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श्रीवैष्णव – बालपाठ – यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य – भाग 1

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर्, श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) और मालादर (तिरुमालै आन्डान्)

pancha-acharyas

यामुनाचार्य (आळवन्दार्) के शिष्य

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर आपने मित्र वेदावल्ली के साथ प्रवेश करते है|

दादी : स्वागत वेदावल्ली। अंदर आ जाओ बच्चों|

व्यास : दादी , पिछली बार आपने कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और दूसरे आचार्य के बारे में विस्तार से बताएंगी|

पराशर : दादी , क्या आपने हमें यह नहीं बताया था की रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्य थे, सिर्फ पेरिया नम्बि ही नहीं ? दूसरे आचार्य कौन थे दादी ?

दादी : जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था बच्चों, यामुनाचार्य स्वामी जी के बहुत शिष्य थे जो रामानुज स्वामी जी को सम्प्रदाय में लाने के लिए सिखाते थे ! उनमे से जो प्रमुख थे : १) तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) २) गोश्टि पूर्ण (तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि) ३) श्रीशैल पूर्ण (पेरिय तिरुमलै नम्बि) ४) तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) ५) तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) और साथ में श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) !|क्या आप को याद है हमने पिछली बार श्री महा पूर्ण (पेरिया नम्बि) स्वामी जी के बारे में बात की थी जब हम पिछली बार मिले थे ! अब, चलो में आपको दूसरे आचार्यो की बारे में और उनकी महत्वपूर्ण योगदान जो उनका हमारे सम्प्रदाय के प्रति रहा उसके बारे में बताउंगी !

पराशर : दादी, रामानुज स्वामी जी के बहुत सारे आचार्या क्यों थे ?

दादी : सभी आचार्यो ने उनको इस तरह से सिखाया की वह एक महान आचार्य बने ! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) एक बहुत बडा कैङ्कर्य किया श्री रामानुज स्वामीजी को श्रीरंगम लाकर |

व्यास : यह सब कैसे हुआ ? वह कहानी भी हमें बताये दादी |

दादी : उस समय रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम में रहते थे और सन्यास आश्रम भी स्वीकार किया! तिरुवरन्गप्पेरुमाळ् अरैयर् (श्री वररंगाचार्य स्वामीजी) कांचीपुरम गए और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) से विनती किये उनको देव पेरुमल के समीप अरैयर् सेवा करने दे ! देव पेरुमल जी ने अर्चक से कहलवाया की उनके सामने ही अरैयर् सेवा किया जाए ! अरैयर् स्वामी जी ने बहुत सेवा भाव से भगवान जी के सामने नृत्य के साथ पाशुरम गाये ! भगवन् उनसे बहुत प्रसन हुए और उनको बहुत सारे उपहार दिए | अरैयर् स्वामी जी बोले की उनको उपहार नहीं चाहिए उनको तो और कुछ चाहिए | भगवान् जी मान गए और बोले ” हम आपको सब कुछ देंगे, आप बोले तो सही” | अरैयर् स्वामी जी तब रामानुज स्वामी जी की तरफ इशारा करते हुए बोले की वह अपने साथ श्री रामानुज स्वामी जी को श्री रंगम ले जाना चाहते है ! भगवन बोले ” हम सोच भी नहीं सकते थे की आप रामानुज स्वामी जी को हमसे मांगेगे; आप कुछ और मांगिये”| अरैयर् स्वामी जी बोले ” आप और कोई नहीं श्री राम जी है जो कभी दो शब्द नहीं बोलते , आप अपने बचन से इंकार नहीं कर सकते ! फिर भगवन जी ने स्वीकार किये और रामानुज स्वामी जी को जाने की अनुमति प्रदान की !

व्यास : दादी कितनी बड़ी चालाकी थी यह| यह अरैयर् स्वामीजी की बुद्धिमता थी की वह पेरुमल स्वामी जी को मना सके !

दादी : बोलो व्यास | उसी समय अरैयर् स्वामी जी ने रामानुज स्वामी जी का हाथ पकड़ा, और श्री रंगम जाने के लिए प्रस्थान किया | फिर , अरैयर् स्वामी जी ने वह महत्व पूर्ण सेवा की श्री रामानुज स्वामी जी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय में लेकर जिससे हमारा सम्प्रदाय ने और आगे बड़े और उसको उचाईयो तक पहुँचाया |

वेदवल्ली : दादी, अपने कहा सभी आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी कुछ न कुछ सिखाया ! अरैयर् स्वामी जी ने उनको क्या सिखाया ?

दादी :आलवन्दार स्वामी जी ने अपने सभी मुख्य शिष्यों को रामानुज स्वामी जी को अपने सम्प्रदाय के बारे में अलग अलग सीखने के लिए निर्देश दिए थे | अरैयर् स्वामी जी को आदेश था की वह सम्प्रदाय का मूल तत्व रामानुज स्वामी जी को बताये ! अब, रामानुज स्वामी जी ने बहुत सुन्दर कृत किये इससे पहले की वह अरैयर् स्वामी जी के पास जाते सीखने के लिए | उन्होंने ६ महीने आचार्य सेवा में कैंकर्य किये कुछ भी सीखने से पहले | यह एक बहुत महत्व पूर्ण पहलु है जो श्री रामानुज स्वामी जी, कुरतालवान स्वामी जी, मुदलियानदान स्वामी जी और बहुत आचार्य जी ने अपने जीवन में किये — अपने आचार्यो का कैंकर्य किये उनसे सीखने से पहले | यह उनकी भक्ति भाव दर्शाता है की वह किससे क्या सीख रहे है और किस उदेश्ये से सीख रहे है | रामानुज स्वामी जी प्रति दिन दूध गरम करते और अरैयर् स्वामी जी को हल्दी का लेप बनाकर देते जब भी आवश्यकता होती !

व्यास : दादी, दूसरे आचार्यो ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी: हाँ, में एक एक करके उस पर आ रही हूँ | तिरुमलै नम्बि, रामानुज के मामाजी लगते थे | वह थिरु वेंकट आद्री के पहले निवासी थे | वह प्रति दिन आकाश गंगा जाकर भगवान् जे के सनान के लिए जल लेकर कैंकर्यं करते थे | वह भगवान् जी की सेवा बहुत ध्यान और मन से करते थे | उनके आचार्य जी का आदेश था की वह रामानुज स्वामी जी को श्री रामायण का सार और उनके श्लोको का सुन्दर वर्णन सीखा सिखाये | श्री रामायाण बहुत प्रसिद्ध है हमारे समप्रदायम में शरणागति शास्त्र की तरह | इळयाळ्वार – यह नाम रामानुज स्वामीजी के मामाजी, पेरिय तिरुमलै नम्बि (श्रीशैलपूर्ण स्वामीजी) ने उनके नामकरण के दिन दिये थे । यही नहीं श्री तिरुमलै नम्बि स्वामी जी ही थे जिन्होंने गोविंदा स्वामी को वापिस श्री वैष्णव सम्प्रदाय में लाये थे जो रामानुज स्वामी जी की ममेरे भाई थे | उनका ज्ञान हमारे सम्प्रदाय के लिए और उनका अलवार स्वामी के पाशुराम के प्रति बहुत लगाव था |

पराशर : दादी, क्या आप हमें तिरुमाळै अण्डाण स्वामी जी के बारे में बता सकते हो ? उन्होंने रामानुज स्वामी जी किस तरह से मदद की ?

दादी : तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी को पूरी ज़िम्मेदारी दी गयी थी की वह रामानुज स्वामी जी को थिरु वाईमोली सिखाये | जब रामानुज स्वामी जी श्री रंगम पहुंचे, तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) जी ने ही उनका मार्ग दर्शन किया था की वह तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) से नम्मालवार (श्री शठकोप स्वामीजी) तिरुवाय्मोळि (सहस्रगीति) को सुने और उनका सार मूल तत्व समझे | यद्यपि, शुरुआत में दोनों में कुछ मतभेद थे क्योंकि यह किसी भी महान विद्वानों के बीच होता है, इसे सुलझाया गया और रामानुज ने अपने आचार्य तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) के आशीर्वाद के साथ अलवार के पाशुरम में छिपे जटिल अर्थों को सीखा | तिरुमालै आण्डान् (श्री मालाधर स्वामी) जी की उनके आचार्य आलवन्दर के लिए इतना सम्मान और भक्ति थी। वह कभी भी अपने आचार्य के मार्ग और शिक्षाओं से दूर नहीं चले और उन्हें रामानुज स्वामी जी को के सिखाया ताकि वह हमारे संप्रदायम के कैंकर्यं को आगे ले जा सकें।

वेदवल्ली : तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (श्री गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) और तिरुक्कचि नम्बि (श्री कान्चिपूर्ण स्वामीजी) जी ने रामानुज स्वामी जी को क्या सिखाया ?

दादी : में आपको अगली बार जब हम मिलेंगे तब बताउंगी | उनके बारे में बहुत सी रोचक कहानियां है |

व्यास , पराशर और वेदवल्ली (मिलकर ) : हमें अभी कहानी सुनाइए दादी माँ !

दादी : अभी बहुत देर हो गयी है | आज के लिए यह काफी है | अभी आप घर जाये और कल आप दुबारा वापिस आना और अपने दोस्त को अपने साथ लाना नहीं भूलना |

बच्चे अपने घर को जाते है और हमारे सम्प्रदाय के आचार्यो के बारे में सोचते है और बहुत उत्सुकता से इंतज़ार करते है की कब दूसरे दिन दादी उनको कहानी सुनाएगी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास)

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

व्यास और पराशर आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। अत्तुज़्हाय् अपने हाथ में एक पुरस्कार के साथ प्रवेश करती है।

दादी : प्रिय! यह तुमने क्या जीता है?

व्यास: दादी, अत्तुज़्हाय् ने हमारे स्कूल में आण्डाल के रूप में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में भाग लिया , तिरुप्पावै से कुछ पाशूरम (तमिल में भजन) गाए और पहला पुरस्कार जीता।

दादी :अत्तुज़्हाय् यह अद्भुत है! आज मैं आपको पेरिय नम्बि (श्री महापूर्ण स्वामीजी/ श्री परांकुशदास) के बारे में बताती हूं, उसके बाद में आपसे पाशूरम (तमिल में भजन) सुनुँगी|

व्यास, पराशर और अत्तुज़्हाय् ( एक साथ ) : और इळैयाज़्ह्वार् (श्री रामानुज) के बारे में भी दादी |

दादी : हां बिल्कुल। जैसा कि मैंने पिछली बार कहा था, पेरिय नम्बि, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के प्रमुख शिष्यों के में से एक थे । उनका जन्म श्रीरंगम में मार्गशीर्ष् मास, ज्येष्ठ नक्षत्र में हुआ था। आळवन्दार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के समय के बाद , सारे श्रीरंगम के श्रीवैष्णव पेरिय नम्बि से विनती करते है की वह श्री रामानुजाचार्य को श्रीरंगम मे लाये । अतः वह श्रीरंगम से अपने सपरिवार के साथ कांचीपुरम की ओर चले। इसी दौरान श्री रामानुजाचार्य भी श्रीरंगम की ओर निकल पडे।

पराशर : दादी, इळयाळ्वार (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) श्रीरंगम को क्यों गए जब की वह कांचीपुरम में यादव प्रकाश जी से सीख रहे थे।

दादी : बहुत अच्छा सवाल है! याद रखें, पिछली बार मैंने आपको बताया था कि आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) को इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) को मार्गदर्शन करने के लिए सौंपा था? जब इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) का उनके गुरु यादव प्रकाश जी के साथ मत भेद हो जाता है और परेशान हो जाते है, और उनके मन में बहुत शंका और प्रश्न घर कर जाते है जैसे मन में काले बदल छा गए हो, तब वह तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास समाधान ढूंढ़ने के लिए जाते हैं! और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) ने मार्गदर्शन के लिए किससे बात की?

अत्तुज़्हाय् : देवप् पेरुमाळ् (पेरुमल / भगवान /श्री रंगनाथ)!

दादी : अति उत्कृष्ट! यह भगवान/पेरुमल थे जो सदैव इळयाळ्वार स्वामीजी की बचाव करते थे और उनको पेरिय नम्बि जी के पास जाने को प्रकाशित करते थे, और कहते की आप पेरिय नम्बि से पञ्च संस्कार करवाइये और उनके शिष्य बन जाईये| तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) के मन में जो शंका होती है वह सब ऐसे दूर करते है जैसे सूर्य उदय होते ही अंधकार दूर हो जाता है| इस तरह से इळयाळ्वार स्वामीजी (श्री रामानुजाचार्य) कान्चि छोड़ के जाते हैं, फिर पेरिय नम्बि से कान्चि के रास्ते में मिलते है| आश्चर्य की बात यह थी की वे दोनो मदुरान्तगम् मे मिलते है और तभी पेरिय नम्बि श्री रामानुजाचार्य का पञ्च संस्कार करते हैं और कान्चिपुरम पहुँचकर श्री रामानुजाचार्य को सम्प्रदाय के अर्थ बतलाते है।

व्यास: अरे हाँ, हमें मालूम है की मदुरान्तगम् में भगवान श्री राम जी का मंदिर है| हम पिछली छुटियों में उस मंदिर में गए थे|लेकिन, वह कान्चि या श्री रंगम में क्यों नहीं गए इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) जी को समाश्रयनम् करने के लिए| उन्होंने मदुरान्तगम् में ही क्यों किया ?

दादी: पेरिय नम्बि एक महान आचार्य थे जिन्हें इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) के प्रति अत्यधिक लगाव और सम्मान था। वह जानते थे कि इस तरह के अच्छे कर्मों को कभी स्थगित नहीं किया जाना चाहिए और इळयाळ्वार (श्री रामानुजाचार्य) भी ऐसा महसूस कर रहे थे। बच्चों, इससे हम सीखते हैं कि हमारे सम्प्रदाय से संबंधित अच्छी चीजें या कैङ्कर्य में कभी देरी नहीं करनी चाहिए | जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा! पेरिय नम्बि हमारे सम्प्रदाय के सच्चे सिद्धांतों को जानते थे जो कभी भगवान के भक्त को अलग नहीं करते थे और सभी को प्यार और सम्मान के साथ समान रूप से व्यवहार करते थे । वह अपने शिष्य रामानुज से इतना प्यार करते थे कि उन्होंने हमारे सम्प्रदाय के भविष्य के आचार्य के लिए अपना जीवन त्याग दिया – रामानुजा!

व्यास : उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया! दादी, उन्होंने ऐसा क्यों किया ?

दादी : उस समय, वहां के शैव राजा ने रामानुजा को अपनी मांगों को स्वीकार करने के लिए अपनी अदालत में आने का आदेश दिया था। रामानुज स्वामीजी के बजाय, उनके महान शिष्य श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनके आचार्य के रूप में छिपे हुए, पेरिय नम्बि के साथ राजा के दरबार में गए, जो बहुत बूढ़े थे। पेरिय नम्बि भी अपनी बेटी अत्तुज़्हाय् के साथ राजा के दरबार में गए !

अत्तुज़्हाय् : यह मेरा नाम भी है!

दादी : हाँ यही है! जब राजा उन्हें अपनी मांगों को स्वीकार करने का आदेश देता है, तो श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और पेरिय नम्बि दोनों राजा की मांगों को नहीं मानते हैं। राजा बहुत क्रोधित हो गया और अपने सैनिकों को उनकी आंखें निकालने का आदेश दिया। वृद्धावस्था के कारण दर्द को सहन करने में असमर्थ, पेरिय नम्बि अपना जीवन छोड़ देते है और श्रीरंगम जाने के रास्ते में परमपद चले जाते है, अंत समय में पेरिय नम्बि स्वामीजी कुरेश स्वामीजी की गोद में अपना सिर रखते है और फिर परमपद को प्रस्थान करते है। इन महान आत्माओं ने बिना किसी चिंता के सब कुछ त्याग दिया, हमारे रामानुज स्वामीजी की रक्षा करने के लिए, जो एक मोती के हार में केंद्रीय मणि की तरह है। अगर हम हार में मोती तोड़ेंगे तो क्या होगा?

व्यास और पराशर (कोरस में एक साथ): हार भी टूट जाएगा|

दादी : बिल्कुल ठीक! इसी तरह, हालांकि रामानुज स्वामीजी मोती के हार में केंद्रीय मणि है , जिसे हमारे श्री रामानुजा सम्प्रदाय कहा जाता है, मोतियों के रूप में सभी आचार्यों ने हार को एक साथ रखा और देखा कि केंद्रीय मणि सुरक्षित रहे । तो हम सभी को अपने आचार्यों के प्रति हमेशा आभारी रहना चाहिए और हमेशा अपने जीवन से नम्र होना चाहिए।

पराशर : दादी, श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के साथ क्या हुआ?

दादी : श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्), उनकी आंखें चली गईं, फिर वह श्री रांगम लौट आये । वह रामानुज स्वामीजी के महानतम शिष्यों में से एक थे और अपने जीवन के सभी पहलुओं में रामानुज स्वामीजी के साथ थे। अगली बार जब हम मिलेंगे तो मैं आपको श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) और रामानुज स्वामीजी के बारे में और बताउंगी। अब, जल्दी करो और घर जाओ। आपके माता-पिता आपके लिए इंतज़ार कर रहे होंगे। और, अत्तुज़्हाय्, अगली बार मैं आप से तिरुप्पावै पासुरम सुनूंगी ।

बच्चे पेरिय नम्बि और श्री कूरेश (कूरत्ताज़्ह्वान्) के बारे में सोचते हुए घर वापस जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) और मणक्काल् नम्बि (श्री राममिश्र स्वामीजी)

व्यास और पराशर अपने मित्र अत्तुज़्हाय् के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी अपने हाथों में प्रसाद के साथ उनका स्वागत करती हैं।

दादी : आपका स्वागत है अत्तुज़्हाय् ! यहां अपने हाथ और पैर धोएं और इस प्रसाद को लें। आज उत्राडम् (उत्तराषाढा), आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र हैं।

पराशर : दादी, पिछली बार आपने कहा था कि आप हमें यमुनैत्तुऱैवर् (आळवन्दा / र्श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में बताएंगी, याद है?

दादी : हाँ! मुझे याद है और मुझे खुशी है कि आप को भी याद हैं और आप हमारे महान आचार्य के बारे में जानना चाहते हैं। आज उनका तिरुनक्षत्र है। इन महान आचार्य की महिमा के बारे में बात करने के लिए यह सही समय है।

व्यास : दादी, लेकिन क्या आपने यह नहीं कहा कि यह आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) का तिरुनक्षत्र था?

दादी : हाँ। यमुनैत्तुऱैवर् स्वामीजी का अवतार स्थल काट्टु मन्नार् कोयिल् है, बाद में इन्हे (यमुनैत्तुऱैवर्) आळवन्दार् के नाम से जाना जाने लगा।यमुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य) का जन्म नाथमुनि के पुत्र ईश्वरमुनी के यहाँ हुआ। [दक्षिणात्य आषाढ़ माह के उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में काट्टुमन्नार् कोविल, वीर नरायणपुराम , वर्तमान मन्नारगुडी गांव में हुआ। ]

श्री आळवन्दार ने अपना विद्याध्यन, अपनी प्रारंभिक शिक्षा महाभष्य भट्टर् से प्राप्त किया। आळवन्दार् के रूप में उनकी प्रशंसा कैसे हुई, इस बारे में एक बहुत ही रोचक कहानी है। उन दिनों पंडितों को मुख्य पंडित को कर चुकाना पडता था। उस समय काल में राजदरबार के विद्वान पंडित, राज पुरोहित आक्कियाज़्ह्वान् थे, आक्कियाज़्ह्वान् अपने प्रतिनिधियों को पंडितों के पास भेज कर उनसे कर वसुल करने को केहते थे। इसे सुनकर महाभाष्य भट्टर् चिन्तित हो जाते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् केहते हैं के वो इसक ख्याल रखेंगे। यामुनाचार्यजी एक श्लोक भेजते हैं, जिसमे वह स्पष्ट रूप से कहते है, वह उन सब कवियों का जो अपना स्वप्रचार के लिये अन्य विद्वानों पर अत्याचार करते है, उनका नाश करेंगे। यह देखकर आक्कियाज़्ह्वान् को गुस्सा आता है और अपने सैनिकों को यमुनैत्तुऱैवर् को राजा के अदालत में लाने के लिए भेजता है। यमुनैत्तुऱैवर् उन्हें बताते हैं कि वह केवल तभी आएगें जब उसे उचित सम्मान की पेशकश की जाएगी। तो, राजा उनके लिये एक दोला भेजते हैं और यमुनैत्तुऱैवर् अदालत आते हैं। वाद शुरू होने वाला है, रानी राजा को बताती है कि उन्हे यकीन है कि यमुनैत्तुऱैवर् जीतेगा और यदि वह हारेंगे तो वोह राजा का सेवक बन जाएंगी। और राजा को भरोसा था कि आक्कियाज़्ह्वान् जीतेंगे और वो कहते हैं कि अगर यमुनैतुऱैर्वर् जीतते हैं, तो राजा उन्हे आधा राज्य दे देंगे। अंत में, महान बहादुरी और ज्ञान के साथ, यमुनैत्तुऱैवर् ने आक्कियाज़्ह्वान् के खिलाफ वाद जीता। आक्कियाज़्ह्वान् इतने प्रभावित हो जाते हैं कि वो भी यमुनैत्तुऱैवर् का शिष्य बन जाते हैं। रानी ने उन्हें “आळवन्दार्” नाम दिया – वह जो उनकी रक्षा करने आये थे – अगर वह जीतते नही तो, रानी एक नौकर बन जाती और इसलिए रानी भी उनकी शिष्य बन जाती हैं। राजा द्वारा वादा किए गए अनुसार उन्हें (आळवन्दार्) को आधा राज्य भी मिलता है।

व्यास : दादी, यदि यामुनाचार्यजी को आधा राज्य मिला, तो उन्होने तो राज्य पर शासन किया होगा । वोह हमारे संप्रदायम में कैसे पहुंचे?

अत्तुज़्हाय् : उन्हें मणक्काल् नम्बि द्वारा हमारे संप्रदायम में लाया गया था जो उय्यक्कोण्डार् के शिष्य थे। उय्यक्कोण्डार् (श्री पुण्डरिकाक्ष स्वामीजी) के निर्देशों के मुताबिक, मणक्काल् नम्बी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) को संप्रदायम लाने के लिए पहल की।

दादी : यह बिल्कुल सही और अद्भुत अत्तुज़्हाय् है! आप इसके बारे में कैसे जानते हो?

अत्तुज़्हाय् : मेरी मां भी मुझे हमारे आचार्य और पेरुमल के बारे में कहानियां बताती है|

दादी : आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) महान आचार्य थे जिन्होंने इळयाळ्वार (रामानुज स्वामीजी) को देवप् पेरुमल के आशीर्वाद के साथ संप्रदायम में लाया।

पराशर : लेकिन दादी, देवप् पेरुमल जी ने आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की मदद कैसे की?

दादी : यह कान्चिपुरम् में हुआ, कि आळवन्दार् ने इळैयाज़्ह्वार् को वरदराज पेरुमाळ् कोयिल में देखा जो अभी रामानुज बने नही थे। इळैयाज़्ह्वार् अपने गुरु यादव प्रकस से सीख रहे थे। आळवन्दार् संप्रदायम के अगले नेता इळैयाज़्ह्वार् को बनाने के लिए देवप् पेरुमल् से प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार यह देवप् पेरुमल् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् को पोषित किया और उठाया, एक मां की तरह उपने बच्चे के साथ कैसे किया जाये और यह महान आळवन्दार् थे जिन्होने इळैयाज़्ह्वार् पर अपने आशीर्वाद बरसाया जो बाद में संप्रदायम के लिए महान महान कैङ्कर्य करने के लिए आगे बढ़े। आळवन्दार् भी आवश्यकतानुसार इळैयाज़्ह्वार् का मार्गदर्शने करने के लिए तिरुक्कच्चि नम्बि को सौंपा। तिरुक्कच्चि नम्बि याद है ना आपको?

व्यास : हाँ दादी, यह वह है जो तिरुवालवट्ट (पंखा) कैङ्कर्य द्Eवप् पेरूमल को करते थे और द्Eवप् पेरूमल और तायार् के साथ भी बात करते थे । यह कितना अच्छा होगा अगर हम तिरुक्कच्चि नम्बि की तरह पेरुमल से भी बात कर सकें? तो क्या यामुनाचार्यजी और इळैयाज़्ह्वार् मिले? क्या आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) ने इळैयाज़्ह्वार् को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया?

