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बालपाठ – तिरुप्पाणाऴ्वार (श्री योगिवाहन स्वामीजी)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (विप्रनारयण/भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी )

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आण्डाल दादी: एक वैकुंठ एकादशी ke दिन जागृत रहने की योजना बनाते हैं, व्यास और पराशर भी उस दिन जागते रहने के लिए अपनी रुचि व्यक्त करते हैं।

आण्डाल दादी: इस शुभ दिन पर जागते रहना पर्याप्त नहीं है। हमें भजन का गायन करना चाहिए और अपने आप को भगवान कि सेवा करने में दिन व्यक्त करना चाहिए।

पराशर: दादी, जैसा कि हम जागे हुए रहने की योजना बना रहे हैं, क्या आप हमें अगले आऴ्वार के बारे में बता सकती हैं?
आण्डाल दादी : पराशर, आपने वहि पूछा जो कि मेरे मन में था, हां, मैं आपको तिरुप्पाणाळ्वार के बारे में बताऊंगा।
व्यास और पराशर: ज़रूर दादी |

आण्डाल दादी: तिरुप्पाणाळ्वार (मुनिवाहन आळ्वार) का अवतार कार्तिक मास में श्रीरंगम के निकट उरैयूर में रोहिणी नक्षत्र् में हुआ था। उन्होंने अमलनादिपिरन प्रबन्ध में 10 पश्रुरम शामिल किए, जिसमें उन्होंने श्री रंगनाथन की खूबसूरती को पैर कि अंगुली से सिर तक प्रशंसा करते हैं।

व्यास: ओह! हां दादी, हमारे पेरुमल इतने सुन्दर हैं, कि जो कोई उन्हें देखता है उसे पूरी तरह से पेरुमल का आनंद मिलेगा।
आण्डाल दादी: हाँ प्रिय! वह पेरिया पेरूमल के एक बहुत प्रिय भक्त थे और एक रोचक घटना के कारण वोह अचानक परम पदम चले गये ।

पराशर: दादी, कृपया हमें घटना बताएं |

आण्डाल दादी: एक दिन, वह कावेरी के दूसरी तरफ किनारे से पेरूमल की प्रशंसा में गाने गा रहे थे । उस समय तक उन्होंने शारीरिक रूप से कभी भी श्रीरंगम में कदम नहीं रखा। लोकसारंग मुनी जो पेरिया पेरुमल के कैंकर्य में लगे हुए थे, वोह नदी से पानी लाने के लिए जाते हैं। उस समय उन्होंने देखा कि आळ्वार उनके रास्ते पर थे। वोह आळ्वार से हठने के लिए केहते हैं ताकि वोह पानी ला सके। लेकिन आळ्वार पेरिया पेरुमल के गहरे ध्यान में थे। तो वह जवाब नहीं देते।
व्यास: दादी, आगे क्या हुआ ?

आण्डाल दादी: लोकसारंग मुनी ने एक कंकड़ उठाया और इसे तिरुप्पाणाळ्वार पर फेंक दिया। तिरुप्पाणाळ्वार को इसके कारण चोट लगी और रक्त बेहने लगा। तिरुप्पाणाळ्वार ध्यान से उठते हैं और उन्हे पता चलता है कि वोह रास्ते में थे।

पराशर: क्या उन्होंने लोकसारंग मुनी पर गुस्सा किया?

आण्डाल दादी: नहीं प्रिय! श्रीवैष्णव इन छोटी सी चीजों के लिए कभी नाराज नहीं होते। तिरुप्पाणाळ्वार एक बार अपने रास्ते पर होने के लिए माफी मांगते हैं और आगे बढ़ता हैं। लोकसारंग मुनी लौटकर मंदिर जाते हैं लेकिन तिरुप्पाणाळ्वार की ओर उनके अनावश्यक आक्रमण के लिए उनपर पेरिया पेरुमल बहुत नाराज होते हैं। Vओह दरवाजे खोलने से इनकार करते हैं और भगवान लोकसारंग मुनी से तिरुप्पाणाळ्वार के पास जाने के लिए केहते हैं, भगवान ने आदेश दिया कि लोकसारंग मुनी तिरुप्पाणाळ्वार से माफ़ी मांगें और उन्हें मंदिर में ले आए। लोकसारंग मुनी ने अपनी बड़ी गलती को महसूस किया और तिरुप्पाणाळ्वार की ओर जाते हैं। उन्होनें आळ्वार को माफ करने के लिए विनती की। आळ्वार को उनके प्रति कोई बुरी भावना नहीं रख्खि और उनके शब्दों को सुन्दर और बहुत विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते हैं।
व्यास: दादी, वह हमारे लिए एक उदाहरण हैं | हम भी उनके जैसे उदार होने की कोशिश करेंगे।

आण्डाल दादी: लोकसारंग मुनी के बार-बार आग्रह करने के बाद, तिरुप्पाणाळ्वार लोकसारंग मुनी के कंधों पर चढ़ते हैं और अपने रास्ते पर पेरिया पेरुमल का अमलनादिपिरान गाते हैं । वोह पेरिया पेरुमल के सन्निधि में पहुंचते है, जहां अंतिम पशुरम में वह कहते है “वह उन आँखों से कुछ भी नहीं देख पाएंगे जो कि पेरिया पेरुममल को देख चुके हैं” और पेरिया पेरूमल के श्री चरणम में गायब हो जाते है ताकि वह परम पदम में अनन्त कैंकर्य कर सकें |

पराशर: वाह! यह बहुत बढ़िया है, दादी । आऴ्वार स्वामीजी के सभी इतिहास में जो हमने अभी तक सुना है, यह सबसे अच्छा है।

आण्डाल दादी: हां, तिरुप्पाणाळ्वार पिरिया पेरुमल के एक विशेष भक्त थे और हम आज भी उरैयूर जा सकते हैं और उनकी पूजा कर सकते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार (विप्रनारयण/भक्तांघ्रिरेणु स्वामीजी )

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बालपाठ

<< श्रीआण्डाल (श्री गोदाम्माजी)

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आण्डाल दादी, अपने घर के बाहर एक विक्रेता से फूल खरीदते है |पराशर और व्यास सुबह सुबह उठकर दादी के पास जाते है

व्यास: दादी, बस याद आया कि आपने कहा था कि दो आऴ्वार स्वामीजी थे, जिन्होंने पेरुमल को फूलों का कैंकर्य करते थे । हम जानते हैं कि उनमें से एक पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) थे । क्या आप हमें अब दूसर आऴ्वार स्वामीजी के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी: व्यास आपके पास बहुत अच्छी याददाश्त है | जैसा कि आप इसके लिए पूछा, मैं आपको दूसरे अलवर के बारे में बताऊंगा जो फूलों का कैंकर्य पेरुमल को पेश करते थे |

पराशर और व्यास अगले आऴ्वार स्वामीजी के बारे में सुनने के लिए दादी के आसपास बैठें |

आण्डाल दादी: उनको तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार के नाम से जाना जाता है| उनके माता-पिता ने उन्हें विप्रनारायण का नाम दिया | उनका जन्म मार्गशीर्ष मास – ज्येष्ठा नक्षत्र कुम्बाकोनाम के पास तिरुमण्डंगुडि में हुआ था | श्री रंगनाथन उनको बहुत प्रिय थे| विप्रनारयण स्वामीजी नित्य भगवान श्रीरंगनाथ का कैंकर्यं करते| इतने प्रिय थे के उनहोने दो दिव्या प्रांबंधों में किसी भी अन्य पेरामल का उल्लेख नहीं किया है, एक तिरुमालई है और दूसरा एक तिरुपल्लिएऊचि है। ऐसा कहा जाता है कि जो तिरुमलाई को नहीं जानता, वह पेरूमल को समझने में सक्षम नहीं होगा।

पराशर: ओह!दादी यह क्या है? तो हम दोनों भी तिरुमलाई सीखेंगे।

आण्डाल दादी: मुझे यकीन है, आप इसे भी सीखेंगे। थिरुमलाई पूरी तरह से पेरिया पेरूमल की महिमा बताता है। क्या आप इन अज़व्वार का एक विशेष पहलू जानते हैं?

व्यास: दादी वो क्या है?

आण्डाल दादी: क्या आपने श्रीवेंकटेश्वर के सुप्रभातम का सबसे पहला श्लोक सुना है??

पराशर: हाँ दादी। (गाती है) “कौशल्या सुप्रजा राम …”

आण्डाल दादी: हाँ। क्या आप जानते हैं कि यह श्रीरामायणम से है? यह ऋषि विश्वामित्र द्वारा श्री राम को उठाने के लिए पढ़ाया जाता था | इसी तरह, पेरियाळ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)ने भी अपने पाशरुम में कन्नन सम्राट को जगाते हैं । तोन्डरडिप्पोडि आळ्वार अपने प्रबंधम में श्रीरंगनाथन के लिए सुप्रभातम गाते है |

व्यास: ओह! यही वह है जिसे हम सुनते हैं कि अररियार स्वामी सुबह-शाम पेरिया पेरूमल के सामने मार्गशीर्ष मास के दौरान तिरुप्पावै का पाठ करते हैं।

आण्डाल दादी: हाँ। आप बहुत सही हैं आइए हम इन फूलों के साथ माला तैयार करें और पेरिया पेरुमल सनीधि में जाएं ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – श्रीआण्डाल (श्री गोदाम्माजी)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)

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आण्डाल दादी सुबह दूधवाले से गाय का दूध इकट्ठा करती हैं और उसे अपने घर में लाती हैं।

दूध को गरम करने के बाद, वोह इसे पराशर और व्यास को देती हैं। पराशर और व्यास चलो  दूध पीलो|

पराशर: दादी, आपने उस दिन कहा था कि आप हमें बाद में आण्डाल के बारे में बताएंगी। क्या आप हमें अभी बता सकती हैं?

आण्डाल दादी: ओह, अरे हाँ। मुझे याद है। ज़रूर, अब समय है कि मैं आपको आण्डाल के बारे में बताती हूं |

आण्डाल दादी, व्यास और पराशर, तीनों बरामदा में बैठते हैं |

आण्डाल दादी: श्रीआण्डाल (श्री गोदाम्माजी) पेरियाअव्वार की बेटी थी, उनका जन्म श्रीविल्लिपुत्तूर में हुआ था, पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) को श्रीआण्डाल मंदिर के बगल के बगीचे में एक तुलसी के पौधे के निकट में मिली। वह आशड मास के पूर्व फाल्गुनी नक्षत्र में पैदा हुई थी। यह दिन तिरुवाडीपुरम के रूप में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। पेरियालवार  ने श्रीआण्डाल को नियमित भोजन के साथ साथ भगवान नारायण के प्रति भक्ति को भी नियमित भोजन की तरहा श्रीआण्डाल दिया।

व्यास: ओह, दादी यह तो बहुत अच्छी बात है| जैसे आप हमें सिखाती हैं?

आण्डाल दादी: हाँ वास्तव में इस से अधिक। क्योंकि पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) कैंकर्य में पूरी तरह से व्यस्त थे, वोह हमेशा भगवान नारायण की विभिन्न अद्भुत पहलुओं को श्रीआण्डाल को बताते हैं। श्रीआण्डाल पांच साल की कोमल उम्र में भी, सपना देखा कि भगवान नारायण उनसे शादी करेंगे और श्रीआण्डाल उनकी सेवा करेंगी।

पराशर: ओह दादी, पेरियाऴ्वार मुख्य कैनकर्यम क्या था?

आण्डाल दादी: उनका मुख्य कैंकर्य मंदिर उद्यान बनाए रखना था और हर दिन भगवान नारायण के लिए अच्छा माला तैयार करना था। वह अच्छे मालाओं को बनते ते और उन्हें घर पर रखते, अपने दिनचर्या करते और फिर मंदिर जाने के दौरान, वह अपने साथ माला को ले जाते और भगवान को माला प्रदान करते थे। जब वोह घर पर माला को रखते थे, श्रीआण्डाल उस माला को पेहनती थी और देखती थी के क्या वोह इस माला में सुन्दर दीखती हैं और सोचती थी के भगवान उन्हे इस माला में बहुत प्रेम के साथ देख रहे हैं|

व्यास: पेरियालवार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) को यह बिल्कुल नहीं पता था?

आण्डाल दादी: हाँ कई दिनों तक, उन्हे यह नहीं पता था, भगवान बहुत खुशी के साथ मालाओं को भी स्वीकार करते थे, क्योंकि उन मालाओं को श्रीआण्डाल ने शुशोभित किया और वोह भगवान को प्यारि थी। लेकिन एक दिन, पेरियालवार ने माला तैयार किया, इसे घर पर रखा और हर दिन की तरह बाहर चले गये। हमेशा की तरह अंडाल खुद माला पहनती हैं, बाद में, पेरियाऴ्वार फूलों की माला मंदिर मँ ले गए| लेकिन माला में बाल की एक स्ट्रिंग पाई गई थी और इस कारन वोह इस कारन वोह माला के साथ अपने घर वापस आ गाये। उन्हें एहसास हुआ कि उनकी बेटी ने यह पहना होगा, इसलिए उनने एक नया माला तैयार किया और इसे मंदिर में वापस ले गए। भगवान ने नई माला को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और अंडालका का पेहना हुआ माला पूछा। पेरियालवार अपनी बेटी की भक्ति की गहराई और अपनी बेटी के  लिए भगवान का प्यार समझ गए और अंडाल द्वारा पहना गया माला के साथ वापस आ गए | पेरुमल ने इसे बहुत खुशी से स्वीकार किया |

पराशर और व्यास: श्री गोदाम्माजी के बारे में और भगवान के प्रति उनका प्यार सुनकर झूम उठे।

व्यास: उसके बाद क्या हुआ?

आण्डाल दादी: पेरुमल के लिए श्री आंडल की भक्ति दिन प्रति दिन बढ़ती गयी। श्री गोदाम्माजी, ने निविदा उम्र में, नाच्चियार तिरुमोलि, तिरुप्पावै का अनुवाद किया। माघशीर्षि के महीने के दौरान तिरुप्पावै सभी घरों और मंदिरों में पढ़ा जाता है। आखिरकार, पेरिया पेरुमल ने पेरियालवार से पूछा कि वह श्री गोदाम्माजी से शादी करने के लिए श्री रंगम मंदिर में लाने के लिए कहा। पेरियालार एक महान जुलूस में अंडाल के साथ श्रीरंगम मंदिर खुशी से पहुंचे। श्री गोदाम्माजी सीधे पेरिया पेरुमल सनिधि में चली गयी और पेरुमल ने अंडाल से शादी कर लिया और वह वापस परम पदम लौट आए।

पराशर: वापस परम पदम लौट आए इसका मतलब? क्या वह मूलतः परमपदम से थी?

आण्डाल दादी: हाँ वह खुद ही पृथ्वी देवी थीं | अन्य आळ्वार, के विपरीत, जो इस दुनिया से हैं और पेरूमल द्वारा आळ्वार, बनने के लिए आशीर्वाद पाया, अंदाल, हमें भक्ति के मार्ग में मार्गदर्शन करने के लिए परमपदम से उतरी। जैसे ही उनका काम खत्म हुआ वह वापस लौट गईं।।

पराशर: ओह, दादी यह जान कर बहुत अच्छा हुआ, यह तो उन्की दया है|

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा। अब, आप दोनों को तिरुप्पावै सीखना और अभ्यास करना है, ताकि आप भी उन्हें माघशीर्षि महीने के दौरान पढ़ सकते हैं जो जल्द ही आ रहा है।

पराशर और व्यास: ज़रूर दादी, हम इसे अभी शुरू कर देते हैं |

आण्डाल दादी उन्हें पढ़ाने शुरू करती है और दोनों यह बहुत उत्सुकता से सीखते हैं |

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बालपाठ – पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी)

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बालपाठ

<< कुलशेखर आळ्वार

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सुंदर रविवार की सुबह आण्डाल दादी अपने घर के बाहर बरामदा में बैठति हैं और भगवान विष्णु के लिए माला बनाती हैं। व्यास और पराशर इधर आओ और मेरे बगल में बरामदे पर बैठो| वे दोनों आण्डाल दादी को उत्सुकता से देखते हैं|

व्यास: दादी माँ आप क्या कर रहे हो?

आण्डाल दादी: भगवान विष्णु के लिए माला बना रही हूं, जो मुझे कुछ आल्वार कि याद दिलाता है? क्या आप उनमें से एक आल्वार के बारे में अब सुनना चाहेंगे?

पराशर : ओह ज़रूर दादी माँ, हम उत्सुकता से इसके लिए इंतजार कर रहे हैं |

आण्डाल दादी: ये हुई ना बात..मेरे अछे पोते |तो मैं आपको पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) के बारे में बताती हुन | उनका जन्म आनी महीने स्वाधीनक्षत्र में श्री विल्ली पुथथुर में हुआ था। उन्हें पट्टरपीरान भी कहा जाता था | वोह भगवान वाटपत्रसाईं के लिए माला बनाते थे | एक उत्कृष्ट दिन, पंडियन राज्य पर शासन करने वाले राजा ने विद्वानों के लिए एक चुनौती रख दी। उन्होंने घोषणा की कि वोह उस व्यक्ति को सोने के सिक्कों से भरा थैला प्रदान करेगा जो यह स्थापित कर सकता है कि सर्वोच्च देवता कौन है|

व्यास: दादी यह तो बहुत मुश्किल हुआ होगा, नहीं?

आण्डाल दादी: पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) के लिए ऐसा नहीं था। अपने भक्ति और पेरुमल की दया के कारण, वोह राजा के अदालत में गए और उन्होंने स्थापित किया कि भगवान नारायण वेदम के माध्यम से सर्वशक्तिमान हैं। राजा बहुत खुश हुआ और उसने इनाम की राशि पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) को दिया और उन्हें एक शाही हाथी पर मदुरै की सड़कों पर भेज दिया।

पराशर : दादी यह तो बहुत सुन्दर नज़ारा हुआ होगा|

आण्डाल दादी: हाँ परसार, वो बहुत सुन्दर नज़रा हुआ होगा। और यही वजह है कि पेरुमल स्वयं अपने गरुड़ की सवारी से परमपदम से नीचे आये। हालाँकि पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) एक हाथी के ऊपर सवार थे, वोह तब भी विनम्रथा और पेरुमल की सुरक्षा के बारे में चिंतित थे| इसलिए उन्होंने तिरुपल्लान्डु गाया और सुनिश्चित किया कि पेरुमल संरक्षित हैं। इसी तरह वोह पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) के रूप में जने जाने लगे। उन्होंने पेरियालवर थिरुवाइमोल्हि भी गाया|

व्यास: ओह। हाँ दादी मैं पल्लानडु पल्लानडु से परिचित हुन|यही है जो शुरुआत में हर रोज मंदिर में पढ़ा जाता है| हमने मंदिर में यह सुना है।

आण्डाल दादी: हाँ, तुम सही हो, पेरियाऴ्वार (श्री विष्णुचित्त स्वामीजी) के थिरूपप्लंडु को हमेशा शुरुआत और अंत में भी पढ़ा जाता है।

पराशर: यह तो बहुत अच्छी बात है दादी |हम इसे भी सीखेंगे और पेरूमल के सामने इसे पढ़ना शुरू करेंगे।

आण्डाल दादी: मुझे यकीन है, आप जल्द ही ऐसा करना शुरू कर देंगे। वैसे, वोह अंडाल के पिता भी थे, जिन्होंने सबसे लोकप्रिय थिरूपवाई गाया था| बाद में आपको अंडाल के बारे में अधिक बताउंगी, आइए हम चले और पेरुमल को माला पेश करें।

आण्डाल दादी माला पेरुमल को पेश करने के लिए व्यास और परसार के साथ श्री रंगनाथन मंदिर की तरफ बढ़ना शुरू करति हैं |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – कुलशेखर आळ्वार

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<< श्री नम्माऴ्वार (श्री शठकोप स्वामीजी) और मधुरकवि आऴ्वार

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व्यास और पराशर आण्डाल दादी के पास जाते हैं और उन्हें आऴ्वार स्वामीजी की कथाओं को जारी रखने के लिए कहते हैं।

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर! आज मैं आपको एक राजा के बारे में बताने जा रही हैं जो एक आऴ्वार स्वामीजी हैं।

पराशर:दादी वोह कौन हैं? उनका नाम क्या है? उनका जन्म कब और कहाँ हुआ? उनके विशेष गुण क्या हैं?

आण्डाल दादी: उनका नाम श्रीकुलशेखराळ्वार् है। उनका जन्म माघ मास, पुनर्वसु नक्षत्र और आवतार स्थल: तिरुवंजिक्कलम है  जो केरला में स्थित है| उनका जन्म एक क्षत्रिय परिवार में हुआ था।

पराशर: दादी क्षत्रिय से क्या मतलब है?

आण्डाल दादी: क्षत्रिय का मतलब प्रशासक है आमतौर पर, जैसे राजा, सम्राट, आदि है । वे राज्य पर शासन करते हैं, नागरिकों की रक्षा करते हैं, आदि।

पराशर: ओह, हमारे रंगराजा की तरह, जो श्रीरंगम में राज करते हैं और हमारी श्रीरंगम में रक्षा करते हैं |

आण्डाल दादी: हाँ, हमरे पेरुमल सभी के लिए राजा हैं | लेकिन प्रत्येक क्षेत्र पर राजा का शासन होता है और इन लोगों को स्थानीय लोगों द्वारा बहुत सम्मान मिलता है। अब हम इतिहास पर वापस जाते हैं, जैसा कि वोह क्षत्रिय परिवार में पैदा हुआ थे, वोह महसूस कर रहे थे कि वोह नियंत्रक थे, पूरी तरह से स्वतंत्र, इत्यादि । लेकिन श्रीमन्नारायण की कृपा से, उन्हे पूरी तरह से एहसास हो गया कि वोह पूरी तरह से भगवान पर निर्भर थे और भगवान की महिमा को सुनने के लिए महान उत्सुकता विकसित किया; और पेरुमल के भक्तों की भी देखभाल करते थे।

पराशर: दादी, मुझे याद है कि आप कह रही थी कि हमें मधुरकवि आळ्वार (श्री मधुरकवि स्वामीजी) की तरह होना चाहिए ताकि भगवान के भक्तों की सेवा कर सकें, दादी, क्या वोह उसी तरह भगवान को पसंद करता थे?

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा पराशर| हाँ, श्रीकुलशेखराळ्वार् को श्रीरामायण के प्रति महान लगाव था | देखें, हमारे संप्रदाय में “श्री राम” को प्यार से “पेरुमल” कहा जाता है। श्रीरामायण और पेरुमाळ (श्री राम) के प्रति इनकी भक्ति और लगाव के कारण इन्हें “कुलशेखर पेरुमाळ” के नाम से भी जाना जाता है। वोह हर दिन महान विद्वानों से श्रीरामायण के बारे में सुनते थे और श्रीरामायण की घटनाओं में डूब जाते थे । एक बार जब उन्होंने सुना कि श्रीराम पर 14000 राक्षसों ने हमला किया था, तो वोह बहुत परेशान हो गए और अपनी सेना को भगवान श्री राम की सहायता करने के लिए बुलाया।।
तब भगवान के भक्तों ने उन्हे शांत कर दिया और उन्हे बताया कि श्रीराम पहले से ही अकेले राक्षसों को हरा दिया था |

व्यास:   अगर वह पूरी तरह से भगवान के बारे में सुनने में लगे हुए थे, तो दादी, उन्होनें राज्य पर कैसे शासन किया?

आण्डाल दादी: हाँ। यह एक बहुत ही अच्छा सवाल है | वोह राज्य पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ थे| उनके मंत्रियों ने भागवतों के प्रति उनके लगाव को खत्म करने की योजना बनाई, जो पेरुमल के भक्त थे| उन्होनें महल में अपने मंदिर से पेरुमल का हार चुरा लिया और उनसे कहा कि यह भागवतों द्वारा चोरी हो गया है | उन्होंने मंत्रियों के शब्दों पर विश्वास नहीं किया | यह उन शब्दों को साबित करने का एक प्राचीन अभ्यास था अपने हाथ एक बर्तन में डाले जिसमें साँप है | ऐसा करने के लिए किसी को सच्चाई और बहादुर पर बहुत विश्वास होना चाहिए | उन्होंने उनसे एक बर्तन लाने के लिए कहा, जिसमें सांप था | उन्होंने साहसपूर्वक बर्तन के अंदर अपना हाथ रख दिया और घोषित किया कि भागवत निर्दोष हैं|

पराशर: दादी, यह बहुत अच्छा है |

आण्डाल दादी: हां, यह भी, जैसे श्रीराम का पेरिया पेरुमल (श्रीरंगनाथ) के प्रति महान लगाव था, कुलशेखराळ्वार् को भी पेरिया पेरुमल और श्रीरंगम से बहुत लगाव था।

व्यास:दादी, श्री राम और पेरिया पेराममल का क्या संबंध है?

आण्डाल दादी: पेरिया पेरूमल, अयोध्या में श्री राम की थिरुवाराधन वाले स्वामी थे। थिरुवाराधन पेरूमल का अर्थ है पेरुमल जिसका हम घर पर पूजा करते हैं। इसलिए, अपने महल में श्री राम ने पेरिया पेरुमल की पूजा की| लेकिन उन्होंने अपने पेरुमल जी को विभीषण को उपहार के रूप में दिया था जो उनके प्रिय भक्त थे| जब विभीषण पेरिया पेरुमल को लंका के लिए ले जा रहे थे, तो वोह श्रीरंगम में संध्या वंदनम करने के लिए रुके। अपने संध्या वंदनम के बाद, जब वोह अपनी यात्रा को लंका के लिए जारी रखना चाहता थे, पेरिया पेरुमल ने विभीषण से कहा कि वोह इस जगह को बहुत पसंद करते हैं और सिर्फ दक्षिण की तरफ देखना चाहते हैं जहां लंका है| विभीषण प्रभु के साथ सहमत थे, और भगवान जी के बिना लंका चले गए| इस प्रकार, पेरिया पेरूमल श्रीरंगम में पहुंचे और अब तक यहिन पर रहते हैं।

पराशर: ओह!दादी यह सुनना के लिए बहुत अच्छा है| हम पेरुमल (श्री राम) और पेरिया पेरुमल के बीच के इस संबंध को पहले नहीं जानते थे।

आण्डाल दादी: तो, कुलशेखराळ्वार् को भी श्रीरंगम और पेरिया पेरुमल से बहुत लगाव था। वोह अपने राज्य से हर रोज श्रीरंगम का दौरा करना चाहते थे और अपने राज्य को छोडना चाहते थे| लेकिन उनके मंत्रियों ने उन्हे किसी कारण या किसी अन्य कारण से रोक दिया ताकि वोह राज्य मैं रेहकर राज्य पर शासन कर सकें। आखिरकार, उन्होंने अपना राज्य छोड़ दिया और श्रीरंगम पहुंच गए । वोह भगवान की महिमा में पेरूमल थिरुमोली का पाठ करते हैं और कुछ समय के लिए श्रीरंगम में रहता हैं । अंत में, वह इस दुनिया से निकलते हैं और परमपदम तक पहुंचते हैं ताकि वह हमेशा के लिए प्रभु की सेवा कर सके|

व्यास:दादी, जितना अधिक हम आऴ्वार स्वामीजी के बारे में सुनते हैं, उतना ही हम पेरुमल के बारे में जानते हैं क्योंकि उनका जीवन पूर्ण रूप से पेरूमल पर केंद्रित है।

आण्डाल दादी: हाँ। हमें अपने जीवन को पेरूमल और उनके भक्तों पर भी केंद्रित करना चाहिए। अब, हम कुलशेखराळ्वार् सन्निधि में जाते हैं और अपने कुलशेखराळ्वार् का दर्शन करते हैं|

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी आइये अब चलें।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – श्री नम्माऴ्वार (श्री शठकोप स्वामीजी) और मधुरकवि आऴ्वार

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<< तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

आण्डाल दादी व्यास और पराशर के लिए आऴ्वार के जीवन को समझाने की प्रक्रिया में हैं।

व्यास: दादी, हमने अब मुदल् आऴ्वार और थियरुमजस्साई आऴ्वार के बारे में सुना है, अगले आऴ्वार कौन है?

आण्डाल दादी: मैं आपको नम्माऴ्वार के बारे में बताति हूं जो आऴ्वार के बीच प्रमुख के रूप में माने जाते हैं | मैं आपको नम्मालवार के प्रिय शिष्य मधुरकवि आऴ्वार के बारे में कुछ बताऊंगा |

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पराशर : ज़रूर दादी, हम उनके बारे में आप से सुनने के लिए उत्सुक हैं |

आण्डाल दादी: नम्माऴ्वार का तमिल में अर्थ है “हमारे आऴ्वार” |इस शीर्षक के साथ पेरुमल ने खुद उन्हें सम्मानित किया| नम्माऴ्वार का जन्म अलवार तिरुनगरि में मास विसाखा नक्षत्र को हुआ | वोह स्थानीय राजा / प्रशासक के बेटे के रूप में पैदा हुए थे, जिनका नाम कारि और उनकी पत्नी उदयनन्गै थे | कारि और उदयनन्गै के पास लंबे समय तक कोई बच्चा नहीं था | तो उन्होने एक बच्चे के लिए तिरुकुरुण्गुडी नंबी से प्रार्थना की | नंबी उन्हें आशीर्वाद देते है कि वह स्वयं बच्चे के रूप में उनके घर में जन्म लेंगे| कारि और उदयनन्गै आऴ्वार थिरुनगारी लौटते हैं और जल्द ही उदयनन्गै एक सुंदर बच्चे को जन्म देती हैं |वोह खुद को पेरुमल के एक अमसम के रूप में और कभी-कभी विश्वकसेन के एक अमसम के रूप में पुकारते हैं।

व्यास: ओह! बहुत अच्छा। तो, क्या वह खुद पेरूअल थे । ?

आण्डाल दादी: उनकि महिमा को देखते हुए, निश्चित रूप से हम यह कह सकते हैं। लेकिन जैसा कि हमारे आचार्य ने बताया, वोह खुद घोषित करते हैं कि वोह समय-समय पर विश्व में भटकते हुए जीव आत्माओं में से एक थे और भगवान् श्रीमन्नारायण ने उनके बिना शर्त अनुग्रह से दैवीय आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसलिए, हम स्वीकार करते हैं कि वोह जो कुछ विशेष रूप से है, उन्हें भगवान विष्णु ने आशीर्वाद दिया था।

पराशर: हां, दादीजी, मुझे याद है कि शुरुआत में भगवान् श्रीमन्नारायण कुछ लोगों को पूर्ण ज्ञान के साथ आशीर्वाद देते हैं और उन्हें अलवर बनाते हैं ताकि वे कई भक्तों को भगवान विष्णु के प्रति ला सकें।

आण्डाल दादी: बिल्कुल सच पराशर | यह बहुत बढ़िया है कि आप इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह से याद रखते हैं| इसलिए, वापस नम्माऴ्वार के जन्म के लिए, यद्यपि वोह एक सामान्य बच्चे की तरह पैदा हुए थे, उन्होने खाना, रोना या कुछ भी नहीं किया |उनके माता-पिता पहले से चिंतित थे और उन्होंने 12 वीं दिन उनहे अधि नाथा पेरुमल मंदिर में लाया और उन्हें पेरुमल के सामने रखा | अन्य बच्चों के जैसे ना हो कर उनकि विशिष्ट प्रकृति के कारण, उनका नाम मारन दिया गया था ( जिसक मतलब – जो अलग है)। उनकि अनूठी प्रकृति को देखकर, उसके माता-पिता ने उसे एक दिव्य व्यक्तित्व माना और उन्हें दिव्य इमली पेड़ के नीचे रखा जो कि मंदिर के दक्षिण की ओर स्थित है और उस पेड़ को महान सम्मान के साथ पूजा करते हैं। तब से वोह इमली पेड़ के नीचे एक शब्द बोले बिना 16 साल तक रहे।

व्यास: तो, वह हर समय क्या कर रहे थे? और क्य उन्होने उन्त मै कोइ बात की?

आण्डाल दादी: जन्म के समय में धन्य होने के नाते, वह पूरे समय पेरुमल पर गेहरे ध्यान में थे। अंत में, यह मधुरकवि आऴ्वार का आगमन था, जिनहोने उन्से बुलवाया।

पराशर: मधुरकवि आऴ्वार कौन थे? उन्होंने क्या किया?

आण्डाल दादी: मधुरकवि आऴ्वार चैत्र मास चैत्र नक्षत्रम पर थिरूकोलुरु में पैदा हुए थे। वोह एक महान विद्वान और भगवान् श्रीमन्नारायण के भक्त थे |वोह नम्माऴ्वार से आयु मे बहुत बडे थे और वोह अयोध्या तीर्थ स्थान में थे |उनहोने पहले से ही मारन के जीवन के बारे में सुना था। उस समय, वोह दक्षिण की ओर से एक चमकती रोशनी देखते हैं और वोह उस प्रकाश का अनुसरण करते है जो अन्त में उनहे आऴ्वार थिरुनगिरी मंदिर जहां मारन रहते हैं, तक पहुंच जाते हैं ।

व्यास: क्या नम्माऴ्वार मधुरकवि आऴ्वार से बात करते हैं?

आण्डाल दादी: हाँ, उन्होंने किया। मधुरकवि आऴ्वार उनसे एक दिव्य बातचीत में संलग्न करते हैं और आख़िर बोलते हैं। अपनी महिमा को समझना, एक बार मधुरकवि आऴ्वार नम्माऴ्वार के शिष्य बन जाते है और सभी आवश्यक सिद्धांतों को सीखते हैं। वोह पूरी तरह से नम्माऴ्वार की सेवा करते हैं और अपने पूरे जीवन के लिए उसकी देखभाल करते हैं |

पराशर:वाह, बहुत अच्छा। इसलिए, ऐसा लगता है कि सच्चा ज्ञान सीखने की बात आती है तो उम्र कोई मानदंड नहीं है। यहाँ, भले ही मधुरकवि आऴ्वार नम्माऴ्वार से आयु में बडे थे, उन्होंने इन सिद्धांतों को नम्माऴ्वार से सीख लिया था।

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा अवलोकन पराशर | हाँ, किसी व्यक्ति से सीखने के लिए विनम्र होना चाहिए, भले ही उस व्यक्ति आयु की तुलना में युवा हो। |यह श्रीवैष्णव की सच्ची गुणवत्ता है और अच्छी तरह से मधुरकवि आऴ्वार द्वारा यहाँ प्रदर्शन किया गया है | कुछ साल बाद, 32 वर्ष की आयु में, नम्माऴ्वार परमपदम में जाने का फैसला करते हैं क्योंकि वह पेरुमल से अलग होने में असमर्थ थे | अपने चार प्रबन्धों में पेरूमल की महिमा गाते हुए, अर्थात् थिरूविरथथम, तिरुव अभिरियाम, पेरिया थिरुवन्त अदी और थिरूवमूझी, पेरुमल की कृपा से, वह वहां परमपदम को चले जाते हैं जहां वोह भगवान विष्णु को अनन्त कैंकर्य में लगे हुए हैं।

व्यास:दादी नम्माऴ्वार परम पदम में जाने के लिये बहुत छोटे थे |

आण्डाल दादी हाँ। लेकिन वोह हमेशा के लिए आनंदित होना चाहता था और पेरूमल उनहे नित्यलोक में रखना चाहते थे | तो, उन्होंने इस दुनिया को छोड़ दिया और श्री वैकुण्ठ पहुंच गए। मधुरकवि आऴ्वार ने नम्माऴ्वार के दिव्य अर्चा विग्रह की स्थापना की, जो नदी के पानी को उबालने पर प्राप्त किया गया था और इस दिव्य देसम में नम्माऴ्वार की उचित पूजा की व्यवस्था की थी। उन्होंने नम्माऴ्वार की पूर्ण प्रशंसा में “कन्निनुन चिरूथंबू” नामक एक प्रबंधम बनाया। उन्होंने हर जगह नम्माऴ्वार की महिमा भी फैल दी और पूरे क्षेत्र में नम्माऴ्वार की महानता की स्थापना की।

पराशर: इसलिए, यह मधुरकवि आऴ्वार की वजह से है, हम पूरी तरह से नम्माऴ्वार की महिमा समझते हैं।

आण्डाल दादी: हाँ। वह पूरी तरह से नम्माऴ्वार के लिए समर्पित थे और उन्होंने खुद को नम्माऴ्वार के समर्पण के कारण महिमा किया था। देखें, पेरुमल के भक्त पेरुमल की तुलना में अधिक महिमावान हैं। तो, पेरूमेल के भक्तों की महिमा को पेरूमेल की महिमा करने से बहुत अधिक माना जाता है। हमें जब भी संभव हो तो पेरूअल के भक्तों की सेवा करने की कोशिश करनी चाहिए।

व्यास और पराशर: निश्चित रूप से दादी मां, हम उस मन को रखेंगे और ऐसे अवसरों की आशा करेंगे।

आण्डाल दादी: इस के साथ हमने नम्माऴ्वार और मधुरकवि आऴ्वार के जीवन को देखा है।  आइए हम नम्माऴ्वार के मंदिर में जाकर उसकी पूजा करें।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 2

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आण्डाल दादी तिरुवेळ्ळरै मंदिरके दर्शन के लिए पराशर और व्यास को साथ में ले जाती हैं । वे श्री रंगम के राजगोपुर के बाहर एक बस में बैठे हैं ।

पराशर: दादी, जबकि हम बस में हैं, क्या आप हमें चौथे आऴ्वार के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी : ज़रूर, पराशर । मुझे हर्ष है कि आप यात्रा के दौरान आऴ्वार के दिव्य चरित्र के बारे में बात करना पसंद करते हैं।

पराशर और व्यास दादी के सामने मुस्कराए । बस श्री रंग से शुरू होता है ।

आण्डाल दादी : चतुर्थ (चौथे) आऴ्वार तिरूमऴिशै आऴ्वार है, जिन्हें प्यार से भक्तिसार कहा जाता था । आप श्री का प्रादुर्भाव थाई महीने के माघ नक्षत्र मे भार्गव मुनी और कणकांगी को चेन्नई के पास स्थित तिरूमऴिशै दिव्य क्षेत्र में हुआ । वह अकेले आऴ्वार थे जो इस दुनिया में सबसे लंबे समय तक जीवित रहे ।आप श्री लगभग ४७०० वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे ।

पराशर और व्यास (आश्चर्य में) : अपने जबड़े ड्रॉप कर पूछते हैं “४७०० साल “???

आण्डाल दादी : हाँ, पेयआऴ्वार से मिलने से पहले, उन्होने अलग-अलग धर्मों का अवलबन किया था ।

व्यास: ओह ! उनसे (पेयआऴ्वार से) मिलने के बाद क्या हुआ ?

आण्डाल दादी : पेयआऴ्वार ने उन्हें भगवान विष्णु के बारे में विस्तार से पढ़ाया और तिरूमऴिशै आऴ्वार को श्री वैष्णव संप्रदाय में वापस लाया.

बस छतरम बस स्टैंड पहुंच गया।

आण्डाल दादी : उनकी विशेष रुचि अन्तरयामी भगवान् (वह पेरुमाळ् जो हमारे अन्तरंग मे है) के प्रति थी और (उनका) कुंभकोणम के अारावमुदन् अर्चा स्वरूप के प्रति इतना अनुरक्त थे कि पेरुमाळ् ने उनका नाम आऴ्वार के नाम से बदल दिया और वह (दानों) अारावमुदन् आऴ्वार और तिरूमऴिशै पिरान् के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पराशर: वाह, दादी ऐसा लगता है कि वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे ।

आण्डाल दादी : हाँ, वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे थे । एक गांव में, जब वह यात्रा कर रहे थे, (उन्होने) उस गांव के मंदिर का दर्शन किया । पेरुमाळ् उनको बहुत प्यार करते थे, जिस दिशा में आऴ्वार चल रहे थे भगवान् विष्णु भी उस दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर दिये । इसी तरह, भागवत-प्रेमी (आऴ्वार-प्रेमी) अारावमुदन् भगवान् जो आऴ्वार के प्रति अनुरक्त थे (कि), आऴ्वार की विशेष प्रार्थना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर, भगवान् स्वशय्यावस्था से उठना शुरू कर दिए जब आऴ्वार के अलविदा होने की बात भगवान् ने सुनी ।

पराशर और व्यास (की आँखें विस्मय में बाहर आये) और पूछते हैं “फिर क्या हुआ दादी माँ?”

आण्डाल दादी : आऴ्वार चौंक गए और भगवान् विष्णु से अनुरोध किए कि वे स्वशय्यावस्था स्थिति में वापस आजाए । भगवान विष्णु दुविधा में थे और इसलिए वह अब भी अर्ध शयित स्थिति में है ।

व्यास: ओह दादी ! यह बहुत अच्छी है । एक दिन हमें भी (उन) भगवान् विष्णु के दर्शन के लिये जाना चाहिए ।

आण्डाल दादी : निश्चित रूप से, हम कुछ समय पर्यन्त वहां जायेंगे । वह लंबे समय तक वहाँ रहते है । वह अपने सभी कार्यों को कावेरी नदी में फेंककर केवल २ प्रबन्धों को प्रतिधारित करते है – तिरूच्छन्द-विरुत्तम् और नान्मुगन्-तिरुवन्दादि । उसके बाद वह अंततः परमपद वापस लौट आये और भगवान् विष्णु को परमपद में सनातन रूप से सेवा-संलग्न हुए ।

बस तिरुवेळ्ळरै तक पहुंचता है । वे मंदिर में प्रवेश करते हैं और माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दर्शन करते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – मुदल् आऴ्वार – भाग 2

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 1

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आण्डाल दादी: व्यास और पराशर मुदल् आऴ्वार सन्निधि से बाहर निकलते हैं ।

पराशर: दादी, मुदल् आऴ्वार को देखकर अच्छा लगा । दादी क्या ये 3 आऴ्वार सदैव एक साथ रहते हैं?

आण्डाल दादी: यह अच्छा सवाल है । उनका एक साथ रहने का एक कारण है । मुझे कृपया समझाने दो । एक दिन भगवान की दिव्य योजना से, वे तिरुक्कोवलूर में एक के बाद एक पहुंचे। प्रचण्ड वायु का वह दिन था । उस दिन भारी वर्षा भी हुई थी । वहां एक ऋषि थे, जिनका नाम मृकर्ण्डु था, जिनका तिरुक्कोवलूर में एक आश्रम था । अपने आश्रम के सामने, एक छोटा सा शाला था । पहले पोईगै आऴ्वार शाला में पहुंचे और वर्षा से स्वयं को बचाने के लिए शाला में शरण लिए । थोड़ी देर के लिए पोईगै आऴ्वार शाला में लेटकर शयन किए ।

पराशर: केवल अकेले? उनको डर नहीं लगा?

आण्डाल दादी: नहीं पराशर । वह निर्भय है क्योंकि वह हमेशा प्रभु का चिन्तन करते हैं । उस समय, भूतद् आऴ्वार वर्षा में वहां पहुंचते हैं और शाला में प्रवेश करने की अनुमति का अनुरोध करते हैं । पोईगै आऴ्वार कहते है कि, “यहां सीमित स्थान है एक व्यक्ति शयन कर सकता है लेकिन दो व्यक्ति बैठ सकते हैं । कृपया पधारें । ” भूतद् आऴ्वार खुशी से प्रवेश करते है और वे दोनों अगल-बगल मे बैठते हैं । तत्पश्चात, वर्षा में भागते हुए पेयाऴ्वार, आश्रय इच्छुक, शाला में प्रवेश करने की अनुमति मांगते है । पोईगै आऴ्वार कहते हैं, “ठीक है, यहां सीमित स्थान है। एक व्यक्ति नीचे लेट सकता है, दो व्यक्ति बैठ सकते हैं और तीन व्यक्ति खड़े हो सकते हैं । कृपया पधारें । हम सभी खड़े हो सकते हैं । ” यह सुनते ही पेय-आऴ्वार, खुशी से शाला में प्रवेश करते है और वे सभी वर्षा के ठंडक में कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं । वे एक-दूसरे से बात करना शुरू करते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानते हैं और सार्वजनिक हित के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न होते हैं, वे भगवान् के सुंदर नाम, रूप, गुण, आदि के बारे में चर्चा करना प्रारम्भ करते हैं।

व्यास: वाह! यह बहुत अच्छा है। वास्तव में ईश्वरीय है । लेकिन दादी, यह और अच्छा होता, अगर भगवान् भी वहां उपस्थित होते, ठीक उसी तरह, जैसे ही वह हमें देखने के लिए यहां परिय पेरुमाळ् के रूप में है ।

आण्डाल दादी: रुको, घटना यहाँ समाप्त नहीं होती है । आपने अगले अनुक्रम को बहुत अच्छी तरह से अनुमान लगाया है । इस घटना क्रम में अधिक देवत्व है, अपने प्रिय भक्तों की सभा को देखकर, अब पेरूमाळ् भी इस का हिस्सा बनना चाहते है । पेरुमाळ् भी शाला में प्रवेश कर स्वयं को विवश करते है । अंधेरे होने और अचानक आश्रय शाला मे स्वयं को क्षेत्राभाव मे विवश मानकर, तीन आऴ्वार सोचते हैं – क्या हो रहा है यहाँ और किसने उनके ज्ञान के बिना शाला में प्रवेश किया । पहले पोईगै आऴ्वार “वय्यम् तगलिया” पासुर का गान शुरू करते हैं – जगत् को दीपक के रूप में देखते हैं । उसके बाद, फिर, भूतद् आऴ्वार “अन्बे तगलिया” गाते है – उनका प्रेम को ही एक दीपक के रूप में कल्पना करते है । इन दीपकों के प्रकाश से, शाला ज्योतिर्मय होता है, और पेय-आऴ्वार पहले श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य रूप को शाला के बीच में देखते है । वह “तिरुकण्डेन्” पासुरगान प्रारम्भ करते है … (श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ मुझे श्रीमन्नारायण, उनके दिव्य / सुंदर स्वर्ण रूप, उनका दिव्य शंख और चक्र) का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ है । सभी आऴ्वार एक साथ भगवान् और श्रीमहालक्ष्मी की दिव्य दृष्टि का आनंद लेते हैं ।

पराशर: यह इतना महान है, अवश्य उनको अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ होगा ।

आण्डाल दादी: हां – वे बहुत खुश थे । श्रीभगवान् और श्रीलक्ष्मीजी भी बहुत खुश थे। इस अद्भुत घटना के बाद, उन्होंने एक साथ दिव्य अर्चा विग्रह वाले अन्य मंदिरों का दिव्य दर्शन किया । वह शेषकालपर्यन्त तक एक साथ रहे और अंततः परमपद पधारे ताकि प्रभु का सान्निध्य प्राप्त करें और उनकी सेवा करें ।

व्यास और पराशर: यह वृत्तांत सुनने के लिए बहुत अद्भुत  है । क्या हम अगले आऴ्वारोें के जीवन के बारे में अब सुनेंगे?

आण्डाल दादी: आपको उसके लिए अगली बार तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।  मैं अब जाकर कुछ भगवान के लिए खाना बनाती हूं, जो हम आज रात को खा सकते हैं । अब आपके खेलने का समय है अतः अब आप बाहर मज़ा कर सकते हैं ।

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी, हम कल आपसे और अधिक सुनने के लिए वापस आएँगे।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – मुदल् आऴ्वार – भाग 1

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आऴ्वारों का परिचय

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर को श्रीरंगम मंदिर में मुदल् आऴ्वार सन्निधि में लेने जाने के लिए योजना बना रही है ताकि उन्हें मुदल् आऴ्वारों की महिमा समझा सकें ।

पोइगै आऴ्वार – सारयोगी

भूतदाऴ्वार – भूतयोगी

महदाह्वययोगी

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर ! आज हम श्रीरंगम मंदिर में मुदल् आऴ्वार सन्निधि जाएंगे ।

व्यास और पराशर: दादी, उत्तम । आइये अब चलें ।

आण्डाल दादी: मैं आपको उनके बारे में थोड़ा सा बताना चाहती हूँ जब हम उनके सन्निधि की तरफ चलेंगे । मुदल् का मतलब पहले (प्रथम) । हम पहले से ही आऴ्वार के अर्थ को जानते हैं – जो भक्ति भाव में परिपूर्णतया निमग्न हैं । इसलिए, १२ आऴ्वारों में मुदल् आऴ्वार सबसे पहले हैं ।

व्यास:दादी, मुदल् आऴ्वार में बहुवचन का प्रयोग क्यों है ? क्या एक से अधिक “प्रथम” अाऴ्वार हैं ?

आण्डाल दादी: हा! हा! बहुत अच्छा सवाल । हां, आऴ्वारों मे, पहले ३ आऴ्वार हमेशा एक साथ उद्धृत होते हैं ।

पराशर: दादी क्यों ? क्या वे पांच पांडवों की तरह हमेशा एक साथ थे ?

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा उदाहरण पराशर । हां – हालांकि पहले ३ आऴ्वारों का जन्म तीन अलग-अलग स्थानों पर हुआ था, लेकिन एक दिव्य घटना के माध्यम से, वे एक साथ आए और तिरुक्कोवलूर दिव्य देश में मिले और श्रीमन्नारायण की पूजा एक साथ मिलकर किये । उस घटना के बाद, ये आम तौर पर एक साथ उद्धृत होते हैं ।

व्यास: वह दिव्य घटना क्या थी दादी ? मैं इसके बारे में जानने के लिए उत्सुक हूं ।

आण्डाल दादी: निश्चित रूप से, मैं आपको उस घटना के बारे में बताऊंगी लेकिन इससे पहले, हम ३ आऴ्वार के बारे में थोड़ा सा समझते हैं । पहले आऴ्वार का नाम पोइगै आऴ्वार – सारयोगी है । दूसरे आऴ्वार – भूतदाऴ्वार – भूतयोगी है । तीसरे आऴ्वार – महदाह्वययोगी है ।

पराशर: कब और कहाँ दादा माँ पैदा हुए थे?

आण्डाल दादी: तीनों आऴ्वार पिछले युग में पैदा हुए थे – द्वापर युग (जब )। वह सभी सरोवर के फूलों से प्रकट हुए । पोइगै आऴ्वार – सारयोगीअश्वयुज मास के श्रवण नक्षत्र में कांञ्चीपुर में तिरुवेक्का दिव्यदेश के एक तालाब में प्रकट हुए थे ।भूतदाऴ्वार – भूतयोगी का प्राकट्य अश्वयुज मास के धनिष्ट नक्षत्र मे तिरुक्कडल्मल्लै दिव्यदेश में एक तालाब में हुआ था – अब आप इस जगह को महाबलीपुरम के नाम से जानते हैं । पेयाऴ्वार का प्राकट्य अश्वयुज मास के शतभिषक नक्षत्र मे तिरुमयिलै दिव्यदेश में एक कुएं में हुआ था – अब आप इस जगह को मयलापोर (mylapore) के नाम से जानते हैं।

व्यास: वाह ! फूलों से इनका प्रादुर्भाव हुआ था, (तो) क्या उनके माता-पिता नहीं हैं?

आण्डाल दादी: हां, वे अपने जन्म के दौरान भगवान् द्वारा आशीर्वाद पाये थे अत: उन्होंने पूरी तरह से श्रीदेवी और पेरूमाळ को माता-पिता के रूप में माना ।

पराशर: ओह, यह जानना बहुत अच्छा है । तो, वह तीनों कैसे मिले थे और वह दैवी-घटना क्या थी ?

आण्डाल दादी: ठीक है, वे व्यक्तिगत रूप से विभिन्न क्षेत्रों के लिए यात्रा कर रहे थे और कई स्थानों पर भगवान् की पूजा करते थे। यह उनका जीवन था – सिर्फ मंदिर जाना, पेरुमाळ की पूजा करें और कुछ दिनों तक वहां रहें और फिर अगले क्षेत्र की ओर जाएं।

व्यास: यह बहुत अच्छा लगता है – किसी और चीज की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। दादी ! काश हम भी इस प्रकार कर सकते ।

आण्डाल दादी: हाँ । देखो हम मुदलाऴ्वार सन्निधि में आए हैं । आओ हम अंदर चलकर उनका भव्य दर्शन करें । उनके शेष जीवन की चर्चा वापसी मे जारी रहेगा ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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बालपाठ – आऴ्वार स्वामीजी का परिचय

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्रीमन्नारायण की दिव्य कृपा

आण्डाल दादी: हे व्यास और पराशर ! मैं काट्टऴगियसिंग पेरुमाळ सन्निधि (भगवान् नरसिंह के लिए एक अलग मंदिर) में जा रही हूं। क्या तुम दोनों मेरे साथ आना चाहते हो ?

व्यास: ज़रूर दादी, हम आपके साथ जुड़ेंगे । पिछली बार जब आप हमें आऴ्वारों के बारे में बता रही थी । क्या आप हमें उनके बारे में अभी बता सकते हैं?

आण्डाल दादी: जो आपने पूछा है, वह अच्छा है, मैं आप दोनों को उनके बारे में अभी बताऊंगी।

सभी काट्टऴगियसिंग पेरुमाळ सन्निधि की ओर चलना शुरू कर दिए ।

आण्डाल दादी: कुल १२ (बारह) आऴ्वार हैं । उनके सभी गीतों का संग्रह अब ‘चार हजा़र दिव्य-प्रबन्ध’ के नाम से जाना जाता है ।

दरअसल, अमलनादिपिरान्प्रबन्ध, जो मैंने कल पढ़ा था, वह चतुस्सहस्त्र दिव्य-प्रबन्ध संग्रह का एक हिस्सा है।

पराशर: ओह ! दादी, वो १२ (बारह) आऴ्वार कौन हैं ?

आण्डाल दादी: श्रीसारयोगी स्वामीजी, श्रीभूतयोगी स्वामीजी , श्रीमहदाह्वययोगी स्वामीजी, श्रीभक्तिसार स्वामीजी, मधुरकवि-आऴ्वार स्वामीजी, श्रीशठकोप स्वामीजी, कुळशेखराऴ्वार स्वामीजी, श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी, आण्डाळ देवी, श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामीजी, योगिवाहन स्वामीजी, परकाल स्वामीजी — यह १२ आऴ्वार है ।

व्यास: अति उत्तम, दादी तो क्या यह वे १२ आऴ्वार स्वामीजी हैं जिन्हें श्रीमन्नारायण की महान दया प्राप्त थी?

आण्डाल दादी: हाँ, व्यास । वे भगवान् की अहैतुक कृपा के पात्र थे । भगवान् की अहैतुक कृपा को प्राप्त करने के बाद, इस दुनिया के अन्य लोगों के प्रति सत्भावना से, हजारों साल पहले, उन्होंने भगवान श्रीमन्नारायण की दया को उनके भजन-गीतों (पासुरों) के माध्यम से हम सभी को प्रदान किए । उनके इन्हीं स्तोत्रों के माध्यम से है हम भगवान् के बारे में समझ रहे हैं और पेरूमाळ की महिमा का आनंद ले रहे हैं ।

पराशर: ओह! दादी, मैंने सोचा था कि हम भगवान् को वेद के माध्यम से समझते हैं।

आण्डाल दादी: हाँ। निश्चित रूप से । लेकिन वेद बहुत बड़े है । कई जटिल मामले हैं जिन्हें संस्कृत भाषा के माध्यम से वेद में समझाया गया है, जो गहन अध्ययन के बिना समझना मुश्किल है । लेकिन, आऴ्वारों ने, वेद सार को,सरल तमिल भाषा के इन ४००० पासुरों में प्रस्तुत किया है । और जैसा कि आप अच्छी तरह जानते हैं, वेद सार श्रीमन्नारायण की महिमागान करना है । इससे भी अधिक, आऴ्वार स्वामीजी ने अपने स्वयं के प्रयासों के बजाय भगवान् के प्रत्यक्ष अनुग्रह से स्वज्ञान प्राप्त किया – अत: यह अत्यधिक विशेष है ।

व्यास: हां, हम इसे अब समझते हैं। आऴ्वार भगवान् के बारे में बहुत सरल और ध्यान केंद्रित तरीके से समझा रहे थे । जैसे आप इन विषयों को अब हमे समझा रही हैं ।

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा व्यास – यह बहुत अच्छा उदाहरण है। अब, आपको याद है, पहले हमने चर्चा की थी कि श्रीमन्नारायण ५ विभिन्न रूपों में विद्यमान हैं – परमपद में पररूप (श्री वैकुण्ठ में भगवान का रूप), व्यूहरूप (भगवान विष्णु क्षीरसागर के रूप में), विभेद/विभाव रूप (राम, कृष्ण, मत्स्य आदि के रूप में अवतार), सर्वज्ञ (भगवान ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में निवास करते है) और मंदिरों में दिव्य मंगल विग्रह (अर्चाविग्रह) के रूप में विद्यमान हैं । विभिन्न आऴ्वारों को पेरुमाळ के विभिन्न रूपों के प्रति लगाव था।

पराशर: ओह – ठीक जैसे हम श्रीरंगनाथ को इतना पसंद करते हैं, क्या प्रत्येक आऴ्वार के अपना इष्ट भगवान् थे?

आण्डाल दादी: हाँ। मुदल् आऴ्वार (पहले ३ आऴ्वार – श्रीसारयोगी स्वामीजीश्रीभूतयोगी स्वामीजी ,श्रीमहदाह्वययोगी स्वामीजी ) प्रभु की सर्वोच्चता से बहुत जुड़े थे – जैसा परमपद में देखा गया । श्रीभक्तिसार स्वामीजी को सर्वव्यापी भगवान् के प्रति महान लगाव था — भगवान् हम सभी के हृदय के अंदर विद्यमान हैं । श्रीशठकोप स्वामीजी), श्रीविष्णुचित्त स्वामीजी और श्रीआण्डाळ देवी का भगवान् कृष्ण के प्रति अत्यधिक लगाव था । कुळशेखराऴ्वार स्वामीजी का भगवान श्री राम की ओर बढ़िया लगाव था ।श्रीभक्ताङ्घ्रिरेणु स्वामीजी  औरयोगिवाहन स्वामीजी का भगवान श्रीरंगराज (श्री रंगम के राजा) के प्रति महान लगाव था ।परकाल स्वामीजी भगवान् के समस्त दिव्य मंगल विग्रह (अर्चाविग्रह) के प्रति बहुत बड़ा लगाव था ।

व्यास और पराशर: दादाजी आपने मधुरकवि-आऴ्वार स्वामीजी को छोड़ दिया है ।

आण्डाल दादी: हां – बहुत अच्छा अवलोकन है । मधुरकवि-आऴ्वार स्वामीजी पूरी तरह श्रीशठकोप स्वामीजी के प्रति समर्पित थे ।

आण्डाल दादी पेरूमाळ के लिए कुछ फूल खरीदने के लिए एक फूल विक्रेता की दुकान पर रुक जाती है ।

दादी: पराशर, क्या आप अब हमें प्रत्येक आऴ्वार के बारे में बता सकते हैं ।

आण्डाल दादी: निश्चित रूप से । लेकिन अब हम मंदिर में पहुंचे हैं । निश्चित रूप से। हम अंदर जाकर भगवान के दर्शन करेंगे और उस प्रभु की महिमा गाएंगे । अगली बार, मैं विस्तार से प्रत्येक आऴ्वार के बारे में विस्तार मे समझाऊंगी ।

व्यास और पराशर: दादी ! ठीक है ।  आइए हम चलें – हम भगवान् नरसिंह को देखने के लिए और अधिक प्रतीक्षा नहीं कर सकते ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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