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Beginner’s guide – azhagiya maNavALa mAmunigaL

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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Full Series

ANdAL pAtti greets the children, who all are excited to learn and hear about maNavALa mAmunigaL  .

pAtti : Welcome children, how did you all enjoy your summer vacation?

parASara : pAtti , vacation was good. We are now eager to hear about maNavALa mAmunigaL. Can you tell us about him?

pAtti :  Sure children. He was born in AzhwAr thirunagari to thigazhak kidanthAn thirunAvIrudaiya pirAn and SrI ranga nAchchiyAr as an avathAram of AdhiSEshan and punar avathAram (reincarnation) of yathirAjar. He was named azhagiya maNavALan (also azhagiya maNavALap perumAL nAyanAr). He learns all sAmAnya SAsthram (basic principles) and does vEdha adhyayanam under his father’s guidance .

vyAsa : pAtti, wasn’t thiruvAimozhip piLLai his AchAryan?

pAtti : yes vyAsa, hearing about thiruvAimozhip piLLai’s greatness, He surrenders unto him. He becomes expert in aruLichcheyal (dhivya prabandham) especially thiruvAimozhi and eedu 36000 padi vyakyAnam. He was also greatly attached SrI rAmAnuja and served him in bhavishyadhAchAryan sannidhi in AzhwArthirunagari. Due to his overwhelming affection towards yathIndhra (SrI rAmAnuja), he was fondly known as “yathIndhra pravaNa” (one who is very attached to yathIndhra).

Later on, recollecting his AchAryan’s niyamanam he goes and lives in SrIrangam to propagate our sampradhAyam. After reaching SrIrangam, he also accepts sanyAsa ASramam and becomes to be popularly known as azhagiya maNavALa mAmunigaL and periya jIyar.

He writes beautiful commentaries to rahasya granthams such as mumukshuppadi, thathva thrayam , SrIvachana bhUshaNam with many references from vEdham, vEdhantham, ithihAsams, purANams and aruLichcheyal .

He writes commentaries to rAmAnuja nURRanthAdhi , gyAna sAram and pramEya sAram which explains the charama upAya nishtai  (understanding  AchAryan is everything). mAmunigaL wrote thiruvAimozhi nURRanthAdhi which highlights the meanings of thiruvAimozhi and greatness of nammAzhwAr, based on the request from few SrIvaishNavas. He even recorded the valuable teachings of our pUrvAchAryas by writing upadhEsa rathina mAlai which highlights AzhwArs’ birth places, thirunakshathrams, thiruvAimozhi and SrIvachana bhUshaNam .

mAmunigaL also performs dhivya dhESa yAthrAs and performs mangaLAsAsanam to all the  perumALs and AzhwArs.

vEdhavalli : pAtti, amazing to hear about mAmunigaL, and his hard work for our sampradhAyam.

pAtti : yes vEdhavalli, even namperumAL was very interested to hear the kAlakshEpam of nammAzhwAr’s thiruvAimozhi with eedu 36000 padi vyAkyAnam from mAmunigaL. mAmunigaL was very pleased and performed kAlakshEpam of the same for 10 months and finally performed sARRumurai on Ani thirumUlam.

srisailesa-thanian-small

Once the sARRumurai  was completed, namperumAl assumes the form of a small child named aranganAyakam comes in front of mAmunigaL and starts reciting “SrISailESa dhayApAthram dhIbhakthyAdhi guNArNavam” with anjali mudhrA (joined palms). Everyone becomes amazed and understood that it was none other than namperumAl himself.

parASara : Wow – that’s great to be honoured by namperumAL himself. pAtti, is that why we start all of our sEvAkAlam with this thaniyan?

pAtti : yes parASara. emperumAn sends this thaniyan to all dhivya dhESams and ordered that it is recited during the commencement and at the end of the sEvAkAlam. Even thiruvEnkatamudayAn and thirumAlirunjOlai azhagar instructed that this thaniyan is recited at the beginning and at the end of aruLichcheyal anusandhAnam.

During his final days, mAmunigaL was writing the commentary for AchArya hrudhayam with great difficulty. Finally he decides to give up his thirumEni (divine form) and go to paramapadham. He recites Arththi prabhandham crying out to emperumAnAr to accept him and relieve him from this material realm. Subsequently, mAmunigaL, by the grace of  emperumAn ascends to paramapadham. ponnadikkAl jIyar, who was away during that time, returns to SrIrangam on hearing the news and completes all the charama kainkaryams for mAmunigaL.

aththuzhAy:  pAtti , all of us benefited immensely by speaking about him. Thanks for sharing the divine charithram of mAmunigaL with us.

pAtti : Pleasure is  mine too aththuzhAy , last but not the least, as he was accepted as AchAryan by periya perumAL, he completes the AchArya rathna hAram and the OrAN vazhi guru paramparai which started from periya perumAL himself.

In our next discussion we will discuss about  Sishyas (ashta dhik gajangal)  of mAmunigaL.

adiyen janani rAmAnuja dAsi

श्रीवैष्णव – बालपाठ – यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर्, श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) और मालादर (तिरुमालै आन्डान्)

pancha-acharyas

यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर आपने मित्र वेदावल्ली के साथ प्रवेश करते है|

दादी : स्वागत वेदावल्ली। अंदर आ जाओ बच्चों|

व्यास : दादी , पिछली बार आपने कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और दूसरे आचार्य के बारे में विस्तार से बताएंगी|

पराशर : दादी , क्या आपने हमें यह नहीं बताया था की रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्य थे, सिर्फ पेरिया नम्बि ही नहीं ? दूसरे आचार्य कौन थे दादी ?

दादी : जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था बच्चों, यामुनाचार्य स्वामी जी के बहुत शिष्य थे जो रामानुज स्वामी जी को सम्प्रदाय में लाने के लिए सिखाते थे ! उनमे से जो प्रमुख थे : १) तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) २) गोश्टि पूर्ण (तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि) ३) श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ४) तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) ५) तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) और साथ में श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) !|क्या आप को याद है हमने पिछली बार श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) स्वामी जी के बारे में बात की थी जब हम पिछली बार मिले थे ! अब, चलो में आपको दूसरे आचार्यो की बारे में और उनकी महत्वपूर्ण योगदान जो उनका हमारे सम्प्रदाय के प्रति रहा उसके बारे में बताउंगी !

पराशर : दादी, रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्या क्यों थे ?

दादी : सभी आचार्यो ने उनको इस तरह से सिखाया की वह एक महान आचार्य बने ! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) एक बहुत बडा कैङ्कर्य किया श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम लाकर |

व्यास : यह सब कैसे हुआ ? वह कहानी भी हमें बताये दादी |

दादी : उस समय रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम में रहते थे और सन्यास आश्रम भी स्वीकार किया! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) कांचीपुरम गए और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से विनती किये उनको देव पेरुमल के समीप अरैयर् सेवा करने दे ! देव पेरुमल जी ने अर्चक से कहलवाया की उनके सामने ही अरैयर् सेवा किया जाए ! अरैयर् स्वामी जी ने बहुत सेवा भाव से भगवान जी के सामने नृत्य के साथ पाशुरम गाये ! भगवन् उनसे बहुत प्रसन हुए और उनको बहुत सारे उपहार दिए | अरैयर् स्वामी जी बोले की उनको उपहार नहीं चाहिए उनको तो और कुछ चाहिए | भगवान् जी मान गए और बोले ” हम आपको सब कुछ देंगे, आप बोले तो सही” | अरैयर् स्वामी जी तब रामानुज स्वामी जी की तरफ इशारा करते हुए बोले की वह अपने साथ श्री रामानुज स्वामी जी को श्री रंगम ले जाना चाहते है ! भगवन बोले ” हम सोच भी नहीं सकते थे की आप रामानुज स्वामी जी को हमसे मांगेगे; आप कुछ और मांगिये”| अरैयर् स्वामी जी बोले ” आप और कोई नहीं श्री राम जी है जो कभी दो शब्द नहीं बोलते , आप अपने बचन से इंकार नहीं कर सकते ! फिर भगवन जी ने स्वीकार किये और रामानुज स्वामी जी को जाने की अनुमति प्रदान की !

व्यास : दादी कितनी बड़ी चालाकी थी यह| यह अरैयर् स्वामीजी की बुद्धिमता थी की वह पेरुमल स्वामी जी को मना सके !

दादी : बोलो व्यास | उसी समय अरैयर् स्वामी जी ने रामानुज स्वामी जी का हाथ पकड़ा, और श्री रंगम जाने के लिए प्रस्थान किया | फिर , अरैयर् स्वामी जी ने वह महत्व पूर्ण सेवा की श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर जिससे हमारा सम्प्रदाय ने और आगे बड़े और उसको उचाईयो तक पहुँचाया |

वेदवल्ली : दादी, अपने कहा सभी आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी कुछ न कुछ सिखाया ! अरैयर् स्वामी जी ने उनको क्या सिखाया ?

दादी :आलवन्दार स्वामी जी ने अपने सभी मुख्य शिष्यों को रामानुज स्वामी जी को अपने सम्प्रदाय के बारे में अलग अलग सीखने के लिए निर्देश दिए थे | अरैयर् स्वामी जी को आदेश था की वह सम्प्रदाय का मूल तत्व रामानुज स्वामी जी को बताये ! अब, रामानुज स्वामी जी ने बहुत सुन्दर कृत किये इससे पहले की वह अरैयर् स्वामी जी के पास जाते सीखने के लिए | उन्होंने ६ महीने आचार्य सेवा में कैंकर्य किये कुछ भी सीखने से पहले | यह एक बहुत महत्व पूर्ण पहलु है जो श्री रामानुज स्वामी जी, कुरतालवान स्वामी जी, मुदलियानदान स्वामी जी और बहुत आचार्य जी ने अपने जीवन में किये — अपने आचार्यो का कैंकर्य किये उनसे सीखने से पहले | यह उनकी भक्ति भाव दर्शाता है की वह किससे क्या सीख रहे है और किस उदेश्ये से सीख रहे है | रामानुज स्वामी जी प्रति दिन दूध गरम करते और अरैयर् स्वामी जी को हल्दी का लेप बनाकर देते जब भी आवश्यकता होती !

व्यास : दादी, दूसरे आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी: हाँ, में एक एक करके उस पर आ रही हूँ | तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे | वह थिरु वेंकट आद्री के पहले निवासी थे | वह प्रति दिन आकाश गंगा जाकर भगवान् जे के सनान के लिए जल लेकर कैंकर्यं करते थे | वह भगवान् जी की सेवा बहुत ध्यान और मन से करते थे | उनके आचार्य जी का आदेश था की वह रामानुज स्वामी जी को श्री रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन सीखा सिखाये | श्री रामायाण बहुत प्रसिद्ध है हमारे समप्रदायम में शरणागति शास्त्र की तरह | इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे । यही नहीं श्री तिरुमलै नम्बि स्वामी जी ही थे जिन्होंने गोविंदा स्वामी को वापिस श्री वैष्णव सम्प्रदाय में लाये थे जो रामानुज स्वामी जी की ममेरे भाई थे | उनका ज्ञान हमारे सम्प्रदाय के लिए और उनका अलवार स्वामी के पाशुराम के प्रति बहुत लगाव था |

पराशर : दादी, क्या आप हमें तिरुमाळै अण्डाण स्वामी जी के बारे में बता सकते हो ? उन्होंने रामानुज स्वामी जी किस तरह से मदद की ?

दादी : तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी को पूरी ज़िम्मेदारी दी गयी थी की वह रामानुज स्वामी जी को थिरु वाईमोली सिखाये | जब रामानुज स्वामी जी श्री रंगम पहुंचे, तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) जी ने ही उनका मार्ग दर्शन किया था की वह तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) से नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामीजी) तिरुवाय्मोळि (सहस्रगीति) को सुने और उनका सार मूल तत्व समझे | यद्यपि, शुरुआत में दोनों में कुछ मतभेद थे क्योंकि यह किसी भी महान विद्वानों के बीच होता है, इसे सुलझाया गया और रामानुज ने अपने आचार्य तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) के आशीर्वाद के साथ अलवार के पाशुरम में छिपे जटिल अर्थों को सीखा | तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी की उनके आचार्य आलवन्दर के लिए इतना सम्मान और भक्ति थी। वह कभी भी अपने आचार्य के मार्ग और शिक्षाओं से दूर नहीं चले और उन्हें रामानुज स्वामी जी को के सिखाया ताकि वह हमारे संप्रदायम के कैंकर्यं को आगे ले जा सकें।

वेदवल्ली : तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) जी ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी : में आपको अगली बार जब हम मिलेंगे तब बताउंगी | उनके बारे में बहुत सी रोचक कहानियां है |

व्यास , पराशर और वेदवल्ली (मिलकर ) : हमें अभी कहानी सुनाइए दादी माँ !

दादी : अभी बहुत देर हो गयी है | आज के लिए यह काफी है | अभी आप घर जाये और कल आप दुबारा वापिस आना और अपने दोस्त को अपने साथ लाना नहीं भूलना |

बच्चे अपने घर को जाते है और हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो के बारे में सोचते है और बहुत उत्सुकता से इंतज़ार करते है की कब दूसरे दिन दादी उनको कहानी सुनाएगी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/07/beginners-guide-alavandhars-sishyas-1/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

व्यास और पराशर आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। अत्तुज़्हाय् अपने हाथ में एक पुरस्कार के साथ प्रवेश करती है।

दादी : प्रिय! यह तुमने क्या जीता है?

व्यास: दादी, अत्तुज़्हाय् ने हमारे स्कूल में आण्डाल के रूप में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लिया , तिरुप्पावै से कुछ पाशूरम (तमिल में भजन) गाए और पहला पुरस्कार जीता।

दादी :अत्तुज़्हाय् यह अद्भुत है! आज मैं आपको पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) के बारे में बताती हूं, उसके बाद में आपसे पाशूरम (तमिल में भजन) सुनुँगी|

व्यास, पराशर और अत्तुज़्हाय् ( एक साथ ) : और इळैयाज़्ह्वार् (श्री रामानुज) के बारे में भी दादी |

दादी : हां बिल्कुल। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था, पेरिय नम्बि, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के प्रमुख शिष्यों के में से एक थे । उनका जन्म श्रीरंगम में मार्गशीर्ष् मास, ज्येष्ठ नक्षत्र में हुआ था। आळवन्दार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के समय के बाद , सारे श्रीरंगम के श्रीवैष्णव पेरिय नम्बि से विनती करते है की वह श्री रामानुजाचार्य को श्रीरंगम मे लाये । अतः वह श्रीरंगम से अपने सपरिवार के साथ कांचीपुरम की ओर चले। इसी दौरान श्री रामानुजाचार्य भी श्रीरंगम की ओर निकल पडे।

पराशर : दादी, इळयाळ्वार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) श्रीरंगम को क्यों गए जब की वह कांचीपुरम में यादव प्रकाश जी से सीख रहे थे।

दादी : बहुत अच्छा सवाल है! याद रखें, पिछली बार मैंने आपको बताया था कि आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) को इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) को मार्गदर्शन करने के लिए सौंपा था? जब इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) का उनके गुरु यादव प्रकाश जी के साथ मत भेद हो जाता है और परेशान हो जाते है, और उनके मन में बहुत शंका और प्रश्न घर कर जाते है जैसे मन में काले बदल छा गए हो, तब वह तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास समाधान ढूंढ़ने के लिए जाते हैं! और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) ने मार्गदर्शन के लिए किससे बात की?

अत्तुज़्हाय् : देवप् पेरुमाळ् (पेरुमल / भगवान /श्री रंगनाथ)!

दादी : अति उत्कृष्ट! यह भगवान/पेरुमल थे जो सदैव इळयाळ्वार स्वामीजी की बचाव करते थे और उनको पेरिय नम्बि जी के पास जाने को प्रकाशित करते थे, और कहते की आप पेरिय नम्बि से पञ्च संस्कार करवाइये और उनके शिष्य बन जाईये| तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) के मन में जो शंका होती है वह सब ऐसे दूर करते है जैसे सूर्य उदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है| इस तरह से इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) कान्चि छोड़ के जाते हैं, फिर पेरिय नम्बि से कान्चि के रास्ते में मिलते है| आश्चर्य की बात यह थी की वे दोनो मदुरान्तगम् मे मिलते है और तभी पेरिय नम्बि श्री रामानुजाचार्य का पञ्च संस्कार करते हैं और कान्चिपुरम पहुँचकर श्री रामानुजाचार्य को सम्प्रदाय के अर्थ बतलाते है।

व्यास: अरे हाँ, हमें मालूम है की मदुरान्तगम् में भगवान श्री राम जी का मंदिर है| हम पिछली छुटियों में उस मंदिर में गए थे|लेकिन, वह कान्चि या श्री रंगम में क्यों नहीं गए इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) जी को समाश्रयनम् करने के लिए| उन्होंने मदुरान्तगम् में ही क्यों किया ?

दादी: पेरिय नम्बि एक महान आचार्य थे जिन्हें इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) के प्रति अत्यधिक लगाव और सम्मान था। वह जानते थे कि इस तरह के अच्छे कर्मों को कभी स्थगित नहीं किया जाना चाहिए और इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) भी ऐसा महसूस कर रहे थे। बच्चों, इससे हम सीखते हैं कि हमारे सम्प्रदाय से संबंधित अच्छी चीजें या कैङ्कर्य में कभी देरी नहीं करनी चाहिए | जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा! पेरिय नम्बि हमारे सम्प्रदाय के सच्चे सिद्धांतों को जानते थे जो कभी भगवान के भक्त को अलग नहीं करते थे और सभी को प्यार और सम्मान के साथ समान रूप से व्यवहार करते थे । वह अपने शिष्य रामानुज से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने हमारे सम्प्रदाय के भविष्य के आचार्य के लिए अपना जीवन त्याग दिया – रामानुजा!

व्यास : उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया! दादी, उन्होंने ऐसा क्यों किया ?

दादी : उस समय, वहां के शैव राजा ने रामानुजा को अपनी मांगों को स्वीकार करने के लिए अपनी अदालत में आने का आदेश दिया था। रामानुज स्वामीजी के बजाय, उनके महान शिष्य श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनके आचार्य के रूप में छिपे हुए, पेरिय नम्बि के साथ राजा के दरबार में गए, जो बहुत बूढ़े थे। पेरिय नम्बि भी अपनी बेटी अत्तुज़्हाय् के साथ राजा के दरबार में गए !

अत्तुज़्हाय् : यह मेरा नाम भी है!

दादी : हाँ यही है! जब राजा उन्हें अपनी मांगों को स्वीकार करने का आदेश देता है, तो श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और पेरिय नम्बि दोनों राजा की मांगों को नहीं मानते हैं। राजा बहुत क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को उनकी आंखें निकालने का आदेश दिया। वृद्धावस्था के कारण दर्द को सहन करने में असमर्थ, पेरिय नम्बि अपना जीवन छोड़ देते है और श्रीरंगम जाने के रास्ते में परमपद चले जाते है, अंत समय में पेरिय नम्बि स्वामीजी कुरेश स्वामीजी की गोद में अपना सिर रखते है और फिर परमपद को प्रस्थान करते है। इन महान आत्माओं ने बिना किसी चिंता के सब कुछ त्याग दिया, हमारे रामानुज स्वामीजी की रक्षा करने के लिए, जो एक मोती के हार में केंद्रीय मणि की तरह है। अगर हम हार में मोती तोड़ेंगे तो क्या होगा?

व्यास और पराशर (कोरस में एक साथ): हार भी टूट जाएगा|

दादी : बिल्कुल ठीक! इसी तरह, हालांकि रामानुज स्वामीजी मोती के हार में केंद्रीय मणि है , जिसे हमारे श्री रामानुजा सम्प्रदाय कहा जाता है, मोतियों के रूप में सभी आचार्यों ने हार को एक साथ रखा और देखा कि केंद्रीय मणि सुरक्षित रहे । तो हम सभी को अपने आचार्यों के प्रति हमेशा आभारी रहना चाहिए और हमेशा अपने जीवन से नम्र होना चाहिए।

पराशर : दादी, श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के साथ क्या हुआ?

दादी : श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनकी आंखें चली गईं, फिर वह श्री रांगम लौट आये । वह रामानुज स्वामीजी के महानतम शिष्यों में से एक थे और अपने जीवन के सभी पहलुओं में रामानुज स्वामीजी के साथ थे। अगली बार जब हम मिलेंगे तो मैं आपको श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और रामानुज स्वामीजी के बारे में और बताउंगी। अब, जल्दी करो और घर जाओ। आपके माता-पिता आपके लिए इंतज़ार कर रहे होंगे। और, अत्तुज़्हाय्, अगली बार मैं आप से तिरुप्पावै पासुरम सुनूंगी ।

बच्चे पेरिय नम्बि और श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के बारे में सोचते हुए घर वापस जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/07/beginners-guide-periya-nambi/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) और मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)

व्यास और पराशर अपने मित्र अत्तुज़्हाय् के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी अपने हाथों में प्रसाद के साथ उनका स्वागत करती हैं।

दादी : आपका स्वागत है अत्तुज़्हाय् ! यहां अपने हाथ और पैर धोएं और इस प्रसाद को लें। आज उत्राडम् (उत्तराषाढा), आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र हैं।

पराशर : दादी, पिछली बार आपने कहा था कि आप हमें यमुनैत्तुऱैवर् (आळवन्दा / र्श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में बताएंगी, याद है?

दादी : हाँ! मुझे याद है और मुझे खुशी है कि आप को भी याद हैं और आप हमारे महान आचार्य के बारे में जानना चाहते हैं। आज उनका तिरुनक्षत्र है। इन महान आचार्य की महिमा के बारे में बात करने के लिए यह सही समय है।

व्यास : दादी, लेकिन क्या आपने यह नहीं कहा कि यह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र था?

दादी : हाँ। यमुनैत्तुऱैवर् स्वामीजी का अवतार स्थल काट्टु मन्नार् कोयिल् है, बाद में इन्हे (यमुनैत्तुऱैवर्) आळवन्दार् के नाम से जाना जाने लगा।यमुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य) का जन्म नाथमुनि के पुत्र ईश्वरमुनी के यहाँ हुआ। [दक्षिणात्य आषाढ़ माह के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में काट्टुमन्नार् कोविल, वीर नरायणपुराम , वर्तमान मन्नारगुडी गांव में हुआ। ]

श्री आळवन्दार ने अपना विद्याध्यन, अपनी प्रारंभिक शिक्षा महाभष्य भट्टर् से प्राप्त किया। आळवन्दार् के रूप में उनकी प्रशंसा कैसे हुई, इस बारे में एक बहुत ही रोचक कहानी है। उन दिनों पंडितों को मुख्य पंडित को कर चुकाना पडता था। उस समय काल में राजदरबार के विद्वान पंडित, राज पुरोहित आक्कियाज़्ह्वान् थे, आक्कियाज़्ह्वान् अपने प्रतिनिधियों को पंडितों के पास भेज कर उनसे कर वसुल करने को केहते थे। इसे सुनकर महाभाष्य भट्टर् चिन्तित हो जाते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् केहते हैं के वो इसक ख्याल रखेंगे। यामुनाचार्यजी एक श्लोक भेजते हैं, जिसमे वह स्पष्ट रूप से कहते है, वह उन सब कवियों का जो अपना स्वप्रचार के लिये अन्य विद्वानों पर अत्याचार करते है, उनका नाश करेंगे। यह देखकर आक्कियाज़्ह्वान् को गुस्सा आता है और अपने सैनिकों को यमुनैत्तुऱैवर् को राजा के अदालत में लाने के लिए भेजता है। यमुनैत्तुऱैवर् उन्हें बताते हैं कि वह केवल तभी आएगें जब उसे उचित सम्मान की पेशकश की जाएगी। तो, राजा उनके लिये एक दोला भेजते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् अदालत आते हैं। वाद शुरू होने वाला है, रानी राजा को बताती है कि उन्हे यकीन है कि यमुनैत्तुऱैवर् जीतेगा और यदि वह हारेंगे तो वोह राजा का सेवक बन जाएंगी। और राजा को भरोसा था कि आक्कियाज़्ह्वान् जीतेंगे और वो कहते हैं कि अगर यमुनैतुऱैर्वर् जीतते हैं, तो राजा उन्हे आधा राज्य दे देंगे। अंत में, महान बहादुरी और ज्ञान के साथ, यमुनैत्तुऱैवर् ने आक्कियाज़्ह्वान् के खिलाफ वाद जीता। आक्कियाज़्ह्वान् इतने प्रभावित हो जाते हैं कि वो भी यमुनैत्तुऱैवर् का शिष्य बन जाते हैं। रानी ने उन्हें “आळवन्दार्” नाम दिया – वह जो उनकी रक्षा करने आये थे – अगर वह जीतते नही तो, रानी एक नौकर बन जाती और इसलिए रानी भी उनकी शिष्य बन जाती हैं। राजा द्वारा वादा किए गए अनुसार उन्हें (आळवन्दार्) को आधा राज्य भी मिलता है।

व्यास : दादी, यदि यामुनाचार्यजी को आधा राज्य मिला, तो उन्होने तो राज्य पर शासन किया होगा । वोह हमारे संप्रदायम में कैसे पहुंचे?

