Author Archives: Romesh Chander Sharma

श्रीवैष्णव – बालपाठ- वेदांताचार्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी एक माला बना रही थी और आने जाने वालो को अपने घर से मंदिर जाते हुए देख रही थी। उन्होंने अपनी आंखों के एक कोने से अपने घर में भाग रहे बच्चों को पकड़ा और खुद मुस्कुराई। उन्होंने पेरिया पेरुमाल और थायार की तस्वीर को माला से सजाया और उनका स्वागत किया।

दादी : आओ बच्चों । क्या आप जानते हैं कि आज हम किसके बारे में चर्चा करने वाले हैं?

सभी बच्चे एक साथ बोलते है की वेदांताचार्य स्वामीजी के बारे में |

दादी: हाँ, क्या आप जानते हो की उनका यह नाम किसने दिया ?

व्यास : उनका ‘वेदांताचार्य’ नाम श्री रंगनाथ ने दिया | दादी, क्या यह सही है।

दादी : बिलकुल ठीक , व्यास । उनके जन्म का नाम वेंकटनाथन था। उनका जन्म कांचीपुरम में दिव्य दंपति अनंत सुरी और तोतारम्बाई से हुआ था।

पराशर : दादी हमें बताये ‘वेदांताचार्य’ स्वामी जी कैसे सम्प्रदाय में आये ?

दादी : जरूर पराशर | जब वेदांताचार्य छोटे थे, वे अपने मामा श्री किदाम्बी अप्पुलार के साथ श्री नदादूर अम्माल की कालक्षेप गोष्ठी में सम्मिलित होने गये थे। इसका उल्लेख करते हुए वेदांताचार्य कहते हैं कि श्री नदादूर अम्माल ने उन पर कृपा कर कहा कि सत्य की स्थापना करेंगे और विशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव सिद्धांत के सभी विरोधियों को समाप्त करेंगे।

अतुलाय : यकीनन , उनके आशीर्वाद से ही यह सब हुआ !

दादी (मुस्कराते हुए ) : हाँ अतुलाय | बड़ो का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता |

वेदवल्ली : मैंने सुना है की वेदांताचार्य स्वमीज श्रीनिवास् भगवान् की पवित्र घंटी के अवतार थे | सही न दादी जी ?

दादी : हाँ, आप सही कह रहे है अतुलाय | उन्होंने सौ से ज्यादा ग्रन्थ संस्कृत, तमिल एवं मणिप्रवाल भाषा में लिखे है |

व्यास : सच में सौ से ज्यादा ग्रन्थ ?

दादी : हाँ, उनके प्रमुख ग्रंथों में से कुछ निम्न है – तात्पर्य चन्द्रिका, (गीता भाष्य का व्याख्यान है), तत्वटीका (श्री भाष्य के एक खंड का व्याख्यान), न्याय सिद्धज्ञानं (हमारे संप्रदाय की सिद्धांत का विश्लेषण करता है), सदा दूषणी (अद्वैत सिद्धांत के विरुद्ध है), आहार नियम(अनुशंसित भोजन की आदतों पर एक तमिल लेख) |

परशार : दादीजी , मै आश्चर्य चकित होने से अपने आपको रोक नही पा रहा हु की कैसे स्वामीजी आहार नियम पर ग्रन्थ लिखा और कैसे एक ही समय में जटिल दार्शनिक टिप्पणियों के बारे में लिखें।

दादी : हमारे पूर्वाचार्यो का ज्ञान सागर के समान गहरा था | पराशर, इस में कोई संदेह नहीं, ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’ (सभी कला और शिल्प के स्वामी), यह नाम श्री रंग नाच्चियार (श्री महालक्ष्मी जी) ने प्रदान किया।

अतुलाय : दादी जी हमें और बताइये| उसके बारे में ये सारे तथ्य सुनना दिलचस्प है|

दादी : ‘वेदांताचार्य’ स्वामीजी को ‘कवितार्किक केसरी’ (कवियों के बीच शेर) नाम से भी जाना जाते थे| उन्होंने एक बार 18 दिनों की लंबी बहस के बाद कृष्णमिस्रा नामक एक अद्वैती पर जीत हासिल की। एक अहंकारी और खोखला कवि द्वारा चुनौती दिए जाने पर उन्होंने ‘पादुका सहस्रम’ की रचना की। यह एक 1008 पद्य कविता है जो भगवान श्री रंगनाथ की दिव्य चरण की प्रशंसा करते है।

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अवतार उत्सव के समय कञ्चि वेदन्ताचर्य

वेदवल्ली : यह गंभीर है! हम वास्तव में ऐसे महान आचार्यों के लिए धन्य हैं जो ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धियों के बावजूद ऐसी विनम्रता रखते थे।

दादी : ठीक कहा वेदवल्ली | श्री वेदांताचार्य को भी, अपने पूर्वाचार्यों और समकालीन आचार्यों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था, जिसका प्रमाण उनकी “अभितिस्तव्” में मिलता है, “कवचं रंगमुक्ये विभो ! परस्पर-हितैषीणाम् परिसरेशु माम् वर्त्य” , (हे भगवान! कृपया मुझे श्रीरंगम में उन महान भागवतों के चरणों में निवास प्रदान करे जो परस्पर एक दुसरे के शुभ चिन्तक हैं)। कई अन्य आचार्यों और विद्वानों ने जैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी), एऱुम्बि अप्पा, वादिकेसरी अऴगिय मणवाळ जीयर, चोलसिंहपुर (शोलिंगुर) के स्वामी डोड्डाचार्य  जी ने वेदांताचार्य के ग्रंथों पर व्याख्यान लिखा है या उनका उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है । वेदांताचार्य ने पिल्लै लोकाचार्य की प्रशंसा में ‘लोकाचार्य पंचासत’ नामक एक सुंदर प्रबंध कि रचना की। वेदांताचार्य, पिल्लै लोकाचार्य से आयु में 50 वर्ष छोटे थे और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे जिसे इस ग्रंथ के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है; इस ग्रंथ का आज भी तिरुनारायणपुरम (मेलकोट, कर्नाटक) में नियमित रूप से पाठ किया जाता है।

पाराशर : वेदांताचार्य स्वामी जी ने श्री रामानुजार जी को कैसे मानते थे ?

दादी : श्री वेदांताचार्य की श्री रामानुज के प्रति भक्ति को सभी भली प्रकार जानते हैं; अपने ग्रंथ “न्यास तिलका” की प्रारंभिक कविता “उक्त्य धनंजय” में, वे संतुष्टी करते हैं कि भगवान परोक्ष रूप में उन्हें यह बताते हैं की उनके द्वारा मोक्ष दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, क्यों कि श्री रामानुज के संबंध मात्र से ही उन्हें मोक्ष मिलने का निर्धारण हो गया है।

व्यास : दादी जी अपने सम्प्रदाय के आचार्यो के प्रति बहुत कुछ सीखने को है |

दादी : हाँ, एक रचना, वेदांताचार्य विजय (आचार्य चंपू) का उल्लेख करते हैं, जो गद्य और कविता के रूप में संस्कृत भाषा में महान विद्वान और कवि “कौशिक कवितार्किकसिंह वेदंताचार्य” द्वारा लिखी गयी है, जो लगभग 1717 AD के समय में हुए। इस रचना को वेदांताचार्य के जीवन का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमाणिक अभिलेख माना जाता है।

अतुलाय : अति सुन्दर दादी जी , आज हमने वेदांताचार्य स्वामीजी के संस्कृत एवं तमिल ग्रंथो के बारे में जाना, उनकी विनम्रता और भक्ति के बारे में भी जाना | ऐसे महान उदाहरण का अनुसरण करने के लिए हम वास्तव में धन्य हैं।

दादी : हाँ बच्चो हम ऐसी महान आत्माओं को हमेशा याद करते हैं! हम कल फिर मिलेंगे। आप सभी के घर जाने का समय हो गया है।

बच्चे एक साथ दादी जी का धन्यवाद करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2019/02/beginners-guide-vedhanthacharyar/

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – अष्टदिग्गज शिष्यगण एवं अन्य

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

दादी : स्वागत बच्चो , आशा करती हुई की आप सबको पिछले समय की चर्चा याद होगी |

बच्चे (एक साथ ) : नमस्ते दादी जी, हमें सब याद है , और हम जहाँ आपसे अष्टदिग्गज शिष्यगण के बारे में जानना चाहते है |

दादी : अच्छा लगा, चलिए हम सब चर्चा शुरू करते है |

पराशर : दादी, अष्टदिग्गज का मतलब शिष्यगण| दादी, क्या में ठीक कह रही हूँ ?

दादी : पराशर, आप ठीक कह रहे हो | मणवाळ मामुनि स्वामीजी के अष्टदिग्गज 8 प्राथमिक शिष्य थे | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि), कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्, पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर्, एऱुम्बि अप्पा, अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार्, अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर् | मणवाळ मामुनि (के समय / उनके बाद) जो महा श्रीवैष्णवाचार्य हुए है, उनके बाद हमारे संप्रदाय की वृद्धि में सबसे प्रभावशाली थे।

चलिए हम आगे बढ़ते हुए श्री पोन्नडिक्काल जीयर के जीवन की चर्चा करेंगे जो अपने आचार्य मनवाल मामुनिगल के प्राण सुकृत थे।

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दादी : पोन्नडिक्काल जीयर वानमामलै मे पैदा हुए और बचपन मे उनके माता–पिता ने उनका नाम अळगिय वरदर रखा ।

पराशर : दादी जी , उनको पोन्नडिक्काल जीयर क्यों कहा जाता था |

दादी : पोन्नडिक्काल  का मतलब है वो जिसने मामुनिगळ के शिष्य सम्पत की स्थापना की हो| | कहते हैं कि पोन्नडिक्काल जीयर के उत्कृष्ठ स्वभाव से सारे आचार्य उन्हें मणवाळमामुनि का उपागम (पुरुषाकार) समझते हैं और उन्ही के उपागम्यता से वे सारे, मणवाळमामुनि को पहुँच पाते थे । 

मामुनिगळ स्वामीजी ने अष्टदिग्गज शिष्यगण के लिए पोन्नडिक्काल जीयर स्वामीजी को चुना | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर जी को आदेश दिया की दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) श्री मणवाळमामुनि को श्री सेनैमुदलियार (विष्वक्सेन) के द्वारा एक संदेश भेजते हैं जिसमे कहते हैं कि वानामामलै दिव्यदेश मे पोन्नडिक्काल जीयर की सेवा कि ज़रूरत है । उसके अनन्तर मणवाळमामुनि उन्हें आदेश देते हैं कि वे तुरन्त वानमामलै जाए और वहाँ अपना कैंकर्य करें ।

व्यास : दादी , पोन्नडिक्कालजीयर स्वामीजी दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) जी के ससुर थे , क्या में सही कह रहा हूँ ?

दादी : हाँ व्यास , बिलकुल सही | पोन्नडिक्काल जीयर उस समय वानमामलै मे श्रीवरमंगै नाचियार का उत्सव विग्रह नही था और उसी से परेशान थे पोन्नडिक्काल जीयर । एक बार भगवान (दैवनायकन) उनके स्वप्न मे आकर कहते हैं कि वे तिरुमलै से नाचियार का उत्सव विग्रह लाना चाहिए। भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु वे तिरुमलै जाते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें स्वप्न मे श्री नाचियार कहती है कि उन्हें वानमामलै तुरन्त ले जाए और उन्की शादी दैवपेरुमाळ से करवाई जाए । पोन्नडिक्काल जीयर नाचियार के पिता स्वरूप बनकर उन्का कन्यादान दैवनायकन पेरुमाळ भगवान को करते हैं। दैवनायनक पेरुमाल कहते हैं कि जैसे भगवान् पेरियपेरुमाळ के ससुरजी पेरिआळ्वार हुए वैसे ही पोन्नडिक्काल जीयर उनके ससुरजी हुए |

शिष्यों को कई सालों तक अपने महत्वपूर्ण निर्देशों की सूचना व्यक्त करने के पश्चात वह अपने आचार्य का ध्यान करते हुए अपने शरीर (चरम तिरुमेणि) का त्याग करते हैं और इस प्रकार उनको परमपदम की प्राप्ति होती है । वह अपने अगले उत्तराधिकारि (अगले जीयर वानमामलै मठ) को नियुक्त करते हैं और यह आचार्य परंपरा आज भी ज़ारी है ।

चलिये अब हम श्री पोन्नडिक्कालजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों में उनके जैसा आसक्ति, हमारे वर्तमानाऽचार्य पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) में हो ।

दादी : हमारी अगली चर्चा कोयिल अण्णन स्वामीजी के बारे में होगी | वह अष्टदिग्गज शिष्यों में सबसे प्रिय शिष्ये थे | कोइल अण्णन के जीवन में एक दिलचस्प घटना घटी, जो उन्हें मामुनिगल की शरण में ले गई।

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पराशर : दादी, वह क्या घटना थी ??

दादी : आपकी जिज्ञासा प्रशंसनीय है पराशर | मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के महान पारिवारिक वंश में जन्मे, वह मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का आश्रय नहीं लेना चाहते थे। एक घटना ने उन्हें वापस मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के चरण कमलो के संपर्क में आये । | आप सभी श्री रामानुज स्वामीजी को जानते है जिन्होंने कोयिल अण्णन जी को मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का शिष्य बनने का आदेश दिया | श्री रामानुज स्वामीजी ने कोयिल अण्णन का मार्गदर्शन किया और उनको आदेश दिया की आप अपना मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के साथ सम्बन्ध का सही इस्तेमाल करे |

एम्पेरुमानार जी ने कहा “मैं आदि शेष हूँ और पुनः मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के रूप में अवतार लिया है | आप और आपके रिश्तेदार मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य बने और अपना उत्थान करें ”। बच्चों, पूरी घटना उनके सपने में हुई थी। स्वप्न टूटता है और स्वप्न से जागते है और पूरी तरह से हैरान हो जाते है । वह अपने भाइयों को बड़ी भावनाओं के साथ घटनाओं के बारे में व्याख्या करते है।

अण्णन स्वामीजी कन्दाडै वंश के आचार्यो के साथ मामुनिगळ स्वामीजी के मठ में प्रवेश करते है | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर स्वामी जी को सभी के लिए पंच संस्कार करने के लिए आवश्यक पहलुओं को तैयार करने का निर्देश दिया।

इसीलिए बच्चो , इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

आगे मैं मोर मुन्नार अय्यर (पत्तन्गि परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर) के बारे में बताऊंगा। वह मामुनिगल के अष्टदिग्गज शिष्यों में से एक थे । वह सदैव मामुनिगळ स्वामीजी के साथ अलग हुए बिना ही उनके साथ रहे, जैसे गोविंदाचार्य स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के साथ रहते थे ।

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वेदवल्ली : दादी जी , उनको मोर मुन्नार अय्यर के नाम से क्यों जाना जाता था ?

दादी : बहुत सही लगता है ना | प्रतिदिन, उन्होंने मामुनिगल के शेष प्रसाद को (बचा हुआ ) को ग्रहण करते थे । अपने पुर्वाश्रम में 30 साल, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद ही ग्रहण किया। वे “मोर मुन्नार अय्यर” (अत्यंत सम्मानीय जिन्होंने पहले दद्ध्योदन ग्रहण किया) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक भोजन में पहले दाल-चावल, सब्जियां आदि पाई जाती है। अंत में दद्ध्योदन के साथ समाप्त किया जाता है। पट्टरपिरान् जीयर, प्रसाद उसी केले के पत्तल पर पाते थे, जिसमें श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने प्रसाद ग्रहण किया था। श्री वरवरमुनि स्वामीजी दद्ध्योदन के साथ प्रसाद समाप्त करते थे और क्यूंकि गोविन्द दासरप्पन स्वाद को बदले बिना ही प्रसाद पाना चाहते थे (दद्ध्योदन से दाल तक), वे प्रतिदिन दद्ध्योदन से प्रारंभ करते थे। इस प्रकार वे “मोर मुन्नार अय्यर” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने मामुनिगल स्वामीजी से शास्त्रों के सभी सार को सीखा और सतत उनकी सेवा की। मामुनिगल स्वामीजी परमपद प्रप्त होने के बाद, पट्टर्पिरान जीयर तिरुमला मे ही रह गय और उधर अनेक जीवात्माओ का उद्दार किया। अधिक आचार्य निष्ठा होने के कारण वे अंतिमोपाय निष्ठा नामक ग्रंथ भि लिखा। यह ग्रंथ में अपने आचर्य परंपरा की स्तुती और अपने पूर्वाचार्य कैसे उनके आचार्यो पर पूर्ण निर्भर रहते थे उसका वर्णन किया गया है। वे बडे विध्वन थे और मामुनिगल स्वामीजी के प्रिय शिश्य भि थे।

दादी : बच्चो , अब हम आपको एरुम्बी अप्पा स्वामीजी के बारे में बताएँगे | एरुम्बी अप्पा, श्री वरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक हैं (आठ प्रमुख शिष्य जिन्हें संप्रदाय के संरक्षण के लिए स्थापित किया)। उनका वास्तविक नाम देवराजन है | अपने गाँव में रहते हुए और धर्मानुसार कार्य करते हुए, एक बार एरुम्बी अप्पा ने श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारे में सुना और उनके प्रति आकर्षित हुए। श्री वरवरमुनि स्वामीजी के समय को हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा नल्लदिक्काल (सुनहरा समय) कहा जाता है। एरुम्बी अप्पा ने कुछ समय के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहकर, सभी रहस्य ग्रंथों कि शिक्षा प्राप्त की और फिर अपने पैतृक गाँव लौटकर, वहां अपना कैंकर्य जारी रखा।

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वे सदा अपने आचार्य का ध्यान किया करते थे और पूर्व और उत्तर दिनचर्या का संकलन कर (जिनमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों का चित्रण किया गया था) एक श्रीवैष्णव द्वारा उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को समर्पित किया। एरुम्बी अप्पा की निष्ठा देखकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी बहुत प्रशंसा की। वे एरुम्बी अप्पा को उनसे भेंट करने के लिए आमंत्रित करते हैं। एरुम्बी अप्पा कुछ समय अपने आचार्य के साथ रहते हैं और फिर नम्पेरुमाल के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के भागवत विषय कालक्षेप में भाग लेते हैं। तद्पश्चाद वे पुनः अपने गाँव लौट जाते हैं।

व्यास : दादीजी, जैसे पट्टर्पिरान जीयर, पोन्नडिक्काल जीयर, एरुम्बी अप्पा स्वामीजी भी अपने आचार्य के प्रति बहुत संलग्न थे | क्या यह ऐसा नहीं था दादी जी ?

दादी : सही व्यास | एरुम्बी अप्पा की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय”। यह एरुम्बी अप्पा और उनके शिष्यों जैसे सेनापति आलवान आदि के बीच हुए वार्तालाप का संकलन है।

वेदवल्ली : दादी जी , “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” क्या है ?

दादी : इस सुंदर ग्रंथ में एरुम्बी अप्पा, अत्यंत दक्षता से आळवार/ आचार्यों की श्रीसूक्तियों के मिथ्याबोध से उत्पन्न होने वाले संदेह को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों के आधार पर संसार में वैराग्य विकसित करने और पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति अनुराग का महत्व बताया और हमारे द्वारा उसे जीवन में अपनाने के लिए जोर दिया है (उसके बिना यह मात्र सैद्धांतिक ज्ञान होता)।

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गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चाद, अण्णा ने तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की सेवा के लिए तिरुमला प्रस्थान किया। अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) का वैभव सुनने के बाद अण्णा स्वामीजी ने निर्णय लिया की वह माणवळ मामुनिगळ स्वामीजी के शिष्या बनने का फैसला किया | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने के लिए सकुटुंब श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते हैं। वह श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मठ में जाते है | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कालक्षेप कर रहे होते है और अण्णा स्वामीजी ने कालक्षेप सुना और उन्होंने शास्त्रों के विभिन्न क्षेत्रों में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वैभव जाना | उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण ली और उनके शिष्य बन गए |

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कांचीपुरम, चोलसिंहपुरम, एरुम्बी आदि के जरिए तिरुमला की यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। अण्णा भी यात्रा में उनके साथ ही जाते हैं। तिरुमला में तिरुवेंकटमुडैयाँ के लिए सुप्रभात के अभाव को देखते हुए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा को भगवान के लिए सुप्रभात की रचना करने का निर्देश देते हैं। अण्णा, कृतज्ञता से अपने आचार्य के दिव्य विग्रह का ध्यान करते हुए, श्री वेंकटेश सुप्रभातम, स्तोत्रं, प्रपत्ति और मंगल श्लोकों की रचना करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा की रचनाओं से बहुत प्रसन्न होते हैं और तिरुमला में भगवान की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उनका पाठ करने का निर्देश देते हैं।

दादी : बच्चो, हमारी अंतिम चर्चा अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार् स्वामीजी के बारे में होगी | उनके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। वे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के प्रिय शिष्य थे और अष्ट दिग्गज में से एक थे । वे दोनों महान विद्धवान थे जिन्होंने भारत के उत्तरी भाग में कई विद्वानों को जीत लिया |

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यद्यपि उन्होंने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के बारे में सुना, लेकिन उनके मन में उनके प्रति बहुत लगाव नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की महिमा के बारे में पता चला और यहां तक कि सुना कि कई महान हस्तियों जैसे कि कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, एऱुम्बि अप्पा ने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की शरण ली ।

वेदवल्ली : दादी जी, वे कैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) शिष्य बने ?

