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श्रीवैष्णव – बालपाठ – अष्ट दिक गज शिष्यगण एवं अन्य

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

दादी : स्वागत बच्चो , आशा करती हुई की आप सबको पिछले समय की चर्चा याद होगी |

बच्चे (एक साथ ) : नमस्ते दादी जी, हमें सब याद है , और हम जहाँ आपसे अष्ट दिक गज शिष्यगण के बारे में जानना चाहते है |

दादी : अच्छा लगा, चलिए हम सब चर्चा शुरू करते है |

पराशर : दादी, अष्ट दिक गज का मतलब शिष्यगण| दादी, क्या में ठीक कह रही हूँ ?

दादी : पराशर, आप ठीक कह रहे हो | मणवाळ मामुनि स्वामीजी के अष्ट दिक गज 8 प्राथमिक शिष्य थे | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि), कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्, पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर्, एऱुम्बि अप्पा, अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार्, अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर् | मणवाळ मामुनि (के समय / उनके बाद) जो महा श्रीवैष्णवाचार्य हुए है, उनके बाद हमारे संप्रदाय की वृद्धि में सबसे प्रभावशाली थे।

चलिए हम आगे बढ़ते हुए श्री पोन्नडिक्काल जीयर के जीवन की चर्चा करेंगे जो अपने आचार्य मनवाल मामुनिगल के प्राण सुकृत थे।

दादी : पोन्नडिक्काल जीयर वानमामलै मे पैदा हुए और बचपन मे उनके माता–पिता ने उनका नाम अळगिय वरदर रखा ।

पराशर : दादी जी , उनको पोन्नडिक्काल जीयर क्यों कहा जाता था |

दादी : पोन्नडिक्काल  का मतलब है वो जिसने ममुनिगल के शिष्य सम्पत की स्थापना की हो| | कहते हैं कि पोन्नडिक्काल जीयर के उत्कृष्ठ स्वभाव से सारे आचार्य उन्हें मणवाळमामुनि का उपागम (पुरुषाकार) समझते हैं और उन्ही के उपागम्यता से वे सारे, मणवाळमामुनि को पहुँच पाते थे । 

मामुनिगळ स्वामीजी ने अष्ट दिक गज शिष्यगण के लिए पोन्नडिक्काल जीयर स्वामीजी को चुना | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर जी को आदेश दिया की दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) श्री मणवाळमामुनि को श्री सेनैमुदलियार के द्वारा एक संदेश भेजते हैं जिसमे कहते हैं कि वानामामलै दिव्यदेश मे पोन्नडिक्काल जीयर की सेवा ज़रूरत है । उसके अनन्तर मणवाळमामुनि उन्हें आदेश देते हैं कि वे तुरन्त वानमामलै जाए और वहाँ अपना कैंकर्य करें ।

व्यास : दादी , पोन्नडिक्कालजीयर स्वामीजी दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) जी के ससुर थे , क्या में सही कह रहा हूँ ?

दादी : हाँ व्यास , बिलकुल सही | पोन्नडिक्काल जीयर उस समय वानमामलै मे श्रीवरमंगैनाचियार का उत्सव विग्रह नही था और उसी से परेशान थे पोन्नडिक्काल जीयर । एक बार भगवान (दैवनायकन) उनके स्वप्न मे आकर कहते हैं कि वे तिरुमलै से नाचियार का उत्सव विग्रह लाना चाहिए। भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु वे तिरुमलै जाते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें स्वप्न मे श्री नाचियार कहती है कि उन्हें वानमामलै तुरन्त ले जाए और उन्की शादी दैवपेरुमाळ से करवाई जाए । पोन्नडिक्काल जीयर नाचियार के पिता स्वरूप बनकर उन्का कन्यादान दैवनायकन पेरुमाळ भगवान को करते हैं। दैवनायनक पेरुमाल कहते हैं कि जैसे भगवान् पेरियपेरुमाळ के ससुरजी पेरिआळ्वार हुए वैसे ही पोन्नडिक्काल जीयर उनके ससुरजी हुए |

शिष्यों को कई सालों तक अपने महत्वपूर्ण निर्देशों की सूचना व्यक्त करने के पश्चात वह अपने आचार्य का ध्यान करते हुए अपने शरीर (चरम तिरुमेणि) का त्याग करते हैं और इस प्रकार उनको परमपदम की प्राप्ति होती है । वह अपने अगले उत्तराधिकारि (अगले जीयर वानमामलै मठ) को नियुक्त करते हैं और यह आचार्य परंपरा आज भी ज़ारी है ।

चलिये अब हम श्री पोन्नडिक्कालजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों में उनके जैसा आसक्ति, हमारे वर्तमानाऽचार्य पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) में हो ।

दादी : हमारी अगली चर्चा कोयिल अण्णन स्वामीजी के बारे में होगी | वह अष्टदिग्गज शिष्यों में सबसे प्रिय शिष्ये थे | कोइल अण्णन के जीवन में एक दिलचस्प घटना घटी, जो उन्हें मामुनिगल की शरण में ले गई।

पराशर : दादी, वह क्या घटना थी ??

दादी : आपकी जिज्ञासा प्रशंसनीय है पराशर | मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के महान पारिवारिक वंश में जन्मे, वह मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का आश्रय नहीं लेना चाहते थे। एक घटना ने उन्हें वापस मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के चरण कमलो के संपर्क में आये । | आप सभी श्री रामानुज स्वामीजी को जानते है जिन्होंने कोयिल अण्णन जी को मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का शिष्य बनने का आदेश दिया | श्री रामानुज स्वामीजी ने कोयिल अण्णन का मार्गदर्शन किया और उनको आदेश दिया की आप अपना मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के साथ सम्बन्ध का सही इस्तेमाल करे |

एम्पेरुमानार जी ने कहा “मैं आदि शेष हूँ और पुनः मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के रूप में अवतार लिया है | आप और आपके रिश्तेदार मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य बने और अपना उत्थान करें ”। बच्चों, पूरी घटना उनके सपने में हुई थी। स्वप्न टूटता है और स्वप्न से जागते है और पूरी तरह से हैरान हो जाते है । वह अपने भाइयों को बड़ी भावनाओं के साथ घटनाओं के बारे में व्याख्या करते है।

अण्णन स्वामीजी कन्दाडै वंश के आचार्यो के साथ मामुनिगळ स्वामीजी के मठ में प्रवेश करते है | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर स्वामी जी को सभी के लिए पंच संस्कार करने के लिए आवश्यक पहलुओं को तैयार करने का निर्देश दिया।

इसीलिए बच्चो , इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

आगे मैं मोर मुन्नार अय्यर (पत्तन्गि परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर) के बारे में बताऊंगा। वह मामुनिगल के अष्टदिग्गज शिष्यों में से एक थे । वह सदैव मामुनिगळ स्वामीजी के साथ अलग हुए बिना ही उनके साथ रहे, जैसे गोविंदाचार्य स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के साथ रहते थे ।

वेदवल्ली : दादी जी , उनको मोर मुन्नार अय्यर के नाम से क्यों जाना जाता था ?

दादी : बहुत सही लगता है | प्रतिदिन, उन्होंने मामुनिगल के शेष प्रसाद को (बचा हुआ ) को ग्रहण करते थे । अपने पुर्वाश्रम में 30 साल, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद ही ग्रहण किया। वे “मोर मुन्नार अय्यर” (अत्यंत सम्मानीय जिन्होंने पहले दद्ध्योदन ग्रहण किया) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक भोजन में पहले दाल-चावल, सब्जियां आदि पाई जाती है। अंत में दद्ध्योदन के साथ समाप्त किया जाता है। पट्टरपिरान् जीयर, प्रसाद उसी केले के पत्तल पर पाते थे, जिसमें श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने प्रसाद ग्रहण किया था। श्री वरवरमुनि स्वामीजी दद्ध्योदन के साथ प्रसाद समाप्त करते थे और क्यूंकि गोविन्द दासरप्पन स्वाद को बदले बिना ही प्रसाद पाना चाहते थे (दद्ध्योदन से दाल तक), वे प्रतिदिन दद्ध्योदन से प्रारंभ करते थे। इस प्रकार वे “मोर मुन्नार अय्यर” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने मामुनिगल स्वामीजी से शास्त्रों के सभी सार को सीखा और सतत उनकी सेवा की। पेरिय जीयर (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) अपने दिव्य चरण कमल अण्णराय चक्रवर्ती के मस्तक पर रखते हैं और उन पर कृपा करते हैं। वे तिरुमला में अण्णराय चक्रवर्ती के कैंकर्य की प्रशंसा करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर से अण्णराय चक्रवर्ती को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने के लिए कहते हैं। श्री वरवरमुनि स्वामीजी कहते हैं जैसे “रामस्य दक्षिणो बाहू:” (लक्ष्मणजी श्रीरामजी के दायें हाथ थे), पट्टरपिरान् जीयर भी मेरे दाहिने हाथ हैं– इसलिए, वे ही आपकी पञ्च संस्कार विधि पूर्ण करके, आपको अपने शिष्य रूप में स्वीकार करके, आपको हमारे संप्रदाय में स्थापित करेंगे। अण्णराय चक्रवर्ती प्रसन्नता से आभार प्रकट करते हैं और पट्टरपिरान् जीयर को अपने आचार्य रूप में स्वीकार करते हैं।

दादी : बच्चो , अब हम आपको एरुम्बी अप्पा स्वामीजी के बारे में बताएँगे | एरुम्बी अप्पा, श्री वरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक हैं (आठ प्रमुख शिष्य जिन्हें संप्रदाय के संरक्षण के लिए स्थापित किया)। उनका वास्तविक नाम देवराजन है | अपने गाँव में रहते हुए और धर्मानुसार कार्य करते हुए, एक बार एरुम्बी अप्पा ने श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारे में सुना और उनके प्रति आकर्षित हुए। श्री वरवरमुनि स्वामीजी के समय को हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा नल्लदिक्काल (सुनहरा समय) कहा जाता है। एरुम्बी अप्पा ने कुछ समय के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहकर, सभी रहस्य ग्रंथों कि शिक्षा प्राप्त की और फिर अपने पैतृक गाँव लौटकर, वहां अपना कैंकर्य जारी रखा।

वे सदा अपने आचार्य का ध्यान किया करते थे और पूर्व और उत्तर दिनचर्या का संकलन कर (जिनमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों का चित्रण किया गया था) एक श्रीवैष्णव द्वारा उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को समर्पित किया। एरुम्बी अप्पा की निष्ठा देखकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी बहुत प्रशंसा की। वे एरुम्बी अप्पा को उनसे भेंट करने के लिए आमंत्रित करते हैं। एरुम्बी अप्पा कुछ समय अपने आचार्य के साथ रहते हैं और फिर नम्पेरुमाल के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के भागवत विषय कालक्षेप में भाग लेते हैं। तद्पश्चाद वे पुनः अपने गाँव लौट जाते हैं।

व्यास : दादीजी, जैसे पट्टर्पिरान जीयर, पोन्नडिक्काल जीयर, एरुम्बी अप्पा स्वामीजी भी अपने आचार्य के प्रति बहुत संलग्न थे | क्या यह ऐसा नहीं था दादी जी ?

दादी : सही व्यास | एरुम्बी अप्पा की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय”। यह एरुम्बी अप्पा और उनके शिष्यों जैसे सेनापति आलवान आदि के बीच हुए वार्तालाप का संकलन है।

वेदवल्ली : दादी जी , “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” क्या है ?

दादी : इस सुंदर ग्रंथ में एरुम्बी अप्पा, अत्यंत दक्षता से आलवार/ आचार्यों की श्रीसूक्तियों के मिथ्याबोध से उत्पन्न होने वाले संदेह को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों के आधार पर संसार में वैराग्य विकसित करने और पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति अनुराग का महत्व बताया और हमारे द्वारा उसे जीवन में अपनाने के लिए जोर दिया है (उसके बिना यह मात्र सैद्धांतिक ज्ञान होता)।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चाद, अण्णा ने तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की सेवा के लिए तिरुमला प्रस्थान किया। अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) का वैभव सुनने के बाद अण्णा स्वामीजी ने निर्णय लिया की वह माणवळ मामुनिगळ स्वामीजी के शिष्या बनने का फैसला किया | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने के लिए सकुटुंब श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते हैं। वह श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मठ में जाते है | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कालक्षेप कर रहे होते है और अण्णा स्वामीजी ने कालक्षेप सुना और उन्होंने शास्त्रों के विभिन्न क्षेत्रों में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वैभव जाना | उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण ली और उनके शिष्य बन गए |

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कांचीपुरम, चोलसिंहपुरम, एरुम्बी आदि के जरिए तिरुमला की यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। अण्णा भी यात्रा में उनके साथ ही जाते हैं। तिरुमला में तिरुवेंकटमुडैयाँ के लिए सुप्रभात के अभाव को देखते हुए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा को भगवान के लिए सुप्रभात की रचना करने का निर्देश देते हैं। अण्णा, कृतज्ञता से अपने आचार्य के दिव्य विग्रह का ध्यान करते हुए, श्री वेंकटेश सुप्रभातम, स्तोत्रं, प्रपत्ति और मंगल श्लोकों की रचना करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा की रचनाओं से बहुत प्रसन्न होते हैं और तिरुमला में भगवान की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उनका पाठ करने का निर्देश देते हैं।

दादी : बच्चो, हमारी अंतिम चर्चा अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार् स्वामीजी के बारे में होगी | उनके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। वे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के प्रिय शिष्य थे और अष्ट दिग्गज में से एक थे । वे दोनों महान विद्धवान थे जिन्होंने भारत के उत्तरी भाग में कई विद्वानों को जीत लिया |

यद्यपि उन्होंने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के बारे में सुना, लेकिन उनके मन में उनके प्रति बहुत लगाव नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की महिमा के बारे में पता चला और यहां तक कि सुना कि कई महान हस्तियों जैसे कि कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, एऱुम्बि अप्पा ने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की शरण ली ।

वेदवल्ली : दादी जी, वे कैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) शिष्य बने ?

दादी : हाँ वेदवल्ली, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने ही एरुम्बि अप्पा जी को सूचित किया था आप आचार्य सम्बन्ध के लिए तैयार है | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि) जी ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहा की एरुम्बी अप्पा जी के साथ चर्चा करके वह धन्य है और एरुम्बी अप्पा जी आपका शिष्य बनने के लिए सभी योग्यताएं हैं | वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। उन दोनों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से पूछा की आप हमें शिष्य रूप में स्वीकार करे और हमें आशीर्वाद प्रदान करें | इस तरह श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अप्पिळ्ळै एवं अप्पिळ्ळार् जी का पञ्च संस्कार संपन्न किये |

अप्पिळ्ळार को जीयर मठ के दैनिक गतिविधियों जैसे तदियाराधन आदि के देखरेख का उत्तरदायित्व दिया गया था। जैसे किदम्बी अच्चान ने श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के लिए मठ की देखरेख का उत्तरदायित्व लिया था, अप्पिळ्ळार ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर अप्पिळ्ळै तिरुवंतादी पर व्याख्यान की रचना करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को उनके बहुत से दिव्य प्रबंध सम्बंधित कैंकर्य में सहायता करते हैं।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अप्पिळ्ळार और जीयर नारायण (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पुर्वाश्रम से उनके पौत्र) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे उनकी दैनिक आराधना के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अर्चा विग्रह प्रदान करने की कृपा करे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें एक सोम्बू (पात्र) प्रदान करते हैं जो वे नित्य उपयोग किया करते थे और उन्होंने उसके उपयोग से दो विग्रहों का निर्माण किया और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का एक-एक विग्रह अपने दैनिक पूजा के लिए रख लिया।

हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

बच्चो अब तक हमने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और उनके अष्ट दिग्गज शिष्यों के वैभव के बारे में चर्चा की |

पराशर : दादीजी हमने आज बहुत कुछ सीखा |

दादी : प्रिय बच्चो, अब में आपको कुछ महत्वपूर्ण बताने जा रही हूँ, उसे ध्यान से सुने |

मामुनिगल स्वामीजी के बाद, कई महान आचार्य हर शहर और गांव में भक्तों को आशीर्वाद देते रहे। आचार्यगण सभी दिव्या देशों, अभिमान स्थलों, अलवार / आचार्य अवतार स्थलों और दूसरे क्षेत्रो में निवास किये और सभी वैष्णव जन के साथ ज्ञान साझा किया और सभी में भक्ति का पोषण किया।

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार एवं श्रीपेरुम्बुदुर के पहले एम्बार जीयर हाल के अतीत (200 साल पहले) से थे और हमारे संप्रदाय के लिए उनके गहन अनुदानों और कैंकर्यो के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जो भी ज्ञान मैंने आपके साथ साझा किया है, वह आचार्यों परम्परा के माध्यम से आया है। हमें हमेशा उनका कृतज्ञ रहना होगा। आशा है कि आप सभी का समय अच्छा होगा। हमारे मन, इंद्रियों और शरीर और ऐसे आचार्यों, आळ्वार और एम्पेरुमान के लिए कैंकर्य में लगे रहना चाहिए।

ठीक है, अब अंधेरा हो गया है। आइए हम आचार्यों के बारे में सोचते हैं और आज अपना सत्र पूरा करते हैं।

बच्चे : धन्यवाद दादीजी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

आण्डाल दादी जी रसोई घर में खाना बनाने में व्यस्त थी जब बच्चे उनके घर में प्रवेश किये ताकि सब बच्चे लोकाचार्य स्वामीजी के शिष्यों के बारे में जान सके | आण्डाल दादी जी सभी बच्चो का मुस्कुराकर स्वागत करती है | दादीजी इस प्रतीक्षा में थी की श्रीरंगनाथ भगवान जी का प्रसाद बच्चो में वितरित कर सके |

दादी : आओ बच्चो | भगवान रंगनाथ जी का प्रसाद ग्रहण करे | आशा करती हूँ की आपको पूर्ववर्ती वाली चर्चा होगी |

व्यास : दादीजी , हमने कूर कुलोत्तम दासर्, विळान् चोलै पिल्लै, जी के बारे में सीखा और आचार्य अभिमानमे उठ्ठारगम के बारे में भी सीखा |

दादी : बहुत गर्व हुआ तुम पर बच्चो, आज में तुम्हें आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के एक शिष्य के बारे में बतायूंगी जिनका नाम तिरुमलै आऴ्वार था |

अतुलहाय : दादी, मैंने सुना है कि तिरुमलै आऴ्वार जी को नाम आऴ्वार रचित तिरुवाय्मोऴि के प्रति लगाव के कारण मिला। क्या मैं सही हूं!

दादी : आप बिलकुल सही कह रही हो अतुलहाय | वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए । तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया ।

व्यास : ओह ! दादी जी फिर तिरुमलै आऴ्वार को संप्रदाय में वापिस को लेकर आये ?

दादी : बच्चो, में आपकी जिज्ञासा की प्रशंसा करती हूँ | पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

वेदवल्ली : दादी जी, कूरकुलोत्त्मदास जी ने तिरुमलै आऴ्वार को सुधारने के लिए क्या किया ? क्या आप हमें बता सकती है ?

दादी : हाँ ! एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये ।

पराशर : दादी जी हमें बताएं तिरुमलै आऴ्वार जी ने कूरकुलोत्त्मदास से कैसे सीखा ?

दादी : तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है, कूरकुलोत्तमदास जी ने देखा की तिरुमलै आऴ्वार पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी की तनियन पाठ करते हुए तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रबंधों का सारांश ज्ञान देने लगे । इसी दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशासनिक-कार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपन शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशासनिक-कार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरणकमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य जी का ध्यान करते हुए कूरकुलोत्त्मदास परमपद को प्राप्त हुए , तिरुमलैयाऴ्वार स्वामीजी ने ही कूरकुलोत्त्मदास स्वामीजी महारजा का चरम कैंकर्यं भव्य तरीके से (अंतिम क्रिया) किया |

व्यास : दादी जी, क्या तिरुमलै आऴ्वार हमारे सम्प्रदाय को आगे लेकर गए ?

दादी : नहीं व्यास, जैसे मैंने पहले कहा था की तिरुमलै आऴ्वार जी श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि सीखने गए थे | वह सभी पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना चाहता थे । तो श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै स्वामीजी ने उनको पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना के लिए थिरुप्पुट्कुल्ही स्वामीजी के पास भेजते है। दुर्भाग्य से उनके आगमन से ठीक पहले थिरुप्पुट्कुल्ही स्वामीजी परमपद को प्राप्त कर लेते है । तिरुमलै आऴ्वार बहुत परेशान हो जाते है और देव पेरुमल (काँची पुरम वरद स्वामीजी ) का मंगलाशाशनम करने का फैसला करते है।

पराशर : दादीजी , यह घटना रामानुज स्वामीजी की तरह ही है जब वह यामुनाचार्य स्वमीजी से मिलने गए थे, लेकिन इससे पहले कि रामानुजा स्वामजी आलवन्दार स्वामीजी से मिलते, आलवन्दार स्वामी जी परमपद प्राप्त कर लेते है । क्या मैं सही हूं?

दादीजी : बिलकुल सही कह रहे हो पराशर | तब वह देवपेरुमाळ स्वामीजी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, सभी उनका स्वागत करते है, देवपेरुमाळ स्वामीजी तिरुमलैयाऴ्वार जी को श्रीशठारी, माला, चन्दन का प्रसाद प्रदान करते है | देवपेरुमाळ स्वामीजी श्री नालूर पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है की वह तिरुमलैयाऴ्वार जी को दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सिखाये जिसमे तिरुवाय्मोऴि ईडुव्याख्यान जो की वह थिरुप्पुट्कुलि जीयर जी से नहीं सीख पाए |

श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने कहा – कोई अन्य क्यों अपने सुपुत्र को हम यह कार्य सौंपते है क्योंकि अगर वह सिखाये तो वह आपके सिखाने के बराबर होगा और फिर भगवान अन्तर्धान होए गये । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को स्वीकार किये और उन्होने श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे । नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मुल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै । तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है ।

व्यास : क्या अलवार तिरुनगरी नामल्लावर स्वामीजी की जन्मस्थली है ? मैंने सुना है की तिरुमलै आऴ्वार स्वमीजी ने ही अलवार तिरुनगरी को दुबारा बनाया था जब यह जीर्ण स्थिति में थी | कृपा करके हमें उस कथा के बारे में बताये दादीजी |

दादी : आप सही हो व्यास | जब तिरुमलै आऴ्वार अलवार तिरुनगरी में पहुँचते है | वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया ) । इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरी लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरी के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरित चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुक्त कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए । उनके बिना, हम उस आऴ्वार तिरुनगरी की कल्पना नहीं कर सकते जो आज हम देख रहे हैं और उसका आनंद ले रहे हैं।

तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्णप्रेमभक्तिभाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है । अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरियपेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के प्रयासों से हमें 36000 ईडु व्याख्यान का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो बाद में अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ द्वारा व्यापक रूप से महान ऊंचाइयों तक फैला । तो बच्चों, चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

बच्चों ने धन्य महसूस किया और विचार-विमर्श करके अण्डाल दादी के घर को छोड़ कर अपने घर को जाते है ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – अऴगिय मणवाळ मामुनि

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श्रीः

श्रीमते रामानुजाय नमः

श्रीमद् वरवरमुनये नमः

श्री वानाचलमहामुनये नमः

दादी बच्चो का स्वागत करती है और पूछती है की आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें के बारे में जानने और सुनने के लिए कौन कौन उत्साहित हैं ।

दादी : स्वागत बच्चो, आप सभी ने अपनी गर्मी की छुट्टी का आनंद कैसे लिया?

दादी जी : गर्मी की छुट्टी तो अच्छी थी | अब हम अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामी जी के बारे में जानने के लिए उत्सक है | क्या हमें उनके बारे में बताएंगी ?

दादी : अवश्य बच्चो | अऴगिय मणवाळ मामुनि आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री अनैतुलगुम् वाऴप्पिरन्त यतिराज के अवतार के रूप मे प्रकट हुए । उनका नाम – अऴगियमणवाळमामुनि (अऴगियमणवाळ पेरुमाळनायनार) था | वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है ।

दादी : क्या तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी के आचार्य थे ?

दादी : हाँ व्यास | तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखते है | उन्हें श्री रामानुज स्वामीजी से भी बहुत लगाव था और उन्होंने आऴ्वार तिरुनगरि में भविष्यदाआचार्य सानिध्य में सेवा करते थे । यतीन्द्र (श्री रामानुज स्वामीजी ) के प्रति उनके अत्यधिक लगाव के कारण, उन्हें “यतीन्द्रं प्रवण” (यतीन्द्र से बहुत लगाव रखने वाले) के रूप में जाना जाता था।

बाद में , उन्होंने आचार्य नियमम आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित करके श्रीरंगम में सम्प्रदाय का प्रचार एवं प्रसार करने लगे | श्रीरंगम पहुँच कर उन्होंने सन्यास धर्म अपना लिया एवं अऴगिय मणवाळ मामुनि और पेरिया जीयर के नामो लोकप्रिय हुए |

श्री वरवरमुनि स्वामीजी मुमुक्षुपडि, तत्त्व त्रय, श्रीवचन भूषणम जैसे महान ग्रन्थों में वेद , वेदांतम्, इतिहास , पुराण और अरुचिच्याल से कई संदर्भों के साथ सुंदर टीका लिखते थे ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने रामानुज नूट्रन्दादि , ज्ञान सरम और प्रमेय सारम पर टिप्पणियां लिखते हैं जो चरम उपाये निष्ठा के बारे में बताती है (की आचार्य ही सब कुछ है) । श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने कुछ श्रीवैष्णवों के अनुरोध के आधार पर तिरुवायमोली नुट्रन्दादि जो तिरुवायमोली के अर्थों पर प्रकाश डालती है ग्रन्थ को रचा | यहाँ तक कि उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों के मूल्यवान उपदेशों को भी लिख दिया जिसमें उपदेश रत्न माला में उन्होंने हमारे आलवारों के जन्म स्थान, तिरुनक्षत्रम , तिरुवायमोली और श्रीवचनभूषणम पर भी प्रकाश डाला ।

मामुनिगळ स्वामी जी दिव्या देशो की यात्रा भी करते है और सभी दिव्या देशो के पेरुमाल जी का मंगला शाशन भी करते है |

वेदवल्ली : दादीजी, मामुनिगळ स्वामी जी के बारे में सुन कर बहुत अद्भुत लगा और उन्होंने हमारे संप्रदाय आगे लेने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की ।

दादी : हाँ वेदवल्ली, जहाँ तक नम्पेरुमाळ जी स्वयं नम्माळ्वार स्वामीजी की 36000 ईडुव्याख्यान वाली तिरुवायमोली का अऴगिय मणवाळ मामुनि द्वारा कालक्षेप सुनने में रूचि रखते | अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी ने बहुत प्रसन्न होकर 10 महीने तक कालक्षेप किया और अंत में अन्नी तिरुमुलम पर इसकी साट्ट्रुमुरै सम्पूर्ण किये |

साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये । हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कहकर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक तीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्रीवैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया ।

पराशर: बहुत अद्भुत दादी जी, नम्पेरुमाळ जी द्वारा सम्मानित होकर कितना अच्छा लगा होगा | दादी , यही कारण है कि हम इस तनियन के साथ अपने सभी कैंकर्य शुरू करते हैं?

दादी : हाँ पराशर | कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुयात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।

अपने अंतिम दिनों के दौरान, मामुनिगळ स्वामीजी बड़ी मुश्किल से आचार्य हृदयम पर टिका लिख पाते है ।अंत में वह अपनी थिरुमनी (दिव्य रूप) को त्याग कर परमपद धाम जाने का फैसला करते है। वह आरती प्रबंधं का पाठ करते हुए एम्पेरुमानार जी से आर्त विनती करते है की उनको स्वीकार करे और उन्हें इस भौतिक क्षेत्र से मुक्त करे । इसके बाद, मामुनिगळ स्वामीजी एम्पेरुमानार जी के कृपा से परमपद को प्रस्थान करते है | पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

अतुलहाय : दादी जी , उनके बारे में बोलने से हम सभी को बहुत फायदा हुआ। मामुनिगल के दिव्य चरित्र को हमारे साथ साझा करने के लिए धन्यवाद।

दादी : मुझे भी अच्छा लगा, कम से कम वह पेरिया पेरुमल द्वारा आचार्य के रूप में स्वीकार किया गए , वह आचार्य रत्न हार को पूरा करते है और ओरण वाली गुरु परंपरा जो स्वयं पेरिया पेरुमाल जी से शुरू हुई ।

हम अपनी अगली चर्चा में मामुनिगळ स्वामीजी के अष्ट दिक गज शिष्यों के बारे में चर्चा करेंगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ- वेदांताचार्य

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

आण्डाल दादी एक माला बना रही थी और आने जाने वालो को अपने घर से मंदिर जाते हुए देख रही थी। उन्होंने अपनी आंखों के कोने से अपने घर में भाग रहे बच्चों को पकड़ा और खुद मुस्कुराई। उन्होंने पेरिया पेरुमल और थायर की तस्वीर को माला से सजाया और उनका स्वागत किया।

दादी : आओ बच्चों । क्या आप जानते हैं कि आज हम किसके बारे में चर्चा करने वाले हैं?

सभी बच्चे एक साथ बोलते है की वेदांताचार्य स्वामीजी के बारे में |

दादी: हाँ, क्या आप जानते हो की उनका यह नाम किसने दिया ?

व्यास : उनका ‘वेदांताचार्य’ नाम श्री रंगनाथ ने दिया | दादी, क्या यह सही है।

दादी : बिलकुल ठीक , व्यास । उनके जन्म का नाम वेंकटनाथन था। उनका जन्म कांचीपुरम में दिव्य दंपति अनंत सुरी और तोतअरमबई से हुआ था।

पराशर : दादी हमें बताये ‘वेदांताचार्य’ स्वामी जी कैसे सम्प्रदाय में आये ?

दादी : जरूर पराशर | जब वेदांताचार्य छोटे थे, वे अपने मामा श्री किदाम्बी अप्पुलार के साथ श्री नदादूर अम्माल की कालक्षेप गोष्ठी में सम्मिलित होने गये थे। इसका उल्लेख करते हुए वेदांताचार्य कहते हैं कि श्री नदादूर अम्माल ने उन पर कृपा कर कहा कि सत्य की स्थापना करेंगे और विशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव सिद्धांत के सभी विरोधियों को समाप्त करेंगे।

अतुलाय : यकीनन , उनके आशीर्वाद से ही यह सब हुआ !

दादी (मुस्कराते हुए ) : हाँ अतुलाय | बड़ो का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता |

वेदवल्ली : मैंने सुना है की वेदांताचार्य स्वमीज श्रीनिवास् भगवान् की पवित्र घंटी के अवतार थे | सही न दादी जी ?

दादी : हाँ, आप सही कह रहे है अतुलाय | उन्होंने सौ से ज्यादा ग्रन्थ संस्कृत, तमिल एवं मणिप्रवाल भाषा में लिखे है |

व्यास : सच में सौ से ज्यादा ग्रन्थ ?

दादी : हाँ, उनके प्रमुख ग्रंथों में से कुछ निम्न है –तात्पर्य चन्द्रिका, ( गीता भाष्य का व्याख्यान है), तत्वटीका (श्री भाष्य के एक खंड का व्याख्यान), न्याय सिद्धज्ञानं (हमारे संप्रदाय की सिद्धांत का विश्लेषण करता है), सदा दूषणी (अद्वैत सिद्धांत के विरुद्ध है), आहार नियम(अनुशंसित भोजन की आदतों पर एक तमिल लेख) |

परशार : दादीजी , मुझे आश्चर्य को कैसे रोक सकता हु की कैसे स्वामीजी आहार नियम पर ग्रन्थ लिखा और कैसे एक ही समय में जटिल दार्शनिक टिप्पणियों के बारे में लिखें।

दादी : हमारे पूर्वाचार्यो का ज्ञान सागर के समान गहरा था | पराशर, इसमें कोई संदेह नहीं, ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’(सभी कला और शिल्प के स्वामी), यह नाम श्री रंग नाच्चियार (श्री महालक्ष्मी जी) ने प्रदान किया।

अतुलाय : दादी जी हमें और बताये | उसके बारे में ये सारे तथ्य सुनना दिलचस्प है|

दादी : ‘वेदांताचार्य’ स्वामीजी को ‘कवितार्किक केसरी’ (कवियों के बीच शेर) नाम से भी जाना जाता था | उन्होंने एक बार 18 दिनों की लंबी बहस के बाद कृष्णमिस्रा नामक एक अद्वैती पर जीत हासिल की। एक व्यर्थ कवि द्वारा चुनौती दिए जाने पर उन्होंने ‘पादुका सहस्रम’ की रचना की। यह एक 1008 पद्य कविता है जो भगवान श्री रंगनाथ की दिव्य चरण की प्रशंसा करते है।

वेदवल्ली : यह प्रभावशाली है! हम वास्तव में ऐसे महान आचार्यों के लिए धन्य हैं जो ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धियों के बावजूद ऐसी विनम्रता रखते थे।

दादी : ठीक कहा वेदवल्ली | श्री वेदांताचार्य को भी, अपने पूर्वाचार्यों और समकालीन आचार्यों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था, जिसका प्रमाण उनकी “अभितिस्तव्” में मिलता है, “कवचं रंगमुक्ये विभो ! परस्पर-हितैषीणाम् परिसरेशु माम् वर्त्य” , (हे भगवान! कृपया मुझे श्रीरंगम में उन महान भागवतों के चरणों में निवास प्रदान करे जो परस्पर एक दुसरे के शुभ चिन्तक हैं)। कई अन्य आचार्यों और विद्वानों ने जैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी), एऱुम्बि अप्पा, वादिकेसरी अऴगिय मणवाळ जीयर, .चोलसिंहपुर (शोलिंगुर) के स्वामी डोड्डाचार्य  जी ने वेदांताचार्य के ग्रंथों पर व्याख्यान लिखा है या उनका उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है । वेदांताचार्य ने पिल्लै लोकाचार्य की प्रशंसा में ‘लोकाचार्य पंचासत’ नामक एक सुंदर प्रबंध कि रचना की। वेदांताचार्य, पिल्लै लोकाचार्य से आयु में 50 वर्ष छोटे थे और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे जिसे इस ग्रंथ के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है; इस ग्रंथ का आज भी तिरुनारायणपुरम (मेलकोट, कर्नाटक) में नियमित रूप से पाठ किया जाता है।

पाराशर : वेदांताचार्य स्वामी जी ने श्री रामानुजार जी को कैसे मानते थे ?

दादी : श्री वेदांताचार्य की श्री रामानुज के प्रति भक्ति को सभी भली प्रकार जानते हैं; अपने ग्रंथ “न्यास तिलका” की प्रारंभिक कविता “उकत्य धनंजय” में, वे संतुष्टी करते हैं कि भगवान परोक्ष रूप में उन्हें यह बताते हैं की उनके द्वारा मोक्ष दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि श्री रामानुज के संबंध मात्र से ही उन्हें मोक्ष मिलने का निर्धारण हो गया है।

व्यास : दादी जी अपने सम्प्रदाय के आचार्यो के प्रति बहुत कुछ सीखने को है |

दादी : हाँ, एक रचना, वेदांताचार्य विजय (आचार्य चंपू) का उल्लेख करते हैं, जो गद्य और कविता के रूप में संस्कृत भाषा में महान विद्वान और कवि “कौशिक कवितार्किकसिंह वेदंताचार्य” द्वारा लिखी गयी है, जो लगभग 1717 AD के समय में हुए। इस रचना को वेदांताचार्य के जीवन का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमाणिक अभिलेख माना जाता है।

अतुलाय : अत्ति सुन्दर दादी जी , आज हमने वेदांताचार्य स्वामीजी के संस्कृत एवं तमिल ग्रंथो के बारे में जाना, उनकी विनम्रता और भक्ति के बारे में भी जाना | ऐसे महान उदाहरण का अनुसरण करने के लिए हम वास्तव में धन्य हैं।

दादी : हाँ बच्चो | चलो हम ऐसी महान आत्माओं को हमेशा याद करते हैं! हम कल फिर मिलेंगे। आप सभी के घर जाने का समय हो गया है।

बच्चे एक साथ दादी जी का धन्यवाद करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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ஸ்ரீராமாயணம் பாலபாடம் – விசுவாமித்ர முனிவரின் வருகை

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ஸ்ரீ:  ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம:  ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம:  ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீராமாயணம் பாலபாடம்

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பராசரன் வ்யாசன் வேதவல்லி அத்துழாய் நால்வரும் ஆண்டாள் பாட்டியின் அகத்திற்கு வருகிறார்கள்.

பாட்டி தன் அகத்து எம்பெருமானுக்காக புஷ்பம் கட்டிக்கொண்டிருந்தாள். வாருங்கள் குழந்தைகளே! கை கால்களை அலம்பிக்கொள்ளுங்கள். நான் உங்களுக்குப் பெருமாள் அமுது செய்த திருப்பணியாரங்களைத் தருகிறேன்.

பராசரன்: சென்ற முறை ராம ஜனனம் பற்றிக் கூறினீர்கள் பாட்டி. மேலும் ராம கதையைக் கேட்க ஆசையாக இருக்கிறது.

பாட்டி: சொல்கிறேன் கேளுங்கள். தசரத மன்னன் புத்திரர்கள் அவதரித்ததைக் கொண்டாடும் வகையில் நாடு நகரத்தில் உள்ள அனைவர்க்கும் பொன்னையும் பொருளையும் வாரி வழங்கினான். பின்பு புத்திரர்களுக்கு ஜாத கர்மம் முதலிய சடங்குகள் அனைத்தையும் சிறப்பாகச் செய்தான்.

அத்துழாய்: நாடு முழுவதும் திருவிழா போல் தோற்றமளித்திருக்கும். மக்களனைவரும் கொண்டாடி மகிழ்ந்திருப்பார்கள். கேட்கும்போதே ஆனந்தமாக இருக்கிறது பாட்டி.

பாட்டி: ஆம் அச்சமயத்தில் தேவர்கள் பூமழை பொழிந்தார்கள், கந்தர்வர்கள் ஆகாயத்தில் மிக இனிமையாக பாடி மகிழ்ந்தனர். மக்கள் அனைவரும் குதூகலித்தனர். அக்குமாரர்கள் நால்வரும் நாளடைவில் வேத சாஸ்திரங்களைக் கற்று, தனுர் வேதத்திலும் வல்லமை பெற்று உலகத்திற்கு நன்மை செய்வதிலே மிக விருப்பங்கொண்டு, நற்குணங்களனைத்திற்கும் இருப்பிடமாகத் திகழ்ந்தனர். நால்வர்களில் ராமபிரான் தன் தந்தை தசரதனுக்குப் பணிவிடை செய்வதிலே மிக விருப்பம்கொண்டான். லக்ஷ்மணன் ராமபிரானுக்குத் தொண்டு செய்வதான பெரும் செல்வத்தை மேன்மேலும் பெருகச் செய்துகொண்டிருந்தான். ஸ்ரீராமனும், லக்ஷ்மணனும் இணைபிரியாமல் இருப்பார்கள். லக்ஷ்மணன் எவ்வாறு ராமனைவிட்டு பிரியாதிருப்பானோ அதுபோல சத்ருகனன் பரதனை விட்டு பிரியாதிருப்பான். பரதனுக்கு சத்ருகனன் தன் உயிரினும் மேலாக இருந்தான்.

வேதவல்லி: நால்வரும் எவ்வாறு உடன் பிறந்தவர்களுடன் ஒற்றுமையாக வாழ்ந்தார்களோ அவர்கள் அருளினால் நாங்களும் எங்கள் உடன் பிறந்தவர்ககுடன் ஒற்றுமையாக வாழ்வோம் பாட்டி. மற்ற மூவரும் ஆம் என்றனர்.

வியாசன்: சகோதர ஒற்றுமைக்கு இவர்களே சிறந்த முன் உதாரணமாக வாழ்ந்திருக்கிறார்கள்.

பாட்டி: ஆமாம். ஸ்ரீராமனுடைய சரித்திரத்தைக் கேட்கக் கேட்க நற்பண்புகள் வளரும். இப்படிப்பட்ட சிறந்த குணங்களைப்பெற்ற புத்திரர்களினால் தசரதன் மட்டற்ற மகிழ்ச்சியடைந்தான். நீங்களும் உங்கள் பெற்றோர்கள் மனம் மகிழும்படி நடந்துகொள்ளவேண்டும். குழந்தைகள் நால்வரும் நிச்சயமாக நீங்கள் கூறியபடி நடந்துகொள்வோம் பாட்டி என்றனர்.

பாட்டி: நீங்கள் கூறுவதைக் கேட்க மிகவும் மகிழ்ச்சியாக இருக்கிறது. மேலும் சொல்கிறேன் கேளுங்கள். நாட்கள் கடந்தன. புதல்வர்கள் நால்வருக்கும் திருமணம் செய்ய தகுந்த வயது வரக்கண்டு ஆனந்தத்துடன் அவர்களது திருமணம் குறித்து புரோஹிதருடனும், உறவினர்களுடனும் கூடி ஆலோசித்துக் கொண்டிருக்கையில் விசுவாமித்ர முனிவர் தசரத மன்னனைக் காண அவ்விடம் வந்தார். மன்னனும் அம்மாமுனியைக் கண்டு மகிழ்ந்து தன் புரோகிதரான வசிஷ்டமுனிவருடன் கூடி நன்கு வரவேற்று அமரச்செய்தான். விசுவாமித்ர முனியும் களிப்படைந்து மன்னனையும் வசிஷ்ட வாமதேவர் முதலிய ரிஷிகளை நலம் விசாரித்தார். பின்பு மன்னன் விசுவாமித்திர முனிவரைப் பூஜித்து முனிவரே நான் புதல்வர்களின் திருமணம் குறித்து ஆலோசித்துக் கொண்டிருக்கையில் தாங்கள் தற்செயலாய் வந்து எனக்கு காட்சியளித்தது எனக்கு அளவற்ற ஆனந்தத்தைக் கொடுக்கிறது. நீர் எந்த பயனைக் குறித்து வந்தீரோ அதைச் சொன்னால் உம்முடைய அருளினால் அதை நிறைவேற்ற விரும்புகிறேன். உம்முடைய கட்டளையை நான் நிறைவேற்றுவேனோ மாட்டேனோ என்று சந்தேகப்படவேண்டாம். நிச்சயம் நிறைவேற்றுவேன் என்றான்.

வேதவல்லி: விசுவாமித்திர முனிவர் மன்னனிடம் எதைப் பெறுவதற்காக வந்தார் பாட்டி? கேட்பதற்கு சுவாரசியமாக இருக்கிறது.

பாட்டி: சுவாரசியத்துடன் காத்திருங்கள். நீங்கள் அடுத்தமுறை வரும்பொழுது கூறுகிறேன். இப்பொழுது இருட்டிவிட்டதால் உங்கள் அகத்திற்குப் புறப்படுங்கள்.

குழந்தைகள் நால்வரும் தங்கள் அகத்திற்குப் புறப்பட்டார்கள்.

அடியேன் ஸாரநாயகி ராமானுஜ தாஸி

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – नम्पिळ्ळै (श्री कलिवैरिदास स्वामीजी)

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< नन्जीयर्

पराशर और व्यास, दादी माँ के घर में अतुललाय और वेदवल्ली के साथ प्रवेश करते है |

दादी : स्वागत बच्चो | आज हम दूसरे आचार्य जिनका नाम नम्पिळ्ळै था उनके बारे में जानेंगे जो नन्जीयर स्वामीजी के शिष्य थे | जैसा मैंने आपको पिछली बार बताया था, नम्बूर गाँव में वरदराजन के नाम से पैदा हुए और नम्पिळ्ळै के नाम से प्रसिद्ध हुए । नम्पिळ्ळै स्वामीजी तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य के प्रकांड विद्वान थे | हम यह भी जानते है कैसे नन्जीयर ने अपनी ९००० पड़ि कि व्याख्यान का एक अच्छी प्रति लिपि बद्द बनाना चाही । जब श्री वैष्णव गोष्ठी में विचार किया गया तब नम्बूर वरदराजर का नाम प्रस्ताव किया गय़ा । वरदराजर नन्जीयर को आश्वासन देते हैं कि वे उनके मन को संतुष्ट होने कि तरह लिखेंगे । नन्जीयर पहले उन्हें ९००० पड़ि कि व्याख्यान को सुनाकर अनन्तर उन्हें मूल प्रति देते हैं । तमिळ भाषा और साहित्य के विद्वान होने के कारण उचित स्थल पर सुन्दर से अर्थ विशेषो को मिलाकर नन्जीयर के पास वापस जाकर उनको वोह पृष्टि सोंप देते हैं । नन्जीयर व्याख्यान पढ़कर जान लेते हैं कि उसमे कुछ बदलाव किया गया हैं और उनसे घटित घटना के बारे में पूछते हैं । वरदराजर उन्हें सब कुछ बताते हैं और नन्जीयर सुन के प्रसन्न हो जाते हैं । वरदराजर की ख्याति समझते हुए उन्हें ” नम्पिळ्ळै “और ” तिरुक्कलिकंरी दासर” से उनका नाम करण करते हैं । वे तिरुक्कलिकंरी दासर, कलिवैरी दासर ,लोकाचार्यर , सूक्ति महार्णवर, जगदाचार्य और उलगसीरियर इत्यादि नामों से भी जाने गए हैं ।

नम्पिळ्ळै – तिरुवाल्लिकेनि

व्यास : दादी हमें याद है कैसे नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने तिरुवायमोली ९००० पड़ी व्याख्यान को दुबारा अपनी स्मरण शक्ति से लिखा जब उनके आचार्य द्वारा दिए गए मूल ग्रन्थ कावेरी नदी में बाढ़ आने से खो गए थे |

दादी : हाँ, इतनी महानता और ज्ञान के बावजूद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी बहुत विनम्र थे और सभी के साथ बहुत सम्मान और प्यार से पेश आते थे |

वेदवल्ली : दादी, क्या आप हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरव को उजागर करने वाली कुछ घटनाएं बता सकते हैं?

दादी : आळ्वार पाशुर को अर्थ सहित नन्जीयर स्वामीजी से सीखने के बाद, नम्पिळ्ळै स्वामीजी नियमित रूप से श्रीरंगम मंदिर में पेरुमल सन्निधि के पूर्वी किनारे पर व्याख्यान देते थे | तमिळ और संस्कृत भाषा और साहित्य पर उनके महान आदेश के कारण नम्पिळ्ळै भारी भीड़ को आकर्षित करते थे । जब भी लोगों के मन में कोई शंका / सवाल उठता है, तो वे वाल्मीकि रामायणम का उपयोग करके संतोषजनक तर्क देकर जिज्ञासाओं के मन का जिज्ञासा शांत करते थे । एक बार, जब नम्पिळ्ळै अपने कालक्षेप दे रहे थे, पेरिया पेरुमल (श्री रंगम के मूलावार विग्रह से बहार से निकल कर) अपनी वैराग्य स्थिति से उठ खड़े हुए और नम्पिळ्ळै के उपदेशं को देखने के लिए आये । नम्पिळ्ळै उपन्यास देते समय देखने के लिए पेरिय पेरुमाळ खड़े हो गए थे । तिरुविळक्कु पिच्छण् (एक श्री वैष्णव जो सन्निधि के दीप और रौशनी के जिम्मेदार हैं ) खड़े हुए पेरिय पेरुमाळ को देखते हैं और उन्हें धक्का देकर कहते हैं कि अर्चावतार में उन्हें हिलने कि इझाजत नहीं हैं । नम्पिळ्ळै को भाषण देते हुए देखने और सुनने के लिए एम्पेरुमान् ने उनकी अर्च समाधी को भी (अर्च अवताराम में स्थानांतरित या बात नहीं करने का वादा) तोडा हैं । तमिळ और संस्कृत दोनों में विभिन्न साहित्य में उनके गहन ज्ञान के कारण वे अपने व्याख्यान के दौरान अपने दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने में सक्षम थे। नम्पिळ्ळै के भाषण इतने प्रसिद्ध थे कि लोग कहते थे कि क्या यह नम्पेरुमाळ कि गोष्टी हैं या नम्पिळ्ळै कि गोष्टी । जिस तरह नम्पेरुमाळ लोगों को अपनी पुरप्पाड इत्यादि कि ओर आकर्षित करते थे उसी तरह नम्पिळ्ळै अपने वचन से उन्हें आकर्षित करते थे । क्या किसी ने श्रीरंगम में नम पेरुमाल के पुरपाडु उत्सव को (झांकी)देखा है?.

श्रीरंग पेरुमाल सन्निद्धी में नम्पिळ्ळै उपन्यास देतेहुए

अतुलाय : जी दादी मैंने देखा है | जब एक बार में श्री रंगम में ब्रह्म उत्सव देखने गयी थी तब नम पेरुमाल जी के वीधि पुरप्पाडु की झांकी देखी थी और जिस तरह से उनकी झांकी लेकर गए विस्मित करने वाला द्रश्य था |

पराशर : जी दादी , हमने भी नम पेरुमाल जी का पुरप्पाडु उत्सव बहुत बार देखा है |

दादी : कौन नहीं होगा? क्या यह हमारी आँखों का इलाज नहीं है? ठीक उसी तरह जैसे नमपेरुमल ने अपने सभी भक्तों को अपने पुरपडु के साथ आकर्षित किया, यहां तक कि नम्पिल्लई ने भी अपने उपन्यासम में भारी भीड़ को आकर्षित किया। इस सब के बावजूद, उनकी विनम्रता अद्वितीय थी। नम्पिळ्ळै की विनम्रता अद्वितीय और असामान्य थी । श्री नन्जीयर का जीवन एक ऐसा आदर्श जीवन था जो केवल श्री नम्पिळ्ळै से सीखा हुआ श्रीवैष्णवतत्व पर पूर्ण तरह से आधारित था । एक बार कन्दाड़ै तोळप्पर (मुदली आण्डान् वंशी ) नम्पेरुमाळ के आगे नम्पिळ्ळै कि निंदा स्तुति करते हैं । उनकी महानता तोळप्पर् से सहन नहीं हो रहा था और वोह असहनता कठिन व्याख्या ( शब्दों ) के रूप में बाहर आए । नम्पिळ्ळै ने बिना कुछ बोले उनकी बेइज्जति सहन करके अपनी तिरुमालिगै को निकल पड़ते हैं । तोळप्पर जब अपने तिरुमालिगै पहुँचते हैं, उनकी धर्म पत्नी जो इस विषय के बारे में जान लेती हैं उन्हें उनकी बर्ताव पे सलाह देती हैं और नम्पिळ्ळै की महानता बताती हैं । उनसे आग्रह करती हैं कि वे नम्पिळ्ळै के पास जाकर उनके चरण कमल पे माफ़ी माँगे । आख़िरकार उन्हें अपनी भूल समझ मे आती हैं और रात में नम्पिळ्ळै कि तिरुमालिगै को जाने कि ठान लेते हैं । जब घर से निकल पड़े और दरवाज़ खोला तब उन्होंने एक व्यक्ति उनका इंतज़ार करते हुए दिखाई दिये जो दूसरे कोई नहीं थे बल्कि नम्पिळ्ळै स्वयं थे। तोळप्पर को देखने के तुरंत बाद नम्पिळ्ळै नीचे गिर कर उन्हें प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्होंने कुछ भूल कि होगी जिस के कारण तोळप्पर उनसे नाराज़ जो गए । तोळप्पर हैरान हो जाते हैं और उनकी महानता अच्छी तरह से समझ आती हैं । भूल उन्होंने किया हैं लेकिन नम्पिळ्ळै इतने विनम्र निकले कि उस भूल को उन्होंने अपने कंधे पे ले लिया और माफ़ी माँगने लगे । तोळप्पर तक्षण उन्हें प्रणाम करते हैं और कहे कि उनकी विनम्रता के कारण उन्हें उस दिन से “लोकाचार्य” के नाम से लोग जानेंगे । जो मानव महान होने के बावज़ूद अपनी चाल चलन में विनम्रता रखता हैं उन्हें “लोकाचार्य” कहते हैं और नम्पिळ्ळै उस पद के लायक हैं । नम्पिळ्ळै के प्रति अपनी द्वेष भाव को छोड़कर तोळप्पर अपनी पत्नी के साथ उनकी सेवा में जुड जाते हैं और कई शास्त्रार्थ उनसे सीखते हैं ।

पराशर : कितना विस्मय है | क्या यह उस घटना से बहुत मिलता-जुलता नहीं है, जहां श्री पराशर भट्टर् ने उस व्यक्ति को महंगी शॉल भेंट की थी, जो उनके बारे में बुरा बुरा कहता था ?

दादी : अच्छा अवलोकन पराशर ! हमारे पूर्वाचार्यों में एक सच्चे श्री वैष्णव के सभी समान गुण थे । बार बार हमारे आचार्यों ने हमें सिखाया कि कैसे जीना है और कैसे श्री वैष्णव के शुद्ध जीवन का नेतृत्व करके सभी के साथ व्यवहार करना है। उन्होंने आदर्श उदाहरण देकर हमें रास्ता दिखाया। उन्होंने हमें यह भी दिखाया कि यह सिर्फ सैद्धांतिक नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी इसका पालन किया जा सकता है। इसके लिए सभी को आचार्यों का आशीर्वाद ही चाहिए और हमारे पूर्वाचार्यों की तरह जीवन जीने की कोशिश करने के लिए हमें थोड़ा प्रयास करना चाहिए । छोटे बच्चे के कदम की तरह आखिरकार हमें हमारी मंजिल तक ले जाएंगे।

जब भट्टार स्वामीजी ने हमें दिखाया कि कैसे एक सच्चे श्री वैष्णव बने, नडुविळ तिरुवीधि भट्टर जो भट्टर वंशीय थे नम्पिळ्ळै की कीर्ति से असहन होते हैं और उन पे ईर्षा भाव बढ़ा लेते हैं । एक बार जब वे राजा के दरबार जा रहे थे तब उनके साथ पिन्बळगीय पेरुमाळ जीयर को अपने साथ लेकर जाते है । राजा उन दोनों को स्वागत करके उन्हें सम्भावना देकर आसीन करते हैं । राजा ने भट्टर से श्री रामायण से एक प्रश्न पूछते हैं । उन्होंने पूछा जब एम्पेरुमान ने एलान किया था कि रामावतार में वे परत्वता नहीं दर्शाएंगे तब वे कैसे जटायु को “गच्छ लोकान् उत्तमान”( सबसे उत्तम लोक – परमपद को जाईये ) कह सकते हैं । भट्टर को समाधान नहीं मालुम था और उनकी ख्याति के बारे में चिंतित हो रहे थे और इस बीच राजा कुछ अन्य कार्य में मग्न हो गए । भट्टर जीयर से पूछते हैं कि अगर नम्पिळ्ळै को यह प्रश्न पूछा गया होता तो वे इसका क्या उत्तर देंगे । जीयर तुरंत उत्तर देते हैं कि वे “सत्येन लोकान जयति” (एक सच्चा इन्सान तीनों लोकों को जीत सकता हैं ) इति सूत्र से समझाते । भट्टर उस श्लोक पर ध्यान करके उसका अर्थ जानकर राजा को समझाते हैं कि श्री राम सत्यवादी थे और उनकी सत्यनिष्ठा की शक्ति से किसी को भी किसी भी प्रदेश पहुँचा सकते हैं । जवाब सुनकर राजा बहुत प्रसन्न होकर भट्टर के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं और उन्हें ढ़ेर सारा सम्पत्ति प्रदान करते हैं । नम्पिळ्ळै के केवल एक व्याख्या की महत्ता को जानकर भट्टर तुरन्त उनके पास जाकर सारा संपत्ती को समर्पित कर देते है । नम्पिळ्ळै के चरण-कमलों का आश्रय (शरण) पाकर उनके शिष्य बनते हैं और उसके बाद निरंतर नम्पिळ्ळै की सेवा में जुट जाते हैं ।

वेदवल्ली : दादी, पिछली बार आप ने बताया था की भट्टर स्वामी जी और नन्जीयर स्वामीजी आपस में बहुत चर्चा करते थे | क्या नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी इतनी आनन्ददायक चर्चा होती थी ?

दादी : हाँ वेदवल्ली | नन्जीयर स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बीच भी बहुत अद्भुत चर्चा होती थी | एक बार नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने नन्जीयर स्वामीजी से पूछा की भगवान के अवतार लेने का क्या अभिप्राय है ? नन्जीयर स्वामीजी बताते है की एम्पेरुमान जी इसीलिए अवतार लेते है की जिन्होंने भागवतो के प्रति अपचारम किये है उनको सही दंड दे सके| जिस तरह एम्पेरुमान जी ने कृष्णावतार में यह सुनिश्चित करने के लिए लिया कि दुर्योधन ने अपने भक्तों पर कई अपचार किए जो अंततः मारे गए। वह हिरण्यकश्यपु को यह सुनिश्चित करने के लिए नरसिंह के रूप में आया, जिसने अपने भक्त प्रह्लाद को परेशान किया, उसे मार दिया । तो, सभी अवतारों का मुख्य उद्देश्य भागवत संरक्षणम है।

व्यास : दादी, भागवत अपचार क्या है ?

दादी : नन्जीयर बताते है कि खुद को अन्य श्री वैष्णवों के बराबर मानना ही भगवत अपचारम है। नंजियार बताते हैं कि हमें हमेशा अन्य श्री वैष्णवों को अपने से ऊपर मानना चाहिए चाहे श्री वैष्णव किसी भी कुल में जन्म लिए हो, चाहे जैसे भी ज्ञान उन्हें हो । उनका यह भी कहना है कि हमारे आळ्वार स्वामीजी और अन्य पूर्वाचार्यों की तरह हमें भी अपने भागवतों का लगातार महिमामंडन करने की कोशिश करनी चाहिए।

नम्पिळ्ळै यह भी स्पष्ट करते है की पेरिया पेरुमाल और पेरिया पिराट्टि को छोड़ कर अन्य देवी देवताओं का भजन एवं पूजन पूर्णतः व्यर्थ है |

अतुलहाय : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी कैसे इसको बताते है ?

दादी : एक बार कोई नम्पिळ्ळै स्वामीजी के पास आकर उनसे प्रश्न किया जाता हैं कि नित्य कर्म करते समय आप अन्य देवता ( जैसे इंद्र , वायु , अग्नि ) कि पूजा कर रहे हैं लेकिन यह पूजा उनके मन्दिर को जाकर क्यूँ नहीं कर रहे हैं ? तत्क्षण अति चतुर जवाब देते हैं कि क्यूँ आप यज्ञ के अग्नि को नमस्कार करते हैं और वहीँ अग्नि जब शमशान में हैं तब उससे दूर हैं ? इसी तरह शास्त्र में निर्बन्ध किया गया हैं कि नित्य कर्म को भगवद् आराधन मानकर करना चाहिए । यह कर्म करते समय हम सभी देवताओं के अंतरात्मा स्वरूप एम्पेरुमान् को दर्शन करते हैं । वही शास्त्र बतलाती हैं कि हमे एम्पेरुमान् के अलावा किसी अन्य देवता कि पूजा नहीं करनी चाहिए इसीलिए हम दूसरे देवताओं के मंदिर को नहीं जाते हैं । साथ ही साथ जब यह देवताओं को मंदिर में प्रतिष्टा की जाती हैं तब उन में रजो गुण भर जाता हैं और अपने आप को परमात्मा मानने लगते हैं और क्योंकि श्री वैष्णव सत्व गुण से सम्पन्न हैं और वे रजो गुण सम्पन्न देवता को पूजा नहीं करते हैं । अन्य देवता भजन या पूजा न करने के लिए क्या इससे बेहतर विवरण दिया जा सकता हैं ।

वेदवल्ली : दादी, मेरी माताजी कहती है की यह एक बहुत ही संवेदनशील विषय है और बहुत से लोग इस विचार को स्वीकार नहीं करते हैं।

दादी : कुछ सत्य जब कहे जाते है तो कड़वी गोलियो जैसी प्रतीत होती है जो उनका श्रवण करता है उसके लिए यह अनुभव करना और मानना अस्वीकार होता है | वैदिक सत्य की प्रामाणिकता को कभी नकारा नहीं जा सकता और न ही सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि लोग इसे स्वीकार नहीं करना चाहते। अपने आचार्य की कृपा और अनुकरणीय अकारण दया के साथ, हर किसी को अंततः इस सच्चाई का एहसास होता है । जैसा कि हमारे आळ्वार स्वामीजी अपने एक अनुष्ठान में कहते हैं, “यदि हर कोई श्रीमन्न नारायण के आधिपत्य के शाश्वत सत्य का एहसास करता है और मोक्ष तक पहुंचता है, तो प्रभु के लिए अपने दिव्य अतीत को निभाने के लिए कोई दुनिया नहीं होगी, इसलिए यह देरी है”।

व्यास : दादी, क्या नम्पिळ्ळै स्वामीजी का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था ?

दादी : हाँ, नम्पिळ्ळै स्वामीजी की दो पत्नियां थी | एक बार एक पत्नि से अपने बारे में उनका विचार पूछते हैं । जवाब देते हैं बतलाती हैं कि उन्हें स्वयं एम्पेरुमान् का स्वरुप मानती हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में देखती हैं । उनकी उत्तर से नम्पिळ्ळै बहुत प्रसन्न हो जाते हैं और उनसे मिलने तिरुमालिगै को आने वाले श्री वैष्णवो के तदियाराधन कैंकर्य में पूरी तरह से झुट जाने के लिए कहते हैं । नम्पिळ्ळै स्वमीजी इस घटना से आचार्य अभिमान के महत्व को प्रकाशित करते है |

पराशर : दादी, नम्पिळ्ळै स्वामीजी का जीवन यात्रा सुनकर बहुत ही आनन्द होता है|उनके बहुत से महान शिष्य रहे होंगे|

दादी : हाँ पराशर | नम्पिळ्ळै स्वामीजी के कई महान शिष्य थे, जो खुद आचार्य पुरुष परिवारों से थे और श्री रंगम में उनका समय सभी के लिए नललदिक्कालम (शानदार समय) के रूप में था। नम्पिळ्ळै स्वामीजी ने हमारे संप्रदाय के 2 गौरवशाली स्तंभों की आधारशिला भी रखी – पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) और अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) जो वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै (श्री कृष्णपाद स्वामीजी) के पुत्र थे। उनके कुछ अन्य प्रमुख शिष्य थे, वडक्कु तिरुवीधि पिळ्ळै, पेरियवाच्चान पिळ्ळै , पिण्बळगिय पेरुमाळ जीयर, ईयुण्णि माधव पेरुमाळ, नाडुविळ तिरुविधि पिळ्ळै भट्टर इत्यादि |

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पिम्बालगराम पेरुमाल के साथ नम्पिळ्ळै

जब हम अगली बार मिलेंगे, तो मैं आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने अपनी असीम दया के साथ, महान अनुदान प्रदान करने के लिए और हमारे संप्रदाय के लिए अद्भुत कैंकर्य किया।

बच्चे नम्पिळ्ळै स्वामीजी के गौरवशाली जीवन और उनकी शिक्षाओं के बारे में सोचते हुए अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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బాల పాఠము – వేదాంతాచార్య

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శ్రీః  శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః  శ్రీమతే రామానుజాయ నమః  శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః

శ్రీ వైష్ణవం – బాల పాఠము

<< పిళ్ళై లోకాచార్య శిష్యులు

ఆండాళ్ నాన్నమ్మ ఇంట్లో పువ్వులు అల్లుతూ గుడి వైపు అటూ ఇటూ నడుస్తున్న వాళ్ళని చూస్తున్నారు. ఆమె తన ఇంటి వైపు పరిగెత్తుకుంటూ వస్తున్న పిల్లలను చూసి చిరునవ్వు నవ్వుకుంది. అల్లిన పూలమాలను ఆమె పెరియ పెరుమాళ్ మరియు తయార్ చిత్ర పఠానికి అలంకరించి తరువాత వాళ్ళని స్వాగతించింది.

నాన్నమ్మ : పిల్లలలూ రండి. ఈ రోజు ఎవరి గురించి చర్చించబోతున్నామో మీకు తెలుసా?

పిల్లలందరు ఒకేసారి : వేదాంతాచార్య

నాన్నమ్మ : అవును. ఆ పేరు వారికి ఎవరు పెట్టారో మీకు తెలుసా?

వ్యాస : పెరియ పెరుమాళ్ వారికి వేదాంతాచార్య అని పేరు పెట్టారు. అవునా
నాన్నమ్మ?

నాన్నమ్మ : అవును, వ్యాస. వారికి పుట్టుకతో పుట్టిన పేరు వెంకటనాథన్. వారు కంచీపురంలో ఒక దివ్య దంపతులైన అనంతసూరి మరియు తోతారంబైలకు జన్మించారు.

పరాశర : నాన్నమ్మ, వారు మన సాంప్రదాయంలోకి ఎలా వచ్చారో మాకు మరింత చెప్పండి.

నాన్నమ్మ : ఖచ్చితంగా, పరాశర. నడాదూర్ అమ్మాళ్ యొక్క కాలక్షేప గోష్టిలో కిడాంబి అప్పుళ్ళార్ అనే పేరుతో ఒక ప్రముఖ శ్రీవిష్ణవుడు ఉండేవారు. చిన్నప్పుడు వేదాంతాచార్యులు వారి మేనమామ (కిడాంబి అప్పుళ్ళార్)తో పాటు శ్రీ నడాదూర్ అమ్మాళ్ యొక్క కాలక్షేప గోష్టికి వెళ్లారు. ఆ సమయంలో శ్రీ నడాదూర్ అమ్మాళ్ వారిని అన్ని అడ్డంకులను ఛేదించి విశిష్టాద్వైత శ్రీవిష్ణవ సిద్దాంతాన్ని స్థిరపరుస్తారని ఆశీర్వదిస్తారు.

అత్తుళాయ్ : ఓహ్! వారి ఆశీర్వాదం నిజమైంది!

నాన్నమ్మ చిరునవ్వుతో: అవును, అత్తుళాయ్ . పెద్దల ఆశీర్వాదాలు నెరవేరకుండా ఉండవు.

వేదవల్లి: వారు తిరువెంకటేశ్వరస్వామి వారి పవిత్ర గంట అవతారం అని నేను విన్నాను. అవునా
నాన్నమ్మ ?

నాన్నమ్మ : అవును. వారు సంస్కృతం, తమిళ్ మరియు మణిప్రవళంలో వందకు పైగా గ్రంథాలు వ్రాశారు.

వ్యాస: ఓ! వందనా?

నాన్నమ్మ : అవును, వాటిలో ముఖ్యమైనవి తాత్పర్య చంద్రిక (శ్రీ భగవత్ గీతపై వ్యాఖ్యానం), తత్వతీకై, న్యాయ సిద్జాంజనం, శత ధూశని ఇంకా అహార నియమం (ఆహార అలవాట్లపై వ్యాఖ్యానం) ఉన్నాయి.

పరాశర : నాన్నమ్మ, ఆశ్చర్యంగా ఉంది. ఒకే వ్యక్తి ఎలా ఆహార అలవాట్లపై వ్యాఖ్యానం లాంటి ప్రాథమిక గ్రంథాలు రాసి మరియు అదే సమయంలో క్లిష్టమైన తాత్విక వ్యాఖ్యానాలు కూడా ఎలా రాసారూ అని.

నాన్నమ్మ : మన పూర్వాచార్యుల జ్ఞానం లోతు మహాసముద్రం లాంటిది, పరాశర! ఆశ్చర్యపోనవసరం లేదు, వారికి మన తాయార్ (శ్రీ రంగనాచియార్) ‘సర్వ-తంత్ర-స్వతంత్ర’ (అన్ని కళల నైపుణ్యం) అని బిరుదునిచ్చారు.

అత్తుళాయ్ : మాకు ఇంకా చెప్పండి, నాన్నమ్మ. వారి గురించి ఇంకా వినాలని ఉంది.

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అవతార ఉత్సవంలో కాంచి తూప్పుళ్ వేదాంతాచార్య

నాన్నమ్మ: వేదాంతాచార్యులను ‘కవితార్కిక కేసరి’ (కవులలోకి సింహం) అని కూడా పిలుస్తారు. వారు ఒకసారి కృష్ణమిశ్ర అనే ఒక అధ్వైతితో 18 రోజుల పాటు సుదీర్ఘ చర్చ చేసి గెలిచారు. వారు ఒక వ్యర్థ కవి సవాలు చేస్తే ‘పాదుకా సహస్రం’ ను రచించారు. ఇది శ్రీ రంగనాథుని దివ్య పాదుకలను ప్రశంసిస్తూ వ్రాసిన 1008 పద్యాల కవిత.

వేదవల్లి: చాలా బాగుంది! ఇన్ని నైపుణ్యాలు ఉన్నప్పటికీ ఇంత నమ్రత కలిగిన గొప్ప ఆచార్యులు మన సాంప్రదాయంలో ఉండటం నిజంగా మన అదృష్టం.

నాన్నమ్మ : బాగా చెప్పావు వేదవల్లి. వేదాంత దేశికులు మరియు అనేక ఇతర సమకాలీన ఆచార్యులు పరస్పర ప్రేమ మరియు గౌరవం కలిగి ఉండేవారు. తన అభితిస్తవంలో, వారు శ్రీ రంగనాథుని “ఓ భగవాన్! పరస్పర శ్రేయోభిలాషులైన గొప్ప భాగవతుల చరణాల వద్ద శ్రీరంగం లోనే నివసిస్తాను అని అడుగుతారు “. మణవాళ మామునులు, ఎఱుంబి అప్పా, వాధికేసరి అళగీయ మణవాళ జీయర్, చోళసింహపురం (షోలింగర్) దొడ్డాచార్య వారి రచనలలో వేదాంత దేశికుల గ్రంథాలను ఉదాహరించారు. వేదాంత దేశికులు, పిళ్ళై లోకాచార్యులను గొప్పగా ప్రశంసించే వారు. వీరు పిళ్ళై లోకాచార్యుల గురించి “లోకాచార్య పంచాసత్” అని పిలువబడే గ్రంథం రచించారు. ఈ గ్రంథం తిరునారాయణపురం (మేల్కోటె, కర్ణాటక) లో క్రమం తప్పకుండా రొజూ పఠిస్తారు.

పరాశర : వేదాంతాచార్యులు శ్రీ రామానుజాచార్యుల సంభంధం ఎలాంటిది?

నాన్నమ్మ : వేదాంతాచార్యులకు శ్రీ రామానుజాచార్యుల పట్ల భక్తి చాలా ప్రసిద్ధమైనది; వారి ‘న్యాస తిలకా’ అనే గ్రంధంలో ‘ఉక్త్య ధనంజయ…’ అను పద్యంతో, శ్రీ రామానుజ సంభంధం వల్ల మోక్షం ఖాయమని పరోక్షంగా చెప్పిన పెరిమాళ్ ని పసన్న పరుస్తారు.

వ్యాస : మన ఆచార్యుల గురించి తెలుసుకోవడానికి చాలా ఉంది, నాన్నమ్మ !


నాన్నమ్మ : అవును, వేదాంతాచార్య విజయ ని ‘ఆచార్య – చంపు’ అని కూడా పిలుస్తారు. వేదాంత దేశికుల జీవితం మరియు రచనల క్లుప్తమైన సంగ్రహాన్ని సంస్కృతంలో గద్య మరియు పద్య రూపంలో గొప్ప పండితుడైన ‘కౌశిక కవితార్కికసింహ వేదాంతాచార్య’ (సుమారు 1717 లో నివసించిన గొప్ప పండితుడు) రచించారు.

అత్తుళాయ్ : ఓహ్, బాగుంది! నాన్నమ్మ, ఈరోజు మనం వేదాంతాచార్యుల సంస్కృతం మరియు తమిళంలోని సాహిత్య నైపుణ్యము మరియు వారి భక్తిలో వినయం నేర్చుకున్నాము. వారి గొప్పతనాన్ని అనుసరించడం నిజంగా మన అదృష్టం.

నాన్నమ్మ : అవును, పిల్లలు. ఇలాంటి గొప్ప పుణ్యాత్ములను ఎల్లప్పుడూ గుర్తుంచుకోవాలి! రేపు మళ్లీ కలుద్దాం. మీరు ఇంటికి వెళ్ళే సమయం అయ్యింది.

పిల్లలందరు ఒకేసారి: నాన్నమ్మ ధన్యవాదాలు.

మూలము : http://pillai.koyil.org/index.php/2019/02/beginners-guide-vedhanthacharyar/

పొందుపరిచిన స్థానము http://pillai.koyil.org

ప్రమేయము (గమ్యము) – http://koyil.org
ప్రమాణము (ప్రమాణ గ్రంథములు) – http://granthams.koyil.org
ప్రమాత (ఆచార్యులు) – http://acharyas.koyil.org
శ్రీవైష్ణవ విద్య / పిల్లల కోసం– http://pillai.koyil.org

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – கைங்கர்யம் (தொண்டு)

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ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

<< அனுஷ்டானம்

வ்யாசன், பராசரன், அத்துழாய், வேதவல்லி நால்வரும் ஆண்டாள் பாட்டியின் அகத்திற்கு வருகிறார்கள்.

பாட்டி : வாருங்கள் குழந்தைகளே . கை கால்களை அலம்பிக்கொள்ளுங்கள். நான் உங்களுக்குப் பெருமாள் அமுது செய்த பழங்களைத் தருகிறேன். ஆளவந்தார் திருநக்ஷத்ரத்தை நன்கு கொண்டாடினீர்களா ?

பராசரன் : மிகவும் சிறப்பாகக் கொண்டாடினோம் பாட்டி. ஆளவந்தார் ஸந்நிதிக்குச் சென்று ஸேவித்தோம்🙏. அங்கு திருநக்ஷத்ர வைபவத்தை வெகு விமரிசையாகக் கொண்டாடினார்கள். எங்கள் அப்பா ஆளவந்தாரின் வாழித் திருநாமத்தை எங்களுக்குக் கற்றுக்கொடுத்தார். அதை எங்கள் அகத்தில் நாங்கள் ஸேவித்தோம் பாட்டி.

பாட்டி : கேட்பதற்கு மிகவும் மகிழ்ச்சியாக இருக்கிறது😊

வேதவல்லி : பாட்டி , போனமுறை நீங்கள் எங்களுக்குக் கைங்கர்யத்தின் மேன்மையைப் பற்றிக் கூறுவதாகச் சொன்னீர்களே , நினைவிருக்கிறதா?

பாட்டி : ஆமாம் ! எனக்கு நன்றாக நினைவிருக்கிறது. நீங்கள் ஞாபகமாய் கேட்பது எனக்கு மகிழ்வளிக்கிறது. கைங்கர்யம் என்பது எம்பெருமானுக்கும் அவன் அடியவர்களுக்கும் செய்யும் தொண்டு. நாம் செய்யும் கைங்கர்யமானது எம்பெருமானுடைய திருவுள்ள உகப்பிற்காகவும், திருமுக மலர்ச்சிக்காகவும் இருத்தல் வேண்டும்.

வ்யாசன்: எம்பெருமானுக்குத் திருவுள்ளம் உகக்கும் என்றால் , எங்களுக்கும் கைங்கர்யம் செய்ய வேண்டும் என்று மிகவும் ஆசையாக இருக்கிறது. எவ்வாறு அவனுக்குக் கைங்கர்யம் செய்யலாம் பாட்டி?

பாட்டி : நாம் மனத்தினாலும், வாக்கினாலும், சரீரத்தாலும் எம்பெருமானுக்குக் கைங்கர்யங்கள் செய்யலாம். இதனையே ஆண்டாள் நாச்சியாரும் தன் திருப்பாவை ஐந்தாம் பாசுரத்தில் வாயினால் பாடி, மனத்தினால் சிந்தித்து, தூமலர் தூவித்தொழுது எம்பெருமானின் திருவுள்ளத்தை உகக்கச் செய்யலாம் என்று கூறுகிறாள். எம்பெருமானுடைய திருக்கல்யாண குணங்களை மனத்தினால் சிந்திப்பது மானசீக கைங்கர்யம் ஆகும். அவனுடைய திருநாமங்களை வாயாரப் பாடுவதும் அவனைப் பற்றியும் , அவன் அடியார்களின் மேன்மையை பற்றிப் பேசுவதும் , மிக முக்கியமாக ஆழ்வார்களின் அருளிச்செயல்களையும் பூர்வாசார்யர்கள் அருளிச்செய்த ஸ்தோத்ரங்களையும் பாடுவதால் எம்பெருமான் மிகவும் ப்ரீதி அடைகின்றான். அதுவே நாம் அவனுக்குச் செய்யும் வாசிக கைங்கர்யம். அவன் எழுந்தருளியிருக்கும் இடத்தைத் தூய்மைப் படுத்துதல், கோலமிடுதல், புஷ்பம் / மாலை தொடுத்தல், சந்தனம் அரைத்துக் கொடுத்தல் போன்றவை அவனுக்கு நாம் செய்யும் சரீர கைங்கர்யங்களாகும். நீங்கள் இக்கைங்கர்யங்களை உங்கள் அகத்தில் எழுந்தருளியிருக்கும் எம்பெருமானுக்கும் அவசியம் செய்யவேண்டும்.

பராசரன்: மிகவும் அழகாக விளக்கினீர்கள் பாட்டி. எங்கள் அப்பா செய்யும் திருவாராதனத்தில் நாங்கள் ஆசையாகப் பங்கு கொள்வோம்.

பாட்டி : மிக்க மகிழ்ச்சி☺️. நீங்கள் உங்களால் இயன்ற கைங்கர்யங்களை உங்கள் அகத்து எம்பெருமானுக்குச் செய்ய வேண்டும். சிறு பிள்ளைகள் செய்யும் கைங்கர்யத்தை எம்பெருமான் மிகவும் உகப்போடு ஏற்றுக் கொள்வான்.

அத்துழாய் : நானும் வேதவல்லியும் கோலமிடுதல் , புஷ்பம் தொடுத்தல் போன்ற கைங்கர்யங்களில் ஈடுபடுவோம் பாட்டி .

பாட்டி : மிக்க மகிழ்ச்சி☺️. மிகவும் முக்கியமாக, எம்பