो सके |

वेधावल्ली : क्या शंकायें थी दादी ? भगवान् जी ने क्या कहा ?

दादी : एक बार रामानुज स्वामी जी के दिमाग में कुछ भ्रम और संदेह हो गया । वह जानते थे कि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) भगवान् पेरुमल से बातचीत करते है, उन्होंने एक बार फिर तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के मार्गदर्शन का अनुरोध किया। नम्बि भगवान के पास जाते है और सामान्य रूप से अपना कैंकर्य करते है और रामानुज स्वामी जी के अनुरोध को खोलने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करते है। भगवान नम्बि की हिचकिचाहट के बारे में पूछताछ करते है | नम्बि देव पेरुमाळ से वारतालाप के विषय मे अत्यधिक प्रसिद्ध माने गये हैं। इळयाळ्वार को विलंब करने वाले कुछ संदेहों का समाधान हेतु वे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास गए और विनम्रतापूर्वक इन संदेशों का प्रस्ताव किया और पूछे की वे ( तिरुक्कच्चि नम्बि ) इन संदेहों का समाधानों प्राप्त करे और उन्हे बताये । श्री रामानुजाचार्य जो साक्षात आदि शेष के अवतार हैं, हमारे पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर हमे यह जानना चाहिये कि श्री रामानुजाचार्य केवल नटन यानि अपने पात्र को भलि–भांति निभा रहे थे और वह इन संदेहों का समाधान भी जानते थे परन्तु प्रमाणों को भगवान और पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर प्रमाणित करना चाहते थे । उस रात , अपना कैंकर्य समाप्त कर श्री नम्बि भगवान को अती प्रेम से देखने लगे ।

सर्वज्ञ देव पेरुमाळ ने उनसे पूछा – नम्बि , क्या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ? नम्बि थोडी देर सोचकर भगवान के समक्ष इळयाळ्वार के मन की मनोवेदना को व्यक्त किये और कहे – अब आप ही इन संदेहो का समाधान दीजिए । यह सुनकर भगवान ने कहा – जिस प्रकार मैने अपने श्री कृष्णावतार मे सान्दीपणि मुनि से शास्त्र सीखा, इळयाळ्वार ( जो अनन्त शेष के अवतार है , सर्वज्ञ है ) वो मुझसे इन संदेहों का समाधान पूछ रहे हैं। उसके पश्चात , भगवान ने स्वयम छे उपदेशों को नम्बि के सामने प्रस्तुत किया जो मेरे छे ईश्वरीय आदेश के नाम से प्रसिद्ध है वही भगवद्बन्धुवों के लिए प्रस्तुत है –

1) अहमेव परम तत्वम् – मै ( देव पेरुमाळ ) ही सर्वोच्छ (महान, श्रेष्ठ) हूँ

2) दर्शनम् भेदमेव – जिवात्मा और अचेतनम् ( अचेत ) मुझसे (मेरे दिव्य शरीर से) विभिन्न है

3) उपायम् प्रपत्ति – “मुझे ही अन्तिम शरण ( उपाय ) के रूप मे स्वीकर करना ” यानि केवल भगवान का शरण ही उपाय है और उससे ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है

4) अन्तिम स्मृति वर्जनं – प्रपन्न भक्तों के लिये अन्तिम स्मरण ज़रूरी नही है क्योंकि श्री वराह भगवान ने वराह चरम श्लोक मे कहा है कि – भगवान स्वयम प्रप्पन्न भक्तों के अन्तिम काल मे उनका स्मरण करेंगे । आम तौर पर हमारे आचार्यों ने दर्शाया है की हमे अपने अन्तिम काल मे अपने आचार्य पर ध्यानकेन्द्रित करना चाहिये ।

5) देहवासने मुक्ति – भगवान ने कहा है – प्रपन्न भक्त उनके अन्त काल के बाद ( भौतिक शरीर का त्याग करना ) निश्चितरूप से परमपद की प्राप्ति होगी और उनको मोक्ष इस प्रकार से मिलेगा और वह भगवद्–भागवदकैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

6) पूर्णाचार्य पदाश्रित – पेरियनम्बि (महापूर्ण) को अपना आचार्य मानो और उनका शरण लो

तिरुक्कच्चि नम्बि इळयाळ्वार के पास जाकर स्वयम भगवान के छे आदेशों ( जो इळयाळ्वर के संदेशों के समाधान ) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। इळयाळ्वर यह सुनकर बहुत खुश होते हैं और इस अनुग्रह (सहायता) के लिये उनकी प्रशंसा और अभिवादन करते हैं। यह बताने के बाद नम्बि इळयाळ्वर से पूछते हैं – क्या वे भी यही सोच रहे थे .. इसके जवाब मे रामानुजाचार्य कहे – जी हा स्वामि , मै भी यही सोच रहा था .. तिरुक्कच्चि नम्बि को तब एहसास हुआ की भगवान और श्री रामानुजाचार्य का तिरुवुळ्ळम् (मनोभावना) एक ही है यह जानकर वे अती प्रसन्न हुए । अब यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि रामानुज को शम शर्यणम के लिए पेरिया नंबी से संपर्क करना चाहिए, वह तिरुक्कच्चि नम्बि के आशीर्वाद लेते हैं और पेरिया नम्बि से मिलने के लिए श्री रंगम को छोड़ देते हैं और हम सभी बाकी की कहानी जानते हैं, बच्चे क्या यह नहीं हैं?

व्यास : हाँ दादी, हमें याद है |

दादी : श्रीवैष्णवों के महत्वपूर्ण गुणों में से एक गुण विनम्रता है , जिसे नेच्या भावम कहते है या हमारे सम्प्रदाय में दूसरे श्री वैष्णवों की उपस्थिति में अपने आपको विनम्र समझना | पेरिया नम्बि नम्रता का एक जीवंत उदाहरण थे जो वास्तव में उनके दिल से आई थी और केवल उनके मुंह से शब्द नहीं थे। पेरिया नम्बि बहुत नम्र थे और हमेशा महान सम्मान के साथ अन्य श्रीविष्णवों का इलाज करते थे। एक बहुत ही रोचक घटना हुई जो यह साबित करती है। मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे । एक बार एक महान आचार्य मारनेरी नम्बि चाहते थे कि उनके अंतिम संस्कार श्रीवैष्णव द्वारा किया जाए और पेरिया नंबी से उनकी देखभाल करने का अनुरोध किया जाए। पेरिया नंबी खुशी से इस बात से सहमत थे और शहर में स्थानीय लोगों के क्रोध का सामना करने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने के लिए जाति के द्वारा पेरिया नंबी से कम है और इस प्रकार शास्त्र के खिलाफ जा रहे है। जब पूछा गया , पेरिया नम्बि स्वामीजी कहते है की वह तो सिर्फ श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी ने उन्हें सिखाया है जो कहते है की भागवत कैंकर्यं बहुत ही शुद्ध और महत्वपूर्ण कैंकर्यं है | एक भागवत को उनकी जाती या जन्म देखे बिना उन सभी को एक समान कैंकर्यं करना चाहिए | नाच्य भाव सैद्धांतिक नहीं था लेकिन पेरिया नम्बि द्वारा अभ्यास में डाल दिया गया था। वह वास्तव में विश्वास करते थे कि सभी श्री वैष्णव भगवान के लिए प्रिय हैं और सम्मानित होना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्राट के एक सच्चे भक्त अपने आखिरी पलों को कैसे बिताते हैं, सम्राट उन्हें श्री वैकुंठम में कन्यार्यम का अनन्त आनंद देता है, जैसा कि भगवान पेरुमल द्वारा तिरुक्कच्चि नम्बि को आश्वासन दिए थे । वह एक महान आचार्य थे जो अपने आचार्य, अलवंधर और श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी की शिक्षाओं के दौरान अपने जीवन भर में रहते थे। क्या यह आज के लिए पर्याप्त है या आप तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) के बारे में भी सुनना चाहते हो?

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वेदवल्ली : क्या आप के पास उनके बारे में भी कहानी है ?

दादी : हाँ, बहुत |

अत्तुज़्हाय् : फिर हमें तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी :आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

व्यास : ॐ नमो नारायणाय मंत्र को तिरुमंत्र कहते है |

श्रीवत्सांगन् : सर्व धर्मं परित्यज्य मामेकं शरणमं व्रजा; अहम् तवा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ सुचा: इसको चरम श्लोक कहते है |

दादी : बहुत अद्भुत | अब यह तीन श्लोक का बहुत गहरा और गंभीर अर्थ है जो की किसी आचार्य के द्वारा ही सीखा जा सकता है |

वेधावल्ली : लेकिन दादी, हमें इन श्लोको का अर्थ जानना है |

दादी: हाँ, हम सभी इन तीन श्लोक का अर्थ जानते है लेकिन हमारे सम्प्रदाय में यह हर एक मंत्र बहुत प्रभावशाली है जो की एक आचार्य के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के बिना पूरी तरह से इसे जानने की क्षमता से परे है। यही कारण है कि तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) को रामानुज को इन छंदों के अर्थों को पढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य दिया गया था |

अत्तुज़्हाय् : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामी जी को १८ बार तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी के पास जाना पड़ा थिरुमन्त्रम सीखने के लिए | क्या यह सत्य है ? उनको इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ा ?

दादी : हाँ, यह सब सत्य है | इसे हमारे संप्रदायम के बारे में सीखने में रामानुज भागीदारी और ईमानदारी का परीक्षण करने के लिए तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) द्वारा उपयोग किए जाने वाले तरीके के रूप में लिया जा सकता है और इसे रामानुज स्वामी की दृढ़ता और धैर्य की गवाही के रूप में भी लिया जा सकता है।

व्यास : दादी, तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी दिखने में बहुत सख्त थे | वह रामानुज स्वामी जी के प्रति उद्धार हो सकते थे |

दादी : यह तो सभी को सीखने के बाद इस घटना के बारे में बहुत गलत धारणा है | यह सही नहीं है | उनके मन में सदैव रामानुज स्वामी जी क्या कल्याण करने का मन करता था और ऐसे तो वह बाहर से बहुत सख्त थे | एक अच्छे पिता का कर्तव्य होता है की बेटे के साथ सख्त रहे और अपने बेटे के लिए किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहे |याद है , कल जब हम तिरुमलै अण्डाण जी के बारे में बात कर रहे थे , मैंने कहा था की अण्डाण और रामानुज स्वामीजी के विचारो में कुछ मतभेद था | यह तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ही थे जिन्होंने मध्यस्था करके दोनों में विरोध खत्म किया सिर्फ रामानुज स्वामीजी के लिए | जहाँ तक की वह रामानुज स्वामीजी का श्री वैष्णवों के प्रति अनुराग देखकर बहुत प्रभाबित हुए की उन्होंने रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमणार नाम से सम्बोधित किया (मन्नाथ ) | इस तरह से रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमानार सुन्दर नाम मिला | जब रामानुज स्वामीजी श्री रंगम में उनके दुश्मनो ने जहर देकर मारने की कोशिश की, तब तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ने समय पर आकर किदाम्बी अचान को रामानुज स्वामीजी के लिए खाना बनाने के लिए नियुक्त किये ताकि रामानुज स्वामीजी सुरक्षित रह सके | तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी एक पिता की तरह सदैव रामानुज स्वामीजी के कल्याण करने के बारे में सोचते रहते | यहाँ और भी बहुत सी कहानियां उनके महानता के बारे में की वह उनसे पिता की तरह अनुराग रखते थे, ज्ञान के सागर एवं उनका उनके आचार्य आलवन्दार स्वामीजी के प्रति श्रद्धा| मे चाहती हूँ की आपको कहानियां सुनाती जाऊ और मुझे विश्वास है की आप भी सुनना पसंद करोगे लेकिन क्या आप नहीं सोचेंगे की आपके माता पिता चिंतत होंगे आप सभी देरी से हो | अब आप यह फल लो और घर जाईये | अगली बार में आपको और बहुत सारी कहानियां बताउंगी अपने आचार्य के बारे में |

बच्चो ने फल फूल लिए, और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी, पेरिया नम्बि स्वामीजी और तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में सोचने लगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-alavandhars-sishyas-2/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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श्रीवैष्णव – बालपाठ – यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर्, श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) और मालादर (तिरुमालै आन्डान्)

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यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर आपने मित्र वेदावल्ली के साथ प्रवेश करते है|

दादी : स्वागत वेदावल्ली। अंदर आ जाओ बच्चों|

व्यास : दादी , पिछली बार आपने कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और दूसरे आचार्य के बारे में विस्तार से बताएंगी|

पराशर : दादी , क्या आपने हमें यह नहीं बताया था की रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्य थे, सिर्फ पेरिया नम्बि ही नहीं ? दूसरे आचार्य कौन थे दादी ?

दादी : जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था बच्चों, यामुनाचार्य स्वामी जी के बहुत शिष्य थे जो रामानुज स्वामी जी को सम्प्रदाय में लाने के लिए सिखाते थे ! उनमे से जो प्रमुख थे : १) तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) २) गोश्टि पूर्ण (तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि) ३) श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ४) तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) ५) तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) और साथ में श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) !|क्या आप को याद है हमने पिछली बार श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) स्वामी जी के बारे में बात की थी जब हम पिछली बार मिले थे ! अब, चलो में आपको दूसरे आचार्यो की बारे में और उनकी महत्वपूर्ण योगदान जो उनका हमारे सम्प्रदाय के प्रति रहा उसके बारे में बताउंगी !

पराशर : दादी, रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्या क्यों थे ?

दादी : सभी आचार्यो ने उनको इस तरह से सिखाया की वह एक महान आचार्य बने ! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) एक बहुत बडा कैङ्कर्य किया श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम लाकर |

व्यास : यह सब कैसे हुआ ? वह कहानी भी हमें बताये दादी |

दादी : उस समय रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम में रहते थे और सन्यास आश्रम भी स्वीकार किया! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) कांचीपुरम गए और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से विनती किये उनको देव पेरुमल के समीप अरैयर् सेवा करने दे ! देव पेरुमल जी ने अर्चक से कहलवाया की उनके सामने ही अरैयर् सेवा किया जाए ! अरैयर् स्वामी जी ने बहुत सेवा भाव से भगवान जी के सामने नृत्य के साथ पाशुरम गाये ! भगवन् उनसे बहुत प्रसन हुए और उनको बहुत सारे उपहार दिए | अरैयर् स्वामी जी बोले की उनको उपहार नहीं चाहिए उनको तो और कुछ चाहिए | भगवान् जी मान गए और बोले ” हम आपको सब कुछ देंगे, आप बोले तो सही” | अरैयर् स्वामी जी तब रामानुज स्वामी जी की तरफ इशारा करते हुए बोले की वह अपने साथ श्री रामानुज स्वामी जी को श्री रंगम ले जाना चाहते है ! भगवन बोले ” हम सोच भी नहीं सकते थे की आप रामानुज स्वामी जी को हमसे मांगेगे; आप कुछ और मांगिये”| अरैयर् स्वामी जी बोले ” आप और कोई नहीं श्री राम जी है जो कभी दो शब्द नहीं बोलते , आप अपने बचन से इंकार नहीं कर सकते ! फिर भगवन जी ने स्वीकार किये और रामानुज स्वामी जी को जाने की अनुमति प्रदान की !

व्यास : दादी कितनी बड़ी चालाकी थी यह| यह अरैयर् स्वामीजी की बुद्धिमता थी की वह पेरुमल स्वामी जी को मना सके !

दादी : बोलो व्यास | उसी समय अरैयर् स्वामी जी ने रामानुज स्वामी जी का हाथ पकड़ा, और श्री रंगम जाने के लिए प्रस्थान किया | फिर , अरैयर् स्वामी जी ने वह महत्व पूर्ण सेवा की श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर जिससे हमारा सम्प्रदाय ने और आगे बड़े और उसको उचाईयो तक पहुँचाया |

वेदवल्ली : दादी, अपने कहा सभी आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी कुछ न कुछ सिखाया ! अरैयर् स्वामी जी ने उनको क्या सिखाया ?

दादी :आलवन्दार स्वामी जी ने अपने सभी मुख्य शिष्यों को रामानुज स्वामी जी को अपने सम्प्रदाय के बारे में अलग अलग सीखने के लिए निर्देश दिए थे | अरैयर् स्वामी जी को आदेश था की वह सम्प्रदाय का मूल तत्व रामानुज स्वामी जी को बताये ! अब, रामानुज स्वामी जी ने बहुत सुन्दर कृत किये इससे पहले की वह अरैयर् स्वामी जी के पास जाते सीखने के लिए | उन्होंने ६ महीने आचार्य सेवा में कैंकर्य किये कुछ भी सीखने से पहले | यह एक बहुत महत्व पूर्ण पहलु है जो श्री रामानुज स्वामी जी, कुरतालवान स्वामी जी, मुदलियानदान स्वामी जी और बहुत आचार्य जी ने अपने जीवन में किये — अपने आचार्यो का कैंकर्य किये उनसे सीखने से पहले | यह उनकी भक्ति भाव दर्शाता है की वह किससे क्या सीख रहे है और किस उदेश्ये से सीख रहे है | रामानुज स्वामी जी प्रति दिन दूध गरम करते और अरैयर् स्वामी जी को हल्दी का लेप बनाकर देते जब भी आवश्यकता होती !

व्यास : दादी, दूसरे आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी: हाँ, में एक एक करके उस पर आ रही हूँ | तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे | वह थिरु वेंकट आद्री के पहले निवासी थे | वह प्रति दिन आकाश गंगा जाकर भगवान् जे के सनान के लिए जल लेकर कैंकर्यं करते थे | वह भगवान् जी की सेवा बहुत ध्यान और मन से करते थे | उनके आचार्य जी का आदेश था की वह रामानुज स्वामी जी को श्री रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन सीखा सिखाये | श्री रामायाण बहुत प्रसिद्ध है हमारे समप्रदायम में शरणागति शास्त्र की तरह | इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे । यही नहीं श्री तिरुमलै नम्बि स्वामी जी ही थे जिन्होंने गोविंदा स्वामी को वापिस श्री वैष्णव सम्प्रदाय में लाये थे जो रामानुज स्वामी जी की ममेरे भाई थे | उनका ज्ञान हमारे सम्प्रदाय के लिए और उनका अलवार स्वामी के पाशुराम के प्रति बहुत लगाव था |

पराशर : दादी, क्या आप हमें तिरुमाळै अण्डाण स्वामी जी के बारे में बता सकते हो ? उन्होंने रामानुज स्वामी जी किस तरह से मदद की ?

दादी : तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी को पूरी ज़िम्मेदारी दी गयी थी की वह रामानुज स्वामी जी को थिरु वाईमोली सिखाये | जब रामानुज स्वामी जी श्री रंगम पहुंचे, तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) जी ने ही उनका मार्ग दर्शन किया था की वह तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) से नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामीजी) तिरुवाय्मोळि (सहस्रगीति) को सुने और उनका सार मूल तत्व समझे | यद्यपि, शुरुआत में दोनों में कुछ मतभेद थे क्योंकि यह किसी भी महान विद्वानों के बीच होता है, इसे सुलझाया गया और रामानुज ने अपने आचार्य तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) के आशीर्वाद के साथ अलवार के पाशुरम में छिपे जटिल अर्थों को सीखा | तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी की उनके आचार्य आलवन्दर के लिए इतना सम्मान और भक्ति थी। वह कभी भी अपने आचार्य के मार्ग और शिक्षाओं से दूर नहीं चले और उन्हें रामानुज स्वामी जी को के सिखाया ताकि वह हमारे संप्रदायम के कैंकर्यं को आगे ले जा सकें।

वेदवल्ली : तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) जी ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी : में आपको अगली बार जब हम मिलेंगे तब बताउंगी | उनके बारे में बहुत सी रोचक कहानियां है |

व्यास , पराशर और वेदवल्ली (मिलकर ) : हमें अभी कहानी सुनाइए दादी माँ !

दादी : अभी बहुत देर हो गयी है | आज के लिए यह काफी है | अभी आप घर जाये और कल आप दुबारा वापिस आना और अपने दोस्त को अपने साथ लाना नहीं भूलना |

बच्चे अपने घर को जाते है और हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो के बारे में सोचते है और बहुत उत्सुकता से इंतज़ार करते है की कब दूसरे दिन दादी उनको कहानी सुनाएगी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/07/beginners-guide-alavandhars-sishyas-1/

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

व्यास और पराशर आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। अत्तुज़्हाय् अपने हाथ में एक पुरस्कार के साथ प्रवेश करती है।

दादी : प्रिय! यह तुमने क्या जीता है?

व्यास: दादी, अत्तुज़्हाय् ने हमारे स्कूल में आण्डाल के रूप में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लिया , तिरुप्पावै से कुछ पाशूरम (तमिल में भजन) गाए और पहला पुरस्कार जीता।

दादी :अत्तुज़्हाय् यह अद्भुत है! आज मैं आपको पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) के बारे में बताती हूं, उसके बाद में आपसे पाशूरम (तमिल में भजन) सुनुँगी|

व्यास, पराशर और अत्तुज़्हाय् ( एक साथ ) : और इळैयाज़्ह्वार् (श्री रामानुज) के बारे में भी दादी |

दादी : हां बिल्कुल। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था, पेरिय नम्बि, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के प्रमुख शिष्यों के में से एक थे । उनका जन्म श्रीरंगम में मार्गशीर्ष् मास, ज्येष्ठ नक्षत्र में हुआ था। आळवन्दार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के समय के बाद , सारे श्रीरंगम के श्रीवैष्णव पेरिय नम्बि से विनती करते है की वह श्री रामानुजाचार्य को श्रीरंगम मे लाये । अतः वह श्रीरंगम से अपने सपरिवार के साथ कांचीपुरम की ओर चले। इसी दौरान श्री रामानुजाचार्य भी श्रीरंगम की ओर निकल पडे।

पराशर : दादी, इळयाळ्वार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) श्रीरंगम को क्यों गए जब की वह कांचीपुरम में यादव प्रकाश जी से सीख रहे थे।

दादी : बहुत अच्छा सवाल है! याद रखें, पिछली बार मैंने आपको बताया था कि आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) को इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) को मार्गदर्शन करने के लिए सौंपा था? जब इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) का उनके गुरु यादव प्रकाश जी के साथ मत भेद हो जाता है और परेशान हो जाते है, और उनके मन में बहुत शंका और प्रश्न घर कर जाते है जैसे मन में काले बदल छा गए हो, तब वह तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास समाधान ढूंढ़ने के लिए जाते हैं! और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) ने मार्गदर्शन के लिए किससे बात की?

अत्तुज़्हाय् : देवप् पेरुमाळ् (पेरुमल / भगवान /श्री रंगनाथ)!

दादी : अति उत्कृष्ट! यह भगवान/पेरुमल थे जो सदैव इळयाळ्वार स्वामीजी की बचाव करते थे और उनको पेरिय नम्बि जी के पास जाने को प्रकाशित करते थे, और कहते की आप पेरिय नम्बि से पञ्च संस्कार करवाइये और उनके शिष्य बन जाईये| तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) के मन में जो शंका होती है वह सब ऐसे दूर करते है जैसे सूर्य उदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है| इस तरह से इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) कान्चि छोड़ के जाते हैं, फिर पेरिय नम्बि से कान्चि के रास्ते में मिलते है| आश्चर्य की बात यह थी की वे दोनो मदुरान्तगम् मे मिलते है और तभी पेरिय नम्बि श्री रामानुजाचार्य का पञ्च संस्कार करते हैं और कान्चिपुरम पहुँचकर श्री रामानुजाचार्य को सम्प्रदाय के अर्थ बतलाते है।

व्यास: अरे हाँ, हमें मालूम है की मदुरान्तगम् में भगवान श्री राम जी का मंदिर है| हम पिछली छुटियों में उस मंदिर में गए थे|लेकिन, वह कान्चि या श्री रंगम में क्यों नहीं गए इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) जी को समाश्रयनम् करने के लिए| उन्होंने मदुरान्तगम् में ही क्यों किया ?

दादी: पेरिय नम्बि एक महान आचार्य थे जिन्हें इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) के प्रति अत्यधिक लगाव और सम्मान था। वह जानते थे कि इस तरह के अच्छे कर्मों को कभी स्थगित नहीं किया जाना चाहिए और इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) भी ऐसा महसूस कर रहे थे। बच्चों, इससे हम सीखते हैं कि हमारे सम्प्रदाय से संबंधित अच्छी चीजें या कैङ्कर्य में कभी देरी नहीं करनी चाहिए | जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा! पेरिय नम्बि हमारे सम्प्रदाय के सच्चे सिद्धांतों को जानते थे जो कभी भगवान के भक्त को अलग नहीं करते थे और सभी को प्यार और सम्मान के साथ समान रूप से व्यवहार करते थे । वह अपने शिष्य रामानुज से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने हमारे सम्प्रदाय के भविष्य के आचार्य के लिए अपना जीवन त्याग दिया – रामानुजा!

व्यास : उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया! दादी, उन्होंने ऐसा क्यों किया ?

दादी : उस समय, वहां के शैव राजा ने रामानुजा को अपनी मांगों को स्वीकार करने के लिए अपनी अदालत में आने का आदेश दिया था। रामानुज स्वामीजी के बजाय, उनके महान शिष्य श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनके आचार्य के रूप में छिपे हुए, पेरिय नम्बि के साथ राजा के दरबार में गए, जो बहुत बूढ़े थे। पेरिय नम्बि भी अपनी बेटी अत्तुज़्हाय् के साथ राजा के दरबार में गए !

अत्तुज़्हाय् : यह मेरा नाम भी है!

दादी : हाँ यही है! जब राजा उन्हें अपनी मांगों को स्वीकार करने का आदेश देता है, तो श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और पेरिय नम्बि दोनों राजा की मांगों को नहीं मानते हैं। राजा बहुत क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को उनकी आंखें निकालने का आदेश दिया। वृद्धावस्था के कारण दर्द को सहन करने में असमर्थ, पेरिय नम्बि अपना जीवन छोड़ देते है और श्रीरंगम जाने के रास्ते में परमपद चले जाते है, अंत समय में पेरिय नम्बि स्वामीजी कुरेश स्वामीजी की गोद में अपना सिर रखते है और फिर परमपद को प्रस्थान करते है। इन महान आत्माओं ने बिना किसी चिंता के सब कुछ त्याग दिया, हमारे रामानुज स्वामीजी की रक्षा करने के लिए, जो एक मोती के हार में केंद्रीय मणि की तरह है। अगर हम हार में मोती तोड़ेंगे तो क्या होगा?

व्यास और पराशर (कोरस में एक साथ): हार भी टूट जाएगा|

दादी : बिल्कुल ठीक! इसी तरह, हालांकि रामानुज स्वामीजी मोती के हार में केंद्रीय मणि है , जिसे हमारे श्री रामानुजा सम्प्रदाय कहा जाता है, मोतियों के रूप में सभी आचार्यों ने हार को एक साथ रखा और देखा कि केंद्रीय मणि सुरक्षित रहे । तो हम सभी को अपने आचार्यों के प्रति हमेशा आभारी रहना चाहिए और हमेशा अपने जीवन से नम्र होना चाहिए।

पराशर : दादी, श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के साथ क्या हुआ?

दादी : श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनकी आंखें चली गईं, फिर वह श्री रांगम लौट आये । वह रामानुज स्वामीजी के महानतम शिष्यों में से एक थे और अपने जीवन के सभी पहलुओं में रामानुज स्वामीजी के साथ थे। अगली बार जब हम मिलेंगे तो मैं आपको श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और रामानुज स्वामीजी के बारे में और बताउंगी। अब, जल्दी करो और घर जाओ। आपके माता-पिता आपके लिए इंतज़ार कर रहे होंगे। और, अत्तुज़्हाय्, अगली बार मैं आप से तिरुप्पावै पासुरम सुनूंगी ।

बच्चे पेरिय नम्बि और श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के बारे में सोचते हुए घर वापस जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) और मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)

व्यास और पराशर अपने मित्र अत्तुज़्हाय् के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी अपने हाथों में प्रसाद के साथ उनका स्वागत करती हैं।

दादी : आपका स्वागत है अत्तुज़्हाय् ! यहां अपने हाथ और पैर धोएं और इस प्रसाद को लें। आज उत्राडम् (उत्तराषाढा), आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र हैं।

पराशर : दादी, पिछली बार आपने कहा था कि आप हमें यमुनैत्तुऱैवर् (आळवन्दा / र्श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में बताएंगी, याद है?

दादी : हाँ! मुझे याद है और मुझे खुशी है कि आप को भी याद हैं और आप हमारे महान आचार्य के बारे में जानना चाहते हैं। आज उनका तिरुनक्षत्र है। इन महान आचार्य की महिमा के बारे में बात करने के लिए यह सही समय है।

व्यास : दादी, लेकिन क्या आपने यह नहीं कहा कि यह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र था?

दादी : हाँ। यमुनैत्तुऱैवर् स्वामीजी का अवतार स्थल काट्टु मन्नार् कोयिल् है, बाद में इन्हे (यमुनैत्तुऱैवर्) आळवन्दार् के नाम से जाना जाने लगा।यमुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य) का जन्म नाथमुनि के पुत्र ईश्वरमुनी के यहाँ हुआ। [दक्षिणात्य आषाढ़ माह के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में काट्टुमन्नार् कोविल, वीर नरायणपुराम , वर्तमान मन्नारगुडी गांव में हुआ। ]

श्री आळवन्दार ने अपना विद्याध्यन, अपनी प्रारंभिक शिक्षा महाभष्य भट्टर् से प्राप्त किया। आळवन्दार् के रूप में उनकी प्रशंसा कैसे हुई, इस बारे में एक बहुत ही रोचक कहानी है। उन दिनों पंडितों को मुख्य पंडित को कर चुकाना पडता था। उस समय काल में राजदरबार के विद्वान पंडित, राज पुरोहित आक्कियाज़्ह्वान् थे, आक्कियाज़्ह्वान् अपने प्रतिनिधियों को पंडितों के पास भेज कर उनसे कर वसुल करने को केहते थे। इसे सुनकर महाभाष्य भट्टर् चिन्तित हो जाते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् केहते हैं के वो इसक ख्याल रखेंगे। यामुनाचार्यजी एक श्लोक भेजते हैं, जिसमे वह स्पष्ट रूप से कहते है, वह उन सब कवियों का जो अपना स्वप्रचार के लिये अन्य विद्वानों पर अत्याचार करते है, उनका नाश करेंगे। यह देखकर आक्कियाज़्ह्वान् को गुस्सा आता है और अपने सैनिकों को यमुनैत्तुऱैवर् को राजा के अदालत में लाने के लिए भेजता है। यमुनैत्तुऱैवर् उन्हें बताते हैं कि वह केवल तभी आएगें जब उसे उचित सम्मान की पेशकश की जाएगी। तो, राजा उनके लिये एक दोला भेजते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् अदालत आते हैं। वाद शुरू होने वाला है, रानी राजा को बताती है कि उन्हे यकीन है कि यमुनैत्तुऱैवर् जीतेगा और यदि वह हारेंगे तो वोह राजा का सेवक बन जाएंगी। और राजा को भरोसा था कि आक्कियाज़्ह्वान् जीतेंगे और वो कहते हैं कि अगर यमुनैतुऱैर्वर् जीतते हैं, तो राजा उन्हे आधा राज्य दे देंगे। अंत में, महान बहादुरी और ज्ञान के साथ, यमुनैत्तुऱैवर् ने आक्कियाज़्ह्वान् के खिलाफ वाद जीता। आक्कियाज़्ह्वान् इतने प्रभावित हो जाते हैं कि वो भी यमुनैत्तुऱैवर् का शिष्य बन जाते हैं। रानी ने उन्हें “आळवन्दार्” नाम दिया – वह जो उनकी रक्षा करने आये थे – अगर वह जीतते नही तो, रानी एक नौकर बन जाती और इसलिए रानी भी उनकी शिष्य बन जाती हैं। राजा द्वारा वादा किए गए अनुसार उन्हें (आळवन्दार्) को आधा राज्य भी मिलता है।

व्यास : दादी, यदि यामुनाचार्यजी को आधा राज्य मिला, तो उन्होने तो राज्य पर शासन किया होगा । वोह हमारे संप्रदायम में कैसे पहुंचे?

अत्तुज़्हाय् : उन्हें मणक्काल् नम्बि द्वारा हमारे संप्रदायम में लाया गया था जो उय्यक्कोण्डार् के शिष्य थे। उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) के निर्देशों के मुताबिक, मणक्काल् नम्बी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) को संप्रदायम लाने के लिए पहल की।

दादी : यह बिल्कुल सही और अद्भुत अत्तुज़्हाय् है! आप इसके बारे में कैसे जानते हो?

अत्तुज़्हाय् : मेरी मां भी मुझे हमारे आचार्य और पेरुमल के बारे में कहानियां बताती है|

दादी : आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) महान आचार्य थे जिन्होंने इळयाळ्वार (रामानुज स्वामीजी) को देवप् पेरुमल के आशीर्वाद के साथ संप्रदायम में लाया।

पराशर : लेकिन दादी, देवप् पेरुमल जी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की मदद कैसे की?

दादी : यह कान्चिपुरम् में हुआ, कि आळवन्दार् ने इळैयाज़्ह्वार् को वरदराज पेरुमाळ् कोयिल में देखा जो अभी रामानुज बने नही थे। इळैयाज़्ह्वार् अपने गुरु यादव प्रकस से सीख रहे थे। आळवन्दार् संप्रदायम के अगले नेता इळैयाज़्ह्वार् को बनाने के लिए देवप् पेरुमल् से प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार यह देवप् पेरुमल् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् को पोषित किया और उठाया, एक मां की तरह उपने बच्चे के साथ कैसे किया जाये और यह महान आळवन्दार् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् पर अपने आशीर्वाद बरसाया जो बाद में संप्रदायम के लिए महान महान कैङ्कर्य करने के लिए आगे बढ़े। आळवन्दार् भी आवश्यकतानुसार इळैयाज़्ह्वार् का मार्गदर्शने करने के लिए तिरुक्कच्चि नम्बि को सौंपा। तिरुक्कच्चि नम्बि याद है ना आपको?

व्यास : हाँ दादी, यह वह है जो तिरुवालवट्ट (पंखा) कैङ्कर्य द्Eवप् पेरूमल को करते थे और द्Eवप् पेरूमल और तायार् के साथ भी बात करते थे । यह कितना अच्छा होगा अगर हम तिरुक्कच्चि नम्बि की तरह पेरुमल से भी बात कर सकें? तो क्या यामुनाचार्यजी और इळैयाज़्ह्वार् मिले? क्या आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने इळैयाज़्ह्वार् को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया?

दादी : दुर्भाग्यवश नहीं! इससे पहले इळैयाज़्ह्वार् श्री रंगम जाकर आळवन्दार् स्वामी जी से मिलते, उससे पहले आळवन्दार् स्वामी जी को परम पदम् प्राप्त हो गया । अगली बार, बच्चों जब मैं आपसे मिलूंगी, मैं आपको श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) के बारे में बताऊंगी, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के कई शिष्यों में एक शिष्य श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) जो इळैयाज़्ह्वार् जी के आचार्य बन गए और लम्बे समय तक उनका मार्ग दर्शन किया । आळवन्दार् स्वामीजी के बहुत शिष्य थे और उन सब ने मिलकर काम किया इळैयाज़्ह्वार् जी को सम्प्रदाय में ला सके । पेरिय नम्बि (श्री महा पूर्ण) के अलावा,पेरिय तिरुमलैनम्बि (श्रीशैल पूर्ण स्वामीजी), तिरुकोष्टियूर् नम्बि (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी), तिरुमालै आण्डान् (मालाधार स्वामीजी), और मारानेरीनम्बि, तिरुकच्चिनम्बि (कांचीपूर्ण स्वामीजी) , तिरुवरंग पेरुमाळ् अरयर्, (मणक्काल नम्बि के शिष्य और आळवन्दार् के पुत्र) और कई अन्य आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के शिष्यगण थे।

व्यास , पराशर और अत्तुज़्हाय् : दादी यह बहुत दिलचस्प था |अगली बार, कृपया हमें पेरिया नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) और इळैयाज़्ह्वार् (रामानुज स्वामीजी) को के बारे में बताएं।

दादी : मुझे यह बताने में बहुत खुशी होगी लेकिन अब बहुत अंधेरा हो रहा है। बच्चों, अपने घर जाओ |

बच्चे आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में सोचकर अपने घरों को खुशी से निकलते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) और मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

 

पराशर और व्यास अपने मित्र वेदवल्लि के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी उन्हें अपने हाथों से प्रसाद के साथ स्वागत करती है।

आण्डाल दादी : यहां इस प्रसाद को लें और मुझे बताएं कि आपकी नयी मित्र कौन है।

व्यास : दादी, यह वेदवल्लि है जो छुट्टियों के लिए कान्चीपुरम् से आयी है | हम उसे हमारे साथ लाए ताकि यह आचार्यों की महिमाओं पर आपकी कहानियों को सुन सके।

पराशर : दादी आज हम किसी त्यौहार का जश्न मना रहे हैं?

आण्डाल दादी : आज आचार्य उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का तिरुनक्ष्त्र है जिन्हे पुण्डरिकाक्षर् और पद्माक्षर स्वामी भी कहा जाता है।

व्यास: दादी, क्या आप हमें इन आचार्य के बारे में बता सकती हैं?

uyyakkondar

आण्डाल दादी: उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का जन्म चैत्र मास कृतिका नक्षत्र को तिरुवेळ्ळऱै (श्वेत गिरि) में हुआ था। इनके माता पिता द्वारा इनका नामकरण तिरुवेळ्ळऱै एम्पेरुमान् के नाम पर ही किया गया। नाथमुनि स्वामीजी के शिष्यों में , कुरुगै कावलप्पन् के साथ साथ इन्हें भी प्रमुख माना जाता है। नाथमुनि जी को नम्माळ्ळवार के अनुग्रह से अष्टांग योग का दिव्य ज्ञान मिला था।

पराशर: दादी, यह योग क्या है?

आण्डाल दादी: यह योग का एक प्रकार है जिसके माध्यम से किसी भी शारीरिक गतिविधियों के बारे में सोचे बिना भगवान का अविराम अनुभव कर सकता हैं। जब नाथमुनि उय्यक्कोण्डार् से अष्टांग योग सीखने में उनकी रूचि के बारे में पूछते हैं तब वे उन्हें जवाब देते हैं की “पिणम् किडक्क मणम् पुणरलामो ” माने जहाँ संसारी अज्ञान के कारण भौतिक जगत् में दुखि हैं वहाँ वे कैसे आनंद से भगवद् गुणानुभव कर सकते हैं।

पराशर: दादी, क्या वह केहते हैं कि किसीके मरने पर कोई आनंद नहीं ले सकता है? कौन मर गया है?

आण्डाल दादी: शानदार पराशर! उन्होंने कहा कि जब इस दुनिया में इतने सारे लोग पीड़ित हैं, तो वह व्यक्तिगत रूप से भगवान का आनंद लेने के बारे में कैसे सोच सकते हैं। यह सुनकर, नाथमुनी बेहद प्रसन्न थे और उय्यक्कोण्डार् की महानता की सराहना की। उन्होंने उय्यक्कोण्डार् और कुरुगै कावलप्पन् दोनों को इश्वर मुनी के बेटे (नाथमुनी के अपने पोते, जो इस् संसार में आने वाले थे) को अर्थ के साथ अष्टांग योग और दिव्य प्रबन्धम को सिखाने के निर्देश दिए।

व्यास: दादी, क्या उय्यक्कोण्डार् का कोई शिष्य था?

दादी : मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) उनका मुख्य शिष्य थे। परमापद जाने के समय, मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) ने उत्तराधिकारी के बारे में उनसे (उय्यक्कोण्डार्) पूछा और उय्यक्कोण्डार् ने संप्रदाय की देखभाल करने के लिए स्वयं मणक्काल् नम्बि को निर्देश दिया। उन्होंने यामुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य स्वामीजी / ईश्वर मुनी के बेटे) को अगला आचार्य बनाने के लिए तैयार करने के लिए मणक्कऽल् नम्बि को भी निर्देश दिया।

पराशर: दादी, क्या आप हमें मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) के बारे में बता सकती हैं?

दादी : उनका मूल नाम राम मिश्र था। उनका जन्म माघ मास , माघ नक्षत्र के महीने में श्रीरंगम के पास कावेरी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गाँव मणक्कल् में हुआ था। माधुरकवी आळ्ळवार की तरह जो नम्माळ्ळवार् के लिए बहुत समर्पित थे, मणक्कल् नम्बि उय्यक्कोण्डार् के लिए बहुत समर्पित थीं। उय्यक्कोण्डार् की पत्नी के निधन के बाद, उन्होंने खाना पकाने के कैङ्कर्य को ग्रहण किया और अपने आचार्य की हर व्यक्तिगत आवश्यकता में भाग लिया। एक बार उय्यक्कोण्डार् की बेटियां नदी में स्नान करने के बाद वापस लौट रही थीं, तब रास्ते में कीचड़ के कारण वह आगे नहीं बढ़पाती। यह देख मणक्कल् नम्बि छाती के बल कीचड़ पर लेट जाते है और अपने आचार्य की पुत्रियों को अपनी पीठ पर चलते हुए कीचड़ पार करने को कहते है। उनके आचार्य उय्यक्कोण्डार् को जब इस घटना का वृतांत मिला , तब वह मणक्कल् नम्बि की आचार्य चरणों में भक्ति और जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता को देख अत्यंत ही प्रसन्न हुए ।

समूह में बच्चे: दादी, अगली बार जब हम मिलेंगे तो क्या आप हमें आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की कहानी बता सकती हैं?

दादी खुशी से कहती हैं, “में बहुत खुश हूँगी आपको यामुनाचार्य स्वामीजी की कथा सुनाने में जब हम अगली बार मिलेंगे ” और बच्चे अपने घरों को जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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