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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और नायनार

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै शिष्य

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ प्रवेश करते हैं। बच्चे दादी माँ को तिरुप्पावै का पाठ करते हुए देखते हैं और उसके खत्म होने तक प्रतीक्षा करते हैं। दादी ने अपना पाठ समाप्त किया और बच्चों का स्वागत किया।

दादी : स्वागत बच्चो !

व्यास : दादी, पिछली बार जब आपने कहा था कि आप वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के बेटों के बारे में बताएंगे। कृपया हमें उनके बारे में बताएं।

दादी: हाँ व्यास । आज हम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के दो महान बेटों के बारे में बात करेंगे। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था कि उनके आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) और नंपेरुमाळ की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) को दो बेटों अर्थात् पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के साथ आशीर्वाद दिया गया था। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते हैं।

नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) परमपदधाम पहुंचने के बाद, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए और आगे बढ़ते हुए अपने बेटों को उन सभी अर्थों को सीखाते है जो उन्होंने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) से सीखे थे। कुछ समय बाद वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) ने अपनी आचार्य नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरीदास स्वामीजी) के बारे में अपने आचार्य कैंकर्य करते हुए अपनी तिरुमेनी को त्याग दिया और परमपद को प्राप्त किया, जिसके बाद उनके पुत्र पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) हमारे संप्रदाय का अगला आचार्य बन गए ।

अतुळाय : दादी , मैंने सुना है कि पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे।

कत्तालागीय पेरुमाल कोयिल में कालक्षेप करते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगम

दादी: अतुळाय आपने सही सुना। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) कोई और नहीं बल्कि देव पेरुमल खुद थे। पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) अपने अंतिम दिनों के दौरान ज्योतिष्कुडी में, नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) को हमारे संप्रदाय के अगला आचार्य घोषित करते है और तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) को व्याख्यान सिखाने का निर्देश देते हैं।  जब तिरुमलै अलवार कांचीपुरम में देव पेरुमल जी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, तो देव पेरुमल सीधे नालूर् पिळ्ळै (श्री कोलवराहाचार्य स्वामीजी) से बात करते हैं, जो उनके पास में खड़े थे और कहते हैं “जैसा कि मैंने ज्योतिष्कुडी में उल्लेख किया है कि आपको तिरुमलै अलवार को अरुळिच्चयल के सभी अर्थ सिखाना चाहिए”।

वेदवल्ली: दादी, पिल्लै लोकाचार्य ने ज्योतिष्कुडी नामक स्थान पर अपने अंतिम दिन क्यों बिताए? क्या उनका जन्म श्री रंगम में नहीं हुआ था?

दादी: पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) एक महान आचार्य थे जिन्होंने एक और सभी के लाभ के लिए आसान तमिल भाषा में अलवार पाशुरम पर सुंदर ग्रन्थ लिखे। उस समय  सभी संस्कृत या तमिल में पारंगत नहीं थे । उन लोगों के लिए जो भाषाओं से बहुत अच्छी जानकारी नहीं रखते, लेकिन फिर भी पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने हमारे पूर्वाचार्यों की कृतियों को सीखने और लाभ पाने की इच्छा रखने वालो के लिए उन्होंने बड़ी दया के साथ अपने आचार्यों से सरल और कुरकुरी भाषा में जो कुछ भी सुना, उसे प्रलेखित किया।   श्री वचन भूषण दिव्या शास्त्र उनका बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ है जिसमे हमारे संप्रदाय के अर्थों का विवरण है। इस प्रकार वह मुख्य आचार्य थे जिन्होंने प्रमाणं रक्षणं (हमारे सम्प्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा / पोषण) किया था।

पिळ्ळै लोकाचार्य – श्रीरंगं

पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) ने न केवल हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार की रक्षा की, बल्कि हमारे सम्प्रदाय के मूल – श्रीरंगम के नंपेरुमाळ जी की भी।  जब भगवान की असीम कृपा से श्रीरंग मे सब कुछ अच्छा चल रहा था, उसी दौरान मुस्लिम राजाओं के आक्रमण की खबर फ़ैल चुकी थी । श्री रंग मे स्थित श्री वैष्णवों और समान्य प्रजा को यह ज्ञात था की मुस्लिम आक्रमणकारि केवल हमारे मंदिरों पर आक्रमण करेंगे क्योंकि मंदिरों मे अत्यधिक धनराशि, सोना, चाँदि इत्यादि उपलब्ध है । यह जानकर तुरंत पिळ्ळै लोकाचार्य ( वरिष्ट श्री वैष्णव आचार्य थे ) जिन्होने इस स्थिति को संतुलित और नियन्त्रित किया । उन्होने अपने शिष्यों को आदेश दिया की वह सारे पेरिय पेरुमाळ के सन्निधि के सामने एक बडी दीवार खडा करे और वह श्री नम्पेरुमाळ और उभय नाच्चियार को लेकर दक्षिण भारत की ओर निकल पडे । वह वृद्ध अवस्था मे होने के बावज़ूद वह भगवान के दिव्य मंगल विग्रह को अपने साथ ले गए । बींच रास्ते मे भगवान के दिव्यमंगलविग्रह पर सजे हुए आभूषण कुछ स्थानिक चोरों ने चुरा लिए । सबसे आगे जाते हुए पिळ्ळै लोकाचार्य को जब यह ज्ञात हुआ वह तुरन्त उन चोरों के पीचे भागे और उन्होने उन चोरों को समझाया और चोरों ने उनके चरण कमलों का आश्रय लिया और आभूषण समर्पित किया ।  आभूषण पाकर पिळ्ळै लोकाचार्य आगे रवाना हुए ।

उसके पश्चात पिळ्ळै लोकाचार्य ज्योतिष्कुडि ( मदुरै के पास – अना मलै नामक पहाड की दूसरी ओर ) पहुँचे । पहुँचने के बाद, वृद्ध पिळ्ळै लोकाचार्य ने अपने प्राण त्याग करने की सोच से अगले दर्शन प्रवर्तक (तिरुमलै आऴ्वार – तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै) को घोषित किया और कूर कुलोत्तम दासर को उपदेश देते है कि वह तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अपने प्रशाशनिक कार्यों से मुक्त करें और उन्हे अगले दर्शन प्रवर्तक के कार्यों मे प्रशिक्षण दे । इस प्रकार अपना भौतिक शरीर [चरम तिरुमेनि] त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । इस प्रकार पिळ्ळै लोकाचार्य ने नम्पेरुमाळ की सुरक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया।   यदि उन्होंने और हजारों अन्य श्री वैष्णव जन, जिन्होंने अपने जीवन के  बलिदान नहीं किया होता , तो आज हम श्रीरंगम में नम्पेरुमाळ जी की पूजा और दर्शन नहीं कर पाते ।

ज्योतिष्कुडि – पिळ्ळै लोकाचार्य परमपद स्थल

पराशर : कोई आश्चर्य नहीं कि वह स्वयं देव पेरुमाळ का अवतार थे, अत्यंत बलिदान का प्रतीक !

दादी: हाँ पराशर, यही कारण है कि देव पेरुमाळ जी को ही हमारे संप्रदयाप के पेरुमाळ कहलाते है । श्री पिळ्ळै लोकाचार्य ने केवल प्रमाण रक्षण (ग्रन्थों के रूप में हमारे संप्रदाय के ज्ञान आधार का संरक्षण) ही नहीं किया था, वह प्रमेयरक्षक भी हुए [यानि जिन्होने भगवान को बचाया] में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करके एक श्री वैष्णव का असली गुणों को प्रकशित किये | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की तरह, जो एम्पेरुमान जी की तिरुमेनि के बारे में चिंतित रहते थे और उन्होंने तिरुपल्लाण्डु गाया, श्री पिळ्ळै लोकाचार्य जी ने नम्पेरुमाळ जी की अर्चा मूर्ति में एक बच्चे को देखा और पितृत्व प्रेम और देखभाल करते हुए, नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की और अपने जीवन का बलिदान किये पर मुस्लिम आक्रमणकारियों को नम्पेरुमाळ जी को नहीं लेने दिए ।  इसलिए, अगली बार जब आप पेरुमाळ मंदिर जाते हैं, तो याद रखें कि हमारे पास जो संप्रदाय है, वह आज हमारे सामने हजारों श्री वैष्णव द्वारा किए गए निस्वार्थ बलिदान द्वारा बनाया गया है। उन्होंने संप्रदाय और नम्पेरुमाळ जी की रक्षा की ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां, उनके श्रम के फल का आनंद ले सकें। हम इतने समर्थ नहीं की ऐसे श्री वैष्णव जन जिन्होंने नम्पेरुमाळ जी की रक्षा करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया उनको कुछ दे सके, सिवाय इसके की हम सभी श्री वैष्णव जन के बलिदान का स्मरण रखे और अपने सम्प्रदाय द्वारा दिए गए मूल्यों और ज्ञान को हम आगे लेकर जाये, और आने वाली पीढियों तक यह मूल्य और ज्ञान पहुंचा सके|

अतुळाय : दादी, हमें पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नयनार के बारे में अधिक बताएं।

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अळगिय मनवाळ पेरुमाळ नायनार

दादी: नायनार ने हमारे संप्रदाय के आवश्यक सिद्धांतों पर अद्भुत ग्रन्थ लिखे, जिनमे से मुख्य आचार्यहॄदयम् ग्रन्थ है । उनको आचार्य पेरियवाच्चान् पिळ्ळै जी के समान महान आचार्य माना जाता है जिनको हमारे सम्प्रदाय और दिव्य प्रभंद का गहरा ज्ञान था |  नायनार को महान आचार्य के रूप में सराहा जाता है । वह “जगत् गुरुवरानुज – पिळ्ळै लोकाचार्य के छोटे भाई” के रूप में लोकप्रिय हैं। नायनार ने कम उम्र में अपनी तिरुमेनि को छोड़ने का फैसला किया और पिळ्ळै लोकाचार्य को पीछे छोड़कर परमपद को गमन किये । उनकी रचनाएँ ज्ञान रत्न के अलावा और कुछ नहीं हैं, जिसके बिना हमारे संप्रदाय के जटिल अर्थ और विवरण आम लोगों की पहुंच से बाहर हो जाते। मामुनि स्वामी जी नायनार स्वामीजी का महिमामंडन करते हुए कहते है कि पेरियवाच्चन पिळ्ळै स्वामीजी के बाद नायनार स्वामीजी ही है जिन्होंने अपने कामों से बहुत योगदान दिया है। जब नायनार स्वामीजी परमपदम पहुंचते है, तो पिळ्ळै लोकाचार्य स्वामीजी दुःख के सागर में गिर जाते हैं और नायनार स्वामीजी के तिरुमुडी (सिर) को अपनी गोद में रखते हुए रोते हैं। वह नायनार स्वामीजी को एक असाधारण श्री वैष्णव के रूप में देखते है जिसे दुनिया ने बहुत कम समय में खो दिया है।

व्यास : दादी माँ, पिळ्ळै लोकाचार्य और नायनार का जीवन सुनने के लिए बहुत ही रोचक और भावनात्मक है।

दादी: हाँ व्यास । जब हम अपने आचार्यों और उनके जीवन के बारे में बात करना शुरू करते हैं, तो हमें समय बीतने का कभी पता नहीं चलता। बाहर अंधेरा हो रहा है। आप बच्चों को अब अपने घरों को चले जाना चाहिए। अगली बार जब हम मिलेंगे, तो मैं आपको पिळ्ळै लोकाचार्य के शिष्यों के बारे में बताउंगी ।

बच्चे अपने-अपने घरों को वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी), पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी), अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) नायनार और उनके शानदार जीवन के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/09/beginners-guide-pillai-lokacharyar-and-nayanar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै शिष्य

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

अंडाल दादी रसोई घर में खाना बना रही होती है जब पराशर, वेद व्यास, वेदवल्ली और अतुळाय साथ में दादी के घर में प्रवेश करते है। दादी बच्चों की बात सुनके, बच्चों के स्वागत के लिए लिविंग रूम के अंदर आती है।

दादी : स्वागत बच्चो | अपने हाथ पावं दो लो | मंदिर का प्रसाद लीजिये | पिछली बार, हमने अपने आचार्य नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में जाना | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया, आज हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रमुख शिष्यों के बारे में जानेंगे | वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि उनके कुछ प्रमुख शिष्य थे |

व्यास : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कई शिष्य थे | क्या आप हमें उनके बारे में बताएंगी |

दादी : हाँ, चलो हम उनके बारे में एक एक करके जानते है | सबसे पहले हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्य जिनका नाम व्याख्यान चक्रवर्ती, पेरियवाच्चान पिळ्ळै जी के बारे में जानते है | पेरियवाच्छान पिळ्ळै, सेंगणूर मे, श्री यामुन स्वामीजी के पुत्र “श्री कृष्ण” के रूप मे अवतरित हुए और पेरियवाच्चान पिळ्ळै के नाम से मशहूर हुए । नम्पिळ्ळै के प्रधान शिष्यों में से वे एक थे और उन्होंने सभी शास्त्रार्थों का अध्ययन किया । नम्पिळ्ळै के अनुग्रह से पेरियवाच्चान पिळ्ळै सम्प्रदाय में एक प्रसिद्ध आचार्य बने । पेरिय तिरुमोळि ७. १०. १० कहता है कि – तिरुक्कण्णमंगै एम्पेरुमान की इच्छा थी कि वे तिरुमंगै आळ्वार के पाशुरों का अर्थ उन्हीं से सुने| अतः इसी कारण, तिरुमंगै आळ्वार नम्पिळ्ळै बनके अवतार लिए और एम्पेरुमान पेरियवाच्छान पिळ्ळै का अवतार लिए ताकि अरुलिचेयळ के अर्थ सीख सके ।

पेरियवाच्छान पिळ्ळै – सेंगानूर

व्यास : दादी, पेरियवाच्चान पिळ्ळै स्वामीजी को व्याख्यान चक्रवर्ती क्यों कहा जाता था ?

दादी : पेरियवाच्छान पिळ्ळै जी ही हमारे सम्प्रदाय के एक ऐसे आचार्य हुए जिन्होंने अरुळिचेयळ की व्याख्या लिखी है | इनकी अरुळिचेयळ और श्री रामायण में निपुणता का प्रमाण इनसे लिखे गए पाशुरपड़ि रामायण ही है जिस में वे केवल अरुळिचेयळ के शब्द उपयोग से पूरे श्री रामायण का विवरण सरल रूप मे प्रस्तुत किया है। देखा जाये तो यह उनका काम नहीं था, कोई भी अरुळिचेयल के आंतरिक अर्थों के बारे में नहीं बोल सकता है और न ही समझ सकता है। उनका कार्य हमारे सभी पूर्वाचार्य के ग्रन्थों को समाहित करता है।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे मुख्य शिष्य जी का नाम वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै था | श्री रंगम में श्री कृष्ण पादर के रूप में जन्मे, वह पूरी तरह से आचार्य निष्ठा में डूबे हुए थे। अपने आचार्य नम्पिळ्ळै की कृपा से, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने एक पुत्र को जन्म दिया और उसका नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, क्योंकि पुत्र का जन्म उसके आचार्य नम्पिळ्ळै (जिसे लोकाचार्य भी कहा जाता है) के आशीर्वाद से हुआ था। मुझे आशा है कि आप सभी को नम्पिळ्ळै के पीछे की कहानी को लोकाचार्य के नाम से याद किया जाएगा।

व्यास : हाँ, दादी | वह कंदाडै तोळप्पर ही थे जिन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी को लोकाचार्यार नाम से संभोदित किया था | हमें वह कथा स्मरण है |

वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै – काँचीपुरम

दादी : जब वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने अपने बेटा का नाम पिळ्ळै लोकाचार्य रखा, नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने बच्चे के नामकरण अऴगिय मणवाळ मामुनि के अपने इरादे का खुलासा किया | जल्द ही, नंपेरुमळ, एक और बेटे के साथ वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै को आशीर्वाद देते हैं और दूसरे बेटे का नाम अऴगिय मणवाळ मामुनि पेरुमल नायराज रखा गया क्योंकि वह अऴगिय मणवाळ मामुनि (नामपेरुमल) की कृपा से पैदा हुए थे, जिससे नम्पिळ्ळै की इच्छा पूरी हुई। दोनों लड़के राम और लक्ष्मण की तरह बड़े हो जाते हैं और महान संत बन जाते हैं और हमारी संप्रदाय के लिए महान कैंकर्य करते है | वे दोनों एक ही समय में हमारे संप्रदाय के महान आचार्य जैसे कि नम्पिळ्ळै, पेरियवाच्चान् पिळ्ळै, पिल्लई, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, आदि का आशीर्वाद और मार्गदर्शन पा रहे थे।

एक बार, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै ने अपने तिरुमालीगई (श्री वैष्णव के घरों को तिरुमालीगई कहते है ) के लिए तदीयराधन के लिए नम्पिळ्ळै स्वामीजी को आमंत्रित किया और नम्पिळ्ळै ने स्वीकार किया और उनके तिरुमालीगई में गए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी खुद तिरुअराधनम की शुरुआत करते हैं और कोयल आळ्वार (पेरुमल सानिधि) में, नम्माळवार स्वामीजी की पाशुरम के सभी उपदेशों और व्याख्यानों को बड़ी सुंदरता एवं सरल अर्थो में ताड़ के पत्तों के गुच्छो में देखते हैं। रूचि होने के कारण, वह उनमें से कुछ को पढ़ना शुरू कर देता है और वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी से पूछते है कि वह क्या था। वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी बताते है कि हर रात, उनकी बात सुनने के बाद उन्होंने नम्पिल्लई के व्याख्यान को रिकॉर्ड किया। नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी से पूछते हैं कि उन्होंने उनकी अनुमति के बिना ऐसा क्यों किया और पूछते हैं कि क्या उन्होंने पेरियवाच्चान पिळ्ळै व्याख्यानम (आळ्वार पाशुरम के अर्थों का विस्तृत विवरण) के साथ प्रतियोगिता के रूप में यह सब किया । वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै जी दोषी महसूस करते है और तुरंत नम्पिल्लई स्वामीजी के चरण कमलो में गिर जाते है और बताते है कि उन्होंने इसे केवल भविष्य में संदर्भित करने के लिए लिखा था। उनकी व्याख्याओं से सहमत होकर, नम्पिल्लई स्वामीजी ने विद्यानम का महिमामंडन किया और अपने काम के लिए वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी की प्रशंसा की। ऐसा विशाल ज्ञान और आचार्य अभिमान था वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी का ।

पराशर : उस व्याख्यान का क्या हुआ ? क्या वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी उसको पूर्ण कर पाए ?

दादी : हाँ, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी ने उसको पूर्ण किया और तिरुवायमोली का यह व्याख्यान को प्रसिद्ध ईडु ३६००० पड़ी से संबोध्दित करते है | नम्पिळ्ळै स्वामीजी वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है यह व्याख्यान ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी को प्रधान करे जो की वह अपने वंशजों को उपदेश कर सके |

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – ईयुण्णि माधव पेरुमाळ द्वितीय पंक्ति में

वेदवल्ली : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी द्वारा दिया गए व्याख्यान को ईयुण्णि माधव पेरुमाळ स्वामीजी ने क्या किया ?

दादी : ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् अपने पुत्र ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् को यह सिखाते हैं। ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् का जन्म नक्षत्र स्वाति है । ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् इसे अपने प्रिय शिष्य नालूर् पिळ्ळै को सिखाते हैं।  इस तरह इसे एक आचार्य से उचित तरीके से अपने शिष्य के पास सिखाया जाता रहा | नालूर् आच्चान् पिळ्ळै, नालूर् पिळ्ळै के पुत्र और प्रिय शिष्य थे। उनका जन्म धनु-भरणी नक्षत्र में हुआ था। उन्हें देवाराज आच्चान् पिळ्ळै, देवेसर, देवादिपर और मैनाडू आच्चान् पिळ्ळै नाम से भी जाना जाता है। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै ने 36000 पद ईदू का अध्ययन अपने पिताश्री के चरण कमलों के सानिध्य में किया था। नालूर् आच्चान् पिळ्ळै स्वामीजी के बहुत शिष्य थे, उनके शिष्यों में से एक थे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै स्वामीजी । नालूर् पिळ्ळै और नालूर् आच्चान् पिळ्ळै भी कांचीपुरम पहुँचते हैं। वे सभी देव पेरुमाल के समक्ष एक दूसरे से मिलते हैं। उस समय देव पेरुमाल, अर्चकर के माध्यम से बात करके, बताते हैं कि पिळ्ळै लोकाचार्य और कोई नहीं स्वयं भगवान हैं और नालूर् पिळ्ळै को आदेश करते हैं कि वे तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै को ईडु व्याख्यान का उपदेश दें। परंतु नालूर् पिळ्ळै देव पेरुमाल से पूछते हैं कि क्या वे ठीक तरह से उन्हें उपदेश कर पाएंगे (अपनी अधिक उम्र की वजह से)? इस पर देव पेरुमाल कहते हैं “तब आपके पुत्र (नालूर् आच्चान् पिळ्ळै) उन्हें उपदेश कर सकते हैं। उनका उपदेश करना आपके उपदेश करने के समान ही है”। इस तरह से तिरुवाय्मोळि पिळ्ळै अन्य श्री वैष्णवों के साथ नालूर् आच्चान् पिळ्ळै से ईदू व्याख्यान का अध्ययन करते हैं और कालांतर में आलवार तिरुनगरी लौटकर उसे मणवाल मामुनिगल को सिखाते हैं, जो ईत्तू पेरुक्कर (जिन्होंने ईदू व्यख्यान का पोषण किया) के रूप में प्रसिद्ध हुए। इस तरह नम्पिळ्ळै स्वामीजी जानते थे की ईडु व्याख्यान हस्तांतरित होते हुए मणवाल-मामुनि तक पहुंचा और इसीलिए उन्होंने इसे ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् स्वामीजी को दिया ।

अतुळाय : दादी, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ् एवं ईयुण्णि पद्मनाभ पेरुमाळ् में ईयुण्णि शब्द का क्या अभिप्राय है ?

दादी : तमिळ में “ईथल” का अर्थ है परोपकार । “उन्नुथल” का अर्थ है भोजन करना । ईयुण्णि का अर्थ है – वह जो बड़े परोपकारी है, जो अन्य श्री वैष्णवों को भोजन कराने पर ही स्वयं भोजन करता है ।

नम्पिळ्ळै स्वामीजी के दूसरे प्रमुख शिष्य पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी थे | जैसे नन्जीयर् (एक् सन्यासी) ने भट्टर् (एक गृहस्थ) कि सेवा की वैसे ही पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् (एक सन्यासी) ने नम्पिळ्ळै (एक गृहस्थ्) कि सेवा की | ये नम्पिळ्ळै के प्रिय शिष्य थे और पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के नाम से भी जाने जाते है | पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्यारे शिष्यों में थे इसीलिए उनको पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् कहा जाता था | उन्होंने अपना जीवन आचार्यो के प्रति बहुत सम्मान प्रतिष्ठा के साथ एक सत्य श्री वैष्णव की तरह जिये | उनका आचार्य अभिमान बहुत ही प्रसिद्व है |

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पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् – नम्पिळ्ळै के चरण कमलों में

पराशर: दादी, आज अपने नम्पिळ्ळै स्वामीजी और उनके शिष्यों के बीच हुई बातचीत के बारे में कुछ नहीं बताया | कृपया उनके बीच हुई कुछ रोचक बातचीत बताएं।

दादी : हमारे सभी पूर्व आचार्यो ने भगवत् विषयम और भागवत् कैंकर्यं संबंधी को ही प्रकाशित किया | एक बार जब पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् बीमार थे, तो वह अन्य श्री वैष्णव से पिन्बळगराम पेरुमाल् जीयर् के शीघ्र स्वस्थ होने के लिए प्रार्थना करने के लिए कहते हैं। आम तौर पर हमारे संप्रदाय में, श्री वैष्णव को किसी भी चीज़ के लिए भगवान् जी से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए – यहाँ तक कि बीमारी से उबरने के लिए भी नहीं । यह देखकर, नम्पिळ्ळै के शिष्यों ने इसके बारे में नम्पिळ्ळै से पूछ ताछ की। नम्पिळ्ळै पहले कहते हैं, ” आप एंगल अलवान स्वामीजी के पास जाओ और उनसे पूछो जो सभी शास्त्रों के विशेषज्ञ है | एंगळ अळवान स्वामीजी ने उत्तर दिया “वह श्री रंगम से जुड़ा हो सकते है और वह कुछ और समय के लिए यहां रहना चाहता है”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तब अपने शिष्यों से अममांगी अम्माल से यह पूछने के लिए कहा कि “कौन होगा जो नम्पिळ्ळै स्वामीजी की कालक्षेपं को छोड़ना चाहता है, वह प्रार्थना कर रहे होंगे ताकि वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कालक्षेपं को सुन सके”। नम्पिळ्ळै स्वामीजी अंत में खुद जीयर स्वामीजी से पूछते है। जीयर स्वामीजी जवाब देते है, “यद्यपि आप वास्तविक कारण जानते हैं, फिर भी आप चाहते हैं कि यह मेरे द्वारा प्रकट हो। चलिए में कहता हूँ की मैं यहां क्यों रहना चाहता हूं। प्रतिदिन, आप स्नान करने के बाद, मुझे आपके रूप के दिव्य दर्शन प्राप्त होते है और पंखा आदि लगाकर आपकी सेवा करने का अवसर मिलता है। मैं उस सेवा को कैसे छोड़ सकता हूं और अभी कैसे परमधाम जा सकता हूं? ”। इस प्रकार, पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् शिष्य के वास्तविक स्वरूप को प्रकट करते है और कहते है की एक शिष्य , स्वयं के आचार्य के दिव्य रूप में पूर्ण निष्ठा होनी चाहिए | यह सब सुनकर शिष्यों को जीयर स्वामीजी की नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति भक्ति देखकर अत्यंत आश्चर्य हुआ। पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् को नम्पिळ्ळै स्वामीजी से इतना लगाव था कि वह परमपद पर जाने का विचार भी त्याग देते थे । पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् के आचार्य में गहरी निष्ठा थी |

अंत में, हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के एक और शिष्य के बारे में देखते हैं जिनका नाम
नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् | प्रारंभ में, नडुविल् तिरुवीदि पिल्लै भट्टर् स्वामीजी का नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति अनुकूल रवैया नहीं था। अपनी समृद्ध पारिवारिक विरासत (कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) और पराशर भट्टर के परिवार में आने के कारण) उनको अभिमान हो गया था और नम्पिळ्ळै स्वामीजी का सम्मान नहीं करते थे । एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है कि कैसे उन्होंने नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलो में शरणागति की ।

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नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कलाक्षेप गोष्ठी – नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् तृतीय पंक्ति में

व्यास : यह कैसी विडंबना है कि कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के वंशज में गर्व और अहंकार के गुण थे। दादी हमें कहानी बताओ!

दादी : हाँ, लेकिन अनचाहा गर्व लंबे समय तक नहीं रहता ! सब के बाद, वह कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के ही पोते थे ! एक बार, नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) राजा के दरबार में जा रहे थे । वह रास्ते में पिन्भळगिय पेरुमाळ् जीयर् से मिलते है और उन्हें राजा के दरबार में जाने के लिए आमंत्रित करते है। राजा उनका स्वागत करता है, उनका सम्मान करता है और उन्हें एक अच्छा पद बैठने के लिए प्रदान करता है। अच्छी तरह से सीखा हुआ राजा को नडुविल् तिरुवीदिप् पिळ्ळै भट्टर् (मद्यवीदि श्रीउत्तण्ड भट्टर स्वामीजी) की बुद्धि का परीक्षण करना चाहते हैं, वह उनसे श्रीरामायण के बारे में सवाल पूछते हैं। श्री राम स्वयं कहते हैं कि वह सिर्फ एक इंसान हैं और राजा दशरथ के प्रिय पुत्र हैं। लेकिन जटायु के अंतिम क्षणों के दौरान, श्री राम जी उनको वैकुण्ठ तक पहुँचने का आशीर्वाद दिया।  अगर वह एक सामान्य इंसान थे , तो वह किसी को वैकुंठ तक पहुंचने के लिए कैसे आशीर्वाद दे सकते है? ”। भट्टर स्वामी जी अवाक थे और किसी भी सार्थक स्पष्टीकरण के साथ प्रतिक्रिया नहीं दिए । संयोग से, राजा का ध्यान किसी अन्य कार्य में चला जाता है। उस समय, भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तरफ देखकर कहते है की नम्पिळ्ळै स्वामीजी ही आपको यह प्रकाशित करेंगे की कैसे एक सत्यवान पुरष पुरे विश्व को वश में कर सकता है | भट्टर स्वामीजी राजा को उस समय समझाते है कि जब राजा उन पर ध्यान केंद्रित करता है। राजा, एक बार उत्तर सुनकर सहमत हो जाता है और भट्टार को बहुत धन के साथ सम्मानित करता है। भट्टर स्वामी नम्पिळ्ळै स्वामीजी के प्रति के प्रति महान कृतज्ञता दर्शाते हुए कहते है वह नम्पिळ्ळै स्वामीजी की तिरुमोळि में जाते है और जो धन उनको राजा से मिला है उसको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के श्री चरणों में समर्पित करते है | भट्टर स्वामीजी नम्पिळ्ळै स्वामीजी को यह कहते है की मुझे आपकी शिक्षाओं में से सिर्फ एक छोटी सी व्याख्या करने से ये सारी दौलत मिली। सभी के साथ, मैंने आप के मूल्यवान संघ / मार्गदर्शन को खो दिया है। अब से, मैं यह सुनिश्चित करूँगा कि मैं आपकी अच्छी तरह से सेवा करूँ और आपसे संप्रदाय के सिद्धांत सीखूँ। ” नम्पिळ्ळै स्वामीजी भट्टर स्वामी जी को आलिंगन करते है और उन्हें हमारे संप्रदाय के सभी सार सिखाते हैं। तो बच्चों, आप इस कहानी से क्या सीखते हैं?

वेदवल्ली : मैंने अपने पूर्वजों के आशीर्वाद से यह सीखा है, पराशर भट्टर स्वामीजी सही गंतव्य पर पहुंच गए।

अतुल्हे : मैंने नम्पिळ्ळै (कलिवैरिदास स्वामीजी) की महानता और उनके ज्ञान के बारे में सीखा।

दादी: तुम दोनों सही हो। लेकिन एक और सबक है जो हम इस कहानी से सीखते हैं। ठीक उसी तरह जैसे कि श्रीमन्न नारायण भगवानजी हमें तभी स्वीकार करते है जब हम अपने आचार्यों के माध्यम से उनसे संपर्क करते हैं, और आचार्य तक पहुंचना हो तो श्री वैष्णव जन के साथ दिव्य सम्बन्ध होना चाहिए | इसी को हम श्री वैष्णव सम्बन्ध या अडियरगळ सम्बन्ध कहते हैं। यहाँ, ऐसा कौन श्री वैष्णव होगा जिन्होंने पराशर भट्टर को नम्पिळ्ळै से जोड़ा था?

दादी: हाँ! इससे हमें भागवत सम्बन्ध का महत्व पता चलता है।  जीयर स्वामीजी, नम्पिल्लई के प्रिय शिष्य होने के नाते, आचार्य ज्ञान (प्राप्ति) और संबंध के साथ भट्टार को आशीर्वाद दिया। आइए हम नम्पिळ्ळै स्वामीजी के चरण कमलों और उनकी साधनाओं पर ध्यान दें।

बच्चे विभिन्न आचार्यों और उनकी दिव्य सेवाओं की महानता के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्री पराशर भट्टर्

पराशर, व्यास वेदवल्ली और अतुलाय के साथ अण्डाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु : स्वागत बच्चो | आज हम अगले आचार्य जी जिनका नाम नन्जीयर् स्वामीजी है जो भट्टर स्वामीजी के शिष्य थे उनके बारे में जानेंगे | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया था की नन्जीयर् स्वामीजी जिनका जन्म श्रीमाधवार जी के रूप में हुआ उनको सम्प्रदाय में रामानुज स्वामीजी की दिव्या आज्ञा के अनुसार पराशर भट्टर स्वामीजी सम्प्रदाय में लेकर आये थे | हमनें देखा कैसे भट्टर स्वामीजी पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए | वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

व्यास : दादी, अगर रामानुज स्वामी जी और भट्टर स्वामी जी जैसे आचार्य दूसरे सम्प्रदाय को मानाने वाले जैसे यादव प्रकाश (जो बाद में गोविन्द जीयर बने), गोविंदा पेरुमल ( जो एम्बार स्वामी जी कहलाएं), यज्ञ मूर्ति ( जो अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति) कहलायें) और माधवर (जो नन्जीयर स्वामीजी कहलाये), उन्होंने शैव मत के राजाओं को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की जिनके कारण उनको कठिनाईओं का सामना करना पड़ा? वह शैव राजाओं से दूर क्यों रहे ?

दादी : व्यास हमारे पूर्व आचार्य जानते थे की किसको सुधारा जा सकता है किसको नहीं? उक्त आचार्य के मामले में, एक बार जब वे जानते थे कि प्रतिद्वंद्वी सही था, तो उन्होंने गरिमा के साथ हार स्वीकार कर ली और न केवल उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उन्होंने पेरिय तिरुमलई नम्बि, रामानुज स्वामी और श्री भट्टर स्वामी जी के चरण कमलो में समर्पण कर दिए और श्री वैष्णव संप्रदाय स्वीकार किये | हालाँकि, शैव राजा न तो एक उचित तर्क के लिए तैयार थे और न ही उन्होंने हार मानने के लिए पर्याप्त सम्मान दिया और श्रीमान नारायण की सर्वोच्चता के शाश्वत सत्य को महसूस किया | जैसा कि पुरानी कहावत है, “केवल जो सो रहा है उसे जगाना संभव है, जो सोने का बहाना कर रहा है उसे जगाना असंभव है”। हमारे पूर्वाचार्य जानते थे कि वास्तव में कौन सो रहा था और कौन केवल दिखावा कर रहा था। इसलिए उनके फैसले अलग-अलग थे। इसके अलावा, ऐसे व्यक्तियों के दोषों के बावजूद, हमारे पूर्वाचार्यों ने भी उनकी मदद करने के लिए वास्तव में प्रयास किया है, लेकिन बाद में दूसरी तरफ से बहुत अधिक प्रतिरोध छोड़ दिया।

पराशर : दादी, माधवार स्वामीजी को नन्जीयर नाम कैसे मिला |?

दादी : भट्टर स्वामी ने माधवर स्वामी को शास्त्रार्थ में पराजित किये और श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा – माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए । श्रीभट्टर स्वामी जी के चले जाने के बाद, माधवर को अपने फैसले से कोई समर्थन नहीं मिला। श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धन–संपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है – संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्य–भक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर “नम्–जीयर” से सम्भोधित करते है और तबसे नम्–जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए । भट्टर और नन्जीयर् आचार्य–शिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर् सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । उनकी आचार्य भक्ति की कोई सीमा नहीं थी | नन्जीयर् कहते थे – वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुःख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयर् को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर् – तिरुनारायणपुरं

अतुलाय : दादी, हमें नन्जीयर् स्वामीजी जी की भक्ति के बारे में कुछ कथा बताये ?

दादी : एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर् अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर् से कहे की नन्जीयर् आपको यह सन्यासाश्रम उचित नहीं लगता, आपको मुझे नहीं उठाना चाहिए | नन्जीयर् स्वामीजी कहते है अगर मेरा त्रिदण्डं मेरे कैंकर्य में रूकावट बन रहा है तो में इसे तोड़ देता हूँ और अपना सन्यासाश्रम छोड़ देता हूँ |

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर् से शिकायत किए । नन्जीयर् ने कहा – यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर् के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर् स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

वेदवल्ली : अभी जो वार्तालाप हुआ क्या आपको पसंद आया ?

दादी (मुस्कुराते हुए ) : हाँ, हमारी चर्चा पसंद आयी लेकिन बहुत रोचक चर्चा थी |

एक बारे नन्जीयर स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा – क्यों सारे आळ्वार भगवान श्री–कृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है – जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभी–अभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।

एक और बार नन्जीयर् स्वामी जी भट्टर स्वामीजी से पूछते है की राजा महाबली पाताल लोक में क्यों गए और उनके गुरु शुक्राचार्य जी की आँख कैसे खो गयी ?
भट्टर स्वामीजी कहते है जब उनके गुरु शुक्राचार्य जी राजा महाबली को उनका बचन पूर्ण करने के लिए रोकते है जो उन्होंने उस समय वामन भगवान जी से किया था, उसी कारण उनकी आँख चली गयी और जैसे राजा महाबली ने अपने आचार्य की आज्ञा नहीं मानी इसीलिए उन्हें पाताल लोक जाने का दंड मिला | इसलिए, यहाँ, भट्टर स्वामीजी इस बात पर जोर देते हैं कि किसी के अपने आचार्य का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। उनके बीच कई ऐसी दिलचस्प बातचीत हुई। इन वार्तालापों ने नन्जीयर् को उनके लिखित कार्यों में भी मदद की।

एक दिन नन्जीयर् स्वामीजी चाहते थे उनके लिखे हुए काम की प्रतियां बनायीं जाये और अपने शिष्यों से पूछा की कौन इस कैंकर्य को करने योग्य है | नम्बुर वरदराजार स्वामीजी का नाम प्रस्तावित किया | नन्जीयर् स्वामीजी ने पहले सम्पूर्ण तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान का कालक्षेप वरदराज स्वामीजी को दिए और फिर उन्हें व्याख्यान की मूल प्रति प्रधान की | वरदराज स्वामीजी ने निर्णय लिए की वह अपने मूल ग्राम जो कावेरी नदी की किनारे पड़ता था वहां जाकर लेखन पर ध्यान केंद्रित कर सके और इसे जल्दी से समाप्त कर सके । नदी पर करते समय अकस्मात बाढ़ आ गयी और वरधराजर स्वामीजी तैरने लगे । ऐसा करते समय, मूल ग्रन्थम उसके हाथ से फिसल जाता है और वह तबाह हो जाता है। अपने मूल स्थान पर पहुंचने के बाद, वह अपने अचर्यन और उसके द्वारा दिए गए अर्थों पर ध्यान देते है और तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान को फिर से लिखना शुरू करते है। चूंकि वे तमिल भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ थे, इसलिए जहाँ भी उनको लगता, अच्छे अर्थ जोड़ते हैं और जब अंत में नन्जीयर् स्वामीजी के पास वापस लौटते हैं तो उनको हस्त लिखित ग्रन्थ प्रस्तुत करते हैं। नन्जीयर् स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान देखकर समझ जाते है कि मूल ग्रन्थ से कुछ परिवर्तन हुआ है , और पूछते है यह कैसे हुआ ? वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वाला प्रतिनिधि होगा । नन्जीयर् स्वामीजी ने भी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की महिमा का गुणगान किये जब नम्पिळ्ळै स्वामीजी नन्जीयर स्वामीजी से बहुत सुन्दर बेहतर स्पष्टीकरण देते है तो नन्जीयर् स्वामीजी प्रसन्न होते है | यह नन्जीयर् स्वामीजी की महिमा को प्रकाशित करता है | भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर् ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर् की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

व्यास : दादी, हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में बताइये |

दादी : में आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में और उनकी महिमा की बारे में कल बताउंगी | अभी देरी हो रही है | अभी आपको घर चाहिए |

बच्चे भट्टर स्वामीजी, नन्जीयर् स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में चिंतन करते हुए घर जाते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री पराशर भट्टर्

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

पराशर और व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो ! आज हम दूसरे आचार्य जी के बारे में बात करेंगे जिनका नाम श्री पराशर भट्टर् जी था, जो एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी के शिष्य थे और उनका एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और एम्पेरुमानार जी के प्रति बहुत स्नेह भक्ति रखते थे | जैसे मैंने आपको बताया की एम्पेरुमानार जी श्री पराशरजी और महर्षि व्यास जी की प्रति आभार व्यक्त करने के लिए कुरेशा स्वामीजी की दोनों पुत्रो का नाम श्री पराशर भट्टर और वेद व्यास भट्टर रखते है | यह उन तीन वचनों में से एक वचन था जो उन्होंने अपने गुरूजी श्री आळवन्दार् स्वामीजी से पूरा करने के लिए किया था | श्री पराशर और वेद व्यास भट्टर जी का जन्म श्रीरंगम के श्रीनाथ पेरिय पेरुमाल जी से प्रसाद रूप में कुरेशा जी और उनकी पत्नी अण्डाल जी से हुए थे |

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

कूरत्ताळ्वान् अपने पुत्र पराशर भट्टर और वेद व्यास के साथ

पराशर : दादी, क्या मेरा और व्यास का नाम आचार्य जी के नाम पर रखा गया ?

दादी : हाँ, पराशर ! बच्चो का नाम आचार्य जी के नाम पर ही रखा जाता है या फिर भगवान के नाम पर ताकि बच्चो को बुलाते हुए हमें भगवानजी और आचार्यजी का दिव्य नाम लेने का अवसर प्राप्त हो | इसी कारण से हम अपने बच्चो का नाम भगवान, श्रीलक्ष्मीजी या आचार्यजी के नाम पर रखते है ताकि हम उनका पवित्र नाम लेकर बच्चो को पुकारे और हमें समय मिले की हम अपने आचार्य जी और भगवानजी के बारे में और दिव्य गुणों के बारे में विचार कर सके| अन्यथा इस कार्यरत संसार में किसके पास इतना समय नहीं होगा की समय निकाल कर भगवानजी के बारे में और उनके दिव्य नामो के बारे में सोच सके ? लेकिन वर्तमान में हालत बदले हुए है| जीव फैशन परस्त नामों को प्रयोग में लाते है जिसका कोई तर्क नहीं बनताजिससे हमें भगवान, श्रीमहालक्ष्मीजी, हमारे आचार्य जी का भी स्मरण नहीं होता |

श्रीरंगम आने के बाद एक बार श्री कूरत्ताळ्वान् भिक्षा मांगने [उंझा वृत्ति] हेतु घर से निकले परंतु बारिश की वजह से खालि हाथ लौटे।आण्डाळ और आळवांन् बिना कुछ पाये खाली पेट विश्राम कर रहे थे | विश्राम के समय मे उनकी पत्नी श्री आण्डाळ को मंदिर के अंतिम भोग की घंटी की गूंज सुनाई देती है। तब श्री आण्डाळ भगवान से कहती है – “यहाँ मेरे पती जो आपके बहुत सच्चे और शुध्द भक्त है जो बिना कुछ खाए ही भगवद-भागवद कैंकर्य कर रहे हैं दूसरी ओर आप स्वादिष्ट भोगों का आनंद ले रहे है यह कैसा अन्याय है स्वामि”। कुछ इस प्रकार से कहने के पश्चात चिंताग्रस्त पेरियपेरुमाळ अपना भोग उत्तमनम्बि के द्वारा उनके घर पहुँचाते है। भगवान का भोग उनके घर आते हुए देखकर कूरत्ताळ्वान् आश्चर्यचकित हो गए। उन्होने तुरंत अपनी पत्नी की ओर मुडकर पूछा – क्या तुमने भगवान से शिकायत किया की हमे अन्न की व्यवस्था करें ? यह पूछने के पश्चात, आण्डाळ अपनी गलती स्वीकार करती है और कूरत्ताळ्वान् इस विषय से नाराज/अस्तव्यस्त हो गये क्योंकि उनकी पत्नी ने भगवान को प्रसाद देने से निर्दिष्ट किया। घर आए हुए भगवान के प्रसाद का अनादर न हो इसीलिये कूरत्ताळ्वान् दो मुट्टी भर प्रसाद ग्रहण करते है और स्वयम थोडा खाकर शेष पत्नी को देते है। यही दो मुट्टी भर प्रसाद उन्हे दो सुंदर बालकों के जन्म का सहकारी कारण बना।

व्यास : दादी, एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के आचार्य कैसे बने?

दादी : दोनों बच्चों  के जन्म के बाद, एम्पेरुमानार एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जी को दोनों बच्चों  लाने के लिए भेजते है ताकि वह उन बच्चों  अपनी दृष्टि डाल सके | एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) जैसे ही दोनों बच्चों  को देखा उन्हें ज्ञात हो गया यह बच्चों  का जन्म संप्रदाय के लिए हुआ है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बच्चों  के मुख पर महान तेज देखा और तत्काल बच्चों  की रक्षा के लिए द्वय महा मंत्र का जाप किया ताकि बच्चों  को किसी की बुरी नजर न लगे | एम्पेरुमानार जी ने बच्चों  को देखा और तत्कालिक निर्णय लिया की दोनों  को द्वयं मंत्र के द्वारा सम्प्रदाय में लाया जाये | एम्पेरुमानार जी के पूछने पर श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी ने बताया की उन्होंने बच्चों  की रक्षा के लिए पहले ही द्वयं मंत्र का उच्चारण किया | तब से  श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी को उन दोनों बच्चों  का आचार्य नियुक्त किये गए जब उन्होंने दोनों को द्वयं मंत्र उच्चारण करके उनको दीक्षित किया | दोनों बच्चे एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) और अपने पिताजी से सीखते हुए बढ़े हुए | जैसे बच्चों  का जन्म भगवान के आशीर्वाद से हुआ था, उसी तरह दोनों बच्चे पेरिय पेरुमल और पेरिय पिराट्टी के प्रति स्नेह भावना रखते थे | एम्पेरुमानार जी भी आलवान स्वामीजी से कहते थे की वह अपना बेटा पराशर भट्टर जी एम्पेरुमानार जी को पेरिया पेरुमल का बेटा समझ कर सौंप दे और आलवान स्वामीजी ने ऐसा ही किया | ऐसा कहा जाता है की भट्टर स्वामीजी जब वह बच्चे थे  श्री रंग नाच्चियार् खुद अपनी सन्निधि में उनका  पालन – पोषण करती थी | | इस तरह का प्रेम और संबंद्व था श्री भट्टर स्वामी का पेरिय पेरुमाल और पिरट्टि के बीच | जब पराशर भट्टर् युवा अवस्था में थे तब एक दिन पेरिय पेरुमाळ को मंगला शासन करने मंदिर पहुँचते हैं । मंगला शासन करके बाहर आने के बाद उन्हें देखकर एम्पेरुमानार् अनंताळ्वान् और अन्य श्री वैष्णव से कहते हैं जिस तरह उन्हें मान सम्मान देकर गौरव से पेश आ रहे हैं उसी तरह भट्टर् के साथ भी बर्ताव करे  | रामानुज स्वामीजी भट्टर स्वामी में अपने आप को देखते थे | रामानुज स्वामी जानते थे भट्टर स्वामी ही आगामी दर्शन प्रवर्तकार होंगे |भट्टर् बचपन से ही बहुत होशियार थे | उनकी बुद्धिमत्ता को दर्शाने वाली कई कहानियाँ हैं।

अत्तुलाय : दादी, हमें उसकी बुद्धि के बारे में कुछ कहानियाँ बताएं ?

दादी : एक बार भट्टर् गली में खेल रहे थे उसी समय सर्वज्ञ भट्टर् के नाम से जाने वाले एक विद्वान पाल्की में विराजमान होकर वहाँ से गुजर रहे थे। श्री रंगं में इस तरह एक मनुष्य पाल्की में विराजित होने का दृश्य देखकर भट्टर् आश्चर्य चकित हो गये, फिर सीधे उनके पास पहुँचकर उन्हें वाद – विवाद करने की चुनौती देते हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उन्हें सिर्फ एक छोटे बालक की दॄष्टि से देखते हैं और उन्हें ललकारते हैं की वे उनके किसी भी प्रश्न का जवाब दे सकते हैं। भट्टर् एक मुट्टी भर रेत लेकर उनसे पूछते है – क्या आप बता सकते है कि मेरे इस मुट्टी मे कितने रेत के कनु है ? सर्वज्ञ भट्टर् प्रश्न सुनकर हैरान हो जाते हैं और उनकी बोलती बंद हो जाती हैं । वे कबूल् कर लेते हैं कि उन्हें उत्तर नहीं पता हैं| भट्टर् उनसे कहते हैं कि वे उत्तर दे सकते थे कि एक मुट्टी भर रेत उनकी हाथ में हैं । सर्वज्ञ भट्टर् उनकी प्रतिभा को देखकर आश्चार्य चकित हो जाते हैं और तुरंत पाल्की से उतरकर उन्हें अपने माता-पिता के पास ले जाकर गौरवान्वित करते हैं |

वेदवल्ली : यह एक अच्छा जवाब था।

दादी : यह घटना भट्टर् के गुरुकुल के समय की थी । उस दिन भट्टर् गुरुकुल नहीं गए और सड़क पे खेल रहें थे । उन्हें रास्ते पर खेलते हुए पाकर आळ्वान् आश्चर्य चकित होकर उनसे गुरुकुल न जाने का कारण पूछते हैं । उत्तर देते हुए वे कहते हैं कि “प्रति दिन गुरुकुल में एक हि पाठ पढ़ाई जा रही हैं ” आमतौर से एक पाठ १५ दिन पढ़ाई जाती हैं । लेकिन भट्टर् पहली ही बार पाठ का ग्रहण कर चुके थे । आळ्वान् ने उनकी परिक्षा की और भट्टर अति सुलभ से पाशुर् पठित किये ।

व्यास : जैसे पिता वैसे पुत्र !

दादी ( मुस्कुराते हुए ) : सही ! भट्टर अपने पिता आलवान स्वामी जैसा ज्ञान और मेधा शक्ति रखते थे | श्री रंग राज: स्तवं में,भट्टर् अपने जीवन में घटित एक घटना बतलाते हैं । एक बार पेरिय कोविल में एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं । अर्चक स्वामि मंदिर को शुद्ध करने के लिए एक छोटा संप्रोक्षण करने की ठान लेते हैं । यह सुनकर भट्टर् दौड़कर पेरिय पेरुमाळ के पास पहुँचते है और कहते हैं कि वे प्रतिदिन कोविल में प्रवेश करते हैं परंतु कोई भी संप्रोक्षण नहीं करते लेकिन जब एक कुत्ते का प्रवेश होता हैं तब क्यों संप्रोक्षण कर रहे हैं । इस प्रकार की थी उनकी विनम्रता – वे स्वयं महान पंडित होने के बावज़ूद अपने आप को कुत्ते से भी नीच मानते हैं । उसी श्री रंग राज:स्तवं में बतलाते हैं कि वे देवलोक में एक देवता जैसे पैदा होने से भी श्री रंग में एक कुत्ता का जन्म लेना पसंद करते हैं ।

वेदवल्ली: दादी, जब श्री रंग नाच्चियार् जी ने भट्टर जी का पालन- पोषण किया, क्या तब भट्टर जी पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे जैसे थिरुकाची नम्बि जी देव पेरुमल जी से करते थे ?

दादी : हाँ, वेदवल्ली तुम ठीक कह रही हो | भट्टर जी भी श्रीरंगम में पेरुमल और पिराट्टी जी से बात करते थे | क्या आप जानते हो वर्ष में एक बार वैकुण्ठ एकादशी से एक दिन पहले, पगल पथु उत्सव के दसवें दिन, नम्पेरुमाळ जी नाच्चियार अम्मा जी की वेश वूशा धारण करते है? नम्पेरुमाळ जी श्रीरंग नाच्चियार जी के अलंकार धारण करते है और बहुत सुंदरता से श्रीरंग नाच्चियार जी की तरह इस दिन बैठते है | एक दिन नम्पेरुमाळ जी भट्टर स्वामीजी को बुलाकर पूछते है की क्या वह श्रीरंग नाच्चियार जी जैसे दीखते है | भट्टर स्वामीजी जो माता लक्ष्मी जी की तरफ अपना पक्ष रखते, नम्पेरुमाळ जी की तरफ प्रीति से देख कर कहते की प्रभु जी सब अलंकार बहुत सुन्दर है लेकिन जो करुणा लक्ष्मी माता जी के नेत्रों में है वह आपके कमल नयनो में नहीं | इस प्रकार का वात्सल्य था भट्टर स्वामीजी का माँ श्रीरंग नाच्चियार जी की प्रति |

हालाँकि, भट्टर जी के सैकड़ों अनुयायी थे, जो नियमित रूप से उनके  कालक्षेप को सुनते थे और उनकी शिक्षाओं से प्रभावित होते थे, फिर भी बहुत कम लोग थे जो भट्टर जी को नापसंद करते थे। यह महान लोगों के लिए बहुत आम है। यह  रामानुज स्वामीजी  के साथ भी हुआ। एक बार, भट्टर जी को नापसंद करने वाले कुछ लोगों ने उन्हें ईर्ष्या और घृणा से डांटना शुरू कर दिया। अगर कोई आप पर चिल्लाता है, तो आप क्या करेंगे?

व्यास :  मैं उस पर वापस चिल्लाऊँगा। मैं क्यों चुप रहूं?

दादी: यह वास्तव में हम में से अधिकांश ऐसे होते है , यहां तक ​​कि वयस्क भी ऐसा ही करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भट्टर जी ने क्या किया? उन्होंने अपने गहने और महंगे शॉल उस व्यक्ति को भेंट किए, जो उन पर चिल्लाया था। भट्टर जी ने यह कहकर उनका धन्यवाद किया कि “हर श्रीवैष्णव को दो काम करने चाहिए – एम्पेरुमान जी की महिमा गाओ और अपने स्वयं के दोषों के बारे में भी विलाप करो। मैं एम्पेरुमान जी की महिमा को गाने में इतनी गहराई से डूब गया कि मैं अपने दोषों के बारे में विलाप करना भूल गया। अब आपने अपना कर्तव्य पूरा करके मुझ पर बड़ा उपकार किया है, इसलिए मुझे केवल आपको पुरस्कृत करना चाहिए ”। ऐसी थी उनकी विशालता।

पराशर : दादी , मुझे स्मरण है की आप कह रही थी की रामानुज स्वामीजी ने ही भट्टर स्वामीजी को आदेश दिया था की नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को सम्प्रदाय में लेकर आये | भट्टर स्वामीजी ने ऐसा कैसे किया होगा ?

दादी : मुझे बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार की पराशर तुम्हे यह सब स्मरण है | हाँ, जैसा रामानुज दिव्य आज्ञा में बताया गया है, भट्टर स्वामीजी तिरुनारायणपुरम जाते है और नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आते है | हमने इस जगह के बारे में पहले से सुना हुआ है ? क्या किसी को स्मरण है कब ?

वेदवल्ली : मुझे याद है | तिरुनारयणपुरम मंदिर उन सब मंदिरो में से एक है जहाँ रामानुज स्वामीजी ने सुधार किया था | रामानुज स्वामीजी ने श्री मेलकोटे मंदिर में व्यवस्था लागू की |

दादी : बहुत अच्छे वेदवल्ली | रामानुज स्वामीजी ने तिरुनारायणपुरम मंदिर में शेल्वपिळ्ळै भगवान जी की उत्सव मूर्ति मुस्लिम अक्रान्ताओ से छुड़ाकर वापिस मंदिर में पुनः स्थापित की थी | भट्टर स्वामीजी जिस कक्ष में माधवाचार्य (नन्जीयर स्वामीजी का असली नाम ) प्रसाद वितरित कर रहे होते है, सलाह उचित मानकर उन्होंने अपना सामान्य वेश धारा में बदलकर माधवाचार्यर् के तदियाराधना (प्रसाद विनियोग करने वाला प्रदेश )होने वाले महा कक्ष के पास पहुँचते हैं । बिना कुछ पाये उसी के पास निरीक्षण कर रहे थे । माधवाचार्यर् ने इन्हे देखा और पास आकर इनकी इच्छा और निरीक्षण का कारण जानना चाहा । भट्टर् कहते हैं कि उन्हें उनसे वाद करना हैं । भट्टर् के बारे में माधवाचार्यर् पहले सुनचुके थे और वे पहचान लेते हैं कि यह केवल भट्टर् ही हो सकते हैं (क्यूंकि किसी और को उनसे टकरार करने कि हिम्मत नहीं होगी ) । माधवाचार्यर् उनसे वाद के लिए राज़ी हो जाते हैं । भट्टर पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । भट्टर् उन्हें अरुळिचेयल सीखने में विशिष्ट उपदेश देते हैं और सम्प्रदाय के विशेष अर्थ समझाते हैं । अध्यायन उत्सव शुरू होने के पहले दिन उनसे विदा होकर श्री रंगम पहुँचते हैं । श्री रंगम में उन्हें शानदार से स्वागत किया गया । भट्टर् पेरिया पेरुमाळ को घटित संघटनो के बारे में सुनाते हैं । पेरिया पेरुमाळ खुश हो जाते हैं और उन्हें उनके सामने तिरनेडुंदांडकम् गाने की आदेश देते हैं और यह रिवाज़ आज भी श्री रंगम में चल रहा हैं – केवाल श्री रंगम में ही अध्यायन उत्सव तिरनेडुंदांडकम् पढ़ने के बाद ही शुरू होता हैं ।

भट्टर स्वामीजी का नम्पेरुमाळ जी और श्रीरंग नाच्चियार जी के दिव्य विग्रहो के प्रति बहुत अनुराग था | भट्टर स्वामीजी कुछ पाशुर् और उनके सृजनीय अर्थ पेरिय पेरुमाळ के सामने सुनाते हैं । पेरिय पेरुमाळ बहुत खुश हो जाते हैं और कहते हैं “तुम्हे इसी समय मोक्ष साम्राज्य प्रदान कर रहा हुँ ” । भट्टर् उनके वचन सुनकर बेहद खुश हो जाते हैं और कहते हैं कि अगर वे नंपेरुमाळ को परमपद में नहीं पाये तो परमपद में एक छेद बनाकर उधर से कूद कर वापस श्री रंगम आ पहुंचेंगे । एक बार कुरेश स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा अगर परमपदनाथ के दो या चार हाथ हुए तो, भट्टर स्वामीजी जवाब देते है की अगर परमपदनाथ जी के दो हाथ होंगे तो वह पेरिया पेरुमल जैसे दिखेंगे और अगर उनके चार हाथ होंगे तो वह हमारे नम्पेरुमाळ जी जैसे दिखेंगे | भट्टर स्वामीजी कभी भी अन्य जीवों को देखकर भी उनमे नम्पेरुमाळ जी ही को देखेंगे | वह भगवान जी के सब दिव्य मंगल विग्रह को नम्पेरुमाळ ही बताते थे | । जब नम्पेरुमाळ जी उनको मोक्ष प्रधान करते है,भट्टर स्वामीजी अपनी माता जी का आशीर्वाद प्राप्त करके इस संसार को छोड़ कर परमपद में जाकर अपने आचार्यो जी के साथ मिलते है ताकि वहां एम्पेरुमान जी का नित्य कैंकर्यं कर सके | कहा जाता हैं कि अगर भट्टर् और कुछ साल जीते तो परमपद को श्री रंगम से सीढ़ी डाल देते तिरुवाय्मोळी की व्याख्यान लिखने के लिए नंजीयर् को आदेश देते हैं और उन्हें दर्शन प्रवर्तकर् के स्थान में नियुक्त करते हैं ।

अतुलहाय : दादी, श्री भट्टर स्वामीजी का जीवन सुनाने में बहुत रूचि पूर्ण था | जो भक्ति उनमे दिखती थी नम्पेरुमाळ जी के प्रति और उनका संबंद्व मन को छू लेता है | अण्डाल अम्मा जी भी कितनी भाग्यशाली होंगी ऐसा महान पति पाकर और ऐसे महान बच्चे पाकर |

दादी : तुम बहुत ठीक कह रही हो अतुलहाय | अंडाल बहुत भाग्यवान समझेगी अपने आप को | कल में आपको नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी) के बारे में बताउंगी जो की आगामी आचार्य थे | अब आप फल लो और घर जाओ |

बच्चे श्री भट्टर स्वामीजी और उनके दिव्य जीवन के बारे में सोचते हुए अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अत्तुलाय के साथ अंडाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु:स्वागतम बच्चो | अपने हाथ और पॉंव दो लो | में कुछ प्रसाद लेकर आती हूँ | क्या आप जानते हो कल कौन सा दिन है ? कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्रम, उत्तराषाढ नक्षत्र, का दिन है | यहाँ पर कौन आळवन्दार् स्वामीजी का स्मरण करता है?

अतुलहाय : मुझे याद है की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने देव पेरुमल जी से प्रार्थना करके रामानुज स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर आये थे |

व्यास : हाँ | उनके परमपदम जाने के बाद उनके दिव्या शरीर के तीन उंगलिया मुड़ी हुई थी जो यह सूचित करती थी की उनकी अंतिम तीन मनोरथ अधूरे रह गए थे और रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए थे उनको पूर्ण करेंगे | जैसे ही रामानुज स्वामीजी ने प्रतिज्ञा लिए उसी समय तीनो मुड़ी हुई उंगलियां सीधी हो गयी |

पराशर : दादी हमें स्मरण है जब आपने कहा था की रामानुज स्वामीजी और आळवन्दार् स्वामीजी का संबंध मन और आत्मा का है और जो शारीरक इन्द्रियों से परे है |

दादी : वास्तव में, कल आळवन्दार् स्वामीजी का तिरुनक्षत्र है | यह लीजिये प्रसाद | कल मंदिर जाना भूल मत जाना और महान आचार्य जी को अपना सम्मान देना जिन्होंने रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लेकर आये | आज आगे चलते है और चलो अपने दूसरे आचार्य एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) के बारे में जानते है | गोविन्द पेरुमाळ कमल नयन भट्टर् और श्री देवी अम्माळ को मधुरमंगलम में पैदा हुए । ये गोविन्द भट्टर, गोविन्द दास और रामानुज पदछायर के नामों से भी जाने जाते हैं । कालान्तर में ये एम्बार् के नाम से प्रसिध्द हुए । ये एम्पेरुमानार के चचेरे भाई थे जिन्होंने जब यादव प्रकाश एम्पेरुमानार की हत्या करने की कोशिश की तब ये साधक बनकर उन्हें मरने से बचाया ।

वेदवल्ली : दादी क्या मारा? मैंने सोचा था की रामानुज स्वामीजी का जीवन उस समय खतरे में था जब कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) स्वामीजी और पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) ने उनके प्राण बचाये थे | दादी कितनी बार उनके जीवन खतरे में था ?

दादी : बहुत बार | में आपको सब बताउंगी जैसी ही समय आएगा | उनका जीवन पहली बार तब खतरे में आया जब उनके गुरु यादव प्रकाश जी ने उनको मारना चाहा | रामानुज स्वामीजी और यादव प्रकाश जी में मत भेद था जब भी वेदो के श्लोको का अर्थ को बताना होता | श्रीयादवप्रकाश शास्त्रों में वर्णित श्लोकों का गलत अर्थ / तात्पर्य बतलाते । रामानुज स्वामीजी वेदो के श्लोको का गलत अर्थ / तात्पर्य सुनते बहुत बुरा अनुभव करते और तब श्री रामानुज स्वामीजी अन्य उदाहरण देकर श्लोकों का सही अर्थ बतलाते हुये श्रीयादवप्रकाश को सही तात्पर्य समझाने की कोशिश करते थे जैसे हमारे श्री विशिष्टाद्वैत संप्रदाय में अर्थ दिए हुए है | यादव प्रकाश जो की अद्वैत वादी थे कभी भी रामानुज स्वामीजी के द्वारा दिए गए अर्थो से प्रसन्न नहीं थे | वह जानते थे की जो अर्थ अनुवाद रामानुज स्वामीजी देते है वह ज़्यादा सार्थक है और इसीलिए प्रतिस्पर्धात्मक अनुभव करने लगे | यादव प्रकाश जी सोचते थे की रामानुज स्वामीजी उनको आचार्य की पदवी से मुक्त कर देंगे जब की रामानुज स्वामीजी का ऐसा कोई उद्देश नहीं था | इसी कारण से यादव प्रकाश जी अपने मन में रामानुज स्वामीजी से द्वेष की भावना रखते थे | यादवप्रकाश भगवत रामानुज स्वामीजी से छुटकारा पाने अपने अन्य शिष्यों के साथ विचार विमर्श कर , रामानुज स्वामीजी को काशी यात्रा पर ले जाकर वही समाप्त कर देने की योजना बना कर, काशी यात्रा के लिए जाते है। यादवप्रकाश की इस योजना का , भगवत रामानुज स्वामीजी के मौसेरे भाई गोविंदाचार्य (एम्बार) को पता चल जाता है । गोविंदाचार्य श्री रामानुज स्वामीजी को यादवप्रकाश की इस योजना से अवगत कराते हुए कांचीपुरम भेज देते हैं और इस तरह से गोविंदाचार्य (एम्बार) रामानुज स्वामीजी के प्राण बचा लेते है |

व्यास : दादी, क्या एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) यादव प्रकाश जी के शिष्य थे ?

एम्बार् – मधुरमंगलं

दादी : हाँ व्यास ! रामानुज स्वामीजी और गोविन्द स्वामीजी दोनों यादव प्रकाश जी से वेद अध्यन सीखने जाते थे | यद्यपि रामानुज स्वामीजी को अपने आप को बचाने के लिए दक्षिण भारत की तरफ यात्रा करनी थी, गोविन्द स्वामीजी यात्रा जारी रखते हैं और कालहस्ती पहुँचकर शिव भक्त बन जाते हैं जिससे उनको उल्लंगै कोंडा नयनार के नाम से जाने जाना लगे । उन्हें सही मार्ग दर्शन करने के लिए एम्पेरुमानार पेरिय तिरुमलै नम्बि को उनके पास भेज देते हैं ताकि गोविन्द स्वामीजी को सम्प्रदाय में वापिस ला सके । पेरिया नम्बि कालहस्ती जाते है और नम्माळ्वार जी के पासुर और आलवन्दार स्वामीजी के स्तोत्र रत्नम के श्लोको द्वारा गोविन्द पेरुमाळ को परिवर्तिन कर सके | गोविन्द पेरुमाळ जी को अपनी गलती की अनुभूति हुई और फिर वह संप्रदाय में वापिस आ जाते है | इसीलिए बच्चो आलवन्दार स्वामीजी परमपदम जाने के बाद भी इतने प्रभावशाली थे की केवल रामानुज स्वामीजी को ही सम्प्रदाय में नहीं लेकर आये बल्कि उनके मुसेरे भाई गोविन्द पेरुमाल जी को भी सम्प्रदाय में लेकर आये | जैसे पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को सम्प्रदाय में वापिस लेकर आते है इसीलिए वह उनके आचार्य भी थे और उन्होंने गोविन्द पेरुमाल जी का पञ्च संस्कार भी किया था | जैसे ही पेरिय थिरुमलई नम्बि गोविन्द पेरुमाल जी के साथ तिरुपति से वापिस आते है और गोविन्द पेरुमाल जी अपने आचार्य जी के कैंकर्य में लग जाते है | जहाँ एक विषय महत्वपूर्ण है जो आप सब ने देखा होगा | आपने देखा होगा की रामानुज स्वामीजी और पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी ही गोविन्द पेरुमाल जी के पास उनके परिवर्तन के लिए जाते है न की गोविन्द पेरुमाल जी अपने सुधार के लिए रामानुज स्वामीजी और पेरिय नम्बि स्वामीजी के पास जाते है | ऐसे आचार्य जो अपने शिष्यों के पास इसीलिए पहुँचते है की उनका बेहतर सुधार कर सके और उनके भलाई के लिए ही चिंतित रहते है उनको कृपा मातृ प्रसनाचार्य कहा जाता है | वह स्वयं अपने शिष्यों के पास शुद्ध भाव से पहुँच कर उन पर निर्हेतुक कृपा करते है जैसे एम्पेरुमान करते है | रामानुज स्वामीजी और पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी दोनों गोविन्द पेरुमाल जी के लिए कृपामात्र प्रसनाचार्य थे |

पराशर : दादी हमें गोविन्द पेरुमाल जी के बारे में और बताइये | उन्होंने कौन कैंकर्यं किया था ?

दादी : ऐसे बहुत सी घटना है जो गोविन्द पेरुमाल जी के ऊपर पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी का आचार्य अभिमान दर्शाती है | एक बार गोविन्द पेरुमाल जी पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी के लिए बिस्तर बना रहे थे, तो उन्होंने अपने आचार्यं जी के लेटने से पहले बिस्तर का निरक्षण किया | जब नम्बि स्वामीजी ने उनसे पूछा अपने ऐसा क्यों किया तो गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी उत्तर देते है की वह जानते है की इससे उनको नरक भोगना पड़ेगा, उनको नरक भोगना बुरा नहीं होगा जब तक आचार्य जी का बिस्तर सुरक्षित है और लेटने के लिए आरामदायक है | इससे उनके आचार्य अभिमान का गुण प्रकाशित होता है जहाँ पर गोविन्द पेरुमाल जी स्वयं के बारे में न सोचकर अपने आचार्य की तिरुमेनि (शारीर) की रक्षा करने में वे चिंतामग्न हैं । यह समय तब आया जब रामानुज स्वामीजी तिरुपति आते है ताकि वह पेरिय तिरुमलै नम्बि स्वामीजी से श्रीरामायण का मूलतत्त्व सीख सके | रामानुज स्वामीजी जब एक वर्ष नम्बि स्वामीजी से सीखने के बाद वापिस जाते है, नम्बि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी को कुछ भेंट देने चाहते थे | रामानुज स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी को मांग लेते है और नम्बि स्वामीजी गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी को कैंकर्यं करने के लिए उनको सौंपने को प्रसन्नता पूर्वक स्वीकार करते है | यह सुनकर गोविन्द पेरुमाल जी दुःखी होते है के उनको पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी को छोड़कर जाना पड़ेगा |

व्यास : दादी, नम्बि स्वामीजी ने गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों दे दिया ? गोविन्द पेरुमाल जी को क्यों जाना पड़ा जब के वह आचार्यं कैंकर्यं करने में खुश थे ?

दादी : व्यास, गोविन्द पेरुमाल संप्रदाय में एक बड़ी भूमिका क्रियान्वित करते है जिससे वह रामानुज स्वामीजी के लिए विभिन्न कैंकर्यं कर सके । बचपन से ही, गोविन्द पेरुमाल जी को रामानुज स्वामीजी के प्रति बहुत स्नेह और प्रेम भावना रखते थे |  रामानुज स्वामीजी के परमपदम पहुँचने के बाद, उन्होंने रामानुज स्वामीजी के दूसरे शिष्य और पराशर भट्टर जी का भी मार्गदर्शन किया | इतनी सारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना जो उनका इंतज़ार कर रही थी जिससे उनको अपने आचार्य पेरिय थिरुमलई नम्बि जी को छोड़ना पड़ा और रामानुज स्वामीजी को अपना गुरु और मार्गदर्शक मानना पड़ा |  बाद में गोविन्द पेरुमाल जी ने रामानुज स्वामीजी को अपना सब कुछ माना और सुंदर पासुर रचा जिस में रामानुज स्वामीजी की दिव्या शरीर की सुंदरता का वर्णन किया | इसको एम्पेरुमानार वाड़ीवालागु पासुर सुनाते है | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था , जब संप्रदाय पर बात आती है , बहुत अच्छे कारण के लिए आपको त्याग करना पड़ेगा और ऐसा ही गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने किया |

अतुलाहय : क्या गोविन्द पेरुमाल स्वामीजी ने विवाह किया था ? क्या उनके बच्चे भी थे ?

दादी : गोविन्द पेरुमाल जी तो भगवद विषयम में लगन थी की उनको हर जगह और हर वस्तु में एम्पेरुमान दिखते थे | विवाह होने के बाद भी जब हम गोविन्द पेरुमाल जी का भगवद विषय की तरफ उठा हुआ जीवन देखते है, एम्पेरुमानार स्वामीजी स्वयं उन्हें सन्याश्रम प्रादान करते हैं और एम्बार् का दास्यनाम देकर उनके साथ सदैव रहने के लिए कहते हैं । अपने जीवन के अंतिम दिनों में एम्बार् स्वामीजी श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश देते है की श्रीवैष्णव संप्रदाय का प्रचार और प्रसार कर सके | उन्होंने श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी को आदेश दिया की सदैव एम्पेरुमानार जी के चरण कमलो में प्रीती रखे और सदैव एम्पेरुमानार थिरुवडिगले शरणम् मंत्र का जाप करे | अपने आचार्यं रामानुज स्वामीजी के चरण कमलो में ध्यानमग्न रहते हुए और अपने आचार्य जी से ली हुई प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए, एम्बार परमपदम पहुँच जाते है ताकि वह अपने आचार्य जी के प्रति कैंकर्यं कर सके | श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी ने भी आचार्य आज्ञा का आदेश मानते हुए श्रीवैष्णव संप्रदाय परम्परा को और आगे प्रचार और प्रसार करने के लिए कैंकर्य किये |

वेदवल्ली : दादी, हमें श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी : में आपको श्री पराशर भट्टर् स्वामीजी के बारे में बताउंगी जब हम अगली बार मिलेंगे | अभी आप घर जाये, बाहर अँधेरा हो रहा है | और कल मंदिर जाना मत भूल जाना क्यूंकि कल आलवन्दार तिरुनक्षत्र है |

बच्चे अपने घर को आळवन्दार् स्वामीजी, पेरिय थिरुमलई नम्बि स्वामीजी, रामानुज स्वामीजी और एम्बार स्वामीजी के बारे में सोचते हुए प्रस्थान करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 1

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अथुलाय के साथ अंडाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

पराशर : दादी, कल आपने हमसे कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और उनके शिष्यों के बारे में बताएंगी|

दादी : हाँ | रामानुज स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताने से पहले, हमें रामानुज स्वामीजी एक विशेष जानकारी होनी चाहिए | वह यह है की उनके अवतरण लेने से पहले ही श्री शठकोप स्वामी जी ने मधुरकवि आलवार स्वामीजी और नाथमुनि स्वामीजी को ५००० वर्ष पहले ही बता दिए थे | एक बहुत ही श्रेष्ट ग्रन्थ है चरमोपाय निर्णयम, जिसमे रामानुज स्वामीजी के वैभव के बारे में बताते है – इस ग्रन्थ में नम्माळ्वार स्वामीजी का नाथमुनि स्वामीजी के साथ वार्तालाप और रामानुज स्वामीजी का अवतार प्रकटीकरण पर बताते है | जो दिव्या विग्रह नम्माळ्वार स्वामीजी ने मधुरकवि आळ्वार स्वामीजी को अर्चन करने के लिए दिया था आज भी अलवारतिरुनगरी में भविष्यदाचार्य की दिव्य मूर्ति को संरक्षित उसका अर्चन आज भी सन्निधि में होता है |

रामानुज स्वामि – अलवारतिरुनगरी

व्यास: उत्कृष्ट | इसीलिए अलवार स्वामी जी और कुछ आचार्य जी रामानुज स्वामीजी के अवतार के बारे में पहले से जानते थे | यह तो बहुत उत्तम है दादी जी | दादी जी आप उनके जीवन के बारे प्रकाश जारी रखे |

दादी : हाँ, रामानुज स्वामीजी ने समस्त भारत का भ्रमण करते हुए श्री वैष्णव धर्म का प्रचार किए | चाहे उनको संघर्ष न करना पड़ा हो, लेकिन कोई न कोई विरोध किसी न किसी तरफ से अवश्य हुआ | रामानुज स्वामीजी ने सर्वजन का ह्रदय अपने ज्ञान और वात्सल्य से जीता | जब स्वामीजी कांचीपुरम में थे, उनका पाणिग्रहण थन्जाम्मा जी से हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने भगवान वरदराज की कृपा से सन्यास धारण किये | जब रामानुज स्वामीजी ने सन्यास धारण किया, तो उन्होंने अपनी सर्व निजी संपत्ति को त्याग दिया एक सिर्फ अपने भतीजे मुधलियांदान को छोड़ कर |

व्यास : दादी, उन्होंने विवाह क्यों किया और फिर सन्यास धारण कर लिए? उन्होंने गृहस्थ आश्रम क्यों नहीं स्वीकार किया और सर्व कैंकर्य उन्होंने क्यों नहीं किये ?

दादी : व्यास, इसके कई कारण है | एक, उनके अपनी पत्नी के बारे में कुछ विचारो को लेकर भेद था और दूसरा, आपको तत्पर रहना चाहिए बड़े मनोरथ को लेकर कुछ भी त्याग करने के लिए | जैसे हम सब जानते है की उनके कंधो पर दायित्व था सम्पूर्ण भारत वर्ष में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का प्रचार कर सके | जैसे की हमारे देश के सिपाही हमारे देश की रक्षा करते है, अपने परिवार और सम्बन्धी जन को छोड़ कर क्यूंकि उनके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है | अपने देश का रक्षण करना एक महान कार्य है | इसी तरह रामानुज स्वामीजी के मन में भी विशेष विचार था | उनको ज्ञात था की उनका उद्देश्य वेदो का सार प्रकाशित करने में है | इसीलिए उन्होंने सन्यास आश्रम धारण किये | एक महान सन्यासी बनने के बाद, मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी) और कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे महान विद्वान रामानुज स्वामीजी के शिष्य बने |

अथुलाय : क्या इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी लेना बोझ नहीं है? रामानुज स्वामी जी ने यह सब अकेले कैसे किया होगा ?

दादी : नहीं अथुलाय | यह कभी भी एक बोझ नहीं था | जब आप अपने कर्म को भावुकता से करते है तो आपको कभी यह बोझ नहीं लगेगा | इसके अतिरिक्त रामानुज स्वामीजी कभी भी एकमात्र नहीं थे | स्वामीजी हमेशा अपने मुख्य शिष्य जैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी),मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी),एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी),अनन्ताळ्वान् (श्री अनन्ताचार्य स्वामीजी),किडाम्बि आच्चान् (श्री प्रणतार्तिहर स्वामीजी),वडुग नम्बि (श्री आंध्रपूर्ण स्वामीजी),पिळ्ळै उऱन्गाविल्लिदासर् (श्री धनुर्दास स्वामीजी) जिन्होंने दिन रात स्वामीजी के सेवा करते है | उनके सभी शिष्य उनकी जीवन यात्रा में सदैव उनके साथ रहे | रामानुज स्वामीजी की जीवन यात्रा में उनको नुक्सान पहुंचाकर जहाँ तक की उनके प्राण तक लेने का बहुत बार प्रयत्न किया गया | ऐसे समय में एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) एवं कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे शिष्यों ने अपने प्राण खतरे में डाल कर स्वामीजी के प्राणो का रक्षण किये | आप सब को जानकारी होगी की कैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) एवं पेरिया नम्बि स्वामीजी शैव राजा के दरबार में चले गए और अपनी आँखे खो दी ? ऐसे महान शिष्यों उनके साथ रहते थे , रामानुज स्वामीजी ने बहुत निष्ठा पूर्वक सभी मंदिरो का प्रशासन को ठीक ढंग से चलने के लिए नियम रूपांतर किये |

रामानुज स्वामी – श्रीरंगम

वेदवल्ली : हाँ दादी जी , मैंने सुना है सभी मंदिरो की नियमावली और उत्सव जैसे श्रीरंगम मंदिर में और तिरुपति मंदिर में रामानुज स्वामीजी की द्वारा स्थापित किये गए | क्या आप हमें इसके बारे में विस्तार से बता सकते है ?

दादी : बिलकुल ठीक है वेदवल्ली | उन्होंने रीति-रिवाज को फिर से आगे बढ़ाया जैसा की वेदो में कहा गया है | उन्होंने देखा की सभी रीति-रिवाज इस तरह से पालन किये जाते है जैसे उन्होंने बताया और बहुत ध्यान पूर्वक उनका स्थापन किया| श्रीरंगम मंदिर पेरिया कोयिल नंबी द्वारा संरक्षित किया गया था। जैसा कि मैंने पहले कहा था, रामानुज स्वामीजी को मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए पेरिया कोयिल नंबी की तत्काल मंजूरी नहीं मिली थी। रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) को पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी के पास भेजा ताकि कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के मूल तत्व और मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन के लिए शिक्षित कर सके | कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी के समझाने के बाद पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी ने परिवर्तन स्वीकार करके रामानुज स्वामीजी की शरणागति की और बाद में तिरुवरन्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी) के नाम से सम्बोधित किये जाने लगे | बाद में श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी पर श्रीरामानुजनूत्तंदादि (१०८ पाशुर) लिखते हैं और उसे रंगनाथ भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्पण करते हैं। क्या आप जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित रामानुज स्वामीजी ही करते है और उस समय और भी मतावलम्बियों इस विष्णु भगवन जी अर्चा विग्रह को अपनी परिभाषा से सम्बोधित करते थे |

रामानुज स्वामी – तिरुमल

पराशर : क्या ? हम सभी जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान और कोई नहीं स्वयं भगवान् श्री विष्णु जी ही है | उन सबको इस पर संशय कब हुआ ?

दादी : हाँ|अथुलाय | तिरुवेन्गडमुडैयान ही स्वमयं व्यक्त साक्षात् भगवान् विष्णु जी है | उस समय कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसको अपने भगवान के नाम से कहते थे | कुछ पंडित जान कहते यह शिव है और कुछ विद्वान जन उनको कार्तिक स्वंय के नाम से कहते थे | एम्पेरुमानार तीर्थयात्रा पर निकलते है और अंत में तिरुमलै पहुँचते है, इतर मतावलम्बियों से विवाद में विजयी हो , तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित करते है , स्वयं भगवान के आचार्य बन भगवान को शंख और चक्र धारण करवाते है । (तिरुमला में भगवद्रामानुजाचार्य ज्ञान मुद्रा से विराजमान होकर दर्शन देते है। ) इसीलिए तिरुपति में रामानुज स्वामीजी मंदिर प्रशासन स्थापित के अलावा और बहुत कुछ किया| उन्होंने तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् की पहचान की स्थापना की। तभी से तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् जी ने रामानुज स्वामीजी को आचार्य पद से उनका वैभव प्रकाशित किये | यह वही जगह है, जहां रामानुज स्वामी जी अपने मामा पेरिया थिरुमलाई नंबी स्वामीजी से रामायण का सार सीखते हैं। वह थिरुणारायण पुरम मंदिर के साथ अन्य प्रमुख मंदिरों में मंदिर कर्तव्यों को स्थापित करने के लिए आगे बढ़ते है |

रामानुज स्वामी – तिरुनारायणपुरं

अथुलाय : दादी, मैंने सुना है की उन दिनों जैन मतावलम्बियों ने रामानुज स्वामीजी के लिए समस्या खड़ी कर दी थी ?

व्यास : मैंने सुना है की थिरुनरायणा पुरम मंदिर के भगवान् जी का अर्चा विग्रह उस समय मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था |

दादी : यह सत्य है | रामानुज स्वामी जी को उन सुधारों के बारे में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो वह मंदिरों और हमारे संप्रदायम के सुधार के लिए स्थापित करने के इच्छुक थे। हालांकि, परिवर्तन ऐसा कुछ था की ज्यादा तर विद्वान लोगो ने उन परिवर्तनों का स्वागत नहीं किया | सभी पुराने रीति-रिवाजों, चाहे वह सही हो या गलत में ही सुरक्षित महसूस करते थे और कभी भी बदलाव स्वीकार नहीं करते थे और न ही उस व्यक्ति को जो बहुत आवश्यक परिवर्तन लाने की कोशिश करता है। यह समाज का आम दृष्टिकोण है। आज का समय में भी, परिवर्तन मुश्किल है, इसलिए 1000 साल पहले कल्पना करें, जब रूढ़िवाद प्रथा और विश्वास इतने कठोर थे, रामानुज स्वामीजी को कोई सकारात्मक परिणाम लाने से पहले इतना प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जैन विद्वान हमारे विशिष्टाद्वैत सिद्धांत दर्शन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे। रामानुज स्वामीजी को 1000 जैन विद्वानों द्वारा 1000 प्रश्नों के उत्तर देने के लिए चुनौती दी गई थी। सहस्त्र फनो वाले आदि शेष भगवान् के रुप में रामानुज स्वामीजी अपना मूल रूप धारण करते है और सभी प्रश्नो का उत्तर देते है और एक साथ बहस जीतते हैं |

थिरुनरायण पुरम मंदिर के श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था और यह विग्रह अक्रान्ताओ के राजा की पुत्री के महल के कक्ष में थी जो उस उत्सव विग्रह से खेलती और उससे अनुराग करती थी | जब रामानुज स्वामीजी श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह को वापिस श्री मेलकोट मंदिर में ले जाने के लिए आये तब मुस्लिम राजा की पुत्री उस्तव विग्रह से अपना वियोग सहन न कर सकी |

अथुलाय : ठीक वैसे जैसे की अंडाल अम्मा जी ( श्री गोदम्बा माता जी ) भगवान् श्री कृष्ण जी से अपना वियोग सहन न कर सके |

दादी : हाँ जैसे अंडाल अम्मा जी जैसे | एम्पेरुमानार तिरुनरायणपुरम मंन्दिर के उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै को एक मुस्लिम राजा की बेटी से प्राप्त कर तिरुनारायणपुरम मे उनकी स्थापना करते है उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै के प्रेम में मगन मुस्लिम राजकुमारी के उत्सव पेरुमाळ के पीछे तिरुनारायणपुरम आने के बाद सेल्वपिळ्ळै और मुस्लिम राजकुमारी का विवाह सम्पन्न करवाते है । यह भक्ति की पराकाष्ठा है और वह अपने परम प्रभु जी के प्रति प्रेम जो न जाती देखता है न पंथ (मज़हब) |

कूरत्ताळ्वान् – रामानुज स्वामी – मुदलियान्डान

व्यास : दादी, अपने हमें कभी यह नहीं बताया की रामानुज स्वामीजी ने आलवन्दार स्वामीजी के ३ मनोरथ कैसे पूर्ण किये |

दादी : कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जी के दो पुत्र रतन हुए | रामानुज स्वामीजी ने दोनों का नाम व्यास और पराशर रख कर दो महान ऋषियों की महानता को स्वीकार करते हुए आलवन्दार स्वामी जी का पहला वचन पूरा करते है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी जिनको बाद में एम्बार् के नाम से जाने जाना लगा, एम्बार के भाई सिरियगोविन्दपेरुमाळ को एक पुत्र की प्राप्ति होती है और उसका नाम एम्पेरुमानार परांकुशनम्बि रखकर आळवन्दार के दूसरा वचन पूरा करते है । बाद में रामानुज स्वामीजी श्री भास्यम लिखकर आलवन्दार स्वामीजी का तीसरा वचन पूर्ण करते है | श्री भास्यम लिखने के लिए रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के साथ कश्मीर तक यात्रा की |

दादी : रामानुज स्वामीजी कश्मीर की यात्रा करते है जिससे उनको एक पुराणी लिखा ग्रन्थ जिसका नाम बोधायनवृत्ति था लेकर श्रीभाष्य ग्रन्थ लिख सके | राजा को प्रसन्न कर बोधायनवृत्ति ग्रन्थ प्राप्त कर, वापस श्रीरंगम की लिये प्रस्थान करते है, किसी आशंका के चलते कश्मीरी विद्वान अपने अनुचरों के सहायता से यह ग्रंथ रामानुज स्वामीजी से वापस ले लेते है ।

व्यास : कितना निर्दयी |

दादी : हाँ | बुरे लोगो द्वारा ग्रन्थ वापिस लेने से पहले कुरेशा स्वामी जी ने ग्रन्थ को इस तरह से कंठस्त कर लिया था की श्री भास्यम ग्रन्थ लिख सके |

व्यास : क्या पूरा ग्रन्थ कंठस्त कर लिया था ? यह कैसे संभव है दादी ? इच्छा है कि मैं भी अपनी पूरी विषय की पुस्तकों को याद कर सकता!

दादी ( मुस्कराते हुए ) : कुरेशा स्वामी जी रामानुज स्वामीजी के एक आम शिष्य नहीं थे | वह एक महान संपत्ति और रामानुज स्वामीजी के लिए एक आशीर्वाद थे | जब सभी जन अपने उद्धार के लिए रामानुज स्वामी जी की शरणागति ले रहे थे उस समय रामानुज स्वामीजी ने स्वंयम कहा की उनका उद्धार कुरेशा स्वामी जी से जुड़ने से हुआ है | इस तरह के एक महान विद्वान होने के बावजूद, कुरेश आलवार के शुद्ध दिल में अहंकार का एक भी हिस्सा नहीं था जिसमे रामानुज स्वामीजी निवास करते है। श्रीकूरत्ताळ्वान की सहायता से श्रीएम्पेरुमानार आळवन्दार को दिए हुए वचन ( श्री भाष्यं के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि) पूरी करते है । श्री रंगम में शैव राजा के देहांत के बाद रामानुज स्वामीजी श्री रंगम वापिस आ गए |

अंततः, वैकुण्ठ धाम पहुंचने से पहले और लीला विभूति को छोड़ने से पहले, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने किया था, रामानुज स्वामीजी ने निर्णय लिया की उनके जाने के बाद कौन आचार्य हमारे सम्प्रदाय का ध्यान रखेंगे, उन्होंने कुरेश स्वामीजी के यशस्वी पुत्र पराशर भट्टर को सम्प्रदाय का आचार्य घोषित किया | रामानुज स्वामीजी ने पराशर भट्टर और कुछ शिष्यों को निर्देशित किया की एम्बार (गोविन्दाचार्य स्वामीजी) की शरण में जाये और सम्प्रदाय सिधान्तो को सीखने के लिए उनका मार्ग दर्शन ले | उन्होंने शिष्यों को आज्ञा किये वह पराशर भट्टर स्वामीजी का भी वैसे ही आदर सम्मान करे जैसे वह एम्पेरुमानार का करते है | उन्होंने पराशर भट्टर स्वामीजी को भी आज्ञा किये की नन्जीयर स्वामीजी को सम्प्रदाय में ले आये, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने पेरिया नम्बि जी को दायित्व दिया था रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लाने का | अपने आचार्य श्री चरणों का ध्यान करते हुए, पेरियनम्बि स्वामीजी और आलवन्दार स्वामीजी का , एम्पेरुमान स्वामीजी इस लीला विभूति को छोड़ते है ताकि स्वामीजी श्रीमन्न नारायण का कैंकर्य नित्य वैकुण्ठ धाम में कर सके | उसी समय रामानुज स्वामीजी से वियोग को न सहते हुए गोविन्दाचार्य स्वामीजी भी वैकुण्ठ धाम को चले जाते है |

पराशर : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामीजी का पार्थिव शरीर आज भी श्री रंगम मंदिर में संरक्षित किया हुआ है | क्या यह सत्य है ?

दादी : हाँ! पराशर, यह सत्य है और जब हम अपने महान आचार्यो के बारे में बात करते है, हमें उनके श्री शरीर का वैसे ही स्मरण करना है जैसे हम भगवान् जी के श्री दिव्या विग्रह का करते है | यह वास्तव में सच है कि रामानुज स्वामीजी की थिरुमेनी श्री रंगम मंदिर के अंदर संरक्षित है, जो कि रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के ठीक नीचे है। आज हम जो रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के रूप में देखते हैं, वे एक समय श्रीरंगम में श्री रंगनाथन भगवान जी का वसंत मंडप था | अब हम भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के श्री चरणों में और भगवान श्री रंगनाथ अब, हम सभी हमारे आचार्यों और उनकी महिमाओं के बारे में और जानने के लिए श्री रामानुज स्वामीजी और भगवान श्री रंगनाथ के श्री चरणों में प्रार्थना करते हैं। अब, आप सभी को छोड़ना चाहिए क्योंकि आपको देर हो रही है । अगली बार जब हम मिलेंगे, मैं आपको रामानुज स्वामीजी के विभिन्न शिष्यों के बारे में , उनकी महिमा और रामानुज स्वामीजी की विजय यात्रा में उनके योगदान के बारे में बताउंगी |

बच्चे रामानुज स्वामीजी के बारे में उनके विभिन्न कैंकर्य में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों और कैसे हमारे संप्रदायम के महान आचार्य के रूप में उभरे, के बारे में सोचते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

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पराशर, व्यास ने अंडाल दादी के घर में वेदवल्ली और अथथुले के साथ प्रवेश किया।

दादी : स्वागत बच्चों | अपने हाथ और पैर धो लो। थिरुआदिप पुरम उत्सव त्यौहार का प्रसाद यहां है, यह हमारे मंदिर में हुआ था। आज, हम अंडल पिराट्टी से बहुत प्रिय किसी पर अपनी चर्चा शुरू करेंगे, जिसे वह अपने भाई के रूप में बुलाती है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह कौन है ?

व्यास : नहीं दादी , अंडाल जी के भाई कौन थे ? क्या अंडाल जी का कोई भाई भी था ?

दादी : हाँ, वह उसका भाई था, जन्म से नहीं बल्कि प्यार और स्नेह से। उन्हें गोदाग्रज या कोयिल अन्नन कहा जाता था, जो हमारे रामानुजर के अलावा कोई नहीं है! अग्रजन का अर्थ संस्कृत में बड़े भाई होता है । गोदा जी द्वारा उनको बड़ा भाई मानना, इसीलिए उनको गोदाग्रज कहते है| स्वयं श्रीअनन्तशेष के अवतार, भगवत रामानुज स्वामीजी के पिता श्री केशवदीक्षितार और माता श्रीमती कान्तिमति देवी थी । भगवत रामानुज स्वामीजी का जन्म दक्षिणात्य चैत्र मास के आर्द्रा नक्षत्र के दिन वर्तमान तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदुर नामक गांव में हुआ। श्रीपेरूंबुदूर मैं श्री तिरुवल्लिक्केणि के श्री पार्थसारथी भगवान के अंशावतार के रूप मैं जन्म हुआ ।

पाराशर : दादी, क्या गोदा जी का अवतरण रामानुज स्वामीजी से पहले नहीं हुआ था? फिर रामानुज स्वामीजी गोदा जी के बड़े भाई कैसे हुए ?

दादी : पाराशर, बहुत अच्छा प्रश्न है | जैसे मैंने कहा था, रामानुज स्वामीजी गोदा जी के जन्म से भाई नहीं थे बल्कि अपने कर्मो के द्वारा उनके भाई थे | अंडाल, भगवान जी के प्रति उनका प्रेम स्नेह बहुत था, इसीलिए उनकी इच्छा थी की, भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग लगाए | लेकिन उस समय गोदा जी बाल्या अवस्था में होने से अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकी | रामानुज स्वामीजी नाच्चियार थिरुमोलही पाशुरम का पाठ करते है जहाँ गोदा जी अपनी इच्छा को पूरा करने की इच्छा प्रकट करती है | फिर रामानुज स्वामीजी १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को गोदाजी की और से लगाते है | भगवान जी को भोग लगाने के बाद रामानुज स्वामीजी जब श्रीविल्लिपुत्तूर जाते है और श्रीविल्लिपुत्तूर पहुँच कर, गोदाजी उनका अभिनन्दन करती है और उनको अपना श्रीरंगम से बड़ा भाई बोल कर संबोधित करती है, इसीलिए रामानुज स्वामीजी का एक नाम कोयिल अन्नन है | गोदाजी रामानुज स्वामीजी को बड़ा भाई इसीलिए कह कर संबोधित करती है क्यूँकि भाई वह होता है जो बहन का ध्यान रखे और अपनी बहन की इच्छा और मनोरथ पूर्ण करे |

अतुलाय, क्या आप तिरुप्पावै के पाशुरम का उच्चारण कर सकते हो ? मुझे स्मरण है की आप स्कूल बहुरूप पोशाक प्रतियोगिता में अभिनीत किया था और कुछ पाशुरम का उच्चारण भी किया था ?

(फिर अतुलाय कुछ पाशुरम का उच्चारण करती है )

दादी : क्या आप जानते है की मैंने क्यों आपको आज उच्चारण के लिए कहा था ? क्योंकि, रामानुज स्वामीजी को भी तिरुप्पावै जीयर के नाम से जाना जाता है | रामानुज स्वामीजी सदैव प्रतिदिन तिरुप्पावै का उच्चारण करते थे | महान विद्वान होने के बाबजूद भी, रामानुज स्वामीजी तिरुप्पावै को अपने मन के पास थी और उसका प्रतिदिन उच्चारण करते थे | क्या आपको मालूम है क्यों ?

वेदावल्ली : इसीलिए यह सिखने में सरल है ? मुझे सभी ३० पाशुरम आते है |

दादी (मुस्कराते हुए ) : वेदावल्ली, यह तो बहुत अच्छा है | तिररुप्पवाई सीखना सरल ही नहीं, परन्तु ३० पाशुरम में हमारे संप्रदाय का सार है | तिरुप्पावै का ज्ञान वेदो में जो ज्ञान है उसके समान है | इसीलिए इसको “वेदं अनैतत्तुक्कुम विठ्ठागुम” —- ३० पाशुरम में सर्व वेदो का सार निहित है |

अतुलाय : दादी, रामानुज स्वामीजी के तो बहुत सारे नाम थे | पहले अपने इळयाळ्वार कहा, फिर रामानुज, और अब कोयिल अन्नन और तिरुप्पावै जीयर |

दादी : हाँ | उनके यह सब नाम हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो ने, गोदा जी ने और भगवान जी ने स्नेह पूर्वक दिए | हमने रामानुज स्वामीजी के सभी आचार्यो के बारे में जाना और उनका रामानुज स्वामीजी के जीवन में योगदान जो उन्होंने दिया | चलिए रामानुज स्वामीजी के विभिन्न प्रकार के नाम देखते है और देखे की यह नाम उनको किस किस ने दिए है |

उनमे कुछ नाम इस प्रकार है,

१) इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे ।

२) श्रीरामानुज – उनके आचार्य श्रीपेरियनम्बि(श्री महापूर्ण स्वामीजी) ने दीक्षा के समय दिये थे।

३) यतिराज और रामानुज मुनि – श्री देवपेरुमाळ (भगवान वरदराज, कांची) ने उनके सन्यास दीक्षा के समय दिये थे।

४) उडयवर – नम्पेरुमाळ (भगवान रंगनाथ, श्रीरंगम ) ने दिया था।

५) लक्ष्मण मुनि – तिरुवरंगपेरुमाळ अरयर(श्री वाररंगाचार्य स्वामीजी) ने दिया था।

६) एम्पेरुमानार – जब श्रीरामानुजाचार्य ने गुरु से प्राप्त मन्त्र वहां उपस्थित सारे लोगों को बिना पूछे ही बतला दिया था तब श्री तिरुक्कोष्टियूर नम्बि(श्री गोष्टिपुर्ण स्वामीजी) ने यह नाम दिया था ।

७) शठगोपनपोन्नडि (शठकोप स्वामीजी की पादुका) – तिरुमलय अण्डाण(श्री मालाकार स्वामीजी) ने दिया था ।

८) कोयिल अन्नन – भगवान सुन्दरबाहु ( तिरुमालिरुन्सोलै) को १०० घड़े अक्कर वडिसल और १०० घड़े मक्खन का भोग लगाकर जब श्रीरामानुजाचार्य स्वामीजी ने माँ गोदाम्बाजी का प्रण पुरा करके, श्रीविल्लिपुत्तूर दर्शन के लिए आये तब माँ गोदाम्बजी ने दिया था।

९) श्रीभाष्यकार – कश्मीर में शारदा पीठ में श्रीभाष्य पर रामानुज स्वामीजी के विवेचन पर प्रसन्न हो सरस्वती देवी ने प्रदान किया था।

१०) भूतपूरीश्वर – श्रीपेरुम्पुदुर के श्रीआदिकेशव भगवान ने दिया था।

११) देषिकेन्द्रार – श्रीतिरुवेण्कटमुदयन(श्री वेंकटेश भगवान) ने यह नाम प्रदान किये थे ।

इस तरह से, यह संक्षेप में वह सब नाम है जो रामानुज स्वामीजी को बहुत सारे आचार्यो ने प्रदान किये जिन्होंने रामानुज स्वामीजी का ध्यान रखा और उनका ज्ञान संवर्धन किया ताकि हमारा सम्प्रदाय और बढ़ सके और आलवन्दार स्वामीजी के बाद रामानुज स्वामीजी इसको आगे ले जा सके | आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के विशेष अनुग्रह के द्वारा उनको सबसे पहले तिरुक्काच्चिनम्बि (श्री काँचीपूर्ण स्वामीजी) से श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के बारे में बतलाते है, बाद में श्री पेरियनम्बि(श्री महापूर्ण स्वामीजी), इळयाळ्वार को पंचसंस्कार दीक्षा प्रदान करते हैं, तिरुवायमोली का अनुसंधान थिरुमलाई अण्डाण जी से सीखते है, हमारे सम्प्रदाय का सार थिरुवरंगपेरुमल अरैयर जी से सीखते है, तिरुक्कोष्टियुरनम्बि (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी) से श्रीसम्प्रदाय के गोपनीय मंत्र सीखते है एवं रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन अपने मामाजी पेरिया थिरुमलाई नम्बि जी से सीखते है | इस प्रकार, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के ६ मुख्या शिष्यों ने अपने गुरूजी के प्रति अपनी सेवा कैंकर्य किये |

रामानुज स्वामीजी – श्री पेरुम्बुदूर

वेदावल्ली : दादी, जब आप आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में बता रही थी, अपने कहा था रामानुज स्वामीजी आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के शिष्य नहीं बन सके पर रामानुज स्वामीजी ने प्रण लिए था की वह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के मनोरथो की पूर्ति करेंगे | वह क्या थी ? रामानुज स्वामीजी को कैसे पता चला की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के क्या अभिलाषाएँ थी |

दादी : एक बहुत सुन्दर प्रश्न है | जब आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने पेरिया नम्बि स्वामीजी को रामानुज स्वामीजी को श्री रंगम में लाने आज्ञा दिए, तो पेरिया नम्बि स्वामीजी कांचीपुरम जाते है | जब तक पेरिया नम्बि स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के साथ श्री रंगम से लौट कर आते है, तब तक आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) वैकुण्ठ गमन कर इस संसार को छोड़ देते है| श्री रंगम पहुंचने पर, पेरिया नम्बि स्वामीजी और रामानुज स्वामीजी को जब इसके बारे में पता चलता है | जब रामानुज स्वामीजी आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का दिव्या रूप देखे, उन्होंने उनके एक हाथ की ३ उंगलिया मुड़ी हुयी (बंद) देख अचंभित होते हैं। इळयाळ्वार् भी यह देख उपस्थित शिष्य और वैष्णव समूह से चर्चा कर इसका कारण जानने का प्रयास करते है , सबकी सुन इस निर्णय पर पहुँचते है की आलवन्दार स्वामी की ३ इच्छाएँ अपूर्ण रह गयी , रामानुज स्वामीजी उसी समय प्रण लेते है की वह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) इच्छाएँ पुराण करेंगे | वे इच्छाएँ इस प्रकार थी, :
१. व्यास और पराशर ॠशियों के प्रति सम्मान व्यक्त करना ।
२. नम्माल्वार् के प्रति अपना प्रेम बढ़ाना ।
३. विशिष्टा द्वैत सिद्धान्त के अनुसार व्यास के ब्रह्म सूत्र पर श्रीभाष्य की रचना करना (विश्लेष से विचार/चर्चा करना ) लिखना । श्रीभाष्य टिका (व्याख्या) हेतु श्री कूरत्ताळ्वान के साथ कश्मीर यात्रा पर जाते है, बोधायनवृत्ति ग्रन्थ प्राप्त कर श्री बादरायण के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि पूरी करते है |

तब इळयाळ्वार् प्रण लेते है की, आलवन्दार स्वामी के यह ३ इच्छाएँ वह पूर्ण करेंगे, इळयाळ्वार् के प्रण लेते ही आळवन्दार् स्वामी की तीनो उंगलिया सीधी हो जाती हैं । यह देखकर वहां एकत्रित सभी वैष्णव, और आलवन्दार स्वामी के शिष्य अचंभित हो खुश हो जाते हैं और इळयाळ्वार् की प्रशंसा करते हैं। आळवन्दार् स्वामी की परिपूर्ण दया, कृपा कटाक्ष और शक्ति उन पर प्रवाहित होती हैं। उन्हें श्री वैष्णव संप्रदाय दर्शन के उत्तराधिकारी पद पर प्रवर्तक/ निरवाहक चुन लिये जाते हैं । इळयाळ्वार् को आळवन्दार् स्वामी का दर्शन का सौभाग्य प्राप्त न होने का बहुत क्षोभ हुआ, वे दुखित मन से सब कैंकर्य पूर्ण करके , बिना पेरिय पेरुमाळ् के दर्शन किये कान्चिपूर् लौट जाते हैं ।

व्यास : लेकिन दादी, किसी का शरीर ऐसे कैसे उत्तर दे सकता है जैसे की आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की मुड़ी हुयी उंगलिया रामानुज स्वामीजी की प्रतिज्ञा सुन कर ?

दादी : व्यास, जो संबंध रामानुज स्वामीजी का और आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) था वह शारीरिक अनुभव से बहार थी | यह संबंध ऐसे था जैसे मन और आत्मा का संबंध जैसा | क्या आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने रामानुज स्वामीजी को अपनी अंतिम ३ इच्छाएँ बताई थी ? यह कैसे हो सकता है ? व्यास, इस प्रकार का संबंध होता है | ठीक उस प्रसंग की तरह जहाँ वरदराज भगवान जी रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान करते है बिना रामानुज स्वामीजी के बताये की उनकी शंकाएँ क्या है | ऐसे संबंध मन और आत्मा से सम्पन होते है और न की शरीर के द्वारा | इस तरह का संबंध था रामानुज स्वामीजी का और आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का |

अब तक हमने रामानुज स्वामीजी और विभिन्न आचार्यो ने जो उनके जीवन से संबंध रखते थे, वह सब देखा | में आपको कल वह सब बताउंगी की कैसे रामानुज स्वामीजी एक महान आचार्य बने और कैसे बहुत से शिष्यों ने रामानुज स्वामीजी के जीवन में उनका अनुसरण किया |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् के शिष्य – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् शिष्य – भाग 1

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

tirukkachinambi

गोश्टि पूर्ण और् कान्ची पूर्ण

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं ! वह अपने मित्र वेदवल्ली, अत्तुज़्हाय् और् श्रीवत्सांगन्. के साथ जाते हैं !

दादी (मुस्कराते हुए ) : आओ बच्चों | व्यास, आप तो सभी मित्रों को साथ लेकर आये हो जैसा मैंने कल कहा था |

व्यास : जी दादी, पराशर और मैं स्वामी रामानुज जी और उनके आचार्य की कहानी बता रहे थे श्रीवत्सांगन्. को और वह चाहता था की आज इसको आपसे सुने !!

दादी : यह तो बहुत बढ़िया है | आईए , बैठे | आज में आपको तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) और् तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में बताउंगी,  इन दोनों महान आचार्यो का हमारे सम्प्रदाय में बहुत विशेष स्थान है |

श्रीवत्सांगन् : दादी, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी का जनम चेन्नई के पास पूविरुन्तवल्लि में वहां हुआ था जो श्रीपेरुम्बूतूर् जाने के रास्ते में आता है| हम उस मंदिर में पिछले साल गर्मी की छुटियों में गए थे |

दादी : बहुत अद्धभुत | यह ठीक है | तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) श्री देव पेरुमाळ को पंखा करने की सेवा से जाने गए है और उसी कारण प्रसिद्ध भी हुए है । इसके अतिरिक्त वे भगवान श्री देव पेरुमाळ और स्वयं के बीच मे आम तौर पर होने वाले वार्तालाप से भी प्रसिद्ध हैं | जब रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम आये, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) प्रथम आचार्य थे जिनकी शरण में रामानुज स्वामी जी आये और उन्होंने ही रामानुज स्वामीजी को भगवान् जी के प्रथम कैङ्कर्य करने के लिए निर्देशत किया |

व्यास : दादी जी रामानुज स्वामी जी ने क्या कैङ्कर्य किये ?

दादी : श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) पास पहुँचे और उनके मार्गदर्शन के लिये निवेदन किया । नम्बि जी इळयाळ्वार को तिरुमंजन तीर्थ कैंकर्य सौंपते हैं ( निकट मे स्थित कुँए से लाया जाने वाला पानी जो भगवान के स्नान के लिये उपयोग किया जाता था ) । इळयाळ्वार खुशी खुशी स्वीकर किये और यह कैंकर्य वह प्रतिदिन करने लगे । शास्त्रों और भगवान के प्रति उनके प्यार के प्रति उनका ज्ञान उत्कृष्टता थी। तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के प्रति अत्यधिक आकर्शित होकर श्री इळयाळ्वार उनके चरण कमलों का आश्रय लेते हुए उनसे विनती करते हैं कि वो उन्हे पंञ्चसंस्कार दे और उन्हे शिष्य के रूप मे स्वीकार करे ।

पराशर : लेकिन दादी, क्या आपने नहीं कहा था की पेरिया नम्बि स्वामीजी ने रामानुज स्वामीजी का मधुरान्तकं में पञ्च संस्कार किया था ?

दादी : हाँ पराशर | मुझे प्रसन्नता है की तुम्हे सब याद है |परन्तु वेदों और शास्त्रों का निरूपण देते हुए कहते हैं कि वह कदाचित भी उन्हे पंञ्चसंस्कार दे नही सकते और उसके वो काबिल नही क्योंकि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) अब्राह्मण वर्ण के थे जिसके कारण वे नियमानुसार दीक्षाचार्य नही हो सकते (परन्तु वो श्री इळयाळ्वार को शिक्षा गुरु के तौर से उपदेश देने के सक्षम हैं और यहि कायम रखेंगे) । यह जानकर इळयाळ्वार बहुत निरुत्साहित हुए परन्तु वेदों और शास्त्रों मे दृध विश्वास होने की वजह से, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के निश्चित निर्णय को पूर्ण तरह से स्वीकार किये । तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी रामानुज स्वामीजी की हमारे सम्प्रदाय के प्रति शंकाओं और प्रशनो का निवारण करते है | यह एक बहुत रोचक कहानी है की कैसे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी भगवान् जी के साथ वार्तालाप करते है जिससे रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान हो सके |

वेधावल्ली : क्या शंकायें थी दादी ? भगवान् जी ने क्या कहा ?

दादी : एक बार रामानुज स्वामी जी के दिमाग में कुछ भ्रम और संदेह हो गया । वह जानते थे कि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) भगवान् पेरुमल से बातचीत करते है, उन्होंने एक बार फिर तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के मार्गदर्शन का अनुरोध किया। नम्बि भगवान के पास जाते है और सामान्य रूप से अपना कैंकर्य करते है और रामानुज स्वामी जी के अनुरोध को खोलने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करते है। भगवान नम्बि की हिचकिचाहट के बारे में पूछताछ करते है | नम्बि देव पेरुमाळ से वारतालाप के विषय मे अत्यधिक प्रसिद्ध माने गये हैं। इळयाळ्वार को विलंब करने वाले कुछ संदेहों का समाधान हेतु वे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास गए और विनम्रतापूर्वक इन संदेशों का प्रस्ताव किया और पूछे की वे ( तिरुक्कच्चि नम्बि ) इन संदेहों का समाधानों प्राप्त करे और उन्हे बताये । श्री रामानुजाचार्य जो साक्षात आदि शेष के अवतार हैं, हमारे पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर हमे यह जानना चाहिये कि श्री रामानुजाचार्य केवल नटन यानि अपने पात्र को भलि–भांति निभा रहे थे और वह इन संदेहों का समाधान भी जानते थे परन्तु प्रमाणों को भगवान और पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर प्रमाणित करना चाहते थे । उस रात , अपना कैंकर्य समाप्त कर श्री नम्बि भगवान को अती प्रेम से देखने लगे ।

सर्वज्ञ देव पेरुमाळ ने उनसे पूछा – नम्बि , क्या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ? नम्बि थोडी देर सोचकर भगवान के समक्ष इळयाळ्वार के मन की मनोवेदना को व्यक्त किये और कहे – अब आप ही इन संदेहो का समाधान दीजिए । यह सुनकर भगवान ने कहा – जिस प्रकार मैने अपने श्री कृष्णावतार मे सान्दीपणि मुनि से शास्त्र सीखा, इळयाळ्वार ( जो अनन्त शेष के अवतार है , सर्वज्ञ है ) वो मुझसे इन संदेहों का समाधान पूछ रहे हैं। उसके पश्चात , भगवान ने स्वयम छे उपदेशों को नम्बि के सामने प्रस्तुत किया जो मेरे छे ईश्वरीय आदेश के नाम से प्रसिद्ध है वही भगवद्बन्धुवों के लिए प्रस्तुत है –

1) अहमेव परम तत्वम् – मै ( देव पेरुमाळ ) ही सर्वोच्छ (महान, श्रेष्ठ) हूँ

2) दर्शनम् भेदमेव – जिवात्मा और अचेतनम् ( अचेत ) मुझसे (मेरे दिव्य शरीर से) विभिन्न है

3) उपायम् प्रपत्ति – “मुझे ही अन्तिम शरण ( उपाय ) के रूप मे स्वीकर करना ” यानि केवल भगवान का शरण ही उपाय है और उससे ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है

4) अन्तिम स्मृति वर्जनं – प्रपन्न भक्तों के लिये अन्तिम स्मरण ज़रूरी नही है क्योंकि श्री वराह भगवान ने वराह चरम श्लोक मे कहा है कि – भगवान स्वयम प्रप्पन्न भक्तों के अन्तिम काल मे उनका स्मरण करेंगे । आम तौर पर हमारे आचार्यों ने दर्शाया है की हमे अपने अन्तिम काल मे अपने आचार्य पर ध्यानकेन्द्रित करना चाहिये ।

5) देहवासने मुक्ति – भगवान ने कहा है – प्रपन्न भक्त उनके अन्त काल के बाद ( भौतिक शरीर का त्याग करना ) निश्चितरूप से परमपद की प्राप्ति होगी और उनको मोक्ष इस प्रकार से मिलेगा और वह भगवद्–भागवदकैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

6) पूर्णाचार्य पदाश्रित – पेरियनम्बि (महापूर्ण) को अपना आचार्य मानो और उनका शरण लो

तिरुक्कच्चि नम्बि इळयाळ्वार के पास जाकर स्वयम भगवान के छे आदेशों ( जो इळयाळ्वर के संदेशों के समाधान ) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। इळयाळ्वर यह सुनकर बहुत खुश होते हैं और इस अनुग्रह (सहायता) के लिये उनकी प्रशंसा और अभिवादन करते हैं। यह बताने के बाद नम्बि इळयाळ्वर से पूछते हैं – क्या वे भी यही सोच रहे थे .. इसके जवाब मे रामानुजाचार्य कहे – जी हा स्वामि , मै भी यही सोच रहा था .. तिरुक्कच्चि नम्बि को तब एहसास हुआ की भगवान और श्री रामानुजाचार्य का तिरुवुळ्ळम् (मनोभावना) एक ही है यह जानकर वे अती प्रसन्न हुए । अब यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि रामानुज को शम शर्यणम के लिए पेरिया नंबी से संपर्क करना चाहिए, वह तिरुक्कच्चि नम्बि के आशीर्वाद लेते हैं और पेरिया नम्बि से मिलने के लिए श्री रंगम को छोड़ देते हैं और हम सभी बाकी की कहानी जानते हैं, बच्चे क्या यह नहीं हैं?

व्यास : हाँ दादी, हमें याद है |

दादी : श्रीवैष्णवों के महत्वपूर्ण गुणों में से एक गुण विनम्रता है , जिसे नेच्या भावम कहते है या हमारे सम्प्रदाय में दूसरे श्री वैष्णवों की उपस्थिति में अपने आपको विनम्र समझना | पेरिया नम्बि नम्रता का एक जीवंत उदाहरण थे जो वास्तव में उनके दिल से आई थी और केवल उनके मुंह से शब्द नहीं थे। पेरिया नम्बि बहुत नम्र थे और हमेशा महान सम्मान के साथ अन्य श्रीविष्णवों का इलाज करते थे। एक बहुत ही रोचक घटना हुई जो यह साबित करती है। मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे । एक बार एक महान आचार्य मारनेरी नम्बि चाहते थे कि उनके अंतिम संस्कार श्रीवैष्णव द्वारा किया जाए और पेरिया नंबी से उनकी देखभाल करने का अनुरोध किया जाए। पेरिया नंबी खुशी से इस बात से सहमत थे और शहर में स्थानीय लोगों के क्रोध का सामना करने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने के लिए जाति के द्वारा पेरिया नंबी से कम है और इस प्रकार शास्त्र के खिलाफ जा रहे है। जब पूछा गया , पेरिया नम्बि स्वामीजी कहते है की वह तो सिर्फ श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी ने उन्हें सिखाया है जो कहते है की भागवत कैंकर्यं बहुत ही शुद्ध और महत्वपूर्ण कैंकर्यं है | एक भागवत को उनकी जाती या जन्म देखे बिना उन सभी को एक समान कैंकर्यं करना चाहिए | नाच्य भाव सैद्धांतिक नहीं था लेकिन पेरिया नम्बि द्वारा अभ्यास में डाल दिया गया था। वह वास्तव में विश्वास करते थे कि सभी श्री वैष्णव भगवान के लिए प्रिय हैं और सम्मानित होना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्राट के एक सच्चे भक्त अपने आखिरी पलों को कैसे बिताते हैं, सम्राट उन्हें श्री वैकुंठम में कन्यार्यम का अनन्त आनंद देता है, जैसा कि भगवान पेरुमल द्वारा तिरुक्कच्चि नम्बि को आश्वासन दिए थे । वह एक महान आचार्य थे जो अपने आचार्य, अलवंधर और श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी की शिक्षाओं के दौरान अपने जीवन भर में रहते थे। क्या यह आज के लिए पर्याप्त है या आप तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) के बारे में भी सुनना चाहते हो?

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वेदवल्ली : क्या आप के पास उनके बारे में भी कहानी है ?

दादी : हाँ, बहुत |

अत्तुज़्हाय् : फिर हमें तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी :आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

व्यास : ॐ नमो नारायणाय मंत्र को तिरुमंत्र कहते है |

श्रीवत्सांगन् : सर्व धर्मं परित्यज्य मामेकं शरणमं व्रजा; अहम् तवा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ सुचा: इसको चरम श्लोक कहते है |

दादी : बहुत अद्भुत | अब यह तीन श्लोक का बहुत गहरा और गंभीर अर्थ है जो की किसी आचार्य के द्वारा ही सीखा जा सकता है |

वेधावल्ली : लेकिन दादी, हमें इन श्लोको का अर्थ जानना है |

दादी: हाँ, हम सभी इन तीन श्लोक का अर्थ जानते है लेकिन हमारे सम्प्रदाय में यह हर एक मंत्र बहुत प्रभावशाली है जो की एक आचार्य के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के बिना पूरी तरह से इसे जानने की क्षमता से परे है। यही कारण है कि तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) को रामानुज को इन छंदों के अर्थों को पढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य दिया गया था |

अत्तुज़्हाय् : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामी जी को १८ बार तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी के पास जाना पड़ा थिरुमन्त्रम सीखने के लिए | क्या यह सत्य है ? उनको इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ा ?

दादी : हाँ, यह सब सत्य है | इसे हमारे संप्रदायम के बारे में सीखने में रामानुज भागीदारी और ईमानदारी का परीक्षण करने के लिए तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) द्वारा उपयोग किए जाने वाले तरीके के रूप में लिया जा सकता है और इसे रामानुज स्वामी की दृढ़ता और धैर्य की गवाही के रूप में भी लिया जा सकता है।

व्यास : दादी, तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी दिखने में बहुत सख्त थे | वह रामानुज स्वामी जी के प्रति उद्धार हो सकते थे |

दादी : यह तो सभी को सीखने के बाद इस घटना के बारे में बहुत गलत धारणा है | यह सही नहीं है | उनके मन में सदैव रामानुज स्वामी जी क्या कल्याण करने का मन करता था और ऐसे तो वह बाहर से बहुत सख्त थे | एक अच्छे पिता का कर्तव्य होता है की बेटे के साथ सख्त रहे और अपने बेटे के लिए किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहे |याद है , कल जब हम तिरुमलै अण्डाण जी के बारे में बात कर रहे थे , मैंने कहा था की अण्डाण और रामानुज स्वामीजी के विचारो में कुछ मतभेद था | यह तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ही थे जिन्होंने मध्यस्था करके दोनों में विरोध खत्म किया सिर्फ रामानुज स्वामीजी के लिए | जहाँ तक की वह रामानुज स्वामीजी का श्री वैष्णवों के प्रति अनुराग देखकर बहुत प्रभाबित हुए की उन्होंने रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमणार नाम से सम्बोधित किया (मन्नाथ ) | इस तरह से रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमानार सुन्दर नाम मिला | जब रामानुज स्वामीजी श्री रंगम में उनके दुश्मनो ने जहर देकर मारने की कोशिश की, तब तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ने समय पर आकर किदाम्बी अचान को रामानुज स्वामीजी के लिए खाना बनाने के लिए नियुक्त किये ताकि रामानुज स्वामीजी सुरक्षित रह सके | तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी एक पिता की तरह सदैव रामानुज स्वामीजी के कल्याण करने के बारे में सोचते रहते | यहाँ और भी बहुत सी कहानियां उनके महानता के बारे में की वह उनसे पिता की तरह अनुराग रखते थे, ज्ञान के सागर एवं उनका उनके आचार्य आलवन्दार स्वामीजी के प्रति श्रद्धा| मे चाहती हूँ की आपको कहानियां सुनाती जाऊ और मुझे विश्वास है की आप भी सुनना पसंद करोगे लेकिन क्या आप नहीं सोचेंगे की आपके माता पिता चिंतत होंगे आप सभी देरी से हो | अब आप यह फल लो और घर जाईये | अगली बार में आपको और बहुत सारी कहानियां बताउंगी अपने आचार्य के बारे में |

बच्चो ने फल फूल लिए, और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी, पेरिया नम्बि स्वामीजी और तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में सोचने लगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-alavandhars-sishyas-2/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर्, श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) और मालादर (तिरुमालै आन्डान्)

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यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर आपने मित्र वेदावल्ली के साथ प्रवेश करते है|

दादी : स्वागत वेदावल्ली। अंदर आ जाओ बच्चों|

व्यास : दादी , पिछली बार आपने कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और दूसरे आचार्य के बारे में विस्तार से बताएंगी|

पराशर : दादी , क्या आपने हमें यह नहीं बताया था की रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्य थे, सिर्फ पेरिया नम्बि ही नहीं ? दूसरे आचार्य कौन थे दादी ?

दादी : जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था बच्चों, यामुनाचार्य स्वामी जी के बहुत शिष्य थे जो रामानुज स्वामी जी को सम्प्रदाय में लाने के लिए सिखाते थे ! उनमे से जो प्रमुख थे : १) तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) २) गोश्टि पूर्ण (तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि) ३) श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ४) तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) ५) तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) और साथ में श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) !|क्या आप को याद है हमने पिछली बार श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) स्वामी जी के बारे में बात की थी जब हम पिछली बार मिले थे ! अब, चलो में आपको दूसरे आचार्यो की बारे में और उनकी महत्वपूर्ण योगदान जो उनका हमारे सम्प्रदाय के प्रति रहा उसके बारे में बताउंगी !

पराशर : दादी, रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्या क्यों थे ?

दादी : सभी आचार्यो ने उनको इस तरह से सिखाया की वह एक महान आचार्य बने ! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) एक बहुत बडा कैङ्कर्य किया श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम लाकर |

व्यास : यह सब कैसे हुआ ? वह कहानी भी हमें बताये दादी |

दादी : उस समय रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम में रहते थे और सन्यास आश्रम भी स्वीकार किया! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) कांचीपुरम गए और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से विनती किये उनको देव पेरुमल के समीप अरैयर् सेवा करने दे ! देव पेरुमल जी ने अर्चक से कहलवाया की उनके सामने ही अरैयर् सेवा किया जाए ! अरैयर् स्वामी जी ने बहुत सेवा भाव से भगवान जी के सामने नृत्य के साथ पाशुरम गाये ! भगवन् उनसे बहुत प्रसन हुए और उनको बहुत सारे उपहार दिए | अरैयर् स्वामी जी बोले की उनको उपहार नहीं चाहिए उनको तो और कुछ चाहिए | भगवान् जी मान गए और बोले ” हम आपको सब कुछ देंगे, आप बोले तो सही” | अरैयर् स्वामी जी तब रामानुज स्वामी जी की तरफ इशारा करते हुए बोले की वह अपने साथ श्री रामानुज स्वामी जी को श्री रंगम ले जाना चाहते है ! भगवन बोले ” हम सोच भी नहीं सकते थे की आप रामानुज स्वामी जी को हमसे मांगेगे; आप कुछ और मांगिये”| अरैयर् स्वामी जी बोले ” आप और कोई नहीं श्री राम जी है जो कभी दो शब्द नहीं बोलते , आप अपने बचन से इंकार नहीं कर सकते ! फिर भगवन जी ने स्वीकार किये और रामानुज स्वामी जी को जाने की अनुमति प्रदान की !

व्यास : दादी कितनी बड़ी चालाकी थी यह| यह अरैयर् स्वामीजी की बुद्धिमता थी की वह पेरुमल स्वामी जी को मना सके !

दादी : बोलो व्यास | उसी समय अरैयर् स्वामी जी ने रामानुज स्वामी जी का हाथ पकड़ा, और श्री रंगम जाने के लिए प्रस्थान किया | फिर , अरैयर् स्वामी जी ने वह महत्व पूर्ण सेवा की श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर जिससे हमारा सम्प्रदाय ने और आगे बड़े और उसको उचाईयो तक पहुँचाया |

वेदवल्ली : दादी, अपने कहा सभी आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी कुछ न कुछ सिखाया ! अरैयर् स्वामी जी ने उनको क्या सिखाया ?

दादी :आलवन्दार स्वामी जी ने अपने सभी मुख्य शिष्यों को रामानुज स्वामी जी को अपने सम्प्रदाय के बारे में अलग अलग सीखने के लिए निर्देश दिए थे | अरैयर् स्वामी जी को आदेश था की वह सम्प्रदाय का मूल तत्व रामानुज स्वामी जी को बताये ! अब, रामानुज स्वामी जी ने बहुत सुन्दर कृत किये इससे पहले की वह अरैयर् स्वामी जी के पास जाते सीखने के लिए | उन्होंने ६ महीने आचार्य सेवा में कैंकर्य किये कुछ भी सीखने से पहले | यह एक बहुत महत्व पूर्ण पहलु है जो श्री रामानुज स्वामी जी, कुरतालवान स्वामी जी, मुदलियानदान स्वामी जी और बहुत आचार्य जी ने अपने जीवन में किये — अपने आचार्यो का कैंकर्य किये उनसे सीखने से पहले | यह उनकी भक्ति भाव दर्शाता है की वह किससे क्या सीख रहे है और किस उदेश्ये से सीख रहे है | रामानुज स्वामी जी प्रति दिन दूध गरम करते और अरैयर् स्वामी जी को हल्दी का लेप बनाकर देते जब भी आवश्यकता होती !

व्यास : दादी, दूसरे आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी: हाँ, में एक एक करके उस पर आ रही हूँ | तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे | वह थिरु वेंकट आद्री के पहले निवासी थे | वह प्रति दिन आकाश गंगा जाकर भगवान् जे के सनान के लिए जल लेकर कैंकर्यं करते थे | वह भगवान् जी की सेवा बहुत ध्यान और मन से करते थे | उनके आचार्य जी का आदेश था की वह रामानुज स्वामी जी को श्री रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन सीखा सिखाये | श्री रामायाण बहुत प्रसिद्ध है हमारे समप्रदायम में शरणागति शास्त्र की तरह | इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे । यही नहीं श्री तिरुमलै नम्बि स्वामी जी ही थे जिन्होंने गोविंदा स्वामी को वापिस श्री वैष्णव सम्प्रदाय में लाये थे जो रामानुज स्वामी जी की ममेरे भाई थे | उनका ज्ञान हमारे सम्प्रदाय के लिए और उनका अलवार स्वामी के पाशुराम के प्रति बहुत लगाव था |

पराशर : दादी, क्या आप हमें तिरुमाळै अण्डाण स्वामी जी के बारे में बता सकते हो ? उन्होंने रामानुज स्वामी जी किस तरह से मदद की ?

दादी : तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी को पूरी ज़िम्मेदारी दी गयी थी की वह रामानुज स्वामी जी को थिरु वाईमोली सिखाये | जब रामानुज स्वामी जी श्री रंगम पहुंचे, तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) जी ने ही उनका मार्ग दर्शन किया था की वह तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) से नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामीजी) तिरुवाय्मोळि (सहस्रगीति) को सुने और उनका सार मूल तत्व समझे | यद्यपि, शुरुआत में दोनों में कुछ मतभेद थे क्योंकि यह किसी भी महान विद्वानों के बीच होता है, इसे सुलझाया गया और रामानुज ने अपने आचार्य तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) के आशीर्वाद के साथ अलवार के पाशुरम में छिपे जटिल अर्थों को सीखा | तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी की उनके आचार्य आलवन्दर के लिए इतना सम्मान और भक्ति थी। वह कभी भी अपने आचार्य के मार्ग और शिक्षाओं से दूर नहीं चले और उन्हें रामानुज स्वामी जी को के सिखाया ताकि वह हमारे संप्रदायम के कैंकर्यं को आगे ले जा सकें।

वेदवल्ली : तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) जी ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी : में आपको अगली बार जब हम मिलेंगे तब बताउंगी | उनके बारे में बहुत सी रोचक कहानियां है |

व्यास , पराशर और वेदवल्ली (मिलकर ) : हमें अभी कहानी सुनाइए दादी माँ !

दादी : अभी बहुत देर हो गयी है | आज के लिए यह काफी है | अभी आप घर जाये और कल आप दुबारा वापिस आना और अपने दोस्त को अपने साथ लाना नहीं भूलना |

बच्चे अपने घर को जाते है और हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो के बारे में सोचते है और बहुत उत्सुकता से इंतज़ार करते है की कब दूसरे दिन दादी उनको कहानी सुनाएगी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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