दादी : दुर्भाग्यवश नहीं! इससे पहले इळैयाज़्ह्वार् श्री रंगम जाकर आळवन्दार् स्वामी जी से मिलते, उससे पहले आळवन्दार् स्वामी जी को परम पदम् प्राप्त हो गया । अगली बार, बच्चों जब मैं आपसे मिलूंगी, मैं आपको श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) के बारे में बताऊंगी, आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के कई शिष्यों में एक शिष्य श्री महा पूर्ण (पेरिय नम्बि) जो इळैयाज़्ह्वार् जी के आचार्य बन गए और लम्बे समय तक उनका मार्ग दर्शन किया । आळवन्दार् स्वामीजी के बहुत शिष्य थे और उन सब ने मिलकर काम किया इळैयाज़्ह्वार् जी को सम्प्रदाय में ला सके । पेरिय नम्बि (श्री महा पूर्ण) के अलावा,पेरिय तिरुमलैनम्बि (श्रीशैल पूर्ण स्वामीजी), तिरुकोष्टियूर् नम्बि (गोष्ठिपूर्ण स्वामीजी), तिरुमालै आण्डान् (मालाधार स्वामीजी), और मारानेरीनम्बि, तिरुकच्चिनम्बि (कांचीपूर्ण स्वामीजी) , तिरुवरंग पेरुमाळ् अरयर्, (मणक्काल नम्बि के शिष्य और आळवन्दार् के पुत्र) और कई अन्य आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के शिष्यगण थे।

व्यास , पराशर और अत्तुज़्हाय् : दादी यह बहुत दिलचस्प था |अगली बार, कृपया हमें पेरिया नम्बि (महापूर्ण स्वामीजी) और इळैयाज़्ह्वार् (रामानुज स्वामीजी) को के बारे में बताएं।

दादी : मुझे यह बताने में बहुत खुशी होगी लेकिन अब बहुत अंधेरा हो रहा है। बच्चों, अपने घर जाओ |

बच्चे आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) के बारे में सोचकर अपने घरों को खुशी से निकलते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

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<< नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

 

पराशर और व्यास अपने मित्र वेदवल्लि के साथ आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं। आण्डाल दादी उन्हें अपने हाथों से प्रसाद के साथ स्वागत करती है।

आण्डाल दादी : यहां इस प्रसाद को लें और मुझे बताएं कि आपकी नयी मित्र कौन है।

व्यास : दादी, यह वेदवल्लि है जो छुट्टियों के लिए कान्चीपुरम् से आयी है | हम उसे हमारे साथ लाए ताकि यह आचार्यों की महिमाओं पर आपकी कहानियों को सुन सके।

पराशर : दादी आज हम किसी त्यौहार का जश्न मना रहे हैं?

आण्डाल दादी : आज आचार्य उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का तिरुनक्ष्त्र है जिन्हे पुण्डरिकाक्षर् और पद्माक्षर स्वामी भी कहा जाता है।

व्यास: दादी, क्या आप हमें इन आचार्य के बारे में बता सकती हैं?

uyyakkondar

आण्डाल दादी: उय्यक्कोण्डार् स्वामीजी का जन्म चैत्र मास कृतिका नक्षत्र को तिरुवेळ्ळऱै (श्वेत गिरि) में हुआ था। इनके माता पिता द्वारा इनका नामकरण तिरुवेळ्ळऱै एम्पेरुमान् के नाम पर ही किया गया। नाथमुनि स्वामीजी के शिष्यों में , कुरुगै कावलप्पन् के साथ साथ इन्हें भी प्रमुख माना जाता है। नाथमुनि जी को नम्माळ्ळवार के अनुग्रह से अष्टांग योग का दिव्य ज्ञान मिला था।

पराशर: दादी, यह योग क्या है?

आण्डाल दादी: यह योग का एक प्रकार है जिसके माध्यम से किसी भी शारीरिक गतिविधियों के बारे में सोचे बिना भगवान का अविराम अनुभव कर सकता हैं। जब नाथमुनि उय्यक्कोण्डार् से अष्टांग योग सीखने में उनकी रूचि के बारे में पूछते हैं तब वे उन्हें जवाब देते हैं की “पिणम् किडक्क मणम् पुणरलामो ” माने जहाँ संसारी अज्ञान के कारण भौतिक जगत् में दुखि हैं वहाँ वे कैसे आनंद से भगवद् गुणानुभव कर सकते हैं।

पराशर: दादी, क्या वह केहते हैं कि किसीके मरने पर कोई आनंद नहीं ले सकता है? कौन मर गया है?

आण्डाल दादी: शानदार पराशर! उन्होंने कहा कि जब इस दुनिया में इतने सारे लोग पीड़ित हैं, तो वह व्यक्तिगत रूप से भगवान का आनंद लेने के बारे में कैसे सोच सकते हैं। यह सुनकर, नाथमुनी बेहद प्रसन्न थे और उय्यक्कोण्डार् की महानता की सराहना की। उन्होंने उय्यक्कोण्डार् और कुरुगै कावलप्पन् दोनों को इश्वर मुनी के बेटे (नाथमुनी के अपने पोते, जो इस् संसार में आने वाले थे) को अर्थ के साथ अष्टांग योग और दिव्य प्रबन्धम को सिखाने के निर्देश दिए।

व्यास: दादी, क्या उय्यक्कोण्डार् का कोई शिष्य था?

दादी : मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) उनका मुख्य शिष्य थे। परमापद जाने के समय, मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) ने उत्तराधिकारी के बारे में उनसे (उय्यक्कोण्डार्) पूछा और उय्यक्कोण्डार् ने संप्रदाय की देखभाल करने के लिए स्वयं मणक्काल् नम्बि को निर्देश दिया। उन्होंने यामुनैत्तुऱैवर् (यामुनाचार्य स्वामीजी / ईश्वर मुनी के बेटे) को अगला आचार्य बनाने के लिए तैयार करने के लिए मणक्कऽल् नम्बि को भी निर्देश दिया।

पराशर: दादी, क्या आप हमें मणक्काल् नम्बि (राममिश्र स्वामीजी ) के बारे में बता सकती हैं?

दादी : उनका मूल नाम राम मिश्र था। उनका जन्म माघ मास , माघ नक्षत्र के महीने में श्रीरंगम के पास कावेरी नदी के तट पर स्थित एक छोटा सा गाँव मणक्कल् में हुआ था। माधुरकवी आळ्ळवार की तरह जो नम्माळ्ळवार् के लिए बहुत समर्पित थे, मणक्कल् नम्बि उय्यक्कोण्डार् के लिए बहुत समर्पित थीं। उय्यक्कोण्डार् की पत्नी के निधन के बाद, उन्होंने खाना पकाने के कैङ्कर्य को ग्रहण किया और अपने आचार्य की हर व्यक्तिगत आवश्यकता में भाग लिया। एक बार उय्यक्कोण्डार् की बेटियां नदी में स्नान करने के बाद वापस लौट रही थीं, तब रास्ते में कीचड़ के कारण वह आगे नहीं बढ़पाती। यह देख मणक्कल् नम्बि छाती के बल कीचड़ पर लेट जाते है और अपने आचार्य की पुत्रियों को अपनी पीठ पर चलते हुए कीचड़ पार करने को कहते है। उनके आचार्य उय्यक्कोण्डार् को जब इस घटना का वृतांत मिला , तब वह मणक्कल् नम्बि की आचार्य चरणों में भक्ति और जिम्मेदारी वहन करने की क्षमता को देख अत्यंत ही प्रसन्न हुए ।

समूह में बच्चे: दादी, अगली बार जब हम मिलेंगे तो क्या आप हमें आळवन्दार् (श्री यामुनाचार्य स्वामीजी) की कहानी बता सकती हैं?

दादी खुशी से कहती हैं, “में बहुत खुश हूँगी आपको यामुनाचार्य स्वामीजी की कथा सुनाने में जब हम अगली बार मिलेंगे ” और बच्चे अपने घरों को जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आचार्यों का परिचय

 

nathamunigal

व्यास और पराशर स्कूल के बाद घर आते हैं। वे अपने दोस्त अत्तुज़्हाइ को उनके साथ ले आए।

आण्डाळ दादी: आप किसके साथ आए हैं?

व्यासः दादी, यह हमारी दोस्त अत्तुज़्हाइ है। हमने इसे कुछ वैभवों के बारे में बताया जो आपने हमें बताया था, और इसको उन वैभवों को आपसे सुनने में दिलचस्पी (रुचि) थी, तो हम इसे साथ में ले आये।

आण्डाळ दादी: अभिवादन अत्तुज़्हाइ (आपका स्वागत है)| यह सुनकर खुशी है कि आप दोनों केवल सुन ही  नहीं रहे हैं, बल्कि अपने दोस्तों के साथ साझा भी कर रहे हैं।

पराशर : दादी, हम हमारे आचार्य के बारे में सुनने आए हैं।

आण्डाळ दादीः अच्छा। आज मैं आपको हमारे आचार्य के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने हमारे संप्रदाय के गौरव को वापस लाया श्री शठकोप स्वामीजी (नम्माळ्ळवार) के दैवीय हस्तक्षेप के माध्यम से।

अत्तुज़्हाइ: दादी वह कौन थे ?

आण्डाळ दादी: अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर के लिए कुछ खानेवाले फल लाती हैं।

आण्डाळ दादी : वह हमारे अपने श्री नाथमुनि स्वामीजी (नाथमुनिगळ्) हैं| श्रीमन नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) का जन्म काट्टु मन्नार् कोयिल् (वीरनारायणपुरम) मे ईश्वरभट्टाळ्वार् के घर में हुआ। श्रीमन् नाथमुनि को श्रीरन्गनाथमुनि और नाथब्रह्म के नामों से भी जाना जाता है| श्रीमन् नाथमुनि अष्टांग योग और संगीत के विद्वान थे। यहि है जिन्होंने अरयर सेवा स्तम्भित किया, जिसे आज भी श्रीरंगम्, आळ्ळवार तिरुनगरि, श्रीविल्लिपुत्तूर् में अभी भी मनाया जाता है। [श्रीरंगम में भगवान अरंगनाथार (श्री रंगनाथजी) की अरयर सेवा ( अरयर सेवा याने , दिव्य प्रबंधों को संगीतमय ताल में नृत्य के साथ प्रस्तुत करना) की शुरुआत की थी, जो आज भी तिरुवरन्गम, आल्वार् तिरुनगरि , और श्री विल्लिपुत्तूर् मे उत्सव और अन्य दिनों में आज भी आयोजित होती है।]

पराशर: दादी हमने हमारे पेरुमल (श्री रंगनाथजी) के सामने अरयर सेवा को कई बार देखा है| यह बहुत खूबसूरत है जिस तरह से अरयर स्वामी अपने हाथों में थलम के साथ पाशुरों को गाते हैं।

आण्डाळ दादीः हाँ। एक दिन श्रीवैष्णवों का समूह मेल्नाडु (तिरुनारायणपुरम् क्षेत्र) से काट्टु मन्नार् कोयिल् दर्शन के लिये पहुचते हैं और “आरावमुदे…” ( तिरुवाइमोज़्हि से दशक) मन्ननार् ( काट्टु मन्नार् कोइल् मे एम्पेरुमान्) के सामने गाते हैं [यह एक द्रविड़ शब्द है, जिसका अर्थ है “रूचि के साथ” / “तन्मयता के साथ” भगवान को गाकर सुनाते हैं ]। नाथमुनि, उन पाशुरों के अर्थ से उत्साहित, उनके बारे में श्रीवैश्णवों से पूछते हैं, लेकिन वो श्रीवैश्णव उन ११ पाशुरों से परे कुछ भी नहीं जानते हैं। वे कहते हैं कि अगर नाथमुनि तिरुक्कुरुगूर् जाते हैं, तो इन्हें शेष पाशुरो की जानकारी प्राप्त हो सकती हैं। नाथमुनि मन्ननार् से अवकाश लेते हैं और आळ्ळवार तिरुनगरि पहुँचते हैं।

अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर जल्द ही अपने भोजन को खत्म करते हैं और नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) के बारे में बेसब्री से सुनना जारी रखते हैं।

आण्डाळ दादी: उनकी मुलाकात मधुरकवि आळ्ळवार के शिष्य परांकुश दास से होती है। परांकुश दास उन्हें कण्णिनुण् चिरुत्ताम्बु सिखाते हैं और इसे १२००० बार तिरुप्पुज़्हियाळ्ळवार (इमली का वह पेड़ जिसमें नम्माळ्वार रेहते थे) के सामने बिना किसी अवरोध के जप करने को केहते हैं। परांकुश दास के बताये हुए क्रम के अनुसार नाथमुनि स्वामीजी (जो अष्टांग योग के अधिकारी हैं) जप आरम्भ करते हैं। नाथमुनि के इस जप से प्रसन्न होकर नम्माळ्वार उनके सामने प्रकट होते हैं । उन्हे अष्टांग योग का परिपूर्ण ज्ञान और आळ्वार संतो द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबंध पाशुर (अरूलिचेयल्) अर्थ सहित प्रदान करते हैं ।

व्यास: अतः, ‘आरावमुदे’ गान, ४००० दिव्य प्रबंध (दिव्य साहित्य) का एक हिस्सा है?

आण्डाळ दादी : हाँ। ‘आरावमुदे’ गान तिरुक्कुडन्तै आरावमुतन् एम्पेरुमान् (भगवान) के बारे में है।. नाथमुनि काट्टु मन्नार् कोयिल् पहुँच , मन्ननार् को ४००० पाशुर सुनाते हैं | प्रसन्न होकर मन्ननार् ४००० पाशुरों को विभजित करके प्रचार – प्रसार करने का आदेश देते हैं | वह आरुळिच्चेयल् में संगीत जोड़ते हैं और उसे अपने भतीजे किज़्ज़्ह् अगत्ताज़्ह्वान् और मेलै अगत्ताज़्ह्वान् के लिए सिखाते हैं और उनके माध्यम से प्रचार करते हैं। [मन्ननार् के आदेश अनुसार ४००० पाशुरो को नाथमुनि स्वामीजी, लय, सुर और ताल के सम्मिश्रण कर ४ भाग कर, अपने दोनों भांजे कीळैयगताळ्वान् और मेलैयागताळ्वान् पर अनुग्रह कर दिव्यप्रबन्ध का ज्ञान देकर इनके द्वारा इन दिव्य प्रबंधों का प्रचार – प्रसार करते हैं|] [अपने दिव्य ज्ञान , अपने अष्टांगयोग की साधना से भविष्य को देखते हुये, अपने पौत्र का आगमन देखते है ।]इतना ही नहीं, अपने अष्टांग योग सिद्द् के माध्यम से, उन्होंने हमारे संप्रदाय के एक और महान आचार्य की उपस्थिति को पूर्ववत किया। अगली बार, मैं आपको उनके बारे में और बताउंगी।

समूह में बच्चे: ज़रूर दादी | हम इसके बारे में सुनने के लिए उत्सुक हैं अत्तुज़्हाइ आण्डाळ दादी से आशीर्वाद लेती हैं और अपने घर जाती हैं, जबकि व्यास और पराशर अपने स्कूल के पाठों का अध्ययन करने जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – आचार्यों का परिचय

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< दिव्य प्रबन्ध – आऴ्वारों का सबसे मूल्यवान उपहार

Acharyasआचार्य रत्न हार

पराशर और व्यास आते हैं और थोड़ी देर बाद आण्डाल दादी को देखते हैं। वे छुट्टी के दौरान अपने भव्य माता-पिता के साथ रहने के लिए तिरुवल्लिककेनी गए थे।

आण्डाल दादी: पराशर! व्यास! वापसी पर स्वागत है। मुझे उम्मीद है कि आपने तिरुवल्लिक्केनी में बहुत अच्छा समय बिताया है।

पराशर: हाँ पट्टी! वहां बहुत अच्छा था |हम हर रोज  पार्थसारथी पेरुमाल मंदिर में जाते थे। इतना ही नहीं, हमने बहुत दिव्य  देश के दर्शन किये जैसे कांचीपुरम आदि का दौरा किया था। हम श्रीभूतपुरी भी गए और वहां एम्पेरुमानार(भगवान) की पूजा किया था।

आण्डाल दादी: सुनकर बहुत अच्छा है | श्री पेरुम्बुदुर ( श्री भूतपुरी) श्री रामानुजाचार्य (एम्पेरुमानार) का जन्म स्थान है। वह सबसे महत्वपूर्ण आचार्यों में से एक है। मैं जल्द ही इसके बारे में और बताउंगी। मैंने आपको पिछली बार बताया था कि मै  आचार्यो के बारे में बताउंगी। मैं अब एक संक्षिप्त परिचय दूंगी। क्या आप शब्द “आचार्य” का अर्थ जानते हैं?

व्यास: दादी! क्या आचार्य, गुरु के समान है?

आण्डाल दादी: Yes. आचार्य और गुरु समान शब्द हैं |आचार्य का अर्थ है जो सच्चे ज्ञान सीखे है, वह खुद अनुसरण करते है और दूसरों को भी उसी के पालन के लिए प्रेरित करते है। गुरु का मतलब है जो हमारी अज्ञानता को मिटते है।

पराशर: दादी “सच्चा ज्ञान” क्या है?

आण्डाल दादी: बहुत बुद्धिमान प्रश्न किया पराशर | सच्चा ज्ञान यह जानना है कि हम कौन हैं और हमारी जिम्मेदारियां क्या हैं। उदाहरण के लिए, मैं आपकी दादी हूं और मेरी जिम्मेदारी आपको अच्छे मूल्यों आदि के साथ शिक्षित करना है। अगर मुझे इस बारे में अच्छी समझ है – यह सही ज्ञान है। इसी प्रकार, हम सभी भगवान के आधीन है और वे हमारे मालिक है। मालिक होने के कारण सेवा के योग्य है, उन्हें सेवा करने का हमारा कर्तव्य है |यह समझना हर एक के लिए  “सच्चा ज्ञान” है |जो लोग इसे जानते हैं और व्यावहारिक तरीके से दूसरों को सिखाते हैं उन्हें आचार्य कहा जाता है। यह “सच्चा ज्ञान” वेद, वेदांतम, दिव्य प्रबन्धम आदि में उपलब्ध है।

व्यास: ओह! तो, पहला आचार्य कौन है? कुछ लोगों को इस “सच्चे ज्ञान” के बारे में पहले पता होना चाहिए कि वह दूसरों को सिखाया है।

आण्डाल दादी: शानदार प्रश्न व्यास |हमारी पेरिया पेरुमाल पहला आचार्य है। हमने पहले ही आऴ्वारों के बारे में देखा है |पेरुमल ने उन्हें सच्चा ज्ञान दिया | आऴ्वारों ने पेरुमल के प्रति महान लगाव दिखाया, जैसा कि हमने देखा उन्के जीवनी में और अपने दिव्व्य प्रबन्धम के माध्यम से भी सच्चा ज्ञान प्रकट किया है।

पराशर : दादी! आऴ्वारों के बाद, क्या हुआ?

आण्डाल दादी: आऴ्वार कुछ समय के लिए इस दुनिया में रहे और वे परमपदम चले गए, वहाँ हमेशा के लिए पेरुमाल के साथ रहे। एक अंधेरे अवधि थी जब ज्ञान धीरे-धीरे क्षीन हो गया था और यहां तक कि दिव्व्य प्रबन्धम लगभग खो गए थे। परन्तु यह नम्मालवार की दिव्य अनुग्रह से पुनः दिव्व्य प्रबन्धम प्राप्त हुए, और बाद में कई आचार्यों द्वारा प्रचारित किया गया थे। हम उन आचार्यों के बारे में बाद में देखेंगे |

पराशर और व्यास: दादी हम इसे आगे देख रहे हैं।

आण्डाल दादी: ठीक है, आपके माता-पिता आपको अब बुला रहे हैं जब हम अगली बार मिलेंगे तो मैं एक और आचार्य के बारे में बताउंगी।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – दिव्य प्रबन्ध – आऴ्वारों का सबसे मूल्यवान उपहार

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< तिरुमङ्गै आऴ्वार (श्री परकाल स्वामीजी)

dhivyaprabandham-smallआण्डाल दादी कण्णिनुन् शिरुत्तांबु दिव्यप्रबंध को पढ़ रही हैं। पराशर और व्यास वहां पहुंचते हैं।

व्यास: दादी ! अब आप क्या पढ़ रहे हैं?

आण्डाल दादी: व्यास! मैं कण्णिनुन् शिरुत्तांबु का पाठ कर रही हूं। जो कि दिव्यप्रबंध का हिस्सा है।

पराशर: दादी ! क्या यह वही प्रबंध नहीं है, जो कि मधुरकवि आऴ्वार द्वारा रचित था?

आण्डाल दादी: हाँ। बहुत अच्छी स्मरण शक्ति है आपकी |

व्यास: दादी ! आऴ्वार स्वामीजी के इतिहास को समझाते हुए आपने कहा था कि प्रत्येक आऴ्वार स्वामीजी ने कुछ दिव्यप्रबंध का निर्माण किया है।

दादी माँ, कृपया दिव्यप्रबंध विवरण के बारे में विस्तार से बताएं।

आण्डाल दादी: ज़रूर व्यास | विस्तार से चीजें सीखने में रुचि रखने के लिए आप बहुत अच्छे हो | हमारे श्री रंगनाथन और श्री रंगानाचियार को दैव दम्पति (दैवीय दंपति) कहा जाता है। आऴ्वार स्वामीजी को नित्यसूरि/दिव्य सूरी (दिव्य और शुभ व्यक्तित्व) कहा जाता है, क्योंकि उन्हें भगवान ने आशीर्वाद दिया है। पाशूरम (तमिल में भजन) जो आऴ्वार स्वामीजी द्वारा रचित थे, उन्हें दिव्य प्रबन्धम (दिव्य साहित्य) कहा जाता है। वह जगहें जहां दिव्य प्रबन्धम में आऴ्वार स्वामीजी द्वारा महिमा होती है, उन्हें दिव्य देशम (दिव्य नगर) कहा जाता है।

पराशर: ओह! दादी, वह बहुत ही दिलचस्प है | ये कौन से दिव्यप्रबंध के बारे में बात कर रहे हैं?

आण्डाल दादी: दिव्य प्रबन्धम का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह से भगवान के शुभ गुणों पर चर्चा करना है। यह भी, विशेष रूप से, अर्चाविग्रह एम्पेरुमानार/भगवान हमारे पेरिया पेरुमल, थिरूवेनकट्टा मुदईयन इत्यादि की तरह |

व्यास: लेकिन दादी, हमने सुना है कि वेद हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है | वेद दिव्या प्रबन्धम से कैसे जुड़े हुए हैं?

आण्डाल दादी: यह एक अच्छा सवाल है | वेद पेरूमल के बारे में जानने का मुख्य स्रोत है | वेदांतम, जो कि वेद का सबसे ऊपरी भाग है, पेरूमल, उनके दिव्य गुणों, दर्शन, आदि के बारे में विस्तार से चर्चा करता है। लेकिन ये सब संस्कृत में हैं। आऴ्वार स्वामीजी ने सुंदर तमिल भाषा में अपने दिव्य प्रबन्दम में वेद और वेदांत का सार प्रस्तुत किया।

पराशर: ओह! दादी, लेकिन वेद और दिव्व्य प्रबन्धन के बीच क्या फर्क है?

आण्डाल दादी: यह समझाया गया है, कि जब भगवान श्रीमान वैकुंठम से अयोध्या में श्री राम के रूप में अवतरण लेते हैं, तो वेद भी श्रीरामायणम के रूप में प्रकट हुए। इसी प्रकार, जब वही पेरुमल को अर्चाविग्रह एम्पेरुमानार/भगवान के रूप में उतरे, वेद आऴ्वार स्वामीजी के शब्दों के माध्यम से दिव्य प्रबंदन के रूप में प्रकट हुए। समझने के लिए परम पदनाथान हमारे लिए यह समझना बहुत मुश्किल है कि हम कहां से हैं।. इसलिए, हम अपने स्थान पर आसानी से अर्चाविग्रह पेरुमल के पास आ रहे हैं। इसी तरह, वेद और वेदांत को समझना मुश्किल है। लेकिन दिव्य प्रबन्धम में आऴ्वार स्वामीजी द्वारा समान सिद्धांतों को समझाया गया है |

व्यास: दादी ! क्या इसका मतलब वेद हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं है?

आण्डाल दादी: नहीं नहीं! दोनों वेद और दिव्य प्रबंधम हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। वेद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पेरुमल के बारे में समझने के लिए सभी स्रोतों की जड़ है। लेकिन पेरूमल के शुभ गुणों को सीखने और आनंद लेने के लिए, दिव्य प्रबन्ध सबसे उपयुक्त है। साथ ही, वेद में समझाए जाने वाले सबसे जटिल सिद्धांत, हमारे पूर्व आचार्यों द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण की सहायता से दिव्य प्रबन्ध के अर्थ का अध्ययन करके आसानी से समझा जा सकता है | इसलिए, अपने स्वयं के हालात के अनुसार, वेद और वेदांत और दिव्य प्रबंधम का अध्ययन करना चाहिए।

पराशर: दादी, दिव्या प्रबन्दम का मुख्य ध्यान क्या है?

आण्डाल दादी: दिव्य प्रबंधम का मुख्य उद्देश्य है,इस भौतिक दुनिया में अस्थाई सुख / दर्द से हमारी सगाई को खत्म करने के लिए, और हमें श्रीमहालक्ष्मी और श्रीमन्नारायण की हमेशा के लिए सेवा प्रदान करके परमपदम में स्थायी और प्राकृतिक आनंद को ऊपर उठाने के लिए। हमारा स्वभाव है कि श्रीमन्नारायण को सनातन सेवा प्रदान करना है, परन्तु हमारे द्वारा इस संसार की गतिविधियों में लगे दुनिया में होने के कारण, हम उस मूल्यवान आनंद से गुम हो रहे हैं। दिव्य प्रबन्धम परमपदम में पेरुमल को सदा-सेवन करने के महत्व को प्रकाशित करता है।

व्यास: हाँ दादी ! हम समझते हैं कि थोड़ा पहले जैसा आपने पहले इस सिद्धांत को समझाया है।

पराशर: हमारे पुरवाचार्य दादी कौन हैं?

आण्डाल दादी: पराशर, बहुत अच्छा सवाल ! मैं अब हमारे संप्रदाय के कई आचार्यों के बारे में आपको बताएंगे।। हमारे आचार्य के बारे में विस्तार से जानने के लिए हमारे लिए यह बहुत महत्व है ताकि हम पूरी तरह से महसूस कर सकें कि कैसे वे आऴ्वार स्वामीजी के शब्दों और और
उनके महत्व हमारे लिए उनके पैर के चरणों में अनुसरण करने के लिए कैसे जीते हैं।

पराशर और व्यास: धन्यवाद दादी ! हम हमारे आचार्य के बारे में सुनने के लिए उत्सुक हैं |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – तिरुमङ्गै आऴ्वार (श्री परकाल स्वामीजी)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< तिरुप्पाणाऴ्वार (श्री योगिवाहन स्वामीजी)

thirumangai-adalma

 

आण्डाल दादी, पराशर और व्यास उरैयूर से घर वापस आ रहें हैं।

आण्डाल दादी: पराशर और व्यास, ऐसा लगता है कि आप दोनों ने उरैयूर में एक अद्भुत समय बिताया|

पराशर और व्यास: हां, दादी माँ वहां तिरुप्पाणाळ्वार (श्री योगिवाहन स्वामीजी) को देख कर इतना अच्छा लगा। हमें दिव्य देशम जाना बहुत् अच्छा लगता है और जाकर अर्चाविग्रह भगवान की पूजा करना भी।

आण्डाल दादी: अब मैं आपको तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) के बारे में बताऊंगा जो इतने सारे दिव्य देशम की महिमा का खुलासा करने में सहायक है। उनका जन्म कार्तिक मास पर कार्तिक नक्षत्र में तिरुक्कुरैयलूर् में तिरुन्नागुर के पास हुआ था। उन्होंने 6 दिव्य प्रबन्धमों का निर्माण किया था, जो हैं पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकूत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम। उनका मूल नाम नीलन था (क्योंकि वोह नीच रंग के थे)।

पराशर: वोह उन दिनो में दिव्य देशे कि यात्रा कैसे करते थे??

आण्डाल दादी: उनके पास अदलमा नाम का घोड़ा था जो बहुत शक्तिशाली था और वह उस घोड़े में हर जगह यात्रा करते थे।

व्यास: उनकी विशेषता क्या हैं दादी?

आण्डाल दादी: तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) के कई अनूठे पेहलुएं हैं | शुरू में, वोह एक महान योद्धा थे और एक छोटे से राज्य पर राज्य करते थे। उस समय वोह कुमुद्धवल्ली नचियार से मिलते हैं और वह उससे शादी करना चाहता हैं । कुमुदवल्ली नचियार उन्हे केहती हैं कि वोह केवल पेरुमल के एक भक्त से शादी करेंगी जो भागवतो की सेवा के साथ भागवतो का काफि देखभाल भी करता हो। तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) सहमत हुए और पेरूमल के भक्त बन जाते हैं और इस तरह वे एक दूसरे से शादी करते हैं। आलवार ने कई श्री वैष्णवों को भोजन का प्रसाद प्रदान किया। लेकिन अंततः, उनका धन खतम हो जाता है। इसलिए वह अमीर लोगों को लूटने लगते हैं जो पास के जंगल से गुजरते हैं और दूसरों की सेवा करने में धन का उपयोग करते हैं।

पराशर: ओह! क्या हम चुरा सकते हैं?

आण्डाल दादी: नहीं! हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए | लेकिन क्यों कि श्री परकाल स्वामीजी भागवतो की सेवा करने के लिए इतने बेताब थे, इस कारण उन्होंने अमीर लोगों को लूटना शुरू कर दिया। वैसे भी, पेरुमल उनहे पूर्ण ज्ञान देना चाहता थे और उनहे पूरी तरह से सुधारना चाहता थे।। एम्पेरुमान अपने देवियों के साथ आळ्वार को अनुग्रहित करने के लिये उनकी राह में नए दूल्हा दुल्हन की तरह , सुन्दर आभूषणों से सज़-दज़ बारात में वायळालिमणवालन के रूप मे निकल पडे । बड़ी मात्रा मे लूटने का मौका देखकर आळ्वार जोश में आ जाते हैं और एम्पेरुमान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और सब कुछ लूट लेते हैं । लेकिन पेरुमल के अनुग्रह से, वह अंततः महसूस करते है कि पेरुमेल खुद आ चुका है। पेरुमल उनहें पूरी तरह आशीर्वाद देते हैं और उनहें सुधार देते हैं और बेहद शुद्ध बना देते हैं। (आखिर में आळ्वार एम्पेरुमान के श्री पाद में लगी हुई बिछिया को क़तर देते हैं । उनकी शूरता पे एम्पेरुमान आश्चर्य चकित हो जाते हैं और “नम् कलियनो ” कहकर सम्बोधित करते है, अर्थात क्या आप हमारे कलियन हो ? (महान शौर्यवान को कलियन कहा जाता हैं)। वह भी परकाल के रूप में जाना जाता है (जो सर्वोच्च भगवान खुद से डरता है)) चूंकि उनहोने खुद को आशीर्वाद देने के लिए पेरुमल को मजबूर किया, पेरुमल ने उनहे “कलियन” नाम दिया जो कि बहुत ही भव्य / अभिमानी है। वोह पराकाल के रूप में भी जाने जाते हैं (जिससे सर्वोच्च भगवान खुद डरता है)।

व्यास: वाह! यह अद्भुत है दादी| उसके बाद उनहोने क्या किया?

आण्डाल दादी: महान भावनाओं से अभिभूत होकर, उन्होंने पूरी तरह से पेरुमल को आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद, उन्होंने भारत देश की लंबाई और चौड़ाई की यात्रा की, उन्होंने कई दिव्य देश (८० से अधिक) और वहां गौरवशाली प्रभु पेरुमल की महिमा गायी। वह भी, उन्होंने विशेष रूप से ४० से अधिक पेरुमल के बारे में गाया है जो किसी भी अन्य आळ्वार नहीं गा सके – इस प्रकार उन दिव्य देश को हमारे लिए खुलासा किया।
पराशर: ओह! यह हमारा महान भाग्य है – उनके कारण, हम अब इन क्रियाशील देवताओं की पूजा कर रहे हैं। हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे ।

आण्डाल दादी: उन्होंने हमारे श्री रंगम में कई कैंकर्य किये, मंदिर के आसपास के किले के निर्माण, आदि। अपने जीवनकाल के दौरान, पेरुमल श्री परकाल स्वामीजी के भाई को आळ्वार के विग्राहम बनाने और उसकी पूजा करने का आदेश देते हैं। कुछ समय बाद, तिरुमंगै-आळ्वार तिरुककुरुंगुडी दिव्य देश को जाता हैं, कुछ समय में नाम्बी सम्राट की पूजा करते हैं। अंत में, भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हुए, वह परम पदम में सदैव भगवान के
कैंकर्य के लिए चले जाते हैं ।

व्यास: हम अर्चावतार पेरुमल और उनके भक्तों आळ्वार जीवन के कैंकर्य के महत्व को दादी से समझ चुके हैं।

आण्डाल दादी: हाँ, यह हमारे संप्रदाय का सार है। इसके साथ, आपने सभी आळ्वार के बारे में सुना है मैं आपको अगली बार हमारे आचार्य के बारे में बताऊंगी।

पराशर और व्यास: ठीक दादी! हम उत्सुकता से इसके लिए इंतजार कर रहे हैं

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2015/02/beginners-guide-thirumangai-azhwar/

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बालपाठ – तिरुप्पाणाऴ्वार (श्री योगिवाहन स्वामीजी)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (विप्रनारयण/भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी )

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आण्डाल दादी: एक वैकुंठ एकादशी ke दिन जागृत रहने की योजना बनाते हैं, व्यास और पराशर भी उस दिन जागते रहने के लिए अपनी रुचि व्यक्त करते हैं।

आण्डाल दादी: इस शुभ दिन पर जागते रहना पर्याप्त नहीं है। हमें भजन का गायन करना चाहिए और अपने आप को भगवान कि सेवा करने में दिन व्यक्त करना चाहिए।

पराशर: दादी, जैसा कि हम जागे हुए रहने की योजना बना रहे हैं, क्या आप हमें अगले आऴ्वार के बारे में बता सकती हैं?
आण्डाल दादी : पराशर, आपने वहि पूछा जो कि मेरे मन में था, हां, मैं आपको तिरुप्पाणाळ्वार के बारे में बताऊंगा।
व्यास और पराशर: ज़रूर दादी |

आण्डाल दादी: तिरुप्पाणाळ्वार (मुनिवाहन आळ्वार) का अवतार कार्तिक मास में श्रीरंगम के निकट उरैयूर में रोहिणी नक्षत्र् में हुआ था। उन्होंने अमलनादिपिरन प्रबन्ध में 10 पश्रुरम शामिल किए, जिसमें उन्होंने श्री रंगनाथन की खूबसूरती को पैर कि अंगुली से सिर तक प्रशंसा करते हैं।

व्यास: ओह! हां दादी, हमारे पेरुमल इतने सुन्दर हैं, कि जो कोई उन्हें देखता है उसे पूरी तरह से पेरुमल का आनंद मिलेगा।
आण्डाल दादी: हाँ प्रिय! वह पेरिया पेरूमल के एक बहुत प्रिय भक्त थे और एक रोचक घटना के कारण वोह अचानक परम पदम चले गये ।

पराशर: दादी, कृपया हमें घटना बताएं |

आण्डाल दादी: एक दिन, वह कावेरी के दूसरी तरफ किनारे से पेरूमल की प्रशंसा में गाने गा रहे थे । उस समय तक उन्होंने शारीरिक रूप से कभी भी श्रीरंगम में कदम नहीं रखा। लोकसारंग मुनी जो पेरिया पेरुमल के कैंकर्य में लगे हुए थे, वोह नदी से पानी लाने के लिए जाते हैं। उस समय उन्होंने देखा कि आळ्वार उनके रास्ते पर थे। वोह आळ्वार से हठने के लिए केहते हैं ताकि वोह पानी ला सके। लेकिन आळ्वार पेरिया पेरुमल के गहरे ध्यान में थे। तो वह जवाब नहीं देते।
व्यास: दादी, आगे क्या हुआ ?

आण्डाल दादी: लोकसारंग मुनी ने एक कंकड़ उठाया और इसे तिरुप्पाणाळ्वार पर फेंक दिया। तिरुप्पाणाळ्वार को इसके कारण चोट लगी और रक्त बेहने लगा। तिरुप्पाणाळ्वार ध्यान से उठते हैं और उन्हे पता चलता है कि वोह रास्ते में थे।

पराशर: क्या उन्होंने लोकसारंग मुनी पर गुस्सा किया?

आण्डाल दादी: नहीं प्रिय! श्रीवैष्णव इन छोटी सी चीजों के लिए कभी नाराज नहीं होते। तिरुप्पाणाळ्वार एक बार अपने रास्ते पर होने के लिए माफी मांगते हैं और आगे बढ़ता हैं। लोकसारंग मुनी लौटकर मंदिर जाते हैं लेकिन तिरुप्पाणाळ्वार की ओर उनके अनावश्यक आक्रमण के लिए उनपर पेरिया पेरुमल बहुत नाराज होते हैं। Vओह दरवाजे खोलने से इनकार करते हैं और भगवान लोकसारंग मुनी से तिरुप्पाणाळ्वार के पास जाने के लिए केहते हैं, भगवान ने आदेश दिया कि लोकसारंग मुनी तिरुप्पाणाळ्वार से माफ़ी मांगें और उन्हें मंदिर में ले आए। लोकसारंग मुनी ने अपनी बड़ी गलती को महसूस किया और तिरुप्पाणाळ्वार की ओर जाते हैं। उन्होनें आळ्वार को माफ करने के लिए विनती की। आळ्वार को उनके प्रति कोई बुरी भावना नहीं रख्खि और उनके शब्दों को सुन्दर और बहुत विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं।
व्यास: दादी, वह हमारे लिए एक उदाहरण हैं | हम भी उनके जैसे उदार होने की कोशिश करेंगे।

आण्डाल दादी: लोकसारंग मुनी के बार-बार आग्रह करने के बाद, तिरुप्पाणाळ्वार लोकसारंग मुनी के कंधों पर चढ़ते हैं और अपने रास्ते पर पेरिया पेरुमल का अमलनादिपिरान गाते हैं । वोह पेरिया पेरुमल के सन्निधि में पहुंचते है, जहां अंतिम पशुरम में वह कहते है “वह उन आँखों से कुछ भी नहीं देख पाएंगे जो कि पेरिया पेरुममल को देख चुके हैं” और पेरिया पेरूमल के श्री चरणम में गायब हो जाते है ताकि वह परम पदम में अनन्त कैंकर्य कर सकें |

पराशर: वाह! यह बहुत बढ़िया है, दादी । आऴ्वार स्वामीजी के सभी इतिहास में जो हमने अभी तक सुना है, यह सबसे अच्छा है।

आण्डाल दादी: हां, तिरुप्पाणाळ्वार पिरिया पेरुमल के एक विशेष भक्त थे और हम आज भी उरैयूर जा सकते हैं और उनकी पूजा कर सकते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (विप्रनारयण/भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी )

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्रीआण्डाल (श्री गोदाम्माजी)

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आण्डाल दादी, अपने घर के बाहर एक विक्रेता से फूल खरीदते है |पराशर और व्यास सुबह सुबह उठकर दादी के पास जाते है

व्यास: दादी, बस याद आया कि आपने कहा था कि दो आऴ्वार स्वामीजी थे, जिन्होंने पेरुमल को फूलों का कैंकर्य करते थे । हम जानते हैं कि उनमें से एक पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) थे । क्या आप हमें अब दूसर आऴ्वार स्वामीजी के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी: व्यास आपके पास बहुत अच्छी याददाश्त है | जैसा कि आप इसके लिए पूछा, मैं आपको दूसरे अलवर के बारे में बताऊंगा जो फूलों का कैंकर्य पेरुमल को पेश करते थे |

पराशर और व्यास अगले आऴ्वार स्वामीजी के बारे में सुनने के लिए दादी के आसपास बैठें |

आण्डाल दादी: उनको तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार के नाम से जाना जाता है| उनके माता-पिता ने उन्हें विप्रनारायण का नाम दिया | उनका जन्म मार्गशीर्ष मास – ज्येष्ठा नक्षत्र कुम्बाकोनाम के पास तिरुमण्डंगुडि में हुआ था | श्री रंगनाथन उनको बहुत प्रिय थे| विप्रनारयण स्वामीजी नित्य भगवान श्रीरंगनाथ का कैंकर्यं करते| इतने प्रिय थे के उनहोने दो दिव्या प्रांबंधों में किसी भी अन्य पेरामल का उल्लेख नहीं किया है, एक तिरुमालई है और दूसरा एक तिरुपल्लिएऊचि है। ऐसा कहा जाता है कि जो तिरुमलाई को नहीं जानता, वह पेरूमल को समझने में सक्षम नहीं होगा।

पराशर: ओह!दादी यह क्या है? तो हम दोनों भी तिरुमलाई सीखेंगे।

आण्डाल दादी: मुझे यकीन है, आप इसे भी सीखेंगे। थिरुमलाई पूरी तरह से पेरिया पेरूमल की महिमा बताता है। क्या आप इन अज़व्वार का एक विशेष पहलू जानते हैं?

व्यास: दादी वो क्या है?

आण्डाल दादी: क्या आपने श्रीवेंकटेश्वर के सुप्रभातम का सबसे पहला श्लोक सुना है??

पराशर: हाँ दादी। (गाती है) “कौशल्या सुप्रजा राम …”

आण्डाल दादी: हाँ। क्या आप जानते हैं कि यह श्रीरामायणम से है? यह ऋषि विश्वामित्र द्वारा श्री राम को उठाने के लिए पढ़ाया जाता था | इसी तरह, पेरियाळ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)ने भी अपने पाशरुम में कन्नन सम्राट को जगाते हैं । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार अपने प्रबंधम में श्रीरंगनाथन के लिए सुप्रभातम गाते है |

व्यास: ओह! यही वह है जिसे हम सुनते हैं कि अररियार स्वामी सुबह-शाम पेरिया पेरूमल के सामने मार्गशीर्ष मास के दौरान तिरुप्पावै का पाठ करते हैं।

आण्डाल दादी: हाँ। आप बहुत सही हैं आइए हम इन फूलों के साथ माला तैयार करें और पेरिया पेरुमल सनीधि में जाएं ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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