अत्तुज़्हाय् : उन्हें मणक्काल् नम्बि द्वारा हमारे संप्रदायम में लाया गया था जो उय्यक्कोण्डार् के शिष्य थे। उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) के निर्देशों के मुताबिक, मणक्काल् नम्बी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) को संप्रदायम लाने के लिए पहल की।

दादी : यह बिल्कुल सही और अद्भुत अत्तुज़्हाय् है! आप इसके बारे में कैसे जानते हो?

अत्तुज़्हाय् : मेरी मां भी मुझे हमारे आचार्य और पेरुमल के बारे में कहानियां बताती है|

दादी : आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) महान आचार्य थे जिन्होंने इळयाळ्वार (रामानुज स्वामीजी) को देवप् पेरुमल के आशीर्वाद के साथ संप्रदायम में लाया।

पराशर : लेकिन दादी, देवप् पेरुमल जी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की मदद कैसे की?

दादी : यह कान्चिपुरम् में हुआ, कि आळवन्दार् ने इळैयाज़्ह्वार् को वरदराज पेरुमाळ् कोयिल में देखा जो अभी रामानुज बने नही थे। इळैयाज़्ह्वार् अपने गुरु यादव प्रकस से सीख रहे थे। आळवन्दार् संप्रदायम के अगले नेता इळैयाज़्ह्वार् को बनाने के लिए देवप् पेरुमल् से प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार यह देवप् पेरुमल् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् को पोषित किया और उठाया, एक मां की तरह उपने बच्चे के साथ कैसे किया जाये और यह महान आळवन्दार् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् पर अपने आशीर्वाद बरसाया जो बाद में संप्रदायम के लिए महान महान कैङ्कर्य करने के लिए आगे बढ़े। आळवन्दार् भी आवश्यकतानुसार इळैयाज़्ह्वार् का मार्गदर्शने करने के लिए तिरुक्कच्चि नम्बि को सौंपा। तिरुक्कच्चि नम्बि याद है ना आपको?

व्यास : हाँ दादी, यह वह है जो तिरुवालवट्ट (पंखा) कैङ्कर्य द्Eवप् पेरूमल को करते थे और द्Eवप् पेरूमल और तायार् के साथ भी बात करते थे । यह कितना अच्छा होगा अगर हम तिरुक्कच्चि नम्बि की तरह पेरुमल से भी बात कर सकें? तो क्या यामुनाचार्यजी और इळैयाज़्ह्वार् मिले? क्या आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने इळैयाज़्ह्वार् को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया?

दादी : दुर्भाग्यवश नहीं! इससे पहले इळैयाज़्ह्वार् श्री रंगम जाकर आळवन्दार् स्वामी जी से मिलते, उससे पहले आळवन्दार् स्वामी जी को परम पदम् प्राप्त हो गया । अगली बार, बच्चों जब मैं आपसे मिलूंगी, मैं आपको श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) के बारे में बताऊंगी, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के कई शिष्यों में एक शिष्य श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) जो इळैयाज़्ह्वार् जी के आचार्य बन गए और लम्बे समय तक उनका मार्ग दर्शन किया । आळवन्दार् स्वामीजी के बहुत शिष्य थे और उन सब ने मिलकर काम किया इळैयाज़्ह्वार् जी को सम्प्रदाय में ला सके । पेरिय नम्बि (श्री महा पूर्ण) के अलावा,पेरिय तिरुमलैनम्बि (श्रीशैल पूर्ण स्वामीजी), तिरुकोष्टियूर् नम्बि (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी), तिरुमालै आण्डान् (मालाधार स्वामीजी), और मारानेरीनम्बि, तिरुकच्चिनम्बि (कांचीपूर्ण स्वामीजी) , तिरुवरंग पेरुमाळ् अरयर्, (मणक्काल नम्बि के शिष्य और आळवन्दार् के पुत्र) और कई अन्य आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के शिष्यगण थे।

व्यास , पराशर और अत्तुज़्हाय् : दादी यह बहुत दिलचस्प था |अगली बार, कृपया हमें पेरिया नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) और इळैयाज़्ह्वार् (रामानुज स्वामीजी) को के बारे में बताएं।

दादी : मुझे यह बताने में बहुत खुशी होगी लेकिन अब बहुत अंधेरा हो रहा है। बच्चों, अपने घर जाओ |

बच्चे आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में सोचकर अपने घरों को खुशी से निकलते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) और मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

 

पराशर और व्यास अपने मित्र वेदवल्लि के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी उन्हें अपने हाथों से प्रसाद के साथ स्वागत करती है।

आण्डाल दादी : यहां इस प्रसाद को लें और मुझे बताएं कि आपकी नयी मित्र कौन है।

व्यास : दादी, यह वेदवल्लि है जो छुट्टियों के लिए कान्चीपुरम् से आयी है | हम उसे हमारे साथ लाए ताकि यह आचार्यों की महिमाओं पर आपकी कहानियों को सुन सके।

पराशर : दादी आज हम किसी त्यौहार का जश्न मना रहे हैं?

आण्डाल दादी : आज आचार्य उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का तिरुनक्ष्त्र है जिन्हे पुण्डरिकाक्षर् और पद्माक्षर स्वामी भी कहा जाता है।

व्यास: दादी, क्या आप हमें इन आचार्य के बारे में बता सकती हैं?

uyyakkondar

आण्डाल दादी: उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का जन्म चैत्र मास कृतिका नक्षत्र को तिरुवेळ्ळऱै (श्वेत गिरि) में हुआ था। इनके माता पिता द्वारा इनका नामकरण तिरुवेळ्ळऱै एम्पेरुमान् के नाम पर ही किया गया। नाथमुनि स्वामीजी के शिष्यों में , कुरुगै कावलप्पन् के साथ साथ इन्हें भी प्रमुख माना जाता है। नाथमुनि जी को नम्माळ्ळवार के अनुग्रह से अष्टांग योग का दिव्य ज्ञान मिला था।

पराशर: दादी, यह योग क्या है?

आण्डाल दादी: यह योग का एक प्रकार है जिसके माध्यम से किसी भी शारीरिक गतिविधियों के बारे में सोचे बिना भगवान का अविराम अनुभव कर सकता हैं। जब नाथमुनि उय्यक्कोण्डार् से अष्टांग योग सीखने में उनकी रूचि के बारे में पूछते हैं तब वे उन्हें जवाब देते हैं की “पिणम् किडक्क मणम् पुणरलामो ” माने जहाँ संसारी अज्ञान के कारण भौतिक जगत् में दुखि हैं वहाँ वे कैसे आनंद से भगवद् गुणानुभव कर सकते हैं।

पराशर: दादी, क्या वह केहते हैं कि किसीके मरने पर कोई आनंद नहीं ले सकता है? कौन मर गया है?

आण्डाल दादी: शानदार पराशर! उन्होंने कहा कि जब इस दुनिया में इतने सारे लोग पीड़ित हैं, तो वह व्यक्तिगत रूप से भगवान का आनंद लेने के बारे में कैसे सोच सकते हैं। यह सुनकर, नाथमुनी बेहद प्रसन्न थे और उय्यक्कोण्डार् की महानता की सराहना की। उन्होंने उय्यक्कोण्डार् और कुरुगै कावलप्पन् दोनों को इश्वर मुनी के बेटे (नाथमुनी के अपने पोते, जो इस् संसार में आने वाले थे) को अर्थ के साथ अष्टांग योग और दिव्य प्रबन्धम को सिखाने के निर्देश दिए।

व्यास: दादी, क्या उय्यक्कोण्डार् का कोई शिष्य था?