दादी : हाँ वेदवल्ली, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने ही एरुम्बि अप्पा जी को सूचित किया था आप आचार्य सम्बन्ध के लिए तैयार है | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि) जी ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहा की एरुम्बी अप्पा जी के साथ चर्चा करके वह धन्य है और एरुम्बी अप्पा जी आपका शिष्य बनने के लिए सभी योग्यताएं हैं | वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। उन दोनों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से पूछा की आप हमें शिष्य रूप में स्वीकार करे और हमें आशीर्वाद प्रदान करें | इस तरह श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अप्पिळ्ळै एवं अप्पिळ्ळार् जी का पञ्च संस्कार संपन्न किये |

अप्पिळ्ळार को जीयर मठ के दैनिक गतिविधियों जैसे तदियाराधन आदि के देखरेख का उत्तरदायित्व दिया गया था। जैसे किदम्बी अच्चान ने श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के लिए मठ की देखरेख का उत्तरदायित्व लिया था, अप्पिळ्ळार ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर अप्पिळ्ळै तिरुवंतादी पर व्याख्यान की रचना करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को उनके बहुत से दिव्य प्रबंध सम्बंधित कैंकर्य में सहायता करते हैं।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अप्पिळ्ळार और जीयर नारायण (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पुर्वाश्रम से उनके पौत्र) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे उनकी दैनिक आराधना के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अर्चा विग्रह प्रदान करने की कृपा करे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें एक सोम्बू (पात्र) प्रदान करते हैं जो वे नित्य उपयोग किया करते थे और उन्होंने उसके उपयोग से दो विग्रहों का निर्माण किया और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का एक-एक विग्रह अपने दैनिक पूजा के लिए रख लिया।

हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

बच्चो अब तक हमने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और उनके अष्ट दिग्गज शिष्यों के वैभव के बारे में चर्चा की |

पराशर : दादीजी हमने आज बहुत कुछ सीखा |

दादी : प्रिय बच्चो, अब में आपको कुछ महत्वपूर्ण बताने जा रही हूँ, उसे ध्यान से सुने |

मामुनिगल स्वामीजी के बाद, कई महान आचार्य हर शहर और गांव में भक्तों को आशीर्वाद देते रहे। आचार्यगण सभी दिव्या देशों, अभिमान स्थलों, आळ्वार / आचार्य अवतार स्थलों और दूसरे क्षेत्रो में निवास किये और सभी वैष्णव जन के साथ ज्ञान साझा किया और सभी में भक्ति का पोषण किया।

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार एवं श्रीपेरुम्बुदुर के पहले एम्बार जीयर हाल के अतीत (200 साल पहले) से थे और हमारे संप्रदाय के लिए उनके गहन अनुदानों और कैंकर्यो के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जो भी ज्ञान मैंने आपके साथ साझा किया है, वह आचार्यों परम्परा के माध्यम से आया है। हमें हमेशा उनका कृतज्ञ रहना होगा। आशा है कि आप सभी का समय अच्छा होगा। हमारे मन, इंद्रियों और शरीर और ऐसे आचार्यों, आळ्वार और एम्पेरुमान के लिए कैंकर्य में लगे रहना चाहिए।

ठीक है, अब अंधेरा हो गया है। आइए हम आचार्यों के बारे में सोचते हैं और आज अपना सत्र पूरा करते हैं।

बच्चे : धन्यवाद दादीजी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)

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श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

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आण्डाल दादी जी रसोई घर में खाना बनाने में व्यस्त थी जब बच्चे उनके घर में प्रवेश किये ताकि सब बच्चे लोकाचार्य स्वामीजी के शिष्यों के बारे में जान सके | आण्डाल दादी जी सभी बच्चो का मुस्कुराकर स्वागत करती है | दादीजी इस प्रतीक्षा में थी की श्रीरंगनाथ भगवान जी का प्रसाद बच्चो में वितरित कर सके |

दादी : आओ बच्चो | भगवान रंगनाथ जी का प्रसाद ग्रहण करे | आशा करती हूँ की आपको पूर्ववर्ती वाली चर्चा याद होगी |

व्यास : दादीजी , हमने कूर कुलोत्तम दासर्, विळान् चोलै पिल्लै, जी के बारे में सीखा और आचार्य अभिमान ही उठ्ठारगम के बारे में भी सीखा |

दादी : बहुत गर्व हुआ तुम पर बच्चो, आज में तुम्हें आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के एक शिष्य के बारे में बतायूंगी जिनका नाम तिरुमलै आऴ्वार था |

अतुलहाय : दादी, मैंने सुना है कि तिरुमलै आऴ्वार जी को नाम आऴ्वार रचित तिरुवाय्मोऴि के प्रति लगाव के कारण मिला। क्या मैं सही हूं!

दादी : आप बिलकुल सही कह रही हो अतुलहाय | वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए । तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया ।

व्यास : ओह ! दादी जी फिर तिरुमलै आऴ्वार को संप्रदाय में वापिस लेकर आये ?

दादी : बच्चो, में आपकी जिज्ञासा की प्रशंसा करती हूँ | पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

वेदवल्ली : दादी जी, कूरकुलोत्त्मदास जी ने तिरुमलै आऴ्वार को सुधारने के लिए क्या किया ? क्या आप हमें बता सकती है ?

दादी : हाँ ! एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये ।

पराशर : दादी जी हमें बताएं तिरुमलै आऴ्वार जी ने कूरकुलोत्त्मदास से कैसे सीखा ?

दादी : तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है, कूरकुलोत्तमदास जी ने देखा की तिरुमलै आऴ्वार पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी की तनियन पाठ करते हुए तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रबंधों का सारांश ज्ञान देने लगे । इसी दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशासनिक-कार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपना शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशासनिक-कार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरण कमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य जी का ध्यान करते हुए कूरकुलोत्त्मदास परमपद को प्राप्त हुए , तिरुमलैयाऴ्वार स्वामीजी ने ही कूरकुलोत्त्मदास स्वामीजी महारजा का चरम कैंकर्यं भव्य तरीके से (अंतिम क्रिया) किया |

व्यास : दादी जी, क्या तिरुमलै आऴ्वार हमारे सम्प्रदाय को आगे लेकर गए ?

दादी : नहीं व्यास, जैसे मैंने पहले कहा था की तिरुमलै आऴ्वार जी श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि सीखने गए थे | वह सभी पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना चाहता थे । तो श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै स्वामीजी ने उनको पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना के लिए थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी के पास भेजते है। दुर्भाग्य से उनके आगमन से ठीक पहले थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी परमपद को प्राप्त कर लेते है । तिरुमलै आऴ्वार बहुत परेशान हो जाते है और देव पेरुमल (काँची पुरम वरद स्वामीजी ) का मंगलाशाशनम करने का फैसला करते है।

पराशर : दादीजी , यह घटना रामानुज स्वामीजी की तरह ही है जब वह यामुनाचार्य स्वमीजी से मिलने गए थे, लेकिन इससे पहले कि रामानुजा स्वामजी आलवन्दार स्वामीजी से मिलते, आलवन्दार स्वामी जी परमपद प्राप्त कर लेते है । क्या मैं सही हूं?

दादीजी : बिलकुल सही कह रहे हो पराशर | तब वह देवपेरुमाळ स्वामीजी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, सभी उनका स्वागत करते है, देवपेरुमाळ स्वामीजी तिरुमलैयाऴ्वार जी को श्रीशठारी, माला, चन्दन का प्रसाद प्रदान करते है | देवपेरुमाळ स्वामीजी श्री नालूर पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है की वह तिरुमलैयाऴ्वार जी को दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सिखाये जिसमे तिरुवाय्मोऴि ईडुव्याख्यान जो की वह थिरुप्पुट्कुलि जीयर जी से नहीं सीख पाए |

श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने नालूरपिळ्ळै के पुत्र नालूर आच्चान पिळ्ळै को यह कार्य सौंपा । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे । नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मूल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै । तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है ।

व्यास : क्या अलवार तिरुनगरी नम्माऴ्वार की जन्मस्थली है ? मैंने सुना है की तिरुमलै आऴ्वार स्वमीजी ने ही अलवार तिरुनगरी को दुबारा बनाया था जब यह जीर्ण स्थिति में थी | कृपा करके हमें उस कथा के बारे में बताये दादीजी |

दादी : आप सही हो व्यास | जब तिरुमलै आऴ्वार अलवार तिरुनगरी में पहुँचते है | वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया)। इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरी लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरी के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरिक्त चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुक्त कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए । उनके बिना, हम उस आऴ्वार तिरुनगरी की कल्पना नहीं कर सकते जो आज हम देख रहे हैं और उसका आनंद ले रहे हैं।

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तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्ण प्रेम भक्ति भाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर मे श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है । अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरिय पेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के प्रयासों से हमें 36000 ईडु व्याख्यान का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो बाद में अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ द्वारा व्यापक रूप से महान ऊंचाइयों तक फैला । तो बच्चों, चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

बच्चों ने धन्य महसूस किया और विचार-विमर्श करके अण्डाल दादी के घर को छोड़ कर अपने घर को जाते है ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – अऴगिय मणवाळ मामुनि

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श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

दादी बच्चो का स्वागत करती है और पूछती है की आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें में जानने और सुनने के लिए कौन कौन उत्साहित हैं ।

दादी : स्वागत बच्चो, आप सभी ने अपनी गर्मी की छुट्टी का आनंद कैसे लिया?

पराशर : गर्मी की छुट्टी तो अच्छी थी | अब हम अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामी जी के बारे में जानने के लिए उत्सक है | क्या हमें उनके बारे में बताएंगी ?

दादी : अवश्य बच्चो | अऴगिय मणवाळ मामुनि आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री तिगळ किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री यतिराज के पुनः अवतार के रूप मे प्रकट हुए । उनका नाम – अऴगिय मणवाळमामुनि (अऴगिय मणवाळ पेरुमाळनायनार) था | वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है ।

व्यास: क्या तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी के आचार्य थे ?

दादी : हाँ व्यास | तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगिय मणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखा था| उन्हें श्री रामानुज स्वामीजी से भी बहुत लगाव था और उन्होंने आऴ्वार तिरुनगरि में भविष्यदाआचार्य सानिध्य में सेवा करते थे । यतीन्द्र (श्री रामानुज स्वामीजी ) के प्रति उनके अत्यधिक लगाव के कारण, उन्हें “यतीन्द्रं प्रवण” (यतीन्द्र से बहुत लगाव रखने वाले) के रूप में जाना जाता था।

बाद में , उन्होंने आचार्य नियमम आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित करके श्रीरंगम में सम्प्रदाय का प्रचार एवं प्रसार करने लगे | श्रीरंगम पहुँच कर उन्होंने सन्यास धर्म अपना लिया एवं अऴगिय मणवाळ मामुनि और पेरिया जीयर के नामो से लोकप्रिय हुए |

श्री वरवरमुनि स्वामीजी मुमुक्षुपडि, तत्त्व त्रय, श्रीवचन भूषणम जैसे महान ग्रन्थों में वेद , वेदांतम्, इतिहास , पुराण और अरुचिच्याल से कई संदर्भों के साथ सुंदर टीका लिखते थे ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने रामानुज नूट्रन्दादि , ज्ञान सारम और प्रमेय सारम पर टिप्पणियां लिखते हैं जो चरम उपाय निष्ठा के बारे में बताती है (की आचार्य ही सब कुछ है) । श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने कुछ श्रीवैष्णवों के अनुरोध के आधार पर तिरुवायमोली नुट्रन्दादि जो तिरुवायमोली के अर्थों पर प्रकाश डालती है ग्रन्थ को रचा | यहाँ तक कि उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों के मूल्यवान उपदेशों को भी लिख दिया जिसमें उपदेश रत्न माला में उन्होंने हमारे आलवारों के जन्म स्थान, तिरुनक्षत्रम , तिरुवायमोली और श्रीवचन भूषणम पर भी प्रकाश डाला ।

मामुनिगळ स्वामी जी दिव्या देशो की यात्रा भी करते है और सभी दिव्या देशो के पेरुमाल जी का मंगला शाशन भी करते है |

वेदवल्ली : दादीजी, मामुनिगळ स्वामी जी के बारे में सुन कर बहुत अद्भुत लगा और उन्होंने हमारे संप्रदाय आगे लेने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की ।

दादी : हाँ वेदवल्ली, जहाँ तक नम्पेरुमाळ जी स्वयं नम्माळ्वार स्वामीजी की 36000 ईडुव्याख्यान वाली तिरुवायमोली का अऴगिय मणवाळ मामुनि द्वारा कालक्षेप सुनने में रूचि रखते | अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी ने बहुत प्रसन्न होकर 10 महीने तक कालक्षेप किया और अंत में आनि तिरुमुलम पर इसकी साट्ट्रुमुरै सम्पूर्ण किये |

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साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये । हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कह कर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक टीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्री वैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया ।

पराशर: बहुत अद्भुत दादी जी, नम्पेरुमाळ जी द्वारा सम्मानित होकर कितना अच्छा लगा होगा | दादी , यही कारण है कि हम इस तनियन के साथ अपने सभी कैंकर्य शुरू करते हैं?

दादी : हाँ पराशर | कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।

अपने अंतिम दिनों के दौरान, मामुनिगळ स्वामीजी बड़ी मुश्किल से आचार्य हृदयम पर व्याख्यान लिख पाते है ।अंत में वह अपनी थिरुमेनि (दिव्य रूप) को त्याग कर परमपद धाम जाने का फैसला करते है। वह आर्ति प्रबंधं का पाठ करते हुए एम्पेरुमानार जी से आर्त विनती करते है की उनको स्वीकार करे और उन्हें इस भौतिक क्षेत्र से मुक्त हुए। इसके बाद, मामुनिगळ स्वामीजी एम्पेरुमानार जी के कृपा से परमपद को प्रस्थान करते है | पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

अतुळाय : दादी जी , उनके बारे में बोलने से हम सभी को बहुत फायदा हुआ। मामुनिगल के दिव्य चरित्र को हमारे साथ साझा करने के लिए धन्यवाद।

दादी : मुझे भी अच्छा लगा, कम से कम वह पेरिया पेरुमल द्वारा आचार्य के रूप में स्वीकार किया गए , वह आचार्य रत्न हार को पूरा करते है और ओराण वाली गुरु परंपरा जो स्वयं पेरिया पेरुमाल जी से शुरू हुई ।

हम अपनी अगली चर्चा में मामुनिगळ स्वामीजी के अष्ट दिक गज शिष्यों के बारे में चर्चा करेंगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य शिष्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ
पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के शिष्यों के बारे में जानने की जिज्ञासा के साथ प्रवेश करते हैं।

दादी : सुस्वागतम बच्चो, आप सब कैसे है ? मैं आप सभी के चेहरे पर उत्साह देख रही हूँ ।

व्यास : नमस्कार दादी जी, हम अच्छे हैं! दादी जी आप कैसे हैं? आप सही हैं हम बेसब्री से पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के बारे में सुनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

दादी : हाँ बच्चों, यहाँ तक कि मैं भी आप सभी के साथ साझा करने की प्रतीक्षा कर रही थी | आशा है कि आप सभी को हमारी पिचला चर्चा याद होगी। क्या कोई मुझे उनके शिष्यो के नाम बता सकता है?

अतुळाय : दादीजी से , मुझे नाम याद है | कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि |

दादी : अतुळाय बहुत सुन्दर , अच्छा लगा की आपको नाम स्मरण है ! अब हम इनके बारे में विवरण से चर्चा करते है | पहले में आपको कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में बताती हूँ |

सब बच्चे : अबश्य दादी जी |

दादी : कूर कुलोत्तम दास का जन्म श्रीरंगम में हुआ और वे कूर कुलोत्तम् नायन् के नाम से भी जाने जाते थे। | कूर कुलोत्तम दासर् ने तिरुमलै आलवार (तिरुवायमोली पिल्लै/ शैलेश स्वामीजी) को फिर से संप्रदाय में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पिल्लै लोकाचार्य के निकट सहयोगियों में से एक हैं और उन्होंने उनके साथ तिरुवरंगन उला (नम्पेरुमाल की कलाब काल की यात्रा) के दौरान यात्रा की थी। 

तिरुमलै आलवार को सुधारने के लिए किये गए उनके अनेक प्रयासों और पिल्लै लोकाचार्य से सीखे हुए दिव्य ज्ञान को तिरुमलै आलवार तक पहुंचाने में, उनके द्वारा की गयी असीम कृपा के कारण मामुनिगल, उनकी महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें “कूर कुलोत्तम् दासं उदारं” से संबोधित करते हैं (वह जो बहुत ही दयालु और उदार है)। रहस्य ग्रंथ कालक्षेप परंपरा में उनका एक महत्वपूर्ण स्थान है और उनकी महिमा का वर्णन रहस्य ग्रंथों की कई तनियों में किया गया है। श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, यह निर्णय किया गया है कि एक शिष्य के लिए “आचार्य अभिमानमे उत्थारगम्”। इसके व्याख्यान में मामुनिगल समझाते हैं कि एक प्रपन्न के लिए जिसने सभी अन्य उपायों का त्याग किया है, आचार्य कि निर्हेतुक कृपा और श्री आचार्य का यह विचार कि “यह मेरा शिष्य है“ ही मोक्ष का एक मात्र मार्ग है। पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर् और तिरुवाय्मोळि पिल्लै के चरित्र में हम यह स्पष्ट देख सकते हैं। यह पिल्लै लोकाचार्य का तिरुवाय्मोळि पिल्लै के प्रति अभिमान और कूर कुलोत्तम दासर् का अभिमान और अथक प्रयास है, जिन्होंने संप्रदाय को महान आचार्य तिरुवाय्मोळि पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) को दिए, जिन्होंने फिर संप्रदाय को अलगिय मणवाल मामुनिगल को दिए।| यह बिल्कुल कूर कुलोत्तम दासर और तिरुमलै आऴ्वार के लिए अनुकूल होता है । चलो आइए हम सब कूर कुलोत्तम दासर् का स्मरण करें जो सदा-सर्वदा पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के चरण कमलों का आश्रय लेते है।

वेदवल्ली : दादीजी , हम सब को कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में सुनकर बहुत प्रसनता हुई | हम सभी ने यह सीखा की शिष्य को कैसे अपने आचार्य का सम्मान करना चाहिए |

दादी : वेदवल्ली सबको “आचार्य अभिमानमे उतरागम ” स्मरण रहना चाहिए | अब हम पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी के दूसरे शिष्ये विळान चोलै पिळ्ळै जी के बारे में जानेंगे |

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व्यास : दादी, मैं यह पहले से जानता हुँ की उनको विळान चोलै पिळ्ळै नाम से क्यों जाना जाता था? क्यूंकि वह विल्लम वृक्ष पर चढ़कर पद्मनाभ स्वामी तिरुवनंतपुरम मंदिर का गोपुरम देखते थे | उनका जन्म ईलव कुल में हुआ था। अपने कुल के कारण वे मंदिर के अंदर नहीं जा सकते थे, इसलिए तिरुवनंतपुरम के अनंत पद्मनाभ मंदिर के गोपुर के दर्शन और मंगलाशासन के लिए वे अपने गाँव के विलम वृक्ष पर चढ़ जाया करते थे। विळान् चोलै पिल्लै ने ईदू, श्री भाष्य, तत्वत्रय और अन्य रहस्य ग्रंथ, अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनाराचार्य से सीखा, जो श्री पिल्लै लोकाचार्य के अनुज थे।

उन्होंने श्री वचन भूषण अपने आचार्य श्री पिल्लै लोकाचार्य से सीखा और वे उसके अर्थों में विशेषज्ञ (अधिकारी) माने जाते थे।

श्री विळान् चोलै पिल्लै ने “सप्तगाथा” कि रचन की जिस में उनके आचार्य के “श्री वचन भूषण” के सार तत्व का वर्णन है।

पराशर : विळान् चोलै पिल्लै के आचार्यत्व के प्रति लगाव को देखकर हम बहुत हैरान हैं।

दादी : हाँ पराशर ! अपने आचार्य के प्रति सबसे बड़े कैंकर्य स्वरुप, उन्होंने आचार्य द्वारा दिए हुए अंतिम निर्देशों का पालन किया – श्री पिल्लै लोकाचार्य चाहते थे कि उनके शिष्य, तिरुवाय्मोली पिल्लै (तिरुमलै आलवार/ शैलेश स्वामीजी) के समक्ष जायें और उन्हें इस सुनहरी वंशावली के अगले आचार्य के रूप में तैयार करें; श्री पिल्लै लोकाचार्य, विळान् चोलै पिल्लै को तिरुमलै आलवार को श्री वचन भूषण के अर्थ सिखाने के निर्देश देते हैं। बच्चो अब मैं विळान् चोलै पिल्लै के जीवन में घटित एक महत्वपूर्ण घटना को साझा करना चाहूंगी।

अतुलहाय : दादी , उस घटना के बारे में हमें बताएं |

दादी : मुझे ज्ञात है की आप सब बहुत उत्सुकता से उस घटना के बारे में जानना चाहते है और यह मेरा कर्त्तव्य है की में आपके साथ सतविषय के बारे में आपको बताऊँ, इसलिए ध्यान से सुने |

एक दिन नम्बूध्री, अनंत पद्मनाभ भगवान की आराधना करते हुए देखते हैं कि विळान् चोलै पिल्लै पूर्वी द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं, ध्वज स्तंभ और नरसिंह भगवान की सन्निधि को पार करते हुए वे उत्तर द्वार से गर्भ गृह में प्रवेश करते हुए “ओर्रै कल मण्डप” के समीप से सीढियाँ चढते हैं और भगवान के सेवा दर्शन देने वाली तीन खिडकियों में से उस खिड़की के समीप खड़े होते हैं जहाँ से भगवान के चरण कमलों के दर्शन होता है।

जब नम्बूध्री यह देखते हैं, वे सन्निधि के द्वार बंद करके मंदिर से बाहर आते हैं क्योंकि उस समय की रीती के अनुसार विळान् चोलै पिल्लै अपने कुल के कारण मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते थे।

उसी समय, विळान् चोलै पिल्लै के कुछ स्थानीय शिष्य मंदिर में पहुंचकर यह बताते हैं कि उनके आचार्य विळान् चोलै पिल्लै ने अपने आचार्य पिल्लै लोकाचार्य के चरणों में प्रस्थान किया!! और वे लोग विळान् चोलै पिल्लै के दिव्य विग्रह के लिए तिरु पारियट्टम और भगवान की फूल माला चाहते थे !! वे लोग मंदिर प्रवेश द्वार के समीप खड़े होकर रामानुज नूत्तन्दादि इयल आदि का पाठ करते हैं।

जब नमबूधिरी यह देखते हैं, उनके पूर्व में हुई गर्भगृह की घटना से बहुत अचंभा होते है और वे सभी को इसके बारे में बताते हैं!

जिस प्रकार तिरुप्पणालवार (योगिवाहन स्वामीजी) पेरिय कोइल में पेरिय पेरुमाल के श्री चरण कमलों में पहुंचे, उसी प्रकार यहाँ विळान् चोलै पिल्लै ने अनंत पद्मनाभ भगवान के श्री चरणों में प्रस्थान किया!

वेदवल्ली : दादी मैं विळान् चोलै पिल्लै के अंतिम क्षणों के बारे में सुनकर मेरे रोन्ते खडे होगये है ।

व्यास : जी हाँ, मेरी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह रहे है । यह वास्तव में बताता है कि कैसे “ईलव कुल” से एक व्यक्ति को हमारे संप्रदाय में महिमा मिलती है।

दादी : ठीक है बच्चों, आप सभी के साथ यह एक अच्छा समय था। आशा है कि आप सभी को याद होगा कि हमने आज क्या चर्चा की। अगली बार, मैं आपको तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) के बारे में विस्तार से बताउंगी , जल्द ही आप से मिलेंगे ।

सभी बच्चों ने पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ चर्चा करके दादी जी के घर को छोड़ दिया।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और नायनार

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै शिष्य

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ प्रवेश करते हैं। बच्चे दादी माँ को तिरुप्पावै का पाठ करते हुए देखते हैं और उसके खत्म होने तक प्रतीक्षा करते हैं। दादी ने अपना पाठ समाप्त किया और बच्चों का स्वागत किया।

दादी : स्वागत बच्चो !

व्यास : दादी, पिछली बार जब आपने कहा था कि आप वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के बेटों के बारे में बताएंगे। कृपया हमें उनके बारे में बताएं।

दादी: हाँ व्यास । आज हम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के दो महान बेटों के बारे में बात करेंगे। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था कि उनके आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) और नंपेरुमाळ की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) को दो बेटों अर्थात् पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के साथ आशीर्वाद दिया गया था। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते हैं।

नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) परमपदधाम पहुंचने के बाद, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए और आगे बढ़ते हुए अपने बेटों को उन सभी अर्थों को सीखाते है जो उन्होंने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) से सीखे थे। कुछ समय बाद वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) ने अपनी आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) के बारे में अपने आचार्य कैंकर्य करते हुए अपनी तिरुमेनी को त्याग दिया और परमपद को प्राप्त किया, जिसके बाद उनके पुत्र पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए ।

अतुळाय : दादी , मैंने सुना है कि पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे।

कत्तालागीय पेरुमाल कोयिल में कालक्षेप करते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगम

दादी: अतुळाय आपने सही सुना। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) अपने अंतिम दिनों के दौरान ज्योतिष्कुडी में, नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) को हमारे संप्रदाय के अगला आचार्य घोषित करते है और तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) को व्याख्यान सिखाने का निर्देश देते हैं।  जब तिरुमलै अलवार कांचीपुरम में देव पेरुमल जी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, तो देव पेरुमल सीधे नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) से बात करते हैं, जो उनके पास में खड़े थे और कहते हैं “जैसा कि मैंने ज्योतिष्कुडी में उल्लेख किया है कि आपको तिरुमलै अलवार को अरुळिच्चयल के सभी अर्थ सिखाना चाहिए”।

वेदवल्ली: दादी, पिल्लै लोकाचार्य ने ज्योतिष्कुडी नामक स्थान पर अपने अंतिम दिन क्यों बिताए? क्या उनका जन्म श्री रंगम में नहीं हुआ था?

दादी: पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) एक महान आचार्य थे जिन्होंने एक और सभी के लाभ के लिए आसान तमिल भाषा में अलवार पाशुरम पर सुंदर ग्रन्थ लिखे। उस समय  सभी संस्कृत या तमिल में पारंगत नहीं थे । उन लोगों के लिए जो भाषाओं से बहुत अच्छी जानकारी नहीं रखते, लेकिन फिर भी पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने हमारे पूर्वाचार्यों की कृतियों को सीखने और लाभ पाने की इच्छा रखने वालो के लिए उन्होंने बड़ी दया के साथ अपने आचार्यों से सरल और कुरकुरी भाषा में जो कुछ भी सुना, उसे प्रलेखित किया।   श्री वचन भूषण दिव्या शास्त्र उनका बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ है जिसमे हमारे संप्रदाय के अर्थों का विवरण है। इस प्रकार वह मुख्य आचार्य थे जिन्होंने प्रमाणं रक्षणं (हमारे सम्प्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा / पोषण) किया था।

पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगं

पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने न केवल हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा की, बल्कि हमारे सम्प्रदाय के मूल – श्रीरंगम के नंपेरुमाळ जी की भी।  जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे । वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । इस प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य ने नम्पेरुमाळ की सुरक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।   यदि उन्होंने और हजारों अन्य श्री वैष्णव जन, जिन्होंने अपने जीवन के  बलिदान नहीं किया होता , तो आज हम श्रीरंगम में नम्पेरुमाळ जी की पूजा और दर्शन नहीं कर पाते ।

ज्योतिष्कुडि – पिळ्ळै लोकाचार्य परमपद स्थल

पराशर : कोई आश्चर्य नहीं कि वह स्वयं देव पेरुमाळ का अवतार थे, अत्यंत बलिदान का प्रतीक !

दादी: हाँ पराशर, यही कारण है कि देव पेरुमाळ जी को ही हमारे संप्रदयाप के पेरुमाळ कहलाते है । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने केवल प्रमाण रक्षण (ग्रन्थों के रूप में हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार का संरक्षण) ही नहीं किया था, वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करके एक श्री वैष्णव का असली गुणों को प्रकशित किये | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की तरह, जो एम्पेरुमान जी की तिरुमेनि के बारे में चिंतित रहते थे और उन्होंने तिरुपल्लाण्डु गाया, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य जी ने नम्पेरुमाळ जी की अर्चा मूर्ति में एक बच्चे को देखा और पितृत्व प्रेम और देखभाल करते हुए, नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की और अपने जीवन का बलिदान किये पर मुस्लिम आक्रमणकारियों को नम्पेरुमाळ जी को नहीं लेने दिए ।  इसलिए, अगली बार जब आप पेरुमाळ मंदिर जाते हैं, तो याद रखें कि हमारे पास जो संप्रदाय है, वह आज हमारे सामने हजारों श्री वैष्णव द्वारा किए गए निस्वार्थ बलिदान द्वारा बनाया गया है। उन्होंने संप्रदाय और नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां, उनके श्रम के फल का आनंद ले सकें। हम इतने समर्थ नहीं की ऐसे श्री वैष्णव जन जिन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया उनको कुछ दे सके, सिवाय इसके की हम सभी श्री वैष्णव जन के बलिदान का स्मरण रखे और अपने सम्प्रदाय द्वारा दिए गए मूल्यों और ज्ञान को हम आगे लेकर जाये, और आने वाली पीढियों तक यह मूल्य और ज्ञान पहुंचा सके|

अतुळाय : दादी, हमें पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नयनार के बारे में अधिक बताएं।

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अळगिय मनवाळ पेरुमाळ नायनार

दादी: नायनार ने हमारे संप्रदाय के आवश्यक सिद्धांतों पर अद्भुत ग्रन्थ लिखे, जिनमे से मुख्य आचार्यहॄदयम् ग्रन्थ है । उनको आचार्य पेरियवाच्चान् पिळ्ळै जी के समान महान आचार्य माना जाता है जिनको हमारे सम्प्रदाय और दिव्य प्रभंद का गहरा ज्ञान था |  नायनार को महान आचार्य के रूप में सराहा जाता है । वह “जगत् गुरुवरानुज – पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई” के रूप में लोकप्रिय हैं। नायनार ने कम उम्र में अपनी तिरुमेनि को छोड़ने का फैसला किया और पिळ्ळै लोकाचार्य को पीछे छोड़कर परमपद को गमन किये । उनकी रचनाएँ ज्ञान रत्न के अलावा और कुछ नहीं हैं, जिसके बिना हमारे संप्रदाय के जटिल अर्थ और विवरण आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाते। मामुनि स्वामी जी नायनार स्वामीजी का महिमामंडन करते हुए कहते है कि पेरियवाच्चन पिळ्ळै स्वामीजी के बाद नायनार स्वामीजी ही है जिन्होंने अपने कामों से बहुत योगदान दिया है। जब नायनार स्वामीजी परमपदम पहुंचते है, तो पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दुःख के सागर में गिर जाते हैं और नायनार स्वामीजी के तिरुमुडी (सिर) को अपनी गोद में रखते हुए रोते हैं। वह नायनार स्वामीजी को एक असाधारण श्री वैष्णव के रूप में देखते है जिसे दुनिया ने बहुत कम समय में खो दिया है।

व्यास : दादी माँ, पिळ्ळै लोकाचार्य और नायनार का जीवन सुनने के लिए बहुत ही रोचक और भावनात्मक है।

दादी: हाँ व्यास । जब हम अपने आचार्यों और उनके जीवन के बारे में बात करना शुरू करते हैं, तो हमें समय बीतने का कभी पता नहीं चलता। बाहर अंधेरा हो रहा है। आप बच्चों को अब अपने घरों को चले जाना चाहिए। अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं आपको पिळ्ळै लोकाचार्य के शिष्यों के बारे में बताउंगी ।

बच्चे अपने-अपने घरों को वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी), पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी), अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नायनार और उनके शानदार जीवन के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-pillai-lokacharyar-and-nayanar/

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै शिष्य

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बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

अंडाल दादी रसोई घर में खाना बना रही होती है जब पराशर, वेद व्यास, वेदवल्ली और अतुळाय साथ में दादी के घर में प्रवेश करते है। दादी बच्चों की बात सुनके, बच्चों के स्वागत के लिए लिविंग रूम के अंदर आती है।

दादी : स्वागत बच्चो | अपने हाथ पावं दो लो | मंदिर का प्रसाद लीजिये | पिछली बार, हमने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में जाना | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया, आज हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों के बारे में जानेंगे | वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि उनके कुछ प्रमुख शिष्य थे |

व्यास : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कई शिष्य थे | क्या आप हमें उनके बारे में बताएंगी |

दादी : हाँ, चलो हम उनके बारे में एक एक करके जानते है | सबसे पहले हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्य जिनका नाम व्याख्यान चक्रवर्ती, पेरियवाच्चान पिळ्ळै जी के बारे में जानते है | पेरियवाच्छान पिळ्ळै, सेंगणूर मे, श्री यामुन स्वामीजी के पुत्र “श्री कृष्ण” के रूप मे अवतरित हुए और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के नाम से मशहूर हुए । नम्पिळ्ळै के प्रधान शिष्यों में से वे एक थे और उन्होंने सभी शास्त्रार्थों का अध्ययन किया । नम्पिळ्ळै के अनुग्रह से पेरियवाच्चान पिळ्ळै सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध आचार्य बने । पेरिय तिरुमोळि ७. १०. १० कहता है कि – तिरुक्कण्णमंगै एम्पेरुमान की इच्छा थी कि वे तिरुमंगै आळ्वार के पाशुरों का अर्थ उन्हीं से सुने| अतः इसी कारण, तिरुमंगै आळ्वार नम्पिळ्ळै बनके अवतार लिए और एम्पेरुमान पेरियवाच्छान पिळ्ळै का अवतार लिए ताकि अरुलिचेयळ के अर्थ सीख सके ।

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – सेंगानूर

व्यास : दादी, पेरियवाच्चान पिळ्ळै स्वामीजी को व्याख्यान चक्रवर्ती क्यों कहा जाता था ?

