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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और नायनार

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै शिष्य

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ प्रवेश करते हैं। बच्चे दादी माँ को तिरुप्पावै का पाठ करते हुए देखते हैं और उसके खत्म होने तक प्रतीक्षा करते हैं। दादी ने अपना पाठ समाप्त किया और बच्चों का स्वागत किया।

दादी : स्वागत बच्चो !

व्यास : दादी, पिछली बार जब आपने कहा था कि आप वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के बेटों के बारे में बताएंगे। कृपया हमें उनके बारे में बताएं।

दादी: हाँ व्यास । आज हम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के दो महान बेटों के बारे में बात करेंगे। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था कि उनके आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) और नंपेरुमाळ की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) को दो बेटों अर्थात् पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के साथ आशीर्वाद दिया गया था। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते हैं।

नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) परमपदधाम पहुंचने के बाद, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए और आगे बढ़ते हुए अपने बेटों को उन सभी अर्थों को सीखाते है जो उन्होंने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) से सीखे थे। कुछ समय बाद वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) ने अपनी आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) के बारे में अपने आचार्य कैंकर्य करते हुए अपनी तिरुमेनी को त्याग दिया और परमपद को प्राप्त किया, जिसके बाद उनके पुत्र पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए ।

अतुळाय : दादी , मैंने सुना है कि पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे।

कत्तालागीय पेरुमाल कोयिल में कालक्षेप करते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगम

दादी: अतुळाय आपने सही सुना। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) अपने अंतिम दिनों के दौरान ज्योतिष्कुडी में, नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) को हमारे संप्रदाय के अगला आचार्य घोषित करते है और तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) को व्याख्यान सिखाने का निर्देश देते हैं।  जब तिरुमलै अलवार कांचीपुरम में देव पेरुमल जी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, तो देव पेरुमल सीधे नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) से बात करते हैं, जो उनके पास में खड़े थे और कहते हैं “जैसा कि मैंने ज्योतिष्कुडी में उल्लेख किया है कि आपको तिरुमलै अलवार को अरुळिच्चयल के सभी अर्थ सिखाना चाहिए”।

वेदवल्ली: दादी, पिल्लै लोकाचार्य ने ज्योतिष्कुडी नामक स्थान पर अपने अंतिम दिन क्यों बिताए? क्या उनका जन्म श्री रंगम में नहीं हुआ था?

दादी: पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) एक महान आचार्य थे जिन्होंने एक और सभी के लाभ के लिए आसान तमिल भाषा में अलवार पाशुरम पर सुंदर ग्रन्थ लिखे। उस समय  सभी संस्कृत या तमिल में पारंगत नहीं थे । उन लोगों के लिए जो भाषाओं से बहुत अच्छी जानकारी नहीं रखते, लेकिन फिर भी पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने हमारे पूर्वाचार्यों की कृतियों को सीखने और लाभ पाने की इच्छा रखने वालो के लिए उन्होंने बड़ी दया के साथ अपने आचार्यों से सरल और कुरकुरी भाषा में जो कुछ भी सुना, उसे प्रलेखित किया।   श्री वचन भूषण दिव्या शास्त्र उनका बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ है जिसमे हमारे संप्रदाय के अर्थों का विवरण है। इस प्रकार वह मुख्य आचार्य थे जिन्होंने प्रमाणं रक्षणं (हमारे सम्प्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा / पोषण) किया था।

पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगं

पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने न केवल हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा की, बल्कि हमारे सम्प्रदाय के मूल – श्रीरंगम के नंपेरुमाळ जी की भी।  जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे । वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । इस प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य ने नम्पेरुमाळ की सुरक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।   यदि उन्होंने और हजारों अन्य श्री वैष्णव जन, जिन्होंने अपने जीवन के  बलिदान नहीं किया होता , तो आज हम श्रीरंगम में नम्पेरुमाळ जी की पूजा और दर्शन नहीं कर पाते ।

ज्योतिष्कुडि – पिळ्ळै लोकाचार्य परमपद स्थल

पराशर : कोई आश्चर्य नहीं कि वह स्वयं देव पेरुमाळ का अवतार थे, अत्यंत बलिदान का प्रतीक !

दादी: हाँ पराशर, यही कारण है कि देव पेरुमाळ जी को ही हमारे संप्रदयाप के पेरुमाळ कहलाते है । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने केवल प्रमाण रक्षण (ग्रन्थों के रूप में हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार का संरक्षण) ही नहीं किया था, वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करके एक श्री वैष्णव का असली गुणों को प्रकशित किये | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की तरह, जो एम्पेरुमान जी की तिरुमेनि के बारे में चिंतित रहते थे और उन्होंने तिरुपल्लाण्डु गाया, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य जी ने नम्पेरुमाळ जी की अर्चा मूर्ति में एक बच्चे को देखा और पितृत्व प्रेम और देखभाल करते हुए, नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की और अपने जीवन का बलिदान किये पर मुस्लिम आक्रमणकारियों को नम्पेरुमाळ जी को नहीं लेने दिए ।  इसलिए, अगली बार जब आप पेरुमाळ मंदिर जाते हैं, तो याद रखें कि हमारे पास जो संप्रदाय है, वह आज हमारे सामने हजारों श्री वैष्णव द्वारा किए गए निस्वार्थ बलिदान द्वारा बनाया गया है। उन्होंने संप्रदाय और नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां, उनके श्रम के फल का आनंद ले सकें। हम इतने समर्थ नहीं की ऐसे श्री वैष्णव जन जिन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया उनको कुछ दे सके, सिवाय इसके की हम सभी श्री वैष्णव जन के बलिदान का स्मरण रखे और अपने सम्प्रदाय द्वारा दिए गए मूल्यों और ज्ञान को हम आगे लेकर जाये, और आने वाली पीढियों तक यह मूल्य और ज्ञान पहुंचा सके|

अतुळाय : दादी, हमें पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नयनार के बारे में अधिक बताएं।

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अळगिय मनवाळ पेरुमाळ नायनार

दादी: नायनार ने हमारे संप्रदाय के आवश्यक सिद्धांतों पर अद्भुत ग्रन्थ लिखे, जिनमे से मुख्य आचार्यहॄदयम् ग्रन्थ है । उनको आचार्य पेरियवाच्चान् पिळ्ळै जी के समान महान आचार्य माना जाता है जिनको हमारे सम्प्रदाय और दिव्य प्रभंद का गहरा ज्ञान था |  नायनार को महान आचार्य के रूप में सराहा जाता है । वह “जगत् गुरुवरानुज – पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई” के रूप में लोकप्रिय हैं। नायनार ने कम उम्र में अपनी तिरुमेनि को छोड़ने का फैसला किया और पिळ्ळै लोकाचार्य को पीछे छोड़कर परमपद को गमन किये । उनकी रचनाएँ ज्ञान रत्न के अलावा और कुछ नहीं हैं, जिसके बिना हमारे संप्रदाय के जटिल अर्थ और विवरण आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाते। मामुनि स्वामी जी नायनार स्वामीजी का महिमामंडन करते हुए कहते है कि पेरियवाच्चन पिळ्ळै स्वामीजी के बाद नायनार स्वामीजी ही है जिन्होंने अपने कामों से बहुत योगदान दिया है। जब नायनार स्वामीजी परमपदम पहुंचते है, तो पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दुःख के सागर में गिर जाते हैं और नायनार स्वामीजी के तिरुमुडी (सिर) को अपनी गोद में रखते हुए रोते हैं। वह नायनार स्वामीजी को एक असाधारण श्री वैष्णव के रूप में देखते है जिसे दुनिया ने बहुत कम समय में खो दिया है।

व्यास : दादी माँ, पिळ्ळै लोकाचार्य और नायनार का जीवन सुनने के लिए बहुत ही रोचक और भावनात्मक है।

दादी: हाँ व्यास । जब हम अपने आचार्यों और उनके जीवन के बारे में बात करना शुरू करते हैं, तो हमें समय बीतने का कभी पता नहीं चलता। बाहर अंधेरा हो रहा है। आप बच्चों को अब अपने घरों को चले जाना चाहिए। अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं आपको पिळ्ळै लोकाचार्य के शिष्यों के बारे में बताउंगी ।

बच्चे अपने-अपने घरों को वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी), पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी), अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नायनार और उनके शानदार जीवन के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-pillai-lokacharyar-and-nayanar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

अंडाल दादी रसोई घर में खाना बना रही होती है जब पराशर, वेद व्यास, वेदवल्ली और अतुळाय साथ में दादी के घर में प्रवेश करते है। दादी बच्चों की बात सुनके, बच्चों के स्वागत के लिए लिविंग रूम के अंदर आती है।

दादी : स्वागत बच्चो | अपने हाथ पावं दो लो | मंदिर का प्रसाद लीजिये | पिछली बार, हमने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में जाना | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया, आज हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों के बारे में जानेंगे | वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि उनके कुछ प्रमुख शिष्य थे |

व्यास : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कई शिष्य थे | क्या आप हमें उनके बारे में बताएंगी |

दादी : हाँ, चलो हम उनके बारे में एक एक करके जानते है | सबसे पहले हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्य जिनका नाम व्याख्यान चक्रवर्ती, पेरियवाच्चान पिळ्ळै जी के बारे में जानते है | पेरियवाच्छान पिळ्ळै, सेंगणूर मे, श्री यामुन स्वामीजी के पुत्र “श्री कृष्ण” के रूप मे अवतरित हुए और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के नाम से मशहूर हुए । नम्पिळ्ळै के प्रधान शिष्यों में से वे एक थे और उन्होंने सभी शास्त्रार्थों का अध्ययन किया । नम्पिळ्ळै के अनुग्रह से पेरियवाच्चान पिळ्ळै सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध आचार्य बने । पेरिय तिरुमोळि ७. १०. १० कहता है कि – तिरुक्कण्णमंगै एम्पेरुमान की इच्छा थी कि वे तिरुमंगै आळ्वार के पाशुरों का अर्थ उन्हीं से सुने| अतः इसी कारण, तिरुमंगै आळ्वार नम्पिळ्ळै बनके अवतार लिए और एम्पेरुमान पेरियवाच्छान पिळ्ळै का अवतार लिए ताकि अरुलिचेयळ के अर्थ सीख सके ।

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – सेंगानूर

व्यास : दादी, पेरियवाच्चान पिळ्ळै स्वामीजी को व्याख्यान चक्रवर्ती क्यों कहा जाता था ?

दादी : पेरियवाच्छान पिळ्ळै जी ही हमारे सम्प्रदाय के एक ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने अरुळिचेयळ की व्याख्या लिखी है | इनकी अरुळिचेयळ और श्री रामायण में निपुणता का प्रमाण इनसे लिखे गए पाशुरपड़ि रामायण ही है जिस में वे केवल अरुळिचेयळ के शब्द उपयोग से पूरे श्री रामायण का विवरण सरल रूप मे प्रस्तुत किया है। देखा जाये तो यह उनका काम नहीं था, कोई भी अरुळिचेयल के आंतरिक अर्थों के बारे में नहीं बोल सकता है और न ही समझ सकता है। उनका कार्य हमारे सभी पूर्वाचार्य के ग्रन्थों को समाहित करता है।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे मुख्य शिष्य जी का नाम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै था | श्री रंगम में श्री कृष्ण पादर के रूप में जन्मे, वह पूरी तरह से आचार्य निष्ठा में डूबे हुए थे। अपने आचार्य नम्पिळ्ळै की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, क्योंकि पुत्र का जन्म उसके आचार्य नम्पिळ्ळै (जिसे लोकाचार्य भी कहा जाता है) के आशीर्वाद से हुआ था। मुझे आशा है कि आप सभी को नम्पिळ्ळै के पीछे की कहानी को लोकाचार्य के नाम से याद किया जाएगा।

व्यास : हाँ, दादी | वह कंदाडै तोळप्पर ही थे जिन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी को लोकाचार्यार नाम से संभोदित किया था | हमें वह कथा स्मरण है |

वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै – काँचीपुरम

दादी : जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने अपने बेटा का नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने बच्चे के नामकरण अऴगिय मणवाळ मामुनि के अपने इरादे का खुलासा किया | जल्द ही, नंपेरुमळ, एक और बेटे के साथ वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को आशीर्वाद देते हैं और दूसरे बेटे का नाम अऴगिय मणवाळ मामुनि पेरुमल नायराज रखा गया क्योंकि वह अऴगिय मणवाळ मामुनि (नामपेरुमल) की कृपा से पैदा हुए थे, जिससे नम्पिळ्ळै की इच्छा पूरी हुई। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते है | वे दोनों एक ही समय में हमारे संप्रदाय के महान आचार्य जैसे कि नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, पिल्लई, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, आदि का आशीर्वाद और मार्गदर्शन पा रहे थे।

एक बार, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने तिरुमालीगई (श्री वैष्णव के घरों को तिरुमालीगई कहते है ) के लिए तदीयराधन के लिए नम्पिळ्ळै स्वामीजी को आमंत्रित किया और नम्पिळ्ळै ने स्वीकार किया और उनके तिरुमालीगई में गए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी खुद तिरुअराधनम की शुरुआत करते हैं और कोयल आळ्वार (पेरुमल सानिधि) में, नम्माळवार स्वामीजी की पाशुरम के सभी उपदेशों और व्याख्यानों को बड़ी सुंदरता एवं सरल अर्थो में ताड़ के पत्तों के गुच्छो में देखते हैं। रूचि होने के कारण, वह उनमें से कुछ को पढ़ना शुरू कर देता है और वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी से पूछते है कि वह क्या था। वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी बताते है कि हर रात, उनकी बात सुनने के बाद उन्होंने नम्पिल्लई के व्याख्यान को रिकॉर्ड किया। नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी से पूछते हैं कि उन्होंने उनकी अनुमति के बिना ऐसा क्यों किया और पूछते हैं कि क्या उन्होंने पेरियवाच्चान पिळ्ळै व्याख्यानम (आळ्वार पाशुरम के अर्थों का विस्तृत विवरण) के साथ प्रतियोगिता के रूप में यह सब किया । वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी दोषी महसूस करते है और तुरंत नम्पिल्लई स्वामीजी के चरण कमलो में गिर जाते है और बताते है कि उन्होंने इसे केवल भविष्य में संदर्भित करने के लिए लिखा था। उनकी व्याख्याओं से सहमत होकर, नम्पिल्लई स्वामीजी ने विद्यानम का महिमामंडन किया और अपने काम के लिए वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी की प्रशंसा की। ऐसा विशाल ज्ञान और आचार्य अभिमान था वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी का ।

पराशर : उस व्याख्यान का क्या हुआ ? क्या वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी उसको पूर्ण कर पाए ?

दादी : हाँ, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने उसको पूर्ण किया और तिरुवायमोली का यह व्याख्यान को प्रसिद्ध ईडु ३६००० पड़ी से संबोध्दित करते है | नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है यह व्याख्यान ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी को प्रधान करे जो की वह अपने वंशजों को उपदेश कर सके |

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – ईयुण्णि माधव पेरुमाळ द्वितीय पंक्ति में

वेदवल्ली : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी द्वारा दिया गए व्याख्यान को ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी ने क्या किया ?

दादी : ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् अपने पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् को यह सिखाते हैं। ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का जन्म नक्षत्र स्वाति है । ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् इसे अपने प्रिय शिष्य नालूर् पिळ्ळै को सिखाते हैं।  इस तरह इसे एक आचार्य से उचित तरीके से अपने शिष्य के पास सिखाया जाता रहा | नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, नालूर् पिळ्ळै के पुत्र और प्रिय शिष्य थे। उनका जन्म धनु-भरणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें देवाराज आच्चान् पिळ्ळै, देवेसर, देवादिपर और मैनाडू आच्चान् पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने 36000 पद ईदू का अध्ययन अपने पिताश्री के चरण कमलों के सानिध्य में किया था। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी के बहुत शिष्य थे, उनके शिष्यों में से एक थे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै स्वामीजी । नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै भी कांचीपुरम पहुँचते हैं। वे सभी देव पेरुमाल के समक्ष एक दूसरे से मिलते हैं। उस समय देव पेरुमाल, अर्चकर के माध्यम से बात करके, बताते हैं कि पिळ्ळै लोकाचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं और नालूर् पिळ्ळै को आदेश करते हैं कि वे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै को ईडु व्याख्यान का उपदेश दें। परंतु नालूर् पिळ्ळै देव पेरुमाल से पूछते हैं कि क्या वे ठीक तरह से उन्हें उपदेश कर पाएंगे (अपनी अधिक उम्र की वजह से)? इस पर देव पेरुमाल कहते हैं “तब आपके पुत्र (नालूर् आच्चान् पिळ्ळै) उन्हें उपदेश कर सकते हैं। उनका उपदेश करना आपके उपदेश करने के समान ही है”। इस तरह से तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै अन्य श्री वैष्णवों के साथ नालूर् आच्चान् पिळ्ळै से ईदू व्याख्यान का अध्ययन करते हैं और कालांतर में आलवार तिरुनगरी लौटकर उसे मणवाल मामुनिगल को सिखाते हैं, जो ईत्तू पेरुक्कर (जिन्होंने ईदू व्यख्यान का पोषण किया) के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस तरह नम्पिळ्ळै स्वामीजी जानते थे की ईडु व्याख्यान हस्तांतरित होते हुए मणवाल-मामुनि तक पहुंचा और इसीलिए उन्होंने इसे ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् स्वामीजी को दिया ।

अतुळाय : दादी, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् एवं ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् में ईयुण्णि शब्द का क्या अभिप्राय है ?

दादी : तमिळ में “ईथल” का अर्थ है परोपकार । “उन्नुथल” का अर्थ है भोजन करना । ईयुण्णि का अर्थ है – वह जो बड़े परोपकारी है, जो अन्य श्री वैष्णवों को भोजन कराने पर ही स्वयं भोजन करता है ।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे प्रमुख शिष्य पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी थे | जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की | ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है | पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्यारे शिष्यों में थे इसीलिए उनको पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् कहा जाता था | उन्होंने अपना जीवन आचार्यो के प्रति बहुत सम्मान प्रतिष्ठा के साथ एक सत्य श्री वैष्णव की तरह जिये | उनका आचार्य अभिमान बहुत ही प्रसिद्व है |

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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् – नम्पिळ्ळै के चरण कमलों में

पराशर: दादी, आज अपने नम्पिळ्ळै स्वामीजी और उनके शिष्यों के बीच हुई बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताया | कृपया उनके बीच हुई कुछ रोचक बातचीत बताएं।

दादी : हमारे सभी पूर्व आचार्यो ने भगवत् विषयम और भागवत् कैंकर्यं संबंधी को ही प्रकाशित किया | एक बार जब पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् बीमार थे, तो वह अन्य श्री वैष्णव से पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के शीघ्र स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहते हैं। आम तौर पर हमारे संप्रदाय में, श्री वैष्णव को किसी भी चीज़ के लिए भगवान् जी से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए – यहाँ तक कि बीमारी से उबरने के लिए भी नहीं । यह देखकर, नम्पिळ्ळै के शिष्यों ने इसके बारे में नम्पिळ्ळै से पूछ ताछ की। नम्पिळ्ळै पहले कहते हैं, ” आप एंगल अलवान स्वामीजी के पास जाओ और उनसे पूछो जो सभी शास्त्रों के विशेषज्ञ है | एंगळ अळवान स्वामीजी ने उत्तर दिया “वह श्री रंगम से जुड़ा हो सकते है और वह कुछ और समय के लिए यहां रहना चाहता है”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तब अपने शिष्यों से अममांगी अम्माल से यह पूछने के लिए कहा कि “कौन होगा जो नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कालक्षेपं को छोड़ना चाहता है, वह प्रार्थना कर रहे होंगे ताकि वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कालक्षेपं को सुन सके”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी अंत में खुद जीयर स्वामीजी से पूछते है। जीयर स्वामीजी जवाब देते है, “यद्यपि आप वास्तविक कारण जानते हैं, फिर भी आप चाहते हैं कि यह मेरे द्वारा प्रकट हो। चलिए में कहता हूँ की मैं यहां क्यों रहना चाहता हूं। प्रतिदिन, आप स्नान करने के बाद, मुझे आपके रूप के दिव्य दर्शन प्राप्त होते है और पंखा आदि लगाकर आपकी सेवा करने का अवसर मिलता है। मैं उस सेवा को कैसे छोड़ सकता हूं और अभी कैसे परमधाम जा सकता हूं? ”। इस प्रकार, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शिष्य के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते है और कहते है की एक शिष्य , स्वयं के आचार्य के दिव्य रूप में पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए | यह सब सुनकर शिष्यों को जीयर स्वामीजी की नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति भक्ति देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ। पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् को नम्पिळ्ळै स्वामीजी से इतना लगाव था कि वह परमपद पर जाने का विचार भी त्याग देते थे । पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के आचार्य में गहरी निष्ठा थी |

अंत में, हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के एक और शिष्य के बारे में देखते हैं जिनका नाम
नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् | प्रारंभ में, नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् स्वामीजी का नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति अनुकूल रवैया नहीं था। अपनी समृद्ध पारिवारिक विरासत (कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) और पराशर भट्टर के परिवार में आने के कारण) उनको अभिमान हो गया था और नम्पिळ्ळै स्वामीजी का सम्मान नहीं करते थे । एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है कि कैसे उन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलो में शरणागति की ।

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् तृतीय पंक्ति में

व्यास : यह कैसी विडंबना है कि कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के वंशज में गर्व और अहंकार के गुण थे। दादी हमें कहानी बताओ!

दादी : हाँ, लेकिन अनचाहा गर्व लंबे समय तक नहीं रहता ! सब के बाद, वह कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के ही पोते थे ! एक बार, नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) राजा के दरबार में जा रहे थे । वह रास्ते में पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से मिलते है और उन्हें राजा के दरबार में जाने के लिए आमंत्रित करते है। राजा उनका स्वागत करता है, उनका सम्मान करता है और उन्हें एक अच्छा पद बैठने के लिए प्रदान करता है। अच्छी तरह से सीखा हुआ राजा को नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) की बुद्धि का परीक्षण करना चाहते हैं, वह उनसे श्रीरामायण के बारे में सवाल पूछते हैं। श्री राम स्वयं कहते हैं कि वह सिर्फ एक इंसान हैं और राजा दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। लेकिन जटायु के अंतिम क्षणों के दौरान, श्री राम जी उनको वैकुण्ठ तक पहुँचने का आशीर्वाद दिया।  अगर वह एक सामान्य इंसान थे , तो वह किसी को वैकुंठ तक पहुंचने के लिए कैसे आशीर्वाद दे सकते है? ”। भट्टर स्वामी जी अवाक थे और किसी भी सार्थक स्पष्टीकरण के साथ प्रतिक्रिया नहीं दिए । संयोग से, राजा का ध्यान किसी अन्य कार्य में चला जाता है। उस समय, भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तरफ देखकर कहते है की नम्पिळ्ळै स्वामीजी ही आपको यह प्रकाशित करेंगे की कैसे एक सत्यवान पुरष पुरे विश्व को वश में कर सकता है | भट्टर स्वामीजी राजा को उस समय समझाते है कि जब राजा उन पर ध्यान केंद्रित करता है। राजा, एक बार उत्तर सुनकर सहमत हो जाता है और भट्टार को बहुत धन के साथ सम्मानित करता है। भट्टर स्वामी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति के प्रति महान कृतज्ञता दर्शाते हुए कहते है वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तिरुमोळि में जाते है और जो धन उनको राजा से मिला है उसको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के श्री चरणों में समर्पित करते है | भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी को यह कहते है की मुझे आपकी शिक्षाओं में से सिर्फ एक छोटी सी व्याख्या करने से ये सारी दौलत मिली। सभी के साथ, मैंने आप के मूल्यवान संघ / मार्गदर्शन को खो दिया है। अब से, मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि मैं आपकी अच्छी तरह से सेवा करूँ और आपसे संप्रदाय के सिद्धांत सीखूँ। ” नम्पिळ्ळै स्वामीजी भट्टर स्वामी जी को आलिंगन करते है और उन्हें हमारे संप्रदाय के सभी सार सिखाते हैं। तो बच्चों, आप इस कहानी से क्या सीखते हैं?

वेदवल्ली : मैंने अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से यह सीखा है, पराशर भट्टर स्वामीजी सही गंतव्य पर पहुंच गए।

अतुल्हे : मैंने नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामीजी) की महानता और उनके ज्ञान के बारे में सीखा।

दादी: तुम दोनों सही हो। लेकिन एक और सबक है जो हम इस कहानी से सीखते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि श्रीमन्न नारायण भगवानजी हमें तभी स्वीकार करते है जब हम अपने आचार्यों के माध्यम से उनसे संपर्क करते हैं, और आचार्य तक पहुंचना हो तो श्री वैष्णव जन के साथ दिव्य सम्बन्ध होना चाहिए | इसी को हम श्री वैष्णव सम्बन्ध या अडियरगळ सम्बन्ध कहते हैं। यहाँ, ऐसा कौन श्री वैष्णव होगा जिन्होंने पराशर भट्टर को नम्पिळ्ळै से जोड़ा था?

दादी: हाँ! इससे हमें भागवत सम्बन्ध का महत्व पता चलता है।  जीयर स्वामीजी, नम्पिल्लई के प्रिय शिष्य होने के नाते, आचार्य ज्ञान (प्राप्ति) और संबंध के साथ भट्टार को आशीर्वाद दिया। आइए हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलों और उनकी साधनाओं पर ध्यान दें।

बच्चे विभिन्न आचार्यों और उनकी दिव्य सेवाओं की महानता के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्री पराशर भट्टर्

पराशर, व्यास वेदवल्ली और अतुलाय के साथ अण्डाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु : स्वागत बच्चो | आज हम अगले आचार्य जी जिनका नाम नन्जीयर् स्वामीजी है जो भट्टर स्वामीजी के शिष्य थे उनके बारे में जानेंगे | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया था की नन्जीयर् स्वामीजी जिनका जन्म श्रीमाधवार जी के रूप में हुआ उनको सम्प्रदाय में रामानुज स्वामीजी की दिव्या आज्ञा के अनुसार पराशर भट्टर स्वामीजी सम्प्रदाय में लेकर आये थे | हमनें देखा कैसे भट्टर स्वामीजी पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए | वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

व्यास : दादी, अगर रामानुज स्वामी जी और भट्टर स्वामी जी जैसे आचार्य दूसरे सम्प्रदाय को मानाने वाले जैसे यादव प्रकाश (जो बाद में गोविन्द जीयर बने), गोविंदा पेरुमल ( जो एम्बार स्वामी जी कहलाएं), यज्ञ मूर्ति ( जो अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति) कहलायें) और माधवर (जो नन्जीयर स्वामीजी कहलाये), उन्होंने शैव मत के राजाओं को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की जिनके कारण उनको कठिनाईओं का सामना करना पड़ा? वह शैव राजाओं से दूर क्यों रहे ?

दादी : व्यास हमारे पूर्व आचार्य जानते थे की किसको सुधारा जा सकता है किसको नहीं? उक्त आचार्य के मामले में, एक बार जब वे जानते थे कि प्रतिद्वंद्वी सही था, तो उन्होंने गरिमा के साथ हार स्वीकार कर ली और न केवल उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उन्होंने पेरिय तिरुमलई नम्बि, रामानुज स्वामी और श्री भट्टर स्वामी जी के चरण कमलो में समर्पण कर दिए और श्री वैष्णव संप्रदाय स्वीकार किये | हालाँकि, शैव राजा न तो एक उचित तर्क के लिए तैयार थे और न ही उन्होंने हार मानने के लिए पर्याप्त सम्मान दिया और श्रीमान नारायण की सर्वोच्चता के शाश्वत सत्य को महसूस किया | जैसा कि पुरानी कहावत है, “केवल जो सो रहा है उसे जगाना संभव है, जो सोने का बहाना कर रहा है उसे जगाना असंभव है”। हमारे पूर्वाचार्य जानते थे कि वास्तव में कौन सो रहा था और कौन केवल दिखावा कर रहा था। इसलिए उनके फैसले अलग-अलग थे। इसके अलावा, ऐसे व्यक्तियों के दोषों के बावजूद, हमारे पूर्वाचार्यों ने भी उनकी मदद करने के लिए वास्तव में प्रयास किया है, लेकिन बाद में दूसरी तरफ से बहुत अधिक प्रतिरोध छोड़ दिया।

पराशर : दादी, माधवार स्वामीजी को नन्जीयर नाम कैसे मिला |?

दादी : भट्टर स्वामी ने माधवर स्वामी को शास्त्रार्थ में पराजित किये और श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा – माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए । श्रीभट्टर स्वामी जी के चले जाने के बाद, माधवर को अपने फैसले से कोई समर्थन नहीं मिला। श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धन–संपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है – संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्य–भक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर “नम्–जीयर” से सम्भोधित करते है और तबसे नम्–जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए । भट्टर और नन्जीयर् आचार्य–शिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर् सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । उनकी आचार्य भक्ति की कोई सीमा नहीं थी | नन्जीयर् कहते थे – वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुःख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयर् को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर् – तिरुनारायणपुरं

अतुलाय : दादी, हमें नन्जीयर् स्वामीजी जी की भक्ति के बारे में कुछ कथा बताये ?

दादी : एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर् अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर् से कहे की नन्जीयर् आपको यह सन्यासाश्रम उचित नहीं लगता, आपको मुझे नहीं उठाना चाहिए | नन्जीयर् स्वामीजी कहते है अगर मेरा त्रिदण्डं मेरे कैंकर्य में रूकावट बन रहा है तो में इसे तोड़ देता हूँ और अपना सन्यासाश्रम छोड़ देता हूँ |

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर् से शिकायत किए । नन्जीयर् ने कहा – यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर् के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर् स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

वेदवल्ली : अभी जो वार्तालाप हुआ क्या आपको पसंद आया ?

दादी (मुस्कुराते हुए ) : हाँ, हमारी चर्चा पसंद आयी लेकिन बहुत रोचक चर्चा थी |

एक बारे नन्जीयर स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा – क्यों सारे आळ्वार भगवान श्री–कृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है – जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभी–अभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।

एक और बार नन्जीयर् स्वामी जी भट्टर स्वामीजी से पूछते है की राजा महाबली पाताल लोक में क्यों गए और उनके गुरु शुक्राचार्य जी की आँख कैसे खो गयी ?
भट्टर स्वामीजी कहते है जब उनके गुरु शुक्राचार्य जी राजा महाबली को उनका बचन पूर्ण करने के लिए रोकते है जो उन्होंने उस समय वामन भगवान जी से किया था, उसी कारण उनकी आँख चली गयी और जैसे राजा महाबली ने अपने आचार्य की आज्ञा नहीं मानी इसीलिए उन्हें पाताल लोक जाने का दंड मिला | इसलिए, यहाँ, भट्टर स्वामीजी इस बात पर जोर देते हैं कि किसी के अपने आचार्य का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। उनके बीच कई ऐसी दिलचस्प बातचीत हुई। इन वार्तालापों ने नन्जीयर् को उनके लिखित कार्यों में भी मदद की।

एक दिन नन्जीयर् स्वामीजी चाहते थे उनके लिखे हुए काम की प्रतियां बनायीं जाये और अपने शिष्यों से पूछा की कौन इस कैंकर्य को करने योग्य है | नम्बुर वरदराजार स्वामीजी का नाम प्रस्तावित किया | नन्जीयर् स्वामीजी ने पहले सम्पूर्ण तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान का कालक्षेप वरदराज स्वामीजी को दिए और फिर उन्हें व्याख्यान की मूल प्रति प्रधान की | वरदराज स्वामीजी ने निर्णय लिए की वह अपने मूल ग्राम जो कावेरी नदी की किनारे पड़ता था वहां जाकर लेखन पर ध्यान केंद्रित कर सके और इसे जल्दी से समाप्त कर सके । नदी पर करते समय अकस्मात बाढ़ आ गयी और वरधराजर स्वामीजी तैरने लगे । ऐसा करते समय, मूल ग्रन्थम उसके हाथ से फिसल जाता है और वह तबाह हो जाता है। अपने मूल स्थान पर पहुंचने के बाद, वह अपने अचर्यन और उसके द्वारा दिए गए अर्थों पर ध्यान देते है और तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान को फिर से लिखना शुरू करते है। चूंकि वे तमिल भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ थे, इसलिए जहाँ भी उनको लगता, अच्छे अर्थ जोड़ते हैं और जब अंत में नन्जीयर् स्वामीजी के पास वापस लौटते हैं तो उनको हस्त लिखित ग्रन्थ प्रस्तुत करते हैं। नन्जीयर् स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान देखकर समझ जाते है कि मूल ग्रन्थ से कुछ परिवर्तन हुआ है , और पूछते है यह कैसे हुआ ? वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वाला प्रतिनिधि होगा । नन्जीयर् स्वामीजी ने भी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की महिमा का गुणगान किये जब नम्पिळ्ळै स्वामीजी नन्जीयर स्वामीजी से बहुत सुन्दर बेहतर स्पष्टीकरण देते है तो नन्जीयर् स्वामीजी प्रसन्न होते है | यह नन्जीयर् स्वामीजी की महिमा को प्रकाशित करता है | भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर् ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर् की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

व्यास : दादी, हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में बताइये |

दादी : में आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में और उनकी महिमा की बारे में कल बताउंगी | अभी देरी हो रही है | अभी आपको घर चाहिए |

बच्चे भट्टर स्वामीजी, नन्जीयर् स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में चिंतन करते हुए घर जाते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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బాల పాఠము – వేదాంతాచార్య

శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః

శ్రీ వైష్ణవం – బాల పాఠము

<< పిళ్ళై లోకాచార్య శిష్యులు

ఆండాళ్ నాన్నమ్మ ఇంట్లో పువ్వులు అల్లుతూ గుడి వైపు అటూ ఇటూ నడుస్తున్న వాళ్ళని చూస్తున్నారు. ఆమె తన ఇంటి వైపు పరిగెత్తుకుంటూ వస్తున్న పిల్లలను చూసి చిరునవ్వు నవ్వుకుంది. అల్లిన పూలమాలను ఆమె పెరియ పెరుమాళ్ మరియు తయార్ చిత్ర పఠానికి అలంకరించి తరువాత వాళ్ళని స్వాగతించింది.

నాన్నమ్మ : పిల్లలలూ రండి. ఈ రోజు ఎవరి గురించి చర్చించబోతున్నామో మీకు తెలుసా?

పిల్లలందరు ఒకేసారి : వేదాంతాచార్య

నాన్నమ్మ : అవును. ఆ పేరు వారికి ఎవరు పెట్టారో మీకు తెలుసా?

వ్యాస : పెరియ పెరుమాళ్ వారికి వేదాంతాచార్య అని పేరు పెట్టారు. అవునా
నాన్నమ్మ?

నాన్నమ్మ : అవును, వ్యాస. వారికి పుట్టుకతో పుట్టిన పేరు వెంకటనాథన్. వారు కంచీపురంలో ఒక దివ్య దంపతులైన అనంతసూరి మరియు తోతారంబైలకు జన్మించారు.

పరాశర : నాన్నమ్మ, వారు మన సాంప్రదాయంలోకి ఎలా వచ్చారో మాకు మరింత చెప్పండి.

నాన్నమ్మ : ఖచ్చితంగా, పరాశర. నడాదూర్ అమ్మాళ్ యొక్క కాలక్షేప గోష్టిలో కిడాంబి అప్పుళ్ళార్ అనే పేరుతో ఒక ప్రముఖ శ్రీవిష్ణవుడు ఉండేవారు. చిన్నప్పుడు వేదాంతాచార్యులు వారి మేనమామ (కిడాంబి అప్పుళ్ళార్)తో పాటు శ్రీ నడాదూర్ అమ్మాళ్ యొక్క కాలక్షేప గోష్టికి వెళ్లారు. ఆ సమయంలో శ్రీ నడాదూర్ అమ్మాళ్ వారిని అన్ని అడ్డంకులను ఛేదించి విశిష్టాద్వైత శ్రీవిష్ణవ సిద్దాంతాన్ని స్థిరపరుస్తారని ఆశీర్వదిస్తారు.

అత్తుళాయ్ : ఓహ్! వారి ఆశీర్వాదం నిజమైంది!

నాన్నమ్మ చిరునవ్వుతో: అవును, అత్తుళాయ్ . పెద్దల ఆశీర్వాదాలు నెరవేరకుండా ఉండవు.

వేదవల్లి: వారు తిరువెంకటేశ్వరస్వామి వారి పవిత్ర గంట అవతారం అని నేను విన్నాను. అవునా
నాన్నమ్మ ?

నాన్నమ్మ : అవును. వారు సంస్కృతం, తమిళ్ మరియు మణిప్రవళంలో వందకు పైగా గ్రంథాలు వ్రాశారు.

వ్యాస: ఓ! వందనా?

నాన్నమ్మ : అవును, వాటిలో ముఖ్యమైనవి తాత్పర్య చంద్రిక (శ్రీ భగవత్ గీతపై వ్యాఖ్యానం), తత్వతీకై, న్యాయ సిద్జాంజనం, శత ధూశని ఇంకా అహార నియమం (ఆహార అలవాట్లపై వ్యాఖ్యానం) ఉన్నాయి.

పరాశర : నాన్నమ్మ, ఆశ్చర్యంగా ఉంది. ఒకే వ్యక్తి ఎలా ఆహార అలవాట్లపై వ్యాఖ్యానం లాంటి ప్రాథమిక గ్రంథాలు రాసి మరియు అదే సమయంలో క్లిష్టమైన తాత్విక వ్యాఖ్యానాలు కూడా ఎలా రాసారూ అని.

నాన్నమ్మ : మన పూర్వాచార్యుల జ్ఞానం లోతు మహాసముద్రం లాంటిది, పరాశర! ఆశ్చర్యపోనవసరం లేదు, వారికి మన తాయార్ (శ్రీ రంగనాచియార్) ‘సర్వ-తంత్ర-స్వతంత్ర’ (అన్ని కళల నైపుణ్యం) అని బిరుదునిచ్చారు.

అత్తుళాయ్ : మాకు ఇంకా చెప్పండి, నాన్నమ్మ. వారి గురించి ఇంకా వినాలని ఉంది.

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అవతార ఉత్సవంలో కాంచి తూప్పుళ్ వేదాంతాచార్య

నాన్నమ్మ: వేదాంతాచార్యులను ‘కవితార్కిక కేసరి’ (కవులలోకి సింహం) అని కూడా పిలుస్తారు. వారు ఒకసారి కృష్ణమిశ్ర అనే ఒక అధ్వైతితో 18 రోజుల పాటు సుదీర్ఘ చర్చ చేసి గెలిచారు. వారు ఒక వ్యర్థ కవి సవాలు చేస్తే ‘పాదుకా సహస్రం’ ను రచించారు. ఇది శ్రీ రంగనాథుని దివ్య పాదుకలను ప్రశంసిస్తూ వ్రాసిన 1008 పద్యాల కవిత.

వేదవల్లి: చాలా బాగుంది! ఇన్ని నైపుణ్యాలు ఉన్నప్పటికీ ఇంత నమ్రత కలిగిన గొప్ప ఆచార్యులు మన సాంప్రదాయంలో ఉండటం నిజంగా మన అదృష్టం.

నాన్నమ్మ : బాగా చెప్పావు వేదవల్లి. వేదాంత దేశికులు మరియు అనేక ఇతర సమకాలీన ఆచార్యులు పరస్పర ప్రేమ మరియు గౌరవం కలిగి ఉండేవారు. తన అభితిస్తవంలో, వారు శ్రీ రంగనాథుని “ఓ భగవాన్! పరస్పర శ్రేయోభిలాషులైన గొప్ప భాగవతుల చరణాల వద్ద శ్రీరంగం లోనే నివసిస్తాను అని అడుగుతారు “. మణవాళ మామునులు, ఎఱుంబి అప్పా, వాధికేసరి అళగీయ మణవాళ జీయర్, చోళసింహపురం (షోలింగర్) దొడ్డాచార్య వారి రచనలలో వేదాంత దేశికుల గ్రంథాలను ఉదాహరించారు. వేదాంత దేశికులు, పిళ్ళై లోకాచార్యులను గొప్పగా ప్రశంసించే వారు. వీరు పిళ్ళై లోకాచార్యుల గురించి “లోకాచార్య పంచాసత్” అని పిలువబడే గ్రంథం రచించారు. ఈ గ్రంథం తిరునారాయణపురం (మేల్కోటె, కర్ణాటక) లో క్రమం తప్పకుండా రొజూ పఠిస్తారు.

పరాశర : వేదాంతాచార్యులు శ్రీ రామానుజాచార్యుల సంభంధం ఎలాంటిది?

నాన్నమ్మ : వేదాంతాచార్యులకు శ్రీ రామానుజాచార్యుల పట్ల భక్తి చాలా ప్రసిద్ధమైనది; వారి ‘న్యాస తిలకా’ అనే గ్రంధంలో ‘ఉక్త్య ధనంజయ…’ అను పద్యంతో, శ్రీ రామానుజ సంభంధం వల్ల మోక్షం ఖాయమని పరోక్షంగా చెప్పిన పెరిమాళ్ ని పసన్న పరుస్తారు.

వ్యాస : మన ఆచార్యుల గురించి తెలుసుకోవడానికి చాలా ఉంది, నాన్నమ్మ !


నాన్నమ్మ : అవును, వేదాంతాచార్య విజయ ని ‘ఆచార్య – చంపు’ అని కూడా పిలుస్తారు. వేదాంత దేశికుల జీవితం మరియు రచనల క్లుప్తమైన సంగ్రహాన్ని సంస్కృతంలో గద్య మరియు పద్య రూపంలో గొప్ప పండితుడైన ‘కౌశిక కవితార్కికసింహ వేదాంతాచార్య’ (సుమారు 1717 లో నివసించిన గొప్ప పండితుడు) రచించారు.

అత్తుళాయ్ : ఓహ్, బాగుంది! నాన్నమ్మ, ఈరోజు మనం వేదాంతాచార్యుల సంస్కృతం మరియు తమిళంలోని సాహిత్య నైపుణ్యము మరియు వారి భక్తిలో వినయం నేర్చుకున్నాము. వారి గొప్పతనాన్ని అనుసరించడం నిజంగా మన అదృష్టం.

నాన్నమ్మ : అవును, పిల్లలు. ఇలాంటి గొప్ప పుణ్యాత్ములను ఎల్లప్పుడూ గుర్తుంచుకోవాలి! రేపు మళ్లీ కలుద్దాం. మీరు ఇంటికి వెళ్ళే సమయం అయ్యింది.

పిల్లలందరు ఒకేసారి: నాన్నమ్మ ధన్యవాదాలు.

మూలము : http://pillai.koyil.org/index.php/2019/02/beginners-guide-vedhanthacharyar/

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ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – வேதாந்தாசார்யர்

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

<< பிள்ளை லோகாசார்யரின் சிஷ்யர்கள்

ஆண்டாள் பாட்டி ஒரு மாலை கட்டிக் கொண்டே தன் வீட்டு ஜன்னலின் வழியே வெளியே கோயிலுக்கு நடந்து செல்லும் பக்தர்களைப் பார்த்துக் கொண்டிருந்தாள். எப்பொழுதும் தன்னை பார்க்க வரும் குழந்தைகள், தன் வீட்டை நோக்கி ஓடி வருவதைப் பார்த்து தனக்குள் சிரித்துக் கொண்டாள். தன் கையிலிருந்த மாலையை பெரிய பெருமாளுக்கும் தாயாருக்கும் சாற்றி விட்டு அவர்களை வரவேற்றாள்.

பாட்டி: வாருங்கள் குழந்தைகளே! இன்றைக்கு யாரைப்பற்றித் தெரிந்துகொள்ளப் போகிறோம் தெரியுமா?

குழந்தைகள் எல்லோரும்: வேதாந்தாசார்யர்.

பாட்டி: யார் அவருக்கு அந்த பெயரை இட்டார்கள் தெரியுமா?

வ்யாசன்: பெரிய பெருமாள் தான் அவருக்கு அந்தப் பெயரை இட்டார். சரி தானே பாட்டி?

பாட்டி: சரியாகச் சொன்னாய் வ்யாசா. அவரது இயற்பெயர் வேங்கடநாதன். அனந்தசூரி தோத்தாரம்பை என்ற திவ்யதம்பதிக்கு காஞ்சிபுரத்தில் பிறந்தவர் அவர்.

பராசரன்: அவர் சம்பிரதாயத்தில் ஈடுபடத் தொடங்கியது பற்றிச் சொல்லுங்கள், பாட்டி

பாட்டி: நடாதூர் அம்மாளின் காலக்ஷேப கோஷ்டியில் கிடாம்பி அப்புள்ளார் என்ற சிறந்த ஸ்ரீவைஷ்ணவர் இருந்தார். வேதாந்தாசார்யாரை, சிறு வயதிலேயே அவரது தாய்மாமனான கிடாம்பி அப்புள்ளா ர் காலக்ஷேப கோஷ்டிக்கு அழைத்துச்சென்றார். ஸ்ரீ நடாதூர் அம்மாள் அவரை, மற்ற சித்தாந்தங்களை வென்று, விஷிஷ்டாத்வைத ஸ்ரீவைஷ்ணவ சித்தாந்தத்தை, உறுதியாக நிலைநாட்டுவார் என்று ஆசீர்வதித்து இருந்தார்.

அத்துழாய்: அவரது ஆசீர்வாதம் உண்மையாயிற்றே !

பாட்டி (புன்னகையுடன்): பெரியோர்களின் ஆசீர்வாதம் என்றைக்கும் பொய்க்காது, அத்துழாய்!

வேதவல்லி: அவர் திருவேங்கடமுடையானின் திருமணியின் அம்சம் என்று கேள்விப்பட்டிருக்கிறேன். உண்மை தானே, பாட்டி ?

பாட்டி: ஆம், நீ சொல்வது சரி தான். அவர் ஸம்ஸ்க்ருதத்திலும், தமிழிலும், மணிப்ரவாளத்திலும் நூறுக்கும் மேற்பட்ட க்ரந்தங்களை எழுதி இருக்கிறார்.

வ்யாசன்: ஆ, நூறா?

பாட்டி: ஆம். அவற்றுள் சில – தாத்பர்ய சந்த்ரிகை (ஸ்ரீமத் பகவத் கீதையின் மேலான பாஷ்யம்), தத்வடீகை, ந்யாயஸித்தாஞ்சனம், சததூஷணி, ஆஹாரநியமம் ஆகியன.

பராசரன்: பாட்டி, ஒருவராலேயே எப்படி கடினமான தத்துவ விஷயங்களைப் பற்றியும் அடிப்படை ஆஹாரநியமங்களைப் பற்றியும் ஒரு சேர எழுத முடிகிறது என்று எண்ண எனக்கு வியப்பாக இருக்கிறது.

பாட்டி: நமது பூர்வாசார்யர்களின் ஞானம் கடலளவு ஆழமானதாக இருந்தது, பராசரா ! அவருக்கு ” ஸர்வதந்த்ர ஸ்வதந்த்ரர்” (அனைத்து கலைகளையும் கற்றுத் தேர்ந்தவர்) என்ற பெயரை நம் தாயாரே (ஸ்ரீ ரங்கநாச்சியார்) சூட்டி இருக்கிறாள் என்றால் அவரது ஞானம் எப்படி இருந்திருக்க வேண்டும் என்று புரிந்துகொள்ள வேண்டும்.

அத்துழாய்: மேலும் சொல்லுங்கள் பாட்டி, அவரைப் பற்றிய தகவல்களெல்லாம் கேட்பதற்கு சுவையாக இருக்கிறது.

பாட்டி: வேதாந்தாசார்யருக்கு “கவிதார்க்கிக கேசரி” (கவிகளுக்குள்ளே சிங்கம் போன்றவர் ) என்ற பெயரும் உண்டு. ஒரு சமயம் அவர் க்ருஷ்ணமிச்ரர் என்ற அத்வைதியுடன் 18 நாட்களுக்கு வாதப்போர் புரிந்தார். வேதாந்தசார்யார் ‘பாதுகா ஸஹஸ்ரம்’ என்ற க்ரந்தத்தையும் எழுதினார், ஒரு ஆணவப் பண்டிதனின் சவாலுக்கு பதிலளிக்க. நம்பெருமாளின் திவ்யபாதுகைகளைப் பற்றிய 1008 வரிகள் கொண்ட க்ரந்தமாகும் இது.

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kAnchi thUppuL vEdAnthAchAryar during avathAra uthsavam

வேதவல்லி: உண்மையாகவே பாராட்டுக்குரியது தான்! இவரைப் போன்ற உயர்ந்த ஆசார்யர்கள் இத்தகைய உயர்ந்த சாதனைகளை புரிந்திருந்த போதும், அடக்கத்துடன் இருந்திருக்கின்றனரே!

பாட்டி: அழகாய்ச் சொன்னாய் வேதவல்லி. வேதாந்த தேசிகனும் மற்ற ஆசார்யர்களும் பரஸ்பரம் மிகுந்த அன்புடனும் மரியாதையுடனும் பழகிக்கொண்டனர். அவருடைய அபீதிஸ்தவத்தில், அவர் நம்பெருமாளிடம் “எம்பெருமானே, நான் ஸ்ரீரங்கத்தில் பரஸ்பர நலம் விரும்பிகளின் திருவடித்தாமரைகளின் கீழ் வாசம் செய்ய வேண்டும்” என்று கேட்டுக்கொண்டார். மணவாள மாமுனிகள், எறும்பியப்பா , வாதிகேசரி அழகிய மணவாள ஜீயர், சோளசிம்மபுரத்து தொட்டையாசார்யார் (சோளிங்கர்) ஆகியோரெல்லாம் அவரது க்ரந்தங்களை தமது க்ரந்தங்களில் மேற்கோள் காட்டி இருக்கிறார்கள். வேதாந்தாசார்யருக்கு பிள்ளை லோகாசார்யரிடம் மிகுந்த அபிமானம் இருந்தது. இதனை அவர் எழுதிய “லோகாச்சார்ய பஞ்சாஸத்” என்ற நூலிலிருந்து தெரிந்து கொள்ளலாம். இந்த க்ரந்தம் திருநாராயணபுரத்தில் (மேலக்கோட்டை, கர்நாடக மாநிலம்) முறையாக அநுஸந்திக்க படுகிறது.

பராசரன்: வேதாந்தாசார்யர் ராமானுஜரை எவ்வாறு கருதினார் ?

பாட்டி: வேதாந்தாசார்யருக்கு ஸ்ரீ ராமானுஜர் மேல் இருந்த பக்தி தெரிந்ததே. ந்யாஸ திலகம் என்ற அவருடைய க்ரந்தத்தில் “உக்த்ய தனஞ்ஜய’ என்ற வரியில் , அவர் பெருமாளிடம் நீர் மோக்ஷம் அளிக்காவிடிலும் ராமானுஜ சம்பந்தத்தால் எனக்கு மோட்சம் நிச்சயம் உண்டு என்று உரைக்கிறார்.

வ்யாசன்: நம் ஆசார்யர்களிடமிருந்து நாம் கற்றுக்கொள்ள வேண்டியது எவ்வளவோ இருக்கிறதே, பாட்டி.

பாட்டி: ஆம்! 1717 ஆம் ஆண்டு ‘வேதாந்தாசார்ய விஜயம்’ என்றும் ‘ஆசார்ய சம்பு’ என்றும் ஸம்ஸ்க்ருதத்தில் கௌசிக கவிதார்க்கிக சிம்ம வேதாந்தாசார்யர் என்பவர் எழுதிய க்ரந்தம், வேதாந்தாசார்யரின் வாழ்க்கை வரலாற்றையும் அவரது க்ரந்தங்களையும் பற்றி விளக்கக் கூடியது.