दादी : मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) उनका मुख्य शिष्य थे। परमापद जाने के समय, मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) ने उत्तराधिकारी के बारे में उनसे (उय्यक्कोण्डार्) पूछा और उय्यक्कोण्डार् ने संप्रदाय की देखभाल करने के लिए स्वयं मणक्काल् नम्बि को निर्देश दिया। उन्होंने यामुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य स्वामीजी / ईश्वर मुनी के बेटे) को अगला आचार्य बनाने के लिए तैयार करने के लिए मणक्कऽल् नम्बि को भी निर्देश दिया।

पराशर: दादी, क्या आप हमें मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) के बारे में बता सकती हैं?

दादी : उनका मूल नाम राम मिश्र था। उनका जन्म माघ मास , माघ नक्षत्र के महीने में श्रीरंगम के पास कावेरी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गाँव मणक्कल् में हुआ था। माधुरकवी आळ्ळवार की तरह जो नम्माळ्ळवार् के लिए बहुत समर्पित थे, मणक्कल् नम्बि उय्यक्कोण्डार् के लिए बहुत समर्पित थीं। उय्यक्कोण्डार् की पत्नी के निधन के बाद, उन्होंने खाना पकाने के कैङ्कर्य को ग्रहण किया और अपने आचार्य की हर व्यक्तिगत आवश्यकता में भाग लिया। एक बार उय्यक्कोण्डार् की बेटियां नदी में स्नान करने के बाद वापस लौट रही थीं, तब रास्ते में कीचड़ के कारण वह आगे नहीं बढ़पाती। यह देख मणक्कल् नम्बि छाती के बल कीचड़ पर लेट जाते है और अपने आचार्य की पुत्रियों को अपनी पीठ पर चलते हुए कीचड़ पार करने को कहते है। उनके आचार्य उय्यक्कोण्डार् को जब इस घटना का वृतांत मिला , तब वह मणक्कल् नम्बि की आचार्य चरणों में भक्ति और जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता को देख अत्यंत ही प्रसन्न हुए ।

समूह में बच्चे: दादी, अगली बार जब हम मिलेंगे तो क्या आप हमें आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की कहानी बता सकती हैं?

दादी खुशी से कहती हैं, “में बहुत खुश हूँगी आपको यामुनाचार्य स्वामीजी की कथा सुनाने में जब हम अगली बार मिलेंगे ” और बच्चे अपने घरों को जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आचार्यों का परिचय

 

nathamunigal

व्यास और पराशर स्कूल के बाद घर आते हैं। वे अपने दोस्त अत्तुज़्हाइ को उनके साथ ले आए।

आण्डाळ दादी: आप किसके साथ आए हैं?

व्यासः दादी, यह हमारी दोस्त अत्तुज़्हाइ है। हमने इसे कुछ वैभवों के बारे में बताया जो आपने हमें बताया था, और इसको उन वैभवों को आपसे सुनने में दिलचस्पी (रुचि) थी, तो हम इसे साथ में ले आये।

आण्डाळ दादी: अभिवादन अत्तुज़्हाइ (आपका स्वागत है)| यह सुनकर खुशी है कि आप दोनों केवल सुन ही  नहीं रहे हैं, बल्कि अपने दोस्तों के साथ साझा भी कर रहे हैं।

पराशर : दादी, हम हमारे आचार्य के बारे में सुनने आए हैं।

आण्डाळ दादीः अच्छा। आज मैं आपको हमारे आचार्य के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने हमारे संप्रदाय के गौरव को वापस लाया श्री शठकोप स्वामीजी (नम्माळ्ळवार) के दैवीय हस्तक्षेप के माध्यम से।

अत्तुज़्हाइ: दादी वह कौन थे ?

आण्डाळ दादी: अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर के लिए कुछ खानेवाले फल लाती हैं।

आण्डाळ दादी : वह हमारे अपने श्री नाथमुनि स्वामीजी (नाथमुनिगळ्) हैं| श्रीमन नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) का जन्म काट्टु मन्नार् कोयिल् (वीरनारायणपुरम) मे ईश्वरभट्टाळ्वार् के घर में हुआ। श्रीमन् नाथमुनि को श्रीरन्गनाथमुनि और नाथब्रह्म के नामों से भी जाना जाता है| श्रीमन् नाथमुनि अष्टांग योग और संगीत के विद्वान थे। यहि है जिन्होंने अरयर सेवा स्तम्भित किया, जिसे आज भी श्रीरंगम्, आळ्ळवार तिरुनगरि, श्रीविल्लिपुत्तूर् में अभी भी मनाया जाता है। [श्रीरंगम में भगवान अरंगनाथार (श्री रंगनाथजी) की अरयर सेवा ( अरयर सेवा याने , दिव्य प्रबंधों को संगीतमय ताल में नृत्य के साथ प्रस्तुत करना) की शुरुआत की थी, जो आज भी तिरुवरन्गम, आल्वार् तिरुनगरि , और श्री विल्लिपुत्तूर् मे उत्सव और अन्य दिनों में आज भी आयोजित होती है।]

पराशर: दादी हमने हमारे पेरुमल (श्री रंगनाथजी) के सामने अरयर सेवा को कई बार देखा है| यह बहुत खूबसूरत है जिस तरह से अरयर स्वामी अपने हाथों में थलम के साथ पाशुरों को गाते हैं।

आण्डाळ दादीः हाँ। एक दिन श्रीवैष्णवों का समूह मेल्नाडु (तिरुनारायणपुरम् क्षेत्र) से काट्टु मन्नार् कोयिल् दर्शन के लिये पहुचते हैं और “आरावमुदे…” ( तिरुवाइमोज़्हि से दशक) मन्ननार् ( काट्टु मन्नार् कोइल् मे एम्पेरुमान्) के सामने गाते हैं [यह एक द्रविड़ शब्द है, जिसका अर्थ है “रूचि के साथ” / “तन्मयता के साथ” भगवान को गाकर सुनाते हैं ]। नाथमुनि, उन पाशुरों के अर्थ से उत्साहित, उनके बारे में श्रीवैश्णवों से पूछते हैं, लेकिन वो श्रीवैश्णव उन ११ पाशुरों से परे कुछ भी नहीं जानते हैं। वे कहते हैं कि अगर नाथमुनि तिरुक्कुरुगूर् जाते हैं, तो इन्हें शेष पाशुरो की जानकारी प्राप्त हो सकती हैं। नाथमुनि मन्ननार् से अवकाश लेते हैं और आळ्ळवार तिरुनगरि पहुँचते हैं।

अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर जल्द ही अपने भोजन को खत्म करते हैं और नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) के बारे में बेसब्री से सुनना जारी रखते हैं।

आण्डाळ दादी: उनकी मुलाकात मधुरकवि आळ्ळवार के शिष्य परांकुश दास से होती है। परांकुश दास उन्हें कण्णिनुण् चिरुत्ताम्बु सिखाते हैं और इसे १२००० बार तिरुप्पुज़्हियाळ्ळवार (इमली का वह पेड़ जिसमें नम्माळ्वार रेहते थे) के सामने बिना किसी अवरोध के जप करने को केहते हैं। परांकुश दास के बताये हुए क्रम के अनुसार नाथमुनि स्वामीजी (जो अष्टांग योग के अधिकारी हैं) जप आरम्भ करते हैं। नाथमुनि के इस जप से प्रसन्न होकर नम्माळ्वार उनके सामने प्रकट होते हैं । उन्हे अष्टांग योग का परिपूर्ण ज्ञान और आळ्वार संतो द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबंध पाशुर (अरूलिचेयल्) अर्थ सहित प्रदान करते हैं ।

व्यास: अतः, ‘आरावमुदे’ गान, ४००० दिव्य प्रबंध (दिव्य साहित्य) का एक हिस्सा है?

आण्डाळ दादी : हाँ। ‘आरावमुदे’ गान तिरुक्कुडन्तै आरावमुतन् एम्पेरुमान् (भगवान) के बारे में है।. नाथमुनि काट्टु मन्नार् कोयिल् पहुँच , मन्ननार् को ४००० पाशुर सुनाते हैं | प्रसन्न होकर मन्ननार् ४००० पाशुरों को विभजित करके प्रचार – प्रसार करने का आदेश देते हैं | वह आरुळिच्चेयल् में संगीत जोड़ते हैं और उसे अपने भतीजे किज़्ज़्ह् अगत्ताज़्ह्वान् और मेलै अगत्ताज़्ह्वान् के लिए सिखाते हैं और उनके माध्यम से प्रचार करते हैं। [मन्ननार् के आदेश अनुसार ४००० पाशुरो को नाथमुनि स्वामीजी, लय, सुर और ताल के सम्मिश्रण कर ४ भाग कर, अपने दोनों भांजे कीळैयगताळ्वान् और मेलैयागताळ्वान् पर अनुग्रह कर दिव्यप्रबन्ध का ज्ञान देकर इनके द्वारा इन दिव्य प्रबंधों का प्रचार – प्रसार करते हैं|] [अपने दिव्य ज्ञान , अपने अष्टांगयोग की साधना से भविष्य को देखते हुये, अपने पौत्र का आगमन देखते है ।]इतना ही नहीं, अपने अष्टांग योग सिद्द् के माध्यम से, उन्होंने हमारे संप्रदाय के एक और महान आचार्य की उपस्थिति को पूर्ववत किया। अगली बार, मैं आपको उनके बारे में और बताउंगी।

समूह में बच्चे: ज़रूर दादी | हम इसके बारे में सुनने के लिए उत्सुक हैं अत्तुज़्हाइ आण्डाळ दादी से आशीर्वाद लेती हैं और अपने घर जाती हैं, जबकि व्यास और पराशर अपने स्कूल के पाठों का अध्ययन करने जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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Beginner’s guide – thiruvAimozhip piLLai

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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AndAL pAtti was busy in kitchen cooking when kids entered the house to discuss more about piLLai lOkAchAryar’s Sishyas. AndAL pAtti welcomed them with broad smile. She was waiting with SrIranganAtha’s prasadam to distribute to kids.

pAtti: Come in children. Here take the perumAL prasAdham. Hope everyone remembers our  previous discussion.

vyAsa: pAtti, We learnt about kUra kulOththama dhAsar, viLAnchOlai piLLai, and have even learned about “AchArya abhimAname uththAragam“.

pAtti: Very proud of you kids, today I will tell more about one such Sishya of piLLai lOkAchAryar named thirumalai AzhwAr.

aththuzhAy:  pAtti , I have heard that thirumalai AzhwAr  got his name due to his attachment towards AzhwAr’s thiruvAimozhi. Am I right pAtti !

pAtti: Absolutely correct aththuzhAy, he was known as SriSailESar, SatakOpa dhAsar and most importantly thiruvAimozhip piLLai. Due to his attachment towards nammAzhwAr and  AzhwAr’s thiruvAimozhi he got this name. thirumalai AzhwAr had his pancha samaskaram at  his young age at the lotus feet of  piLLai lOkAchAryar . But after some time  thirumalai AzhwAr  drifted off from our sampradhAyam  and became the chief advisor of the madhurai kingdom .

vyAsa : Oh , but  pAtti then who brought  thirumalai AzhwAr back into our sampradhAyam ?

pAtti : Children, I appreciate your curiosity. piLLai lOkAchAryar during his final days , instructed kUra kulOththama dhAsar and other Sishyas to reform thirumalai AzhwAr and bring him back to lead the sampradhAyam.

vEdhavalli : pAtti, what did  kUra kulOththama dhAsar do to reform thirumalai AzhwAr? Can you tell us pAtti ?

pAtti : Yes , Once  thirumalai AzhwAr  was doing his routine  rounds in his palanquin. He comes across kUra kulOththama dhAsar who was reciting AzhwAr’s thiruviruththam. Since thirumalai AzhwAr had the blessings of  piLLai lOkAchAryar, he was able to understand the greatness of dhAsar. thirumalai AzhwAr stepped down from his palanquin and requested dhAsar to teach him the meanings of  thiruviruththam.

parASara : pAtti , tell us more about how thirumalai AzhwAr learned from dhAsar.

pAtti : dhAsar arrives to teach thirumalai AzhwAr; he notices that thirumalai AzhwAr is reciting  piLLai lOkAchAryar thaniyan while applying thirumaN kAppu and was very pleased with that. But thirumalai AzhwAr is unable to attend the class some times. thirumalai AzhwAr asks for pardon to dhAsar. dhAsar accepts him and gives him his SEsha prasAdham (food remnants). thirumalai AzhwAr accepts with great joy and from then on he completely becomes detached from worldly activities, transfers the power to the young prince and leaves the kingdom.

During his final days, dhAsar instructs thirumalai AzhwAr to go thirukkaNNangudip piLLai to learn thiruvAimozhi in detail. Later, he learned all rahasya arthams (confidential meanings) from viLAnchOlaip piLLai. dhAsar appoints thirumalai AzhwAr as the leader of our sampradhAyam. After dhAsar attaining paramapadham, meditating on piLLai lOkAchAryar, thirumalai AzhwAr does all the charama kainkaryam (final rites) for him in a grand manner.

vyAsa : pAtti, did thirumalai AzhwAr lead our sampradhAyam from then onwards?

pAtti : No vyAsa, as I said before, thirumalai AzhwAr goes to thirukkaNNangudip piLLai and starts learning  thiruvAimozhi. He wants to know the meaning of all the pAsurams in detail. So piLLai sends him to thirupputkuzhi jIyar to learn the same. Unfortunately just before his arrival jIyar had attained paramapadham. thirumalai AzhwAr becomes very upset and then decides to perform mangaLAsAsanam to dhEvap perumAL (kAnchIpuram varadhar).

parASara : pAtti , this incident is similar like rAmanujar once visits ALavaNdhAr, but before udaiyavar’s arrival ALavaNdhAr attained paramapadham. Am I right pAtti ?

pAtti : Absolutely correct parASara, then he arrives to do mangaLAsAsanam to dhEvap perumAL; he was welcomed by every one there and dhEvap perumAL blesses thirumalai AzhwAr with his SrI SatakOpam, mAlai (garland), sARRupadi (sandalwood paste). dhEvap perumAL ordered nAlUr piLLai to teach thirumalai AzhwAr all the meanings of aruLichcheyal (dhivya prabandham) including thiruvAimozhi eedu vyAkyAnam which he could not hear from thirupputkuzhi jIyar .

nAlUr piLLai felt happy to teach, but he felt his old age would not allow him to teach thirumalai AzhwAr properly. Then dhEvap perumAL ordered nAlUr piLLai’s son nAlUr AchchAn piLLai  to teach thirumalai AzhwAr . Hearing this divine order, nAlUr piLLai accepts thirumalai AzhwAr with great joy and brings him to nAlUr AchchAn piLLai and instructs him to teach eedu along with other aruLichcheyal meanings. Hearing the incident, thirunArAyaNapuraththu Ayi, thirunArAyaNapuraththup piLLai and others request nAlUr AchAn piLLai and thirumalai AzhwAr to come and live at thirunArAyaNapuram and continue the kAlakshEpam there so they can also learn this in detail. They accept the invitation and reach thirunArAyaNa puram and performs the kAlakshEpam fully there. There thirumalai AzhwAr learns eedu in full depth and being pleased with him and his service attitude, nAlUr AchchAn piLLai presents his  thiruvArAdhanap  perumAL to thirumalai AzhwAr. Thus eedu 36000 padi gets propagated from nAlUr AchchAn piLLai through 3 great scholars – thirumalai AzhwAr, thirunArAyanapuraththu Ayi , and thirunArAyanapuraththup piLLai. Then thirumalai AzhwAr decides to go to AzhwArthirunagari to live there permanently .

vyAsa : Isn’t AzhwArthirunagari the birth place of nammAzhwAr? I have heard that thirumalai AzhwAr is the one who rebuilt AzhwArthirunagari when it was in a very bad shape. Please tell us that chaithram pAtti.

pAtti : You are right vyAsa. When thirumalai AzhwAr arrived in AzhwArthirunagari, it was like a forest. During muslim invasion, AzhwAr left AzhwArthirunagari and travelled to Karnataka/Kerala border. thirumalai AzhwAr with great efforts, cleared the forest, reconstructed the town and the temple, re-established the temple norms. He also brought back AzhwAr with the help of madhurai king. He showed great love for AzhwAr and thiruvAimozhi. He became to be known as thiruvAimozhip piLLai as he was constantly reciting thiruvAimozhi. He also found the divine bhavishyadhAchAryan (emperumAnAr) vigraham and established a separate temple for emperumAnAr in the western part of the town with separate 4 streets surrounding it and a sannidhi street in front of the temple. He also established care takers for this temple too. Without him, we cannot imaging the AzhwArthirunagari we are seeing and enjoying today.

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Then Hearing about thiruvAimozhi piLLai, azhagiya maNavALan (maNavALa mAmunigaL before accepting sanyAsa) went to AzhwArthirunagari, becomes a Sishya of him, starts serving him and learning aruLichcheyal and its meanings from him fully.  During his last days , thiruvAimozhip piLLai starts worrying about a successor to carry our sampradhAyam after his time. azhagiya maNavALan vowed to take up the responsibility. thiruvAimozhip piLLai becoming very pleased with that and instructed mAmunigaL to learn SrIbhAshyam once and asked him to fully focus on  thiruvAimozhi and its vyAkyAnams for the rest of his life. Later thiruvAimozhip piLLai attained paramapadham and azhagiya maNavALan performs all the charama kainkaryams to thiruvAimozhip piLLai .

thiruvAimozhi piLLai  dedicated his life for nammAzhwAr and thiruvAimozhi. It is by the efforts of thiruvAimozhip piLLai we have received the eedu 36000 padi vyAkyAnam which was spread widely to great heights by azhagiya maNavALa mAmunigaL subsequently. So children, let us pray at the lotus feet of thiruvAimozhip piLLai to give us the same attachment towards emperumAnAr and our AchAryan.

Kids felt fully blessed and left AndAl pAtti’s home thinking about discussions .

adiyen janani rAmAnuja dAsi

Beginner’s guide – piLLai lOkAchAryar’s sishyas

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parASara, vyAsa, vEdhavalli and aththuzhAy enter ANdAL pAtti’s home with full curiosity as they are going to learn about the Sishya’s of piLLai lOkAchAryar.

pAtti: Welcome children, How are you all? I could see excitement in all your faces.

vyAsa: Hello pAtti, we are doing good! How are you patti? Yes pAtti you are correct we been eagerly waiting to hear about the sishyas of piLLai lOkAchAryar.

pAtti: Yes kids, even I was waiting to share with you all. Hope you all remember our last discussion. Can any one tell me his sishyas’ names?

aththuzhAy: pAtti! I do remember the names. kUra kulOththama dhAsar, viLAnchOlaip piLLai, thirumalai AzhwAr (thiruvAimozhip piLLai), maNapAkkaththu nambi, kOttUr aNNar, thirupputkuzhi jIyar, thirukkaNNangudip piLLai, kolli kAvala dhAsar.

pAtti: Very nice aththuzhAy, glad that you kids remember. Now let us discuss in detail. First, I will tell you all about kUra kulOththama dhAsar.

All children: Sure pAtti!

pAtti: kUra kulOththama dhAsar was born in SrIrangam. His role was very important in bringing thirumalai AzhwAr (thiruvAimozhip piLLai) back to our sampradhAyam. He was close associate of piLLai lOkAchAryar and he travelled with piLLai lOkAchAryar during thiruvarangan ula (when namperumAL travelled to various places during muslim invasion). mAmunigaL glorifies kUra kulOththama dhAsar as “kUra kulOththama dhAsam udhAram” (one who is very merciful and generous) because of his unlimited krupai of taking many efforts to reform thirumalai Azhwar. Eventually, thirumalai AzhwAr became so grateful and surrendered to kUra kulOththama dhAsar that he always lived with dhAsar serving him and left to AzhwArthirunagari only after dhAsar’s ascending to parampadham. In SrI vachana bhushaNam, it is said that for a Sishya “AchArya abhimAname uththAragam“. This absolutely suites kUra kulOththama dhAsar and thirumalai Azhwar. So let us all remember kUra kulOththama dhAsar who always remembers the feet of  piLLai lOkAchAryar.

vEdhavalli: pAtti, we are all happy to hear about kUra kulOththama dhAsar. We all learned how a Sishya should respect Acharyan.

pAtti: Yes vEdhavalli everyone should remember “AchArya abhimAname uththAragam”. Now  we will learn another important Sishya named viLAnchOlaip piLLai.

vyAsa: pAtti, I already know why he is called viLAnchOlai piLLai. He used to climb “ViLam” trees to get dharSan of the gOpuram of the thiruvananthapuram,  padhmanAbha swAmi temple.


viLAnchOlai piLLai

pAtti: Very good vyAsa,you are right. Being born in eezhava kulam, he was not allowed inside the temple. So to have dharSan of perumAL, he will climb “viLam” tree and perform mangaLASAsanam. Due to piLLai lOkAchAryar’s grace, he learned eedu, SrI bhAshyam, thathva thrayam and other rahasya granthams from azhagiya maNavALap perumAL nAyanAr, who is the younger brother of piLLai lOkAchAryar.

viLAnchOlai piLLai learned SrI vachana bhUshaNam from his Acharyan piLLai lOkAchAryar. He become an expert in the meaning of  SrI vachana bhUshaNam. He wrote “saptha gAthai” which is the essence of his AchArya’s SrI vachana bhUshaNam.

parASara: We are greatly surprised seeing  viLAnchOlai piLLai”s attachment towards his AchAryan.

pAtti: Yes, parASara! One of the biggest kainkarayams he did was to follow his AchAryan’s instructions in reforming thirumalai AzhwAr. piLLai lOkAchAryar wanted viLanchOlai piLLai to teach the meanings of SrI vachana bhUshaNam to thirumalai Azhwar. Children! Now, I would like to share one important incident happened in the life of viLAnchOlaip piLLai.

aththuzhAy: pAtti, please tell us about the incident.

pAtti: I know you all be curious to listen to it and my duty is to share sathvishyam with you all, so listen carefully,

One day nambUdaris were doing thiruvArAdhanam to padhmanAbha swAmi. viLAnchOlai piLLai entered in to the temple. As we all know, the sanctum has three doors to facilitate our dharSan of perumAL. viLAnchOlai piLLai stood near the door that gives dharSan of perumAL’s lotus feet. Seeing all this, nambUdaris became shocked, as he was not allowed inside the temple premises those days. nambUdaris closed the door of the sannidhi, started to move out of the temple.

At the same time, some local Sishyas of viLAnchOlai piLLai approached the temple and announced that their Acharyan viLanchOlai piLLai has left his body and reached the lotus feet of his Acharayan piLLai lOkAchAryar. They wanted “thirupariyattam” (emperumAn’s vasthram as prasAdham) and emperumAn’s garlands for the charama thirumEni (final sacred body) of viLAnchOlai piLLai.

Hearing this nambUdharis became shocked and understood the greatness of viLAnchOlaip piLLai. He then offered perumAL’s thiruppariyattam and garlands.

vEdhavalli: pAtti, I had goose bumps hearing about viLAnchOlai piLLai final moments.

vyAsa: Yes pAtti, I am also getting happy tears from my eyes. This truly explains how a person from “eezhava kulam” is glorified in our sampradhAyam.

pAtti: Alright kids, I had a nice time with you all. Hope you all will remember what we discussed today. Next time, I will tell you in detail about thiruvAimozhip piLLai, see you all soon.

All the kids left Andal patti’s home with full energy and happiness thinking about the discussions.

adiyEn janani rAmAnuja dAsi

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers – Who is Rāmānuja?

Śrīḥ  Śrīmathē Śatakōpāya namaḥ  Śrīmathē Rāmānujāya namaḥ  Śrīmath Varavaramunayē namaḥ

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers

<< Our Philosophy

This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

Rāmānuja (Rāmānujāchārya) is a pivotal Āchārya (teacher) in our tradition. He war born in the year 1017 in Sriperumbudur, a town near Chennai (formerly Madras), south India. He was at the same time a first-class philosopher and theologian who dominated the intellectual landscape of his time, a very humble devotee of God and a devoted servant of his godbrothers and sisters as well as humanity as a whole.

Rāmānuja fought excesses of the caste system by allowing people of all castes and groups into temples and was open to accepting them as his disciples – more than 950 years ago. He implemented a strong sense of mutual respect and service amongst his followers, which crosses all boundaries of society and is very much alive until today.

Rāmānuja corrected misinterpretations of the Vedic literature and proved that every letter of Veda is authentic and authoritative, there no need to create secondary meanings in order to solve seeming contradictions. This was common practice before him. The philosopher Shankara (Śankarāchārya), who lived about 150 years before Rāmānuja, had classified the Veda into significant and less significant parts, claiming that some verses mean something very different from what they say in the Word. This was based on very complicated grammatical arguments, which were however widely accepted by intellectuals before Rāmānuja.

The correction was made possible by Rāmānuja’s refinement and systematization of the Vishishtadvaita philosophy. Our tradition and academic researchers agree that Vishishtadvaita existed long before Rāmānuja, but in a less organized form. Vishishtadvaita perfectly reconciles the testimony of an impersonal-monistic God with the testimony of a personal-dualistic God we both find in the Veda.

In spite of his great merit, Rāmānuja is hardly known to the western world in general and is unknown even to most sincere spiritual seekers in the western world. This is in stark contrast to the interest of the indological research. Amongst others, the Austrian Academy of Sciences has issued a seven volume series of academic books centered around Rāmānuja and his tradition.

Academic research has clearly shown that Rāmānuja’s philosophical / theological work is of the highest intellectual quality and has been an important factor in shaping the debates of Indian scholars over the centuries. One can imagine Rāmānuja’s position in the Indian intellectual history as a pivot, maybe similar to Kant in the European intellectual history. He has laid the intellectual foundations for the so called Bhakti movement, which proposed a very personal, intimate and relatively informal relation to God. Note that the direct followers of Rāmānuja do not see themselves as Bhaktas (people practicing Bhakti). The Bhakti movement was a major factor that shaped modern Hinduism, it produced dozens of offshoots over the centuries all over India. The Hare Krishna movement is probably the most prominent Bhakti group in the west.

But in contrast to European philosophers like Kant, Rāmānuja was an Āchārya, i.e. a teacher who lived what he taught at the highest standards. For while in our modern culture it is quite conceivable that someone holds lectures on ethics and at the same time deceives his wife, this would be inconceivable for an Āchārya.

Thus, Rāmānuja is an embodiment of perfection, somebody who was perfected not only in his intellect but also in all aspects of his practice. In today’s time, when so many people are spiritually searching and sadly so often filled with spiritual junk food or barely digestible fragments, perhaps even deceived or exploited, the living tradition of Rāmānuja represents a lighthouse in the fog of commerce and confusion. Rāmānuja and his successors pursue philosophy and theology at the highest intellectual level, at the same time living practice, both spiritually and in social cohesion. They are willing to hand down invaluable treasures of knowledge and practice to everybody who sincerely seeks to be a follower of Rāmānuja.

Further Reading:

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

archived in http://pillai.koyil.org

pramēyam (goal) – http://koyil.org/
pramāṇam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramāthā (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
ŚrīVaiṣṇava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers – Our Philosophy

Śrīḥ  Śrīmathē Śatakōpāya namaḥ  Śrīmathē Rāmānujāya namaḥ  Śrīmath Varavaramunayē namaḥ

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers

<< Our Practices

This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

Emergence and relation to other vedic philosophies

Our philosophy is called Vishishtadvaitam, which is commonly translated as “qualified monism”. In the testimony of the Veda and more generally in the testimony of true mystics and seers of all religions, we find both the experience of unity with God, one-ness, and the experience of duality, other-ness, in relation to God.

These seemingly contradictory testimonies have been a source of long standing debate within the Vedic tradition and too often violent persecution of “heresy” in the Abrahamic religions. Over the millennia, there have been many attempts to reconcile the two testimonies within the Vedic tradition. Unfortunately, many treatises which could shed light on the development of thought on these issues have been lost during the Muslim invasion of India, where many universities and libraries were destroyed. From the few sources that survived the destruction, we can infer that India had a very rich spiritual landscape in the first millennium C.E., with many teachers and traditions of thinking that were in constant debate and exchange of ideas.

Rāmānuja made his first appearance in this landscape with a text named Vedārtha Saṅgrahaḥ, which means “Summary of the meaning of Vedas”. The text debates the standpoints of rival schools of thinking in a very sophisticated way and, by doing this, gives a precise description of Vishishtadvaitam philosophy.

The starting point of Rāmānuja and his contemporaries is a very interesting philosophical problem: All scriptures state that God has infinite perfections. But the world we see is not perfect. So how does it relate to God? Philosophers before Rāmānuja have solved this problem either with the philosophy of Advaitam (non duality) or early variants of the Dvaitam (duality) philosphoy. The Advaitam philosophers argued that God is a monolithic entity of knowledge and perfection, but his perfection is covered by ignorance. The goal of spiritual seekers is thus to remove this ignorance in order to see that they are this monolithic entity, that they are non different from God. Dvaitam philosophers argued that the world and the living entities are strictly distinct from God, so their imperfections are nothing surprising.

Rāmānuja points out several logical inconsistencies in Advaitam philosophy, amongst others the issue that this ignorance must then be stronger than God’s perfection and knowledge, i.e. the most powerful entity in reality is not God but ignorance. If this would be really what Advaitam means, it would be both conflicting with many statements in the Veda and would produce a myriad of logical problems – like, if ignorance is so strong, how can a simple human being break it by gaining knowledge?

But also the early forms of Dvaitam were criticised by Rāmānuja as this philosophy implies irreconcilable logical problems if one also accepts God omnipresence and omniscience – which is emphasized by the Vedic scriptures.

Outline of the philosophy

Vishishtadvaitam solves the philosophical problem with the argument that God has modifications. These modifications are matter and spiritual entities, i.e the individual souls. Modification is meant in a grammatical sense. In Sanskrit, the standard language for philosophical research and debate in India for millennia, words are constructed from a root that is modified. With these modifications, a single root can create a vast number of different words and meanings. In the same way, God is the root and with modifications, he constitutes the vastness and diversity of the world as we perceive it.

The problem with this analogy from Sanskrit grammar is that, even though it is the most perfect, it is not entirely accessible to the common man of modern days. A modern but less perfect analogy is that of a computer: A computer can run a near infinite variety of computer programs. While each program seems distinct and can create certain pictures and sounds on the machine, all programs have a common base, which is the operating system in combination with the physical machine. So our relation to God is roughly comparable to the relation a computer program has to the operating system plus physical machine. We are in a certain sense distinct from God, as a computer program is distinct from the operating system and the machine, but in another sense also not distinct and totally dependent on God, as a computer program can only exist and function if operating system and machine are present. This analogy even helps to understand the role of an Āchārya. The operating system and the components of the machine offer various tools and interfaces to access its possibilities. Similarly, God’s grace and power can be accessed trough an Āchārya.

The philosophy of Vishishtadvaitam is thus perfectly able to reconcile the conflict between the two testimonies we mentioned in the beginning. Rāmānuja explained that the relation of the soul (jīvāthmā) to God is similar to the relation our body has to the jīvāthmā. So the innermost core of our jīvāthmā, our existence, is none other than God, which can produce the mystical experience of oneness. On the other hand, a jīvāthmā has “layers”, which are modifications and thus distinct from God.

The totality of existence that is unfolded by this is structured into three ontological categories (the three reals):

  • Chit – conscious entities, i.e. the jīvāthmās.
  • Achit – unconscious entities, i.e. the material of which the physical world is made of.
  • Īśvara, God – the owner and controller of Chit an Achit

Our Āchāryas have spend quite a bit of effort to analyze the relation between these entities, as this is the very basis for all practical applications of our philosophy.

So Vishishtadvaitam is philosophically sound, absolutely consistent with both the testimony of the Veda and of mystics from within and outside our religion and is applicable in daily life. We are eternally indebted to the unbroken line of our Āchāryas who formulated, refined and preserved this treasure of knowledge and insight for more than thousand years.

Further Reading:

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

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pramāṇam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
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