दादी : पेरियवाच्छान पिळ्ळै जी ही हमारे सम्प्रदाय के एक ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने अरुळिचेयळ की व्याख्या लिखी है | इनकी अरुळिचेयळ और श्री रामायण में निपुणता का प्रमाण इनसे लिखे गए पाशुरपड़ि रामायण ही है जिस में वे केवल अरुळिचेयळ के शब्द उपयोग से पूरे श्री रामायण का विवरण सरल रूप मे प्रस्तुत किया है। देखा जाये तो यह उनका काम नहीं था, कोई भी अरुळिचेयल के आंतरिक अर्थों के बारे में नहीं बोल सकता है और न ही समझ सकता है। उनका कार्य हमारे सभी पूर्वाचार्य के ग्रन्थों को समाहित करता है।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे मुख्य शिष्य जी का नाम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै था | श्री रंगम में श्री कृष्ण पादर के रूप में जन्मे, वह पूरी तरह से आचार्य निष्ठा में डूबे हुए थे। अपने आचार्य नम्पिळ्ळै की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, क्योंकि पुत्र का जन्म उसके आचार्य नम्पिळ्ळै (जिसे लोकाचार्य भी कहा जाता है) के आशीर्वाद से हुआ था। मुझे आशा है कि आप सभी को नम्पिळ्ळै के पीछे की कहानी को लोकाचार्य के नाम से याद किया जाएगा।

व्यास : हाँ, दादी | वह कंदाडै तोळप्पर ही थे जिन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी को लोकाचार्यार नाम से संभोदित किया था | हमें वह कथा स्मरण है |

वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै – काँचीपुरम

दादी : जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने अपने बेटा का नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने बच्चे के नामकरण अऴगिय मणवाळ मामुनि के अपने इरादे का खुलासा किया | जल्द ही, नंपेरुमळ, एक और बेटे के साथ वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को आशीर्वाद देते हैं और दूसरे बेटे का नाम अऴगिय मणवाळ मामुनि पेरुमल नायराज रखा गया क्योंकि वह अऴगिय मणवाळ मामुनि (नामपेरुमल) की कृपा से पैदा हुए थे, जिससे नम्पिळ्ळै की इच्छा पूरी हुई। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते है | वे दोनों एक ही समय में हमारे संप्रदाय के महान आचार्य जैसे कि नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, पिल्लई, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, आदि का आशीर्वाद और मार्गदर्शन पा रहे थे।

एक बार, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने तिरुमालीगई (श्री वैष्णव के घरों को तिरुमालीगई कहते है ) के लिए तदीयराधन के लिए नम्पिळ्ळै स्वामीजी को आमंत्रित किया और नम्पिळ्ळै ने स्वीकार किया और उनके तिरुमालीगई में गए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी खुद तिरुअराधनम की शुरुआत करते हैं और कोयल आळ्वार (पेरुमल सानिधि) में, नम्माळवार स्वामीजी की पाशुरम के सभी उपदेशों और व्याख्यानों को बड़ी सुंदरता एवं सरल अर्थो में ताड़ के पत्तों के गुच्छो में देखते हैं। रूचि होने के कारण, वह उनमें से कुछ को पढ़ना शुरू कर देता है और वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी से पूछते है कि वह क्या था। वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी बताते है कि हर रात, उनकी बात सुनने के बाद उन्होंने नम्पिल्लई के व्याख्यान को रिकॉर्ड किया। नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी से पूछते हैं कि उन्होंने उनकी अनुमति के बिना ऐसा क्यों किया और पूछते हैं कि क्या उन्होंने पेरियवाच्चान पिळ्ळै व्याख्यानम (आळ्वार पाशुरम के अर्थों का विस्तृत विवरण) के साथ प्रतियोगिता के रूप में यह सब किया । वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी दोषी महसूस करते है और तुरंत नम्पिल्लई स्वामीजी के चरण कमलो में गिर जाते है और बताते है कि उन्होंने इसे केवल भविष्य में संदर्भित करने के लिए लिखा था। उनकी व्याख्याओं से सहमत होकर, नम्पिल्लई स्वामीजी ने विद्यानम का महिमामंडन किया और अपने काम के लिए वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी की प्रशंसा की। ऐसा विशाल ज्ञान और आचार्य अभिमान था वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी का ।

पराशर : उस व्याख्यान का क्या हुआ ? क्या वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी उसको पूर्ण कर पाए ?

दादी : हाँ, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने उसको पूर्ण किया और तिरुवायमोली का यह व्याख्यान को प्रसिद्ध ईडु ३६००० पड़ी से संबोध्दित करते है | नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है यह व्याख्यान ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी को प्रधान करे जो की वह अपने वंशजों को उपदेश कर सके |

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – ईयुण्णि माधव पेरुमाळ द्वितीय पंक्ति में

वेदवल्ली : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी द्वारा दिया गए व्याख्यान को ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी ने क्या किया ?

दादी : ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् अपने पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् को यह सिखाते हैं। ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का जन्म नक्षत्र स्वाति है । ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् इसे अपने प्रिय शिष्य नालूर् पिळ्ळै को सिखाते हैं।  इस तरह इसे एक आचार्य से उचित तरीके से अपने शिष्य के पास सिखाया जाता रहा | नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, नालूर् पिळ्ळै के पुत्र और प्रिय शिष्य थे। उनका जन्म धनु-भरणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें देवाराज आच्चान् पिळ्ळै, देवेसर, देवादिपर और मैनाडू आच्चान् पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने 36000 पद ईदू का अध्ययन अपने पिताश्री के चरण कमलों के सानिध्य में किया था। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी के बहुत शिष्य थे, उनके शिष्यों में से एक थे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै स्वामीजी । नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै भी कांचीपुरम पहुँचते हैं। वे सभी देव पेरुमाल के समक्ष एक दूसरे से मिलते हैं। उस समय देव पेरुमाल, अर्चकर के माध्यम से बात करके, बताते हैं कि पिळ्ळै लोकाचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं और नालूर् पिळ्ळै को आदेश करते हैं कि वे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै को ईडु व्याख्यान का उपदेश दें। परंतु नालूर् पिळ्ळै देव पेरुमाल से पूछते हैं कि क्या वे ठीक तरह से उन्हें उपदेश कर पाएंगे (अपनी अधिक उम्र की वजह से)? इस पर देव पेरुमाल कहते हैं “तब आपके पुत्र (नालूर् आच्चान् पिळ्ळै) उन्हें उपदेश कर सकते हैं। उनका उपदेश करना आपके उपदेश करने के समान ही है”। इस तरह से तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै अन्य श्री वैष्णवों के साथ नालूर् आच्चान् पिळ्ळै से ईदू व्याख्यान का अध्ययन करते हैं और कालांतर में आलवार तिरुनगरी लौटकर उसे मणवाल मामुनिगल को सिखाते हैं, जो ईत्तू पेरुक्कर (जिन्होंने ईदू व्यख्यान का पोषण किया) के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस तरह नम्पिळ्ळै स्वामीजी जानते थे की ईडु व्याख्यान हस्तांतरित होते हुए मणवाल-मामुनि तक पहुंचा और इसीलिए उन्होंने इसे ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् स्वामीजी को दिया ।

अतुळाय : दादी, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् एवं ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् में ईयुण्णि शब्द का क्या अभिप्राय है ?

दादी : तमिळ में “ईथल” का अर्थ है परोपकार । “उन्नुथल” का अर्थ है भोजन करना । ईयुण्णि का अर्थ है – वह जो बड़े परोपकारी है, जो अन्य श्री वैष्णवों को भोजन कराने पर ही स्वयं भोजन करता है ।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे प्रमुख शिष्य पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी थे | जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की | ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है | पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्यारे शिष्यों में थे इसीलिए उनको पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् कहा जाता था | उन्होंने अपना जीवन आचार्यो के प्रति बहुत सम्मान प्रतिष्ठा के साथ एक सत्य श्री वैष्णव की तरह जिये | उनका आचार्य अभिमान बहुत ही प्रसिद्व है |

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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् – नम्पिळ्ळै के चरण कमलों में

पराशर: दादी, आज अपने नम्पिळ्ळै स्वामीजी और उनके शिष्यों के बीच हुई बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताया | कृपया उनके बीच हुई कुछ रोचक बातचीत बताएं।

दादी : हमारे सभी पूर्व आचार्यो ने भगवत् विषयम और भागवत् कैंकर्यं संबंधी को ही प्रकाशित किया | एक बार जब पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् बीमार थे, तो वह अन्य श्री वैष्णव से पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के शीघ्र स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहते हैं। आम तौर पर हमारे संप्रदाय में, श्री वैष्णव को किसी भी चीज़ के लिए भगवान् जी से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए – यहाँ तक कि बीमारी से उबरने के लिए भी नहीं । यह देखकर, नम्पिळ्ळै के शिष्यों ने इसके बारे में नम्पिळ्ळै से पूछ ताछ की। नम्पिळ्ळै पहले कहते हैं, ” आप एंगल अलवान स्वामीजी के पास जाओ और उनसे पूछो जो सभी शास्त्रों के विशेषज्ञ है | एंगळ अळवान स्वामीजी ने उत्तर दिया “वह श्री रंगम से जुड़ा हो सकते है और वह कुछ और समय के लिए यहां रहना चाहता है”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तब अपने शिष्यों से अममांगी अम्माल से यह पूछने के लिए कहा कि “कौन होगा जो नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कालक्षेपं को छोड़ना चाहता है, वह प्रार्थना कर रहे होंगे ताकि वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कालक्षेपं को सुन सके”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी अंत में खुद जीयर स्वामीजी से पूछते है। जीयर स्वामीजी जवाब देते है, “यद्यपि आप वास्तविक कारण जानते हैं, फिर भी आप चाहते हैं कि यह मेरे द्वारा प्रकट हो। चलिए में कहता हूँ की मैं यहां क्यों रहना चाहता हूं। प्रतिदिन, आप स्नान करने के बाद, मुझे आपके रूप के दिव्य दर्शन प्राप्त होते है और पंखा आदि लगाकर आपकी सेवा करने का अवसर मिलता है। मैं उस सेवा को कैसे छोड़ सकता हूं और अभी कैसे परमधाम जा सकता हूं? ”। इस प्रकार, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शिष्य के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते है और कहते है की एक शिष्य , स्वयं के आचार्य के दिव्य रूप में पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए | यह सब सुनकर शिष्यों को जीयर स्वामीजी की नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति भक्ति देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ। पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् को नम्पिळ्ळै स्वामीजी से इतना लगाव था कि वह परमपद पर जाने का विचार भी त्याग देते थे । पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के आचार्य में गहरी निष्ठा थी |

अंत में, हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के एक और शिष्य के बारे में देखते हैं जिनका नाम
नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् | प्रारंभ में, नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् स्वामीजी का नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति अनुकूल रवैया नहीं था। अपनी समृद्ध पारिवारिक विरासत (कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) और पराशर भट्टर के परिवार में आने के कारण) उनको अभिमान हो गया था और नम्पिळ्ळै स्वामीजी का सम्मान नहीं करते थे । एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है कि कैसे उन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलो में शरणागति की ।

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् तृतीय पंक्ति में

व्यास : यह कैसी विडंबना है कि कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के वंशज में गर्व और अहंकार के गुण थे। दादी हमें कहानी बताओ!

दादी : हाँ, लेकिन अनचाहा गर्व लंबे समय तक नहीं रहता ! सब के बाद, वह कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के ही पोते थे ! एक बार, नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) राजा के दरबार में जा रहे थे । वह रास्ते में पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से मिलते है और उन्हें राजा के दरबार में जाने के लिए आमंत्रित करते है। राजा उनका स्वागत करता है, उनका सम्मान करता है और उन्हें एक अच्छा पद बैठने के लिए प्रदान करता है। अच्छी तरह से सीखा हुआ राजा को नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) की बुद्धि का परीक्षण करना चाहते हैं, वह उनसे श्रीरामायण के बारे में सवाल पूछते हैं। श्री राम स्वयं कहते हैं कि वह सिर्फ एक इंसान हैं और राजा दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। लेकिन जटायु के अंतिम क्षणों के दौरान, श्री राम जी उनको वैकुण्ठ तक पहुँचने का आशीर्वाद दिया।  अगर वह एक सामान्य इंसान थे , तो वह किसी को वैकुंठ तक पहुंचने के लिए कैसे आशीर्वाद दे सकते है? ”। भट्टर स्वामी जी अवाक थे और किसी भी सार्थक स्पष्टीकरण के साथ प्रतिक्रिया नहीं दिए । संयोग से, राजा का ध्यान किसी अन्य कार्य में चला जाता है। उस समय, भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तरफ देखकर कहते है की नम्पिळ्ळै स्वामीजी ही आपको यह प्रकाशित करेंगे की कैसे एक सत्यवान पुरष पुरे विश्व को वश में कर सकता है | भट्टर स्वामीजी राजा को उस समय समझाते है कि जब राजा उन पर ध्यान केंद्रित करता है। राजा, एक बार उत्तर सुनकर सहमत हो जाता है और भट्टार को बहुत धन के साथ सम्मानित करता है। भट्टर स्वामी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति के प्रति महान कृतज्ञता दर्शाते हुए कहते है वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तिरुमोळि में जाते है और जो धन उनको राजा से मिला है उसको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के श्री चरणों में समर्पित करते है | भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी को यह कहते है की मुझे आपकी शिक्षाओं में से सिर्फ एक छोटी सी व्याख्या करने से ये सारी दौलत मिली। सभी के साथ, मैंने आप के मूल्यवान संघ / मार्गदर्शन को खो दिया है। अब से, मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि मैं आपकी अच्छी तरह से सेवा करूँ और आपसे संप्रदाय के सिद्धांत सीखूँ। ” नम्पिळ्ळै स्वामीजी भट्टर स्वामी जी को आलिंगन करते है और उन्हें हमारे संप्रदाय के सभी सार सिखाते हैं। तो बच्चों, आप इस कहानी से क्या सीखते हैं?

वेदवल्ली : मैंने अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से यह सीखा है, पराशर भट्टर स्वामीजी सही गंतव्य पर पहुंच गए।

अतुल्हे : मैंने नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामीजी) की महानता और उनके ज्ञान के बारे में सीखा।

दादी: तुम दोनों सही हो। लेकिन एक और सबक है जो हम इस कहानी से सीखते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि श्रीमन्न नारायण भगवानजी हमें तभी स्वीकार करते है जब हम अपने आचार्यों के माध्यम से उनसे संपर्क करते हैं, और आचार्य तक पहुंचना हो तो श्री वैष्णव जन के साथ दिव्य सम्बन्ध होना चाहिए | इसी को हम श्री वैष्णव सम्बन्ध या अडियरगळ सम्बन्ध कहते हैं। यहाँ, ऐसा कौन श्री वैष्णव होगा जिन्होंने पराशर भट्टर को नम्पिळ्ळै से जोड़ा था?

दादी: हाँ! इससे हमें भागवत सम्बन्ध का महत्व पता चलता है।  जीयर स्वामीजी, नम्पिल्लई के प्रिय शिष्य होने के नाते, आचार्य ज्ञान (प्राप्ति) और संबंध के साथ भट्टार को आशीर्वाद दिया। आइए हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलों और उनकी साधनाओं पर ध्यान दें।

बच्चे विभिन्न आचार्यों और उनकी दिव्य सेवाओं की महानता के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-nampillais-sishyas/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्री पराशर भट्टर्

पराशर, व्यास वेदवल्ली और अतुलाय के साथ अण्डाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु : स्वागत बच्चो | आज हम अगले आचार्य जी जिनका नाम नन्जीयर् स्वामीजी है जो भट्टर स्वामीजी के शिष्य थे उनके बारे में जानेंगे | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया था की नन्जीयर् स्वामीजी जिनका जन्म श्रीमाधवार जी के रूप में हुआ उनको सम्प्रदाय में रामानुज स्वामीजी की दिव्या आज्ञा के अनुसार पराशर भट्टर स्वामीजी सम्प्रदाय में लेकर आये थे | हमनें देखा कैसे भट्टर स्वामीजी पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए | वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

व्यास : दादी, अगर रामानुज स्वामी जी और भट्टर स्वामी जी जैसे आचार्य दूसरे सम्प्रदाय को मानाने वाले जैसे यादव प्रकाश (जो बाद में गोविन्द जीयर बने), गोविंदा पेरुमल ( जो एम्बार स्वामी जी कहलाएं), यज्ञ मूर्ति ( जो अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति) कहलायें) और माधवर (जो नन्जीयर स्वामीजी कहलाये), उन्होंने शैव मत के राजाओं को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की जिनके कारण उनको कठिनाईओं का सामना करना पड़ा? वह शैव राजाओं से दूर क्यों रहे ?

दादी : व्यास हमारे पूर्व आचार्य जानते थे की किसको सुधारा जा सकता है किसको नहीं? उक्त आचार्य के मामले में, एक बार जब वे जानते थे कि प्रतिद्वंद्वी सही था, तो उन्होंने गरिमा के साथ हार स्वीकार कर ली और न केवल उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उन्होंने पेरिय तिरुमलई नम्बि, रामानुज स्वामी और श्री भट्टर स्वामी जी के चरण कमलो में समर्पण कर दिए और श्री वैष्णव संप्रदाय स्वीकार किये | हालाँकि, शैव राजा न तो एक उचित तर्क के लिए तैयार थे और न ही उन्होंने हार मानने के लिए पर्याप्त सम्मान दिया और श्रीमान नारायण की सर्वोच्चता के शाश्वत सत्य को महसूस किया | जैसा कि पुरानी कहावत है, “केवल जो सो रहा है उसे जगाना संभव है, जो सोने का बहाना कर रहा है उसे जगाना असंभव है”। हमारे पूर्वाचार्य जानते थे कि वास्तव में कौन सो रहा था और कौन केवल दिखावा कर रहा था। इसलिए उनके फैसले अलग-अलग थे। इसके अलावा, ऐसे व्यक्तियों के दोषों के बावजूद, हमारे पूर्वाचार्यों ने भी उनकी मदद करने के लिए वास्तव में प्रयास किया है, लेकिन बाद में दूसरी तरफ से बहुत अधिक प्रतिरोध छोड़ दिया।

पराशर : दादी, माधवार स्वामीजी को नन्जीयर नाम कैसे मिला |?

दादी : भट्टर स्वामी ने माधवर स्वामी को शास्त्रार्थ में पराजित किये और श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा – माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए । श्रीभट्टर स्वामी जी के चले जाने के बाद, माधवर को अपने फैसले से कोई समर्थन नहीं मिला। श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धन–संपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है – संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्य–भक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर “नम्–जीयर” से सम्भोधित करते है और तबसे नम्–जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए । भट्टर और नन्जीयर् आचार्य–शिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर् सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । उनकी आचार्य भक्ति की कोई सीमा नहीं थी | नन्जीयर् कहते थे – वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुःख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयर् को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर् – तिरुनारायणपुरं

अतुलाय : दादी, हमें नन्जीयर् स्वामीजी जी की भक्ति के बारे में कुछ कथा बताये ?

दादी : एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर् अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर् से कहे की नन्जीयर् आपको यह सन्यासाश्रम उचित नहीं लगता, आपको मुझे नहीं उठाना चाहिए | नन्जीयर् स्वामीजी कहते है अगर मेरा त्रिदण्डं मेरे कैंकर्य में रूकावट बन रहा है तो में इसे तोड़ देता हूँ और अपना सन्यासाश्रम छोड़ देता हूँ |

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर् से शिकायत किए । नन्जीयर् ने कहा – यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर् के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर् स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

वेदवल्ली : अभी जो वार्तालाप हुआ क्या आपको पसंद आया ?

दादी (मुस्कुराते हुए ) : हाँ, हमारी चर्चा पसंद आयी लेकिन बहुत रोचक चर्चा थी |

एक बारे नन्जीयर स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा – क्यों सारे आळ्वार भगवान श्री–कृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है – जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभी–अभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।

एक और बार नन्जीयर् स्वामी जी भट्टर स्वामीजी से पूछते है की राजा महाबली पाताल लोक में क्यों गए और उनके गुरु शुक्राचार्य जी की आँख कैसे खो गयी ?
भट्टर स्वामीजी कहते है जब उनके गुरु शुक्राचार्य जी राजा महाबली को उनका बचन पूर्ण करने के लिए रोकते है जो उन्होंने उस समय वामन भगवान जी से किया था, उसी कारण उनकी आँख चली गयी और जैसे राजा महाबली ने अपने आचार्य की आज्ञा नहीं मानी इसीलिए उन्हें पाताल लोक जाने का दंड मिला | इसलिए, यहाँ, भट्टर स्वामीजी इस बात पर जोर देते हैं कि किसी के अपने आचार्य का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। उनके बीच कई ऐसी दिलचस्प बातचीत हुई। इन वार्तालापों ने नन्जीयर् को उनके लिखित कार्यों में भी मदद की।

एक दिन नन्जीयर् स्वामीजी चाहते थे उनके लिखे हुए काम की प्रतियां बनायीं जाये और अपने शिष्यों से पूछा की कौन इस कैंकर्य को करने योग्य है | नम्बुर वरदराजार स्वामीजी का नाम प्रस्तावित किया | नन्जीयर् स्वामीजी ने पहले सम्पूर्ण तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान का कालक्षेप वरदराज स्वामीजी को दिए और फिर उन्हें व्याख्यान की मूल प्रति प्रधान की | वरदराज स्वामीजी ने निर्णय लिए की वह अपने मूल ग्राम जो कावेरी नदी की किनारे पड़ता था वहां जाकर लेखन पर ध्यान केंद्रित कर सके और इसे जल्दी से समाप्त कर सके । नदी पर करते समय अकस्मात बाढ़ आ गयी और वरधराजर स्वामीजी तैरने लगे । ऐसा करते समय, मूल ग्रन्थम उसके हाथ से फिसल जाता है और वह तबाह हो जाता है। अपने मूल स्थान पर पहुंचने के बाद, वह अपने अचर्यन और उसके द्वारा दिए गए अर्थों पर ध्यान देते है और तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान को फिर से लिखना शुरू करते है। चूंकि वे तमिल भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ थे, इसलिए जहाँ भी उनको लगता, अच्छे अर्थ जोड़ते हैं और जब अंत में नन्जीयर् स्वामीजी के पास वापस लौटते हैं तो उनको हस्त लिखित ग्रन्थ प्रस्तुत करते हैं। नन्जीयर् स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान देखकर समझ जाते है कि मूल ग्रन्थ से कुछ परिवर्तन हुआ है , और पूछते है यह कैसे हुआ ? वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वाला प्रतिनिधि होगा । नन्जीयर् स्वामीजी ने भी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की महिमा का गुणगान किये जब नम्पिळ्ळै स्वामीजी नन्जीयर स्वामीजी से बहुत सुन्दर बेहतर स्पष्टीकरण देते है तो नन्जीयर् स्वामीजी प्रसन्न होते है | यह नन्जीयर् स्वामीजी की महिमा को प्रकाशित करता है | भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर् ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर् की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

व्यास : दादी, हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में बताइये |

दादी : में आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में और उनकी महिमा की बारे में कल बताउंगी | अभी देरी हो रही है | अभी आपको घर चाहिए |

बच्चे भट्टर स्वामीजी, नन्जीयर् स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में चिंतन करते हुए घर जाते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री पराशर भट्टर्

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

पराशर और व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो ! आज हम दूसरे आचार्य जी के बारे में बात करेंगे जिनका नाम श्री पराशर भट्टर् जी था, जो एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी के शिष्य थे और उनका एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और एम्पेरुमानार जी के प्रति बहुत स्नेह भक्ति रखते थे | जैसे मैंने आपको बताया की एम्पेरुमानार जी श्री पराशरजी और महर्षि व्यास जी की प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कुरेशा स्वामीजी की दोनों पुत्रो का नाम श्री पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते है | यह उन तीन वचनों में से एक वचन था जो उन्होंने अपने गुरूजी श्री आळवन्दार् स्वामीजी से पूरा करने के लिए किया था | श्री पराशर और वेद व्यास भट्टर जी का जन्म श्रीरंगम के श्रीनाथ पेरिय पेरुमाल जी से प्रसाद रूप में कुरेशा जी और उनकी पत्नी अण्डाल जी से हुए थे |

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

पराशर : दादी, क्या मेरा और व्यास का नाम आचार्य जी के नाम पर रखा गया ?

दादी : हाँ, पराशर ! बच्चो का नाम आचार्य जी के नाम पर ही रखा जाता है या फिर भगवान के नाम पर ताकि बच्चो को बुलाते हुए हमें भगवानजी और आचार्यजी का दिव्य नाम लेने का अवसर प्राप्त हो | इसी कारण से हम अपने बच्चो का नाम भगवान, श्रीलक्ष्मीजी या आचार्यजी के नाम पर रखते है ताकि हम उनका पवित्र नाम लेकर बच्चो को पुकारे और हमें समय मिले की हम अपने आचार्य जी और भगवानजी के बारे में और दिव्य गुणों के बारे में विचार कर सके| अन्यथा इस कार्यरत संसार में किसके पास इतना समय नहीं होगा की समय निकाल कर भगवानजी के बारे में और उनके दिव्य नामो के बारे में सोच सके ? लेकिन वर्तमान में हालत बदले हुए है| जीव फैशन परस्त नामों को प्रयोग में लाते है जिसका कोई तर्क नहीं बनताजिससे हमें भगवान, श्रीमहालक्ष्मीजी, हमारे आचार्य जी का भी स्मरण नहीं होता |

श्रीरंगम आने के बाद एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

व्यास : दादी, एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के आचार्य कैसे बने?

दादी : दोनों बच्चों  के जन्म के बाद, एम्पेरुमानार एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी को दोनों बच्चों  लाने के लिए भेजते है ताकि वह उन बच्चों  अपनी दृष्टि डाल सके | एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जैसे ही दोनों बच्चों  को देखा उन्हें ज्ञात हो गया यह बच्चों  का जन्म संप्रदाय के लिए हुआ है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बच्चों  के मुख पर महान तेज देखा और तत्काल बच्चों  की रक्षा के लिए द्वय महा मंत्र का जाप किया ताकि बच्चों  को किसी की बुरी नजर न लगे | एम्पेरुमानार जी ने बच्चों  को देखा और तत्कालिक निर्णय लिया की दोनों  को द्वयं मंत्र के द्वारा सम्प्रदाय में लाया जाये | एम्पेरुमानार जी के पूछने पर श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बताया की उन्होंने बच्चों  की रक्षा के लिए पहले ही द्वयं मंत्र का उच्चारण किया | तब से  श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी को उन दोनों बच्चों  का आचार्य नियुक्त किये गए जब उन्होंने दोनों को द्वयं मंत्र उच्चारण करके उनको दीक्षित किया | दोनों बच्चे एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और अपने पिताजी से सीखते हुए बढ़े हुए | जैसे बच्चों  का जन्म भगवान के आशीर्वाद से हुआ था, उसी तरह दोनों बच्चे पेरिय पेरुमल और पेरिय पिराट्टी के प्रति स्नेह भावना रखते थे | एम्पेरुमानार जी भी आलवान स्वामीजी से कहते थे की वह अपना बेटा पराशर भट्टर जी एम्पेरुमानार जी को पेरिया पेरुमल का बेटा समझ कर सौंप दे और आलवान स्वामीजी ने ऐसा ही किया | ऐसा कहा जाता है की भट्टर स्वामीजी जब वह बच्चे थे  श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनका  पालन – पोषण करती थी | | इस तरह का प्रेम और संबंद्व था श्री भट्टर स्वामी का पेरिय पेरुमाल और पिरट्टि के बीच | जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरिय पेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे  | रामानुज स्वामीजी भट्टर स्वामी में अपने आप को देखते थे | रामानुज स्वामी जानते थे भट्टर स्वामी ही आगामी दर्शन प्रवर्तकार होंगे |भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे | उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाने वाली कई कहानियाँ हैं।

अत्तुलाय : दादी, हमें उसकी बुद्धि के बारे में कुछ कहानियाँ बताएं ?

दादी : एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नाम से जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगं में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं। भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |

वेदवल्ली : यह एक अच्छा जवाब था।

दादी : यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।

व्यास : जैसे पिता वैसे पुत्र !

दादी ( मुस्कुराते हुए ) : सही ! भट्टर अपने पिता आलवान स्वामी जैसा ज्ञान और मेधा शक्ति रखते थे | श्री रंग राज: स्तवं में,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि मंदिर को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं । इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं । उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।

वेदवल्ली: दादी, जब श्री रंग नाच्चियार् जी ने भट्टर जी का पालन- पोषण किया, क्या तब भट्टर जी पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे जैसे थिरुकाची नम्बि जी देव पेरुमल जी से करते थे ?

दादी : हाँ, वेदवल्ली तुम ठीक कह रही हो | भट्टर जी भी श्रीरंगम में पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे | क्या आप जानते हो वर्ष में एक बार वैकुण्ठ एकादशी से एक दिन पहले, पगल पथु उत्सव के दसवें दिन, नम्पेरुमाळ जी नाच्चियार अम्मा जी की वेश वूशा धारण करते है? नम्पेरुमाळ जी श्रीरंग नाच्चियार जी के अलंकार धारण करते है और बहुत सुंदरता से श्रीरंग नाच्चियार जी की तरह इस दिन बैठते है | एक दिन नम्पेरुमाळ जी भट्टर स्वामीजी को बुलाकर पूछते है की क्या वह श्रीरंग नाच्चियार जी जैसे दीखते है | भट्टर स्वामीजी जो माता लक्ष्मी जी की तरफ अपना पक्ष रखते, नम्पेरुमाळ जी की तरफ प्रीति से देख कर कहते की प्रभु जी सब अलंकार बहुत सुन्दर है लेकिन जो करुणा लक्ष्मी माता जी के नेत्रों में है वह आपके कमल नयनो में नहीं | इस प्रकार का वात्सल्य था भट्टर स्वामीजी का माँ श्रीरंग नाच्चियार जी की प्रति |

हालाँकि, भट्टर जी के सैकड़ों अनुयायी थे, जो नियमित रूप से उनके  कालक्षेप को सुनते थे और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होते थे, फिर भी बहुत कम लोग थे जो भट्टर जी को नापसंद करते थे। यह महान लोगों के लिए बहुत आम है। यह  रामानुज स्वामीजी  के साथ भी हुआ। एक बार, भट्टर जी को नापसंद करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें ईर्ष्या और घृणा से डांटना शुरू कर दिया। अगर कोई आप पर चिल्लाता है, तो आप क्या करेंगे?

व्यास :  मैं उस पर वापस चिल्लाऊँगा। मैं क्यों चुप रहूं?

दादी: यह वास्तव में हम में से अधिकांश ऐसे होते है , यहां तक ​​कि वयस्क भी ऐसा ही करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भट्टर जी ने क्या किया? उन्होंने अपने गहने और महंगे शॉल उस व्यक्ति को भेंट किए, जो उन पर चिल्लाया था। भट्टर जी ने यह कहकर उनका धन्यवाद किया कि “हर श्रीवैष्णव को दो काम करने चाहिए – एम्पेरुमान जी की महिमा गाओ और अपने स्वयं के दोषों के बारे में भी विलाप करो। मैं एम्पेरुमान जी की महिमा को गाने में इतनी गहराई से डूब गया कि मैं अपने दोषों के बारे में विलाप करना भूल गया। अब आपने अपना कर्तव्य पूरा करके मुझ पर बड़ा उपकार किया है, इसलिए मुझे केवल आपको पुरस्कृत करना चाहिए ”। ऐसी थी उनकी विशालता।

पराशर : दादी , मुझे स्मरण है की आप कह रही थी की रामानुज स्वामीजी ने ही भट्टर स्वामीजी को आदेश दिया था की नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को सम्प्रदाय में लेकर आये | भट्टर स्वामीजी ने ऐसा कैसे किया होगा ?

दादी : मुझे बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार की पराशर तुम्हे यह सब स्मरण है | हाँ, जैसा रामानुज दिव्य आज्ञा में बताया गया है, भट्टर स्वामीजी तिरुनारायणपुरम जाते है और नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आते है | हमने इस जगह के बारे में पहले से सुना हुआ है ? क्या किसी को स्मरण है कब ?

वेदवल्ली : मुझे याद है | तिरुनारयणपुरम मंदिर उन सब मंदिरो में से एक है जहाँ रामानुज स्वामीजी ने सुधार किया था | रामानुज स्वामीजी ने श्री मेलकोटे मंदिर में व्यवस्था लागू की |

दादी : बहुत अच्छे वेदवल्ली | रामानुज स्वामीजी ने तिरुनारायणपुरम मंदिर में शेल्वपिळ्ळै भगवान जी की उत्सव मूर्ति मुस्लिम अक्रान्ताओ से छुड़ाकर वापिस मंदिर में पुनः स्थापित की थी | भट्टर स्वामीजी जिस कक्ष में माधवाचार्य (नन्जीयर स्वामीजी का असली नाम ) प्रसाद वितरित कर रहे होते है, सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर स्वामीजी का नम्पेरुमाळ जी और श्रीरंग नाच्चियार जी के दिव्य विग्रहो के प्रति बहुत अनुराग था | भट्टर स्वामीजी कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । एक बार कुरेश स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा अगर परमपदनाथ के दो या चार हाथ हुए तो, भट्टर स्वामीजी जवाब देते है की अगर परमपदनाथ जी के दो हाथ होंगे तो वह पेरिया पेरुमल जैसे दिखेंगे और अगर उनके चार हाथ होंगे तो वह हमारे नम्पेरुमाळ जी जैसे दिखेंगे | भट्टर स्वामीजी कभी भी अन्य जीवों को देखकर भी उनमे नम्पेरुमाळ जी ही को देखेंगे | वह भगवान जी के सब दिव्य मंगल विग्रह को नम्पेरुमाळ ही बताते थे | । जब नम्पेरुमाळ जी उनको मोक्ष प्रधान करते है,भट्टर स्वामीजी अपनी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त करके इस संसार को छोड़ कर परमपद में जाकर अपने आचार्यो जी के साथ मिलते है ताकि वहां एम्पेरुमान जी का नित्य कैंकर्यं कर सके | कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

अतुलहाय : दादी, श्री भट्टर स्वामीजी का जीवन सुनाने में बहुत रूचि पूर्ण था | जो भक्ति उनमे दिखती थी नम्पेरुमाळ जी के प्रति और उनका संबंद्व मन को छू लेता है | अण्डाल अम्मा जी भी कितनी भाग्यशाली होंगी ऐसा महान पति पाकर और ऐसे महान बच्चे पाकर |

दादी : तुम बहुत ठीक कह रही हो अतुलहाय | अंडाल बहुत भाग्यवान समझेगी अपने आप को | कल में आपको नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) के बारे में बताउंगी जो की आगामी आचार्य थे | अब आप फल लो और घर जाओ |

बच्चे श्री भट्टर स्वामीजी और उनके दिव्य जीवन के बारे में सोचते हुए अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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