அத்துழாய்: நல்லது பாட்டி, இன்றைக்கு வேதாந்தாசார்யரின் ஸம்ஸ்க்ருதப் புலமை, அவரது தமிழறிவு, அடக்கம், பக்தி ஆகியவற்றைப் பற்றியெல்லாம் அறிந்தோம்.

பாட்டி: ஆம், குழந்தைகளே. இவரை போன்ற உயர்ந்த ஆத்மாக்களை எப்பொழுதும் நினைவில் கொள்வோம். இப்பொழுது நீங்களெல்லாம் வீட்டிற்கு செல்லும் நேரம் வந்து விட்டது.

குழந்தைகள் (ஒன்றாக) : நன்றி பாட்டி!

அடியேன் பார்கவி ராமானுஜ தாசி

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री पराशर भट्टर्

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

पराशर और व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो ! आज हम दूसरे आचार्य जी के बारे में बात करेंगे जिनका नाम श्री पराशर भट्टर् जी था, जो एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी के शिष्य थे और उनका एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और एम्पेरुमानार जी के प्रति बहुत स्नेह भक्ति रखते थे | जैसे मैंने आपको बताया की एम्पेरुमानार जी श्री पराशरजी और महर्षि व्यास जी की प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कुरेशा स्वामीजी की दोनों पुत्रो का नाम श्री पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते है | यह उन तीन वचनों में से एक वचन था जो उन्होंने अपने गुरूजी श्री आळवन्दार् स्वामीजी से पूरा करने के लिए किया था | श्री पराशर और वेद व्यास भट्टर जी का जन्म श्रीरंगम के श्रीनाथ पेरिय पेरुमाल जी से प्रसाद रूप में कुरेशा जी और उनकी पत्नी अण्डाल जी से हुए थे |

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

पराशर : दादी, क्या मेरा और व्यास का नाम आचार्य जी के नाम पर रखा गया ?

दादी : हाँ, पराशर ! बच्चो का नाम आचार्य जी के नाम पर ही रखा जाता है या फिर भगवान के नाम पर ताकि बच्चो को बुलाते हुए हमें भगवानजी और आचार्यजी का दिव्य नाम लेने का अवसर प्राप्त हो | इसी कारण से हम अपने बच्चो का नाम भगवान, श्रीलक्ष्मीजी या आचार्यजी के नाम पर रखते है ताकि हम उनका पवित्र नाम लेकर बच्चो को पुकारे और हमें समय मिले की हम अपने आचार्य जी और भगवानजी के बारे में और दिव्य गुणों के बारे में विचार कर सके| अन्यथा इस कार्यरत संसार में किसके पास इतना समय नहीं होगा की समय निकाल कर भगवानजी के बारे में और उनके दिव्य नामो के बारे में सोच सके ? लेकिन वर्तमान में हालत बदले हुए है| जीव फैशन परस्त नामों को प्रयोग में लाते है जिसका कोई तर्क नहीं बनताजिससे हमें भगवान, श्रीमहालक्ष्मीजी, हमारे आचार्य जी का भी स्मरण नहीं होता |

श्रीरंगम आने के बाद एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

व्यास : दादी, एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के आचार्य कैसे बने?

दादी : दोनों बच्चों  के जन्म के बाद, एम्पेरुमानार एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी को दोनों बच्चों  लाने के लिए भेजते है ताकि वह उन बच्चों  अपनी दृष्टि डाल सके | एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जैसे ही दोनों बच्चों  को देखा उन्हें ज्ञात हो गया यह बच्चों  का जन्म संप्रदाय के लिए हुआ है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बच्चों  के मुख पर महान तेज देखा और तत्काल बच्चों  की रक्षा के लिए द्वय महा मंत्र का जाप किया ताकि बच्चों  को किसी की बुरी नजर न लगे | एम्पेरुमानार जी ने बच्चों  को देखा और तत्कालिक निर्णय लिया की दोनों  को द्वयं मंत्र के द्वारा सम्प्रदाय में लाया जाये | एम्पेरुमानार जी के पूछने पर श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बताया की उन्होंने बच्चों  की रक्षा के लिए पहले ही द्वयं मंत्र का उच्चारण किया | तब से  श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी को उन दोनों बच्चों  का आचार्य नियुक्त किये गए जब उन्होंने दोनों को द्वयं मंत्र उच्चारण करके उनको दीक्षित किया | दोनों बच्चे एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और अपने पिताजी से सीखते हुए बढ़े हुए | जैसे बच्चों  का जन्म भगवान के आशीर्वाद से हुआ था, उसी तरह दोनों बच्चे पेरिय पेरुमल और पेरिय पिराट्टी के प्रति स्नेह भावना रखते थे | एम्पेरुमानार जी भी आलवान स्वामीजी से कहते थे की वह अपना बेटा पराशर भट्टर जी एम्पेरुमानार जी को पेरिया पेरुमल का बेटा समझ कर सौंप दे और आलवान स्वामीजी ने ऐसा ही किया | ऐसा कहा जाता है की भट्टर स्वामीजी जब वह बच्चे थे  श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनका  पालन – पोषण करती थी | | इस तरह का प्रेम और संबंद्व था श्री भट्टर स्वामी का पेरिय पेरुमाल और पिरट्टि के बीच | जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरिय पेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे  | रामानुज स्वामीजी भट्टर स्वामी में अपने आप को देखते थे | रामानुज स्वामी जानते थे भट्टर स्वामी ही आगामी दर्शन प्रवर्तकार होंगे |भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे | उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाने वाली कई कहानियाँ हैं।

अत्तुलाय : दादी, हमें उसकी बुद्धि के बारे में कुछ कहानियाँ बताएं ?

दादी : एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नाम से जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगं में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं। भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |

वेदवल्ली : यह एक अच्छा जवाब था।

दादी : यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।

व्यास : जैसे पिता वैसे पुत्र !

दादी ( मुस्कुराते हुए ) : सही ! भट्टर अपने पिता आलवान स्वामी जैसा ज्ञान और मेधा शक्ति रखते थे | श्री रंग राज: स्तवं में,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि मंदिर को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं । इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं । उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।

वेदवल्ली: दादी, जब श्री रंग नाच्चियार् जी ने भट्टर जी का पालन- पोषण किया, क्या तब भट्टर जी पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे जैसे थिरुकाची नम्बि जी देव पेरुमल जी से करते थे ?

दादी : हाँ, वेदवल्ली तुम ठीक कह रही हो | भट्टर जी भी श्रीरंगम में पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे | क्या आप जानते हो वर्ष में एक बार वैकुण्ठ एकादशी से एक दिन पहले, पगल पथु उत्सव के दसवें दिन, नम्पेरुमाळ जी नाच्चियार अम्मा जी की वेश वूशा धारण करते है? नम्पेरुमाळ जी श्रीरंग नाच्चियार जी के अलंकार धारण करते है और बहुत सुंदरता से श्रीरंग नाच्चियार जी की तरह इस दिन बैठते है | एक दिन नम्पेरुमाळ जी भट्टर स्वामीजी को बुलाकर पूछते है की क्या वह श्रीरंग नाच्चियार जी जैसे दीखते है | भट्टर स्वामीजी जो माता लक्ष्मी जी की तरफ अपना पक्ष रखते, नम्पेरुमाळ जी की तरफ प्रीति से देख कर कहते की प्रभु जी सब अलंकार बहुत सुन्दर है लेकिन जो करुणा लक्ष्मी माता जी के नेत्रों में है वह आपके कमल नयनो में नहीं | इस प्रकार का वात्सल्य था भट्टर स्वामीजी का माँ श्रीरंग नाच्चियार जी की प्रति |

हालाँकि, भट्टर जी के सैकड़ों अनुयायी थे, जो नियमित रूप से उनके  कालक्षेप को सुनते थे और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होते थे, फिर भी बहुत कम लोग थे जो भट्टर जी को नापसंद करते थे। यह महान लोगों के लिए बहुत आम है। यह  रामानुज स्वामीजी  के साथ भी हुआ। एक बार, भट्टर जी को नापसंद करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें ईर्ष्या और घृणा से डांटना शुरू कर दिया। अगर कोई आप पर चिल्लाता है, तो आप क्या करेंगे?

व्यास :  मैं उस पर वापस चिल्लाऊँगा। मैं क्यों चुप रहूं?

दादी: यह वास्तव में हम में से अधिकांश ऐसे होते है , यहां तक ​​कि वयस्क भी ऐसा ही करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भट्टर जी ने क्या किया? उन्होंने अपने गहने और महंगे शॉल उस व्यक्ति को भेंट किए, जो उन पर चिल्लाया था। भट्टर जी ने यह कहकर उनका धन्यवाद किया कि “हर श्रीवैष्णव को दो काम करने चाहिए – एम्पेरुमान जी की महिमा गाओ और अपने स्वयं के दोषों के बारे में भी विलाप करो। मैं एम्पेरुमान जी की महिमा को गाने में इतनी गहराई से डूब गया कि मैं अपने दोषों के बारे में विलाप करना भूल गया। अब आपने अपना कर्तव्य पूरा करके मुझ पर बड़ा उपकार किया है, इसलिए मुझे केवल आपको पुरस्कृत करना चाहिए ”। ऐसी थी उनकी विशालता।

पराशर : दादी , मुझे स्मरण है की आप कह रही थी की रामानुज स्वामीजी ने ही भट्टर स्वामीजी को आदेश दिया था की नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को सम्प्रदाय में लेकर आये | भट्टर स्वामीजी ने ऐसा कैसे किया होगा ?

दादी : मुझे बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार की पराशर तुम्हे यह सब स्मरण है | हाँ, जैसा रामानुज दिव्य आज्ञा में बताया गया है, भट्टर स्वामीजी तिरुनारायणपुरम जाते है और नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आते है | हमने इस जगह के बारे में पहले से सुना हुआ है ? क्या किसी को स्मरण है कब ?

वेदवल्ली : मुझे याद है | तिरुनारयणपुरम मंदिर उन सब मंदिरो में से एक है जहाँ रामानुज स्वामीजी ने सुधार किया था | रामानुज स्वामीजी ने श्री मेलकोटे मंदिर में व्यवस्था लागू की |

दादी : बहुत अच्छे वेदवल्ली | रामानुज स्वामीजी ने तिरुनारायणपुरम मंदिर में शेल्वपिळ्ळै भगवान जी की उत्सव मूर्ति मुस्लिम अक्रान्ताओ से छुड़ाकर वापिस मंदिर में पुनः स्थापित की थी | भट्टर स्वामीजी जिस कक्ष में माधवाचार्य (नन्जीयर स्वामीजी का असली नाम ) प्रसाद वितरित कर रहे होते है, सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर स्वामीजी का नम्पेरुमाळ जी और श्रीरंग नाच्चियार जी के दिव्य विग्रहो के प्रति बहुत अनुराग था | भट्टर स्वामीजी कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । एक बार कुरेश स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा अगर परमपदनाथ के दो या चार हाथ हुए तो, भट्टर स्वामीजी जवाब देते है की अगर परमपदनाथ जी के दो हाथ होंगे तो वह पेरिया पेरुमल जैसे दिखेंगे और अगर उनके चार हाथ होंगे तो वह हमारे नम्पेरुमाळ जी जैसे दिखेंगे | भट्टर स्वामीजी कभी भी अन्य जीवों को देखकर भी उनमे नम्पेरुमाळ जी ही को देखेंगे | वह भगवान जी के सब दिव्य मंगल विग्रह को नम्पेरुमाळ ही बताते थे | । जब नम्पेरुमाळ जी उनको मोक्ष प्रधान करते है,भट्टर स्वामीजी अपनी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त करके इस संसार को छोड़ कर परमपद में जाकर अपने आचार्यो जी के साथ मिलते है ताकि वहां एम्पेरुमान जी का नित्य कैंकर्यं कर सके | कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

अतुलहाय : दादी, श्री भट्टर स्वामीजी का जीवन सुनाने में बहुत रूचि पूर्ण था | जो भक्ति उनमे दिखती थी नम्पेरुमाळ जी के प्रति और उनका संबंद्व मन को छू लेता है | अण्डाल अम्मा जी भी कितनी भाग्यशाली होंगी ऐसा महान पति पाकर और ऐसे महान बच्चे पाकर |

दादी : तुम बहुत ठीक कह रही हो अतुलहाय | अंडाल बहुत भाग्यवान समझेगी अपने आप को | कल में आपको नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) के बारे में बताउंगी जो की आगामी आचार्य थे | अब आप फल लो और घर जाओ |

बच्चे श्री भट्टर स्वामीजी और उनके दिव्य जीवन के बारे में सोचते हुए अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार –  http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-bhattar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अंडाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो | अपने हाथ और पॉंव दो लो | में कुछ प्रसाद लेकर आती हूँ | क्या आप जानते हो कल कौन सा दिन है ? कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्रम, उत्तराषाढ नक्षत्र, का दिन है | यहाँ पर कौन आळवन्दार् स्वामीजी का स्मरण करता है?

अतुलहाय : मुझे याद है की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने देव पेरुमल जी से प्रार्थना करके रामानुज स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आये थे |

व्यास : हाँ | उनके परमपदम जाने के बाद उनके दिव्या शरीर के तीन उंगलिया मुड़ी हुई थी जो यह सूचित करती थी की उनकी अंतिम तीन मनोरथ अधूरे रह गए थे और रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए थे उनको पूर्ण करेंगे | जैसे ही रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए उसी समय तीनो मुड़ी हुई उंगलियां सीधी हो गयी |

पराशर : दादी हमें स्मरण है जब आपने कहा था की रामानुज स्वामीजी और आळवन्दार् स्वामीजी का संबंध मन और आत्मा का है और जो शारीरक इन्द्रियों से परे है |

दादी : वास्तव में, कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्र है | यह लीजिये प्रसाद | कल मंदिर जाना भूल मत जाना और महान आचार्य जी को अपना सम्मान देना जिन्होंने रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लेकर आये | आज आगे चलते है और चलो अपने दूसरे आचार्य एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) के बारे में जानते है | गोविन्द पेरुमाळ कमल नयन भट्टर् और श्री देवी अम्माळ को मधुरमंगलम में पैदा हुए । ये गोविन्द भट्टर, गोविन्द दास और रामानुज पदछायर के नामों से भी जाने जाते हैं । कालान्तर में ये एम्बार् के नाम से प्रसिध्द हुए । ये एम्पेरुमानार के चचेरे भाई थे जिन्होंने जब यादव प्रकाश एम्पेरुमानार की हत्या करने की कोशिश की तब ये साधक बनकर उन्हें मरने से बचाया ।

वेदवल्ली : दादी क्या मारा? मैंने सोचा था की रामानुज स्वामीजी का जीवन उस समय खतरे में था जब कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) स्वामीजी और पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) ने उनके प्राण बचाये थे | दादी कितनी बार उनके जीवन खतरे में था ?

दादी : बहुत बार | में आपको सब बताउंगी जैसी ही समय आएगा | उनका जीवन पहली बार तब खतरे में आया जब उनके गुरु यादव प्रकाश जी ने उनको मारना चाहा | रामानुज स्वामीजी और यादव प्रकाश जी में मत भेद था जब भी वेदो के श्लोको का अर्थ को बताना होता | श्रीयादवप्रकाश शास्त्रों में वर्णित श्लोकों का गलत अर्थ / तात्पर्य बतलाते । रामानुज स्वामीजी वेदो के श्लोको का गलत अर्थ / तात्पर्य सुनते बहुत बुरा अनुभव करते और तब श्री रामानुज स्वामीजी अन्य उदाहरण देकर श्लोकों का सही अर्थ बतलाते हुये श्रीयादवप्रकाश को सही तात्पर्य समझाने की कोशिश करते थे जैसे हमारे श्री विशिष्टाद्वैत संप्रदाय में अर्थ दिए हुए है | यादव प्रकाश जो की अद्वैत वादी थे कभी भी रामानुज स्वामीजी के द्वारा दिए गए अर्थो से प्रसन्न नहीं थे | वह जानते थे की जो अर्थ अनुवाद रामानुज स्वामीजी देते है वह ज़्यादा सार्थक है और इसीलिए प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव करने लगे | यादव प्रकाश जी सोचते थे की रामानुज स्वामीजी उनको आचार्य की पदवी से मुक्त कर देंगे जब की रामानुज स्वामीजी का ऐसा कोई उद्देश नहीं था | इसी कारण से यादव प्रकाश जी अपने मन में रामानुज स्वामीजी से द्वेष की भावना रखते थे | यादवप्रकाश भगवत रामानुज स्वामीजी से छुटकारा पाने अपने अन्य शिष्यों के साथ विचार विमर्श कर , रामानुज स्वामीजी को काशी यात्रा पर ले जाकर वही समाप्त कर देने की योजना बना कर, काशी यात्रा के लिए जाते है। यादवप्रकाश की इस योजना का , भगवत रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई गोविंदाचार्य (एम्बार) को पता चल जाता है । गोविंदाचार्य श्री रामानुज स्वामीजी को यादवप्रकाश की इस योजना से अवगत कराते हुए कांचीपुरम भेज देते हैं और इस तरह से गोविंदाचार्य (एम्बार) रामानुज स्वामीजी के प्राण बचा लेते है |

व्यास : दादी, क्या एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) यादव प्रकाश जी के शिष्य थे ?

एम्बार् – मधुरमंगलं

दादी : हाँ व्यास ! रामानुज स्वामीजी और गोविन्द स्वामीजी दोनों यादव प्रकाश जी से वेद अध्यन सीखने जाते थे | यद्यपि रामानुज स्वामीजी को अपने आप को बचाने के लिए दक्षिण भारत की तरफ यात्रा करनी थी, गोविन्द स्वामीजी यात्रा जारी रखते हैं और कालहस्ती पहुँचकर शिव भक्त बन जाते हैं जिससे उनको उल्लंगै कोंडा नयनार के नाम से जाने जाना लगे । उन्हें सही मार्ग दर्शन करने के लिए एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि को उनके पास भेज देते हैं ताकि गोविन्द स्वामीजी को सम्प्रदाय में वापिस ला सके । पेरिया नम्बि कालहस्ती जाते है और नम्माळ्वार जी के पासुर और आलवन्दार स्वामीजी के स्तोत्र रत्नम के श्लोको द्वारा गोविन्द पेरुमाळ को परिवर्तिन कर सके | गोविन्द पेरुमाळ जी को अपनी गलती की अनुभूति हुई और फिर वह संप्रदाय में वापिस आ जाते है | इसीलिए बच्चो आलवन्दार स्वामीजी परमपदम जाने के बाद भी इतने प्रभावशाली थे की केवल रामानुज स्वामीजी को ही सम्प्रदाय में नहीं लेकर आये बल्कि उनके मुसेरे भाई गोविन्द पेरुमाल जी को भी सम्प्रदाय में लेकर आये | जैसे पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को सम्प्रदाय में वापिस लेकर आते है इसीलिए वह उनके आचार्य भी थे और उन्होंने गोविन्द पेरुमाल जी का पञ्च संस्कार भी किया था | जैसे ही पेरिय थिरुमलई नम्बि गोविन्द पेरुमाल जी के साथ तिरुपति से वापिस आते है और गोविन्द पेरुमाल जी अपने आचार्य जी के कैंकर्य में लग जाते है | जहाँ एक विषय महत्वपूर्ण है जो आप सब ने देखा होगा | आपने देखा होगा की रामानुज स्वामीजी और पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी ही गोविन्द पेरुमाल जी के पास उनके परिवर्तन के लिए जाते है न की गोविन्द पेरुमाल जी अपने सुधार के लिए रामानुज स्वामीजी और पेरिय नम्बि स्वामीजी के पास जाते है | ऐसे आचार्य जो अपने शिष्यों के पास इसीलिए पहुँचते है की उनका बेहतर सुधार कर सके और उनके भलाई के लिए ही चिंतित रहते है उनको कृपा मातृ प्रसनाचार्य कहा जाता है | वह स्वयं अपने शिष्यों के पास शुद्ध भाव से पहुँच कर उन पर निर्हेतुक कृपा करते है जैसे एम्पेरुमान करते है | रामानुज स्वामीजी और पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी दोनों गोविन्द पेरुमाल जी के लिए कृपामात्र प्रसनाचार्य थे |

पराशर : दादी हमें गोविन्द पेरुमाल जी के बारे में और बताइये | उन्होंने कौन कैंकर्यं किया था ?

दादी : ऐसे बहुत सी घटना है जो गोविन्द पेरुमाल जी के ऊपर पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी का आचार्य अभिमान दर्शाती है | एक बार गोविन्द पेरुमाल जी पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी के लिए बिस्तर बना रहे थे, तो उन्होंने अपने आचार्यं जी के लेटने से पहले बिस्तर का निरक्षण किया | जब नम्बि स्वामीजी ने उनसे पूछा अपने ऐसा क्यों किया तो गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी उत्तर देते है की वह जानते है की इससे उनको नरक भोगना पड़ेगा, उनको नरक भोगना बुरा नहीं होगा जब तक आचार्य जी का बिस्तर सुरक्षित है और लेटने के लिए आरामदायक है | इससे उनके आचार्य अभिमान का गुण प्रकाशित होता है जहाँ पर गोविन्द पेरुमाल जी स्वयं के बारे में न सोचकर अपने आचार्य की तिरुमेनि (शारीर) की रक्षा करने में वे चिंतामग्न हैं । यह समय तब आया जब रामानुज स्वामीजी तिरुपति आते है ताकि वह पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी से श्रीरामायण का मूलतत्त्व सीख सके | रामानुज स्वामीजी जब एक वर्ष नम्बि स्वामीजी से सीखने के बाद वापिस जाते है, नम्बि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी को कुछ भेंट देने चाहते थे | रामानुज स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी को मांग लेते है और नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी को कैंकर्यं करने के लिए उनको सौंपने को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करते है | यह सुनकर गोविन्द पेरुमाल जी दुःखी होते है के उनको पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी को छोड़कर जाना पड़ेगा |

व्यास : दादी, नम्बि स्वामीजी ने गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों दे दिया ? गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों जाना पड़ा जब के वह आचार्यं कैंकर्यं करने में खुश थे ?

दादी : व्यास, गोविन्द पेरुमाल संप्रदाय में एक बड़ी भूमिका क्रियान्वित करते है जिससे वह रामानुज स्वामीजी के लिए विभिन्न कैंकर्यं कर सके । बचपन से ही, गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी के प्रति बहुत स्नेह और प्रेम भावना रखते थे |  रामानुज स्वामीजी के परमपदम पहुँचने के बाद, उन्होंने रामानुज स्वामीजी के दूसरे शिष्य और पराशर भट्टर जी का भी मार्गदर्शन किया | इतनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना जो उनका इंतज़ार कर रही थी जिससे उनको अपने आचार्य पेरिय थिरुमलई नम्बि जी को छोड़ना पड़ा और रामानुज स्वामीजी को अपना गुरु और मार्गदर्शक मानना पड़ा |  बाद में गोविन्द पेरुमाल जी ने रामानुज स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और सुंदर पासुर रचा जिस में रामानुज स्वामीजी की दिव्या शरीर की सुंदरता का वर्णन किया | इसको एम्पेरुमानार वाड़ीवालागु पासुर सुनाते है | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था , जब संप्रदाय पर बात आती है , बहुत अच्छे कारण के लिए आपको त्याग करना पड़ेगा और ऐसा ही गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने किया |

अतुलाहय : क्या गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने विवाह किया था ? क्या उनके बच्चे भी थे ?

दादी : गोविन्द पेरुमाल जी तो भगवद विषयम में लगन थी की उनको हर जगह और हर वस्तु में एम्पेरुमान दिखते थे | विवाह होने के बाद भी जब हम गोविन्द पेरुमाल जी का भगवद विषय की तरफ उठा हुआ जीवन देखते है, एम्पेरुमानार स्वामीजी स्वयं उन्हें सन्याश्रम प्रादान करते हैं और एम्बार् का दास्यनाम देकर उनके साथ सदैव रहने के लिए कहते हैं । अपने जीवन के अंतिम दिनों में एम्बार् स्वामीजी श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश देते है की श्रीवैष्णव संप्रदाय का प्रचार और प्रसार कर सके | उन्होंने श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश दिया की सदैव एम्पेरुमानार जी के चरण कमलो में प्रीती रखे और सदैव एम्पेरुमानार थिरुवडिगले शरणम् मंत्र का जाप करे | अपने आचार्यं रामानुज स्वामीजी के चरण कमलो में ध्यानमग्न रहते हुए और अपने आचार्य जी से ली हुई प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए, एम्बार परमपदम पहुँच जाते है ताकि वह अपने आचार्य जी के प्रति कैंकर्यं कर सके | श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी ने भी आचार्य आज्ञा का आदेश मानते हुए श्रीवैष्णव संप्रदाय परम्परा को और आगे प्रचार और प्रसार करने के लिए कैंकर्य किये |

वेदवल्ली : दादी, हमें श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी : में आपको श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताउंगी जब हम अगली बार मिलेंगे | अभी आप घर जाये, बाहर अँधेरा हो रहा है | और कल मंदिर जाना मत भूल जाना क्यूंकि कल आलवन्दार तिरुनक्षत्र है |

बच्चे अपने घर को आळवन्दार् स्वामीजी, पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी, रामानुज स्वामीजी और एम्बार स्वामीजी के बारे में सोचते हुए प्रस्थान करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-embar/

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Beginner’s guide – vEdhAnthAchAryar

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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ANdAL pAtti was wreathing a garland and watching the passersby walking to the temple, from her home. She caught the children running to her home by the corner of her eye and smiled to herself. She adorned periya perumAL and thAyAr’s picture with the garland and welcomed them.

pAtti: Come in children. Do you know whom are we going to discuss about today?

All children in Chorus: vEdhAnthAchAryar

pAtti: Yes. Do you know who named him so?

vyAsA: periya perumAL named him as vEdhAnthAchAryar. Is that right pAtti?

pAtti: Right, vyAsA. His birth name was vEnkatanAthan. He was born in kAnchIpuram to the divine couple anantha sUri and thOthArambai.

parAsaran: Tell us more about his initiation into our sampradAyam, pAtti.

pAtti: Sure, parAsara. In the kAlakshEpa ghoshti of NadaadUr Ammal, there was a a famous Srivaishnava named kidAmbi appuLLAr. When vEdhAnthAchAryar was young he went with his maternal uncle (Sri kidAmbi appuLAr) to attend Sri nadAdhUr ammAL’s kAlakshEpa goshti. Sri nadAdhUr ammAL had blessed him at that time that he will establish well and clear all the oppositions of viSishtAdhvaitha Srivaishnava sidhdhAntham.

aththuzhAy : Wow! Indeed his blessing came true!

pAtti (with a beaming smile): Yes, aththuzhAy. The blessings of elders will never go unfulfilled.

vEdhavalli: I heard he is an incarnation of the holy bell of thiruvEnkadamudaiyAn. Is that right, pAtti?

pAtti: Yes, you are right, aththuzhAy. He has written more than a hundred granthams in samskrutham, thamizh and maNipravALam.

vyAsAn: Wow! A hundred ?

pAtti: Yes, some of the important ones are thAthparya chandhrikai (a commentary on SrI bhagavath gIthA), thathvateekai, nyAya sidhdhAnjanam, Satha dhUshani and AhAra niyamam (a commentary on food habits).

parAsaran: PAtti, I cannot stop wondering about how can one person write basic granthams for eating habits and also write about complex philosophical commentaries at the same time.

pAtti: Our pUrvAchAryas’ knowledge was as deep as the ocean, parASara! No wonder, he was conferred the title ‘sarva-thanthra-svathanthra’ (master of all arts and crafts) by our own thAyAr (SrI ranganAachchiyAr).

aththuzhAy : Tell us more, pAtti. It is interesting to hear all these facts about him

pAtti: vEdhAnthAchAryar was also known as ‘kavithArkika kEsari’  (lion amongst poets). He once won over an advaithi named krishNamiSra after a long debate of 18 days. He composed ‘pAdhuka sahasram’ when challenged by a vain Poet. This is a 1008 verse poem praising the divine sandals of Lord ranganAtha.

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kAnchi thUppuL vEdAnthAchAryar during avathAra uthsavam

vEdhavalli: That is impressive! We are indeed blessed to have such noble Acharyas who had such humility despite such phenomenal accomplishments.

pAtti: Well said, vEdhavalli. vEdhAntha dhESikan and many other contemporary Acharyas had mutual love and reverence for each other. In his abhithistavamhe asks Lord ranganAtha “Oh Lord! let me reside in SrIrangam at the feet of the great ones who are mutual well-wishers’. maNavALa mAmunigaL, eRumbi appA, vAdhikESari azhagiya maNavALa jIyar, dhoddAcharyar of choLasimhapuram (Sholingur) have all quoted his granthams in their works. vEdhAntha dhESikan himself had great admiration for piLLai lOkAchAryar , which can be easily understood from the grantham he composed called “lOkAchArya panchAsath”. This grantham is recited regularly in thirunArAyaNapuram (Melkote, Karnataka).

parAsaran: How did vEdhAnthAchAryar regard Sri Ramanujar?

pAtti: Sri vEdhAnthAchAryar’s devotion to Sri rAmanujar is very well known; in his ‘nyAsa thilakA’ in the verse starting ‘ukthya dhananjaya…’ he pacifies perumAL for having indirectly told him that mOksham need not be granted by Him, as it had already been guaranteed to him by his connection with Sri rAmAnujar.

vyAsa: There is so much to learn about our AcharyAs, pAtti!

pAtti: Yes, vEdhAnthAchArya Vijaya’ also known as ‘AchArya-champu’, written in Sanskrit in the form of prose and verse, by a great scholar and poet named ‘kouSika kavithArkikasimha vEdanthAcharyar’, who lived around 1717 CE gives a good glimpse into the life and works of vEdhAntha dhESikan

aththuzhAy : Oh, nice! pAtti, today we learnt about vEdhAnthAchAryar’s literary prowess in samskrutham and thamizh, his humility and bhakthi. We are truly blessed to follow such a great example.

pAtti: Yes, children. Let us remember such great souls always! We will meet again tomorrow. Its time for you all to go home.

Children (in chorus): Thank you pAtti!

adiyen bhArgavi rAmAnuja dasi

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – அஷ்டதிக்கஜங்கள் மற்றும் சில ஆசார்யர்கள்

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீ மதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

<< அழகிய மணவாள மாமுனிகள்

பாட்டி: வாருங்கள் குழந்தைகளே, உங்கள் அனைவருக்கும் நாம் சென்ற முறை பேசியதெல்லாம் நினைவிருக்கும் என நினைக்கிறேன்.

குழந்தைகள் (ஒரே குரலில்): நமஸ்காரம் பாட்டி, நினைவு இருக்கு. நாங்கள் இன்று அஷ்டதிக்கஜங்கள் பற்றித் தான் கேட்க வந்திருக்கிறோம்.

பாட்டி: நல்லது, பேசலாம்.

பராசரன்: பாட்டி, அஷ்டதிக்கஜங்கள் என்றால் 8 சிஷ்யர்கள் இல்லையா, பாட்டி?

பாட்டி: பராசரன், நீ சொல்வது சரி. அஷ்டதிக்கஜங்கள் என்றால் மணவாள மாமுனிகளின் 8 முதன்மையான சிஷ்யர்கள் – பொன்னடிக்கால் ஜீயர், கோயில் அண்ணன், பத்தங்கி பரவஸ்து பட்டர்பிரான் ஜீயர், திருவேங்கட ஜீயர், எறும்பியப்பா, ப்ரதிவாதி பயங்கரம் அண்ணன், அப்பிள்ளை, அப்பிள்ளார் ஆகியோர். மாமுனிகள் பரமபதித்த பிறகு மாமுனிகளின் இந்த சிஷ்யர்கள் தாம் நம் சம்ப்ரதாயத்தின் வளர்ச்சிக்குப் பெரிய காரணமாயிருந்தனர்.

மணவாள மாமுனிகளின் ப்ராணசுஹ்ருதான (உயிர் போன்றவரான) பொன்னடிக்கல் ஜீயருடன் தொடங்குவோம்.

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பாட்டி: அழகிய வரதர் என்ற பெயருடன் பிறந்தவர், பொன்னடிக்கால் ஜீயரென பிரபலமாக வழங்கப்படலானார்.

பராசரன்: பாட்டி, ஏன் அவரை பொன்னடிக்கால் ஜீயர் என்று அழைக்கிறார்கள்?

பாட்டி: பொன்னடிக்கால் என்றால் மாமுனிகளின் சிஷ்ய சம்பத்திற்கு ( சிஷ்ய செல்வம்) அடிக்கல் நாட்டியவர் என்று பொருள். பல சிஷ்யர்கள் பொன்னடிக்கால் ஜீயரைப் புருஷகாரமாகப் பற்றியே மாமுனிகளை அடைந்தார்கள்.

பொன்னடிக்கால் ஜீயருக்கும் அஷ்டதிக்கஜங்களை நியமித்தார் மணவாள மாமுனிகள். பொன்னடிக்கால் ஜீயரை வானமாமலை திவ்யதேசத்திற்கு வந்து கைங்கர்யம் செய்யுமாறு வானமாமலை எம்பெருமானான தெய்வனாயகப் பெருமான் சேனை முதலியாரின் மூலம் மணவாள மாமுனிகளுக்கு ஸ்ரீமுகம் (செய்தி) அனுப்பினார். அதனால், மணவாள மாமுனிகள் பொன்னடிக்கால் ஜீயரை வானமாமலைக்கு அனுப்பினார்.

வ்யாசன்: பாட்டி, பொன்னடிக்கால் ஜீயர் வானமாமலைப் பெருமாளின் மாமனார் ஆவார், இல்லையா?

பாட்டி: ஆம், வ்யாசா! பொன்னடிக்கால் ஜீயர் தாம் நாச்சியார் விக்ரஹத்தை திருமலையிலிருந்து எழுந்தருளப் பண்ணிக்கொண்டு வந்து தெய்வனாயகப் பெருமாளுக்குக் திருக்கல்யாணம் செய்து கொடுத்தார். அவரே கன்னிகாதானம் செய்து கொடுத்ததால், வானமாமலை எம்பெருமானும் “பெரியாழ்வரைப் போன்று பொன்னடிக்கால் ஜீயரும் எமது மாமனாரே” என்று அறிவித்தார்.

மாமுனிகளின் ஆணையைக் கொண்டு, பாரத தேசத்தின் பல்வேறு பகுதிகளுக்கும் சென்று நம் சம்ப்ரதாயத்தை வளர்த்தார், பொன்னடிக்கால் ஜீயர். இறுதியாக, தன் ஆசார்யரான மணவாள மாமுனிகளின் திருவடித்தாமரைகளைத் த்யானித்துக்கொண்டே தம் சரமத்திருமேனியை விட்டு, பரமபதத்தை அடைந்தார்.

பெருமானிடமும் ஆசார்யரிடமும் அத்தகைய அபிமானத்தை வளர்த்துக் கொள்வதற்கு பொன்னடிக்கால் ஜீயர் ஸ்வாமியின் திருவடித்தாமரைகளை ப்ரார்த்திப்போம், வாருங்கள்.

பாட்டி: நாம் அடுத்த விஷயமாக கோயில் அண்ணணைப் பற்றிப் பேசுவோம். மாமுனிகளின் ஆப்தசிஷ்யராகவும், அஷ்டதிக்கஜங்களில் ஒருவராகவும் ஆனவர். அவரது வாழ்க்கையில் அவரை மாமுனிகளின் திருவடிக்கு கொண்டு சேர்த்த ஒரு சுவாரஸ்யமான விஷயம் நடந்தது.

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பராசரன்: என்ன விஷயம் பாட்டி, அது ?

பாட்டி: முதலியாண்டானின் பரம்பரையில் பிறந்த கோயில் அண்ணனுக்கு, மாமுனிகளின் நிழலை ஏற்பதில் விருப்பம் இல்லை. இந்தச் சம்பவம் அவரை மணவாள மாமுனிகளின் திருவடித் தாமரைகளுக்குக் கொண்டு சேர்த்தது. கோயில் அண்ணன் ஸ்ரீரங்கத்தில் பல சிஷ்யர்களுடன் வாழ்ந்து வந்தார். ஸ்ரீ பாஷ்யகாரர் (ஸ்ரீ ராமானுஜர்) தாம் கோயில் அண்ணனை மணவாள மாமுனிகளின் சிஷ்யராகச் சொன்னார். முதலியாண்டானின் திருவடிச் சம்பந்தத்தை சரி வர உபயோகிக்குமாறு கோயில் அண்ணனைப் பணித்தார் அவர்.

எம்பெருமானார் அண்ணன் ஸ்வாமியின் கனவில் வந்து “நான் ஆதிசேஷன். மறுபடியும் மணவாள மாமுனிகளாய் பிறந்திருக்கிறேன்” என்று சொன்னார். நீங்களும் உங்களைச் சார்ந்தவர்களும் மாமுனிகளின் சீடர்களாகி உஜ்ஜீவனம் அடைவீர்களாக!” என்றார். கனவு கலைந்ததும் மிகுந்த அதிர்ச்சியுடன் எழுந்த அண்ணன் ஸ்வாமி தனது சகோதரர்களிடம் உணர்ச்சிபூர்வமாக நடந்ததை எடுத்துரைத்தார்.

அண்ணன் ஸ்வாமி மற்ற கந்தாடை குடும்பத்து ஆசார்ய புருஷர்களோடு ஜீயர் மடத்திற்குச் சென்று மாமுனிகளை ஆஸ்ரயித்தார். மாமுனிகள் வானமாமலை (பொன்னடிக்கால்) ஜீயரை அவர்களது பஞ்ச ஸம்ஸ்காரத்திற்கு தேவையானவற்றை தயார் செய்யுமாறு பணித்தார்.

குழந்தைகளே, கோயில் கந்தாடை அண்ணனின் சிறப்பான வாழ்க்கையிலிருந்து சில சம்பவங்களைப் பார்த்தோம். அவர் மாமுனிகளுக்கு மிகவும் பிரியமானவர். அவரைப் போன்ற ஆசார்ய அபிமானத்தைப் பெற அவரது திருவடித் தாமரைகளைத் தொழுவோம்.

அடுத்து, பரவஸ்து பட்டர்பிரான் ஜீயர் என்ற பெயர் பெற்ற ‘மோர் முன்னார்’ ஐயரைப் பற்றிப் பார்ப்போம். இவர் மாமுனிகளின் அஷ்டதிக்கஜங்களில் ஒருவர். எம்பார் எவ்வாறு எம்பெருமானாரோடு இருந்தாரோ, அவ்வாறே இவரும் மாமுனிகளை விட்டுப்பிரியாமலே இருந்தார்.

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வேதவல்லி: பாட்டி, அவருக்கு ஏன் மோர் முன்னார் ஐயர் என்ற பெயர் வந்தது?

பாட்டி: சுவாரஸ்யமாக இருக்கிறதல்லவா? தினமும் அவர் மாமுனிகள் சாப்பிட்ட சேஷப் பிரசாதத்தை (மிச்சத்தை) உண்ணுவார். மாமுனிகள் சாப்பிட்ட வாழை இலையிலேயே சாப்பிடுவார். மாமுனிகள் மோர் சாதத்துடன் முடிக்கும் பொழுது பட்டர்பிரான் ஜீயர் அந்த சுவை மாறாமல் இருப்பதற்காக மோர் சாதத்திலிருந்தே சாப்பிடத் தொடங்குவாராம். அதனால் அவர் மோர் முன்னர் ஐயர் என அழைக்கப்பட்டார்.

மாமுனிகளிடத்தே கைங்கர்யங்கள் பல செய்து சாஸ்த்ரார்த்தங்கள் அனைத்தையும் அவரிடம் கற்றார். மாமுனிகள் பரமபதித்த பின் அவர் திருமலையிலேயே தங்கி பல ஜீவாத்மாக்களை உஜ்ஜீவனம் அடையச் செய்தார். ஆசார்ய நிஷ்டை மிகுந்தவராதலால், “அந்திமோபாய நிஷ்டை” என்ற நூல் எழுதினார். அந்த க்ரந்தம் நமது ஆசார்ய பரம்பரையின் ஏற்றத்தையும், நமது பூர்வாசார்யர்கள் எவ்வாறு தத்தமது ஆசார்யர்களைச் சார்ந்தே இருந்தனர் என்றும் விளக்கவல்ல க்ரந்தமாகும். பரவஸ்து பட்டர்பிரான் ஜீயர் மாமுனிகளுக்கு மிகவும் பிரியமான சீடராவார்.

பாட்டி: குழந்தைகளே, அடுத்து எறும்பியப்பா என்பவரைப் பற்றி உங்களுக்குச் சொல்லப் போகிறேன். அவரது இயற்பெயர் தேவராஜன். அவரது கிராமத்திலிருந்து கொண்டு அவரது தர்மத்தை அனுஷ்டித்துக் கொண்டிருக்கும் பொழுது, மணவாள மாமுனிகளைப் பற்றி கேள்விப்பட்டு அவரைச் சந்திக்க ஆசைப்பட்டார். அவர் மாமுனிகளோடு சில காலம் தங்கி இருந்து அனைத்து ரஹஸ்ய க்ரந்தங்களையும் கற்றறிந்து தனது கிராமத்திற்குத் திரும்பி கைங்கர்யம் செய்யலானார்.

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அவர் எப்பொழுதும் தனது ஆசார்யரைப் பற்றியே நினைத்துக் கொண்டிருந்தார். ‘பூர்வ தினசர்யை’,’ உத்தர தினசர்யை’ (மாமுனிகளின் நித்யகர்மாக்களைப் பற்றிய வர்ணனை) என்ற இரண்டு க்ரந்தங்களை எழுதி மாமுனிகளுக்கு அனுப்பி வைத்தார். எறும்பியப்பாவின் நிஷ்டையை பார்த்து அவரைப் பெருமைப்படுத்தினார் மாமுனிகள். எறும்பியப்பாவிற்கு தன்னை வந்து பார்க்குமாறு அழைப்பு விடுத்தார்.

வ்யாசன்: பட்டர்பிரான் ஜீயர், பொன்னடிக்கால் ஜீயர், இவர்களைப் போல எறும்பியப்பாவும் தன் ஆசார்யனிடம் மிகுந்த பற்று கொண்டவர் இல்லையா, பாட்டி?

பாட்டி: ஆமாம், வ்யாஸா. “விலக்ஷண மோக்ஷ அதிகாரி நிர்ணயம்” என்பது அவரது முக்கிய க்ரந்தமாகும். எறும்பியப்பாவிற்கும் சேனாபதியாழ்வான் போன்ற அவரது சிஷ்யர்களுக்கும் நடக்கும் உரையாடல்களின் தொகுப்பாகும் இந்த க்ரந்தம்.

வேதவல்லி: பாட்டி, விலக்ஷண மோக்ஷ அதிகாரி நிர்ணயம் என்றால் என்ன?

பாட்டி: இந்த க்ரந்தம் நாம் ஆழ்வார் ஆசார்யர்களின் ஸ்ரீசூக்திகளைப் படித்துத் தவறாக புரிந்து கொள்வதால் வரும் குழப்பங்களை நீக்க வல்லது. எறும்பியப்பா சம்சாரத்தில் வைராக்கியம் வளர்த்துக் கொள்வதின் முக்கியத்துவத்தைச் சொல்லிக் கொடுக்கிறார். பூர்வாசார்யர்களின் ஞானம் மற்றும் அனுஷ்டானம் ஆகியவற்றில் ஈடுபாடு கொள்ளுமாறும் பணித்து நம்மை வழி நடத்துகிறார்.

பாட்டி: மணவாள மாமுனிகளை என்றும் நினைவில் கொண்ட எறும்பியப்பாவை நாமும் என்றும் நினைவில் கொள்வோம்.

பாட்டி: குழந்தைகளே, நாம் இப்பொழுது ப்ரதிவாதி பயங்கரம் அண்ணாவைப் பற்றித் தெரிந்துகொள்ளலாம், வாருங்கள். ஹஸ்திகிரிநாதராகப் பிறந்தவர், காஞ்சிபுரத்தில் தன் இளையபிராயத்தில் வேதாந்தாசார்யரின் ஆசீர்வாதத்தைப் பெற்றவர். அவர் பெரிய வித்வானாகி மற்ற ஸம்ப்ரதாயத்து வித்வான்களை வென்றார்.

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பின்னர் அவர் திருமலையில் தங்கி திருவேங்கடமுடையானுக்கு சேவை செய்யத் தொடங்கினார். மணவாளமாமுனிகளின் பெருமைகளைக் கேட்டவர், அவருக்கு சிஷ்யராக ஆசைப்பட்டார். ஸ்ரீரங்கத்தை வந்து மாமுனிகளின் மடத்தை அடைந்தார். அப்பொழுது மாமுனிகள் காலக்ஷேபம் செய்து கொண்டிருந்தார். அதனைக் கேட்ட அண்ணா பற்பல சாஸ்திரங்களில் மாமுனிகளுக்கு இருந்த அபார ஞானத்தை புரிந்து கொண்டார். மாமுனிகளிடம் சரணடைந்து அவரது சிஷ்யரானார்.

அண்ணன், எம்பெருமானின் மீதும் மாமுனிகளின் மீதும் பல க்ரந்தங்களைச் சாதித்தார். அவற்றில் வேங்கடேச சுப்ரபாதம், வேங்கடேச ப்ரபத்தி ஆகியவற்றை தனது ஆசார்யரின் மனம் மகிழுமாறு திருவேங்கடமுடையானுக்குச் சமர்ப்பித்தார்.

பாட்டி: குழந்தைகளே, நாம் இறுதியாக அப்பிள்ளை, அப்பிள்ளார் ஆகியோரைப் பற்றிப் பார்ப்போம். அவர்களைப் பற்றி நிறைய செய்திகள் கிடைக்க பெறுவதில்லை. அவர்கள் மணவாள மாமுனிகளின் ஆப்தசிஷ்யர்களானார்கள். வட இந்தியாவில் பல வித்வான்களை வென்றார்கள் எனத் தெரிய வருகிறது.

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அவர்கள் மாமுனிகளைப் பற்றித் தெரிந்திருந்தாலும், அவரிடம் அவர்களுக்கு எந்த அபிமானமும் ஏற்படவில்லை. பின்னர் அவரது பெருமைகளை கேள்விப்பட்டு , கந்தாடை அண்ணன், எறும்பியப்பா போன்றோர் மாமுனிகளை ஆச்ரயித்தனர் என்றும் கேள்விப்பட்டனர்.

வேதவல்லி: பாட்டி, பின்னர் அவர்கள் எப்படி மணவாள மாமுனிகளின் சிஷ்யர்களானார்கள்?

பாட்டி: ஆம் வேதவல்லி, எறும்பியப்பா தாம் மாமுனிகளிடம் அவர்கள் ஆசார்ய சம்பந்தத்திற்குத் தயார் என்று சொன்னார். பொன்னடிக்கால் ஜீயர் மாமுனிகளிடம் “அவர்கள் எறும்பியப்பாவிடம் நிறைய அர்த்தங்களைக் கேட்டிருக்கிறார்கள். அவர்களுக்கு உங்கள் சிஷ்யர்களாவதற்கு எல்லாத் தகுதியும் இருக்கிறது” என்றார் . அவர்களும் மாமுனிகளிடம் தங்களை ஏற்றுக்கொள்ளும் படியாக கேட்டார்கள். மாமுனிகள் பின்னர் அப்பிள்ளை அப்பிள்ளார் ஆகியோர்க்குப் பஞ்ச ஸம்ஸ்காரம் செய்தார்.

அப்பிள்ளாருக்கு ஜீயர் மடத்தின் ததீயாதாராதனம் போன்ற நித்யகைங்கர்யங்களில் ஈடுபடும் பொறுப்பு கொடுக்கப்பட்டது. கிடாம்பி ஆச்சான் எவ்வாறு எம்பெருமானாருக்கு கைங்கர்யம் செய்தாரோ, அவ்வாறே மாமுனிகளின் மடத்துக்கு அப்பிள்ளார் கைங்கர்யம் செய்தார்.

அப்பிள்ளை திருவந்தாதிகளுக்கு மாமுனிகளின் திவ்ய ஆணையின் படி வ்யாக்யானம் அருளினார். மாமுனிகளுடன் அவரது பல திவ்யப்ரபந்தத்துடன் சம்பந்தப்பட்ட கைங்கர்யங்களில் ஈடுபட்டார்.

மாமுனிகளின் இறுதிக்காலத்தில், அப்பிள்ளார் அவரிடம் தனக்கு மாமுனிகளின் அர்ச்சா விகிரஹத்தை கொடுக்குமாறு வேண்டினார். மாமுனிகள் தான் தினமும் பயன்படுத்துகிறச் சொம்பினை கொடுத்து அதிலிருந்து இரு விக்ரஹங்களைச் செய்ய சொன்னார். அப்பிள்ளாருக்கும் அப்பிள்ளைக்கும் ஆளுக்கு ஒரு விக்ரஹத்தை அவர்களின் நித்யதிருவாராதனத்திற்கு அளிக்கச் சொன்னார்.

அவர்களைப் போல ஆசார்ய அபிமானத்தை பெற நாமும் அவர்களின் திருவடித்தாமரைகளில் வேண்டுவோம்.

இது வரை நாம் மாமுனிகளின் பெருமைகளையும் அவரது அஷ்டதிக்கஜங்களின் பெருமைகளையும் பற்றித் தெரிந்து கொண்டோம்.

பராசரன்: இன்றைக்கு நிறையத் தெரிந்து கொண்டோம் பாட்டி.

பாட்டி: ஆம், குழந்தைகளா. உங்களுக்கு எல்லாம் மிக முக்கியமான ஒன்றைப் பற்றிச் சொல்லப் போகிறேன். கவனமாகக் கேளுங்கள்.

மாமுனிகளின் காலத்திற்குப் பிறகு, பல ஆசார்யர்கள் ஒவ்வொரு கிராமத்திலும் ஊரிலும் பக்தர்களை அனுக்ரஹித்து வந்தனர். திவ்யதேசங்களிலும் அபிமானஸ்தலங்களிலும் ஆழ்வார் ஆசார்யர் அவதார ஸ்தலங்களிலும் தங்கி ஞானத்தையும் பக்தியையும் வளர்த்தனர்.

திருமழிசை அண்ணாவப்பங்கார் ஸ்வாமியும் ஸ்ரீபெரும்புதூர் ஒன்றான எம்பார் ஜீயரும் சமீப காலத்தில் (200 வருடத்திற்கு முன்பாக) நம் சம்ப்ரதாயத்திற்காகப் பல ஆழ்ந்த கருத்துடைய க்ரந்தங்களையும் நிறைய கைங்கர்யங்களையும் செய்திருக்கிறார்கள்.

நான் உங்களுடன் பகிர்ந்து கொண்டதெல்லாம் இந்த ஆசார்யப் பரம்பரையிலிருந்து வந்தது தாம். நாம் அவர்களுக்கு எப்பொழுதும் நன்றிக்கடன் பட்டிருக்கிறோம். உங்களுக்கு பொழுது நன்றாக கழிந்தது என்று நினைக்கிறேன். நம்முடைய மனம், வாக்கு, மெய் எல்லாம் ஆழ்வார் ஆசார்யர் மற்றும் எம்பெருமானின் கைங்கர்யத்திலேயே ஈடுபட்டிருக்க வேண்டும்.

சரி, இரவாகி விட்டது. நம் ஆசார்யர்களின் சிந்தனையோடு வீட்டிற்குச் செல்லுங்கள்!

குழந்தைகள்: நன்றி பாட்டி!

அடியேன் பார்கவி ராமானுஜ தாசி

ஆதாரம்: http://pillai.koyil.org/index.php/2018/07/beginners-guide-ashta-dhik-gajas-and-others/

வலைத்தளம் – http://pillai.koyil.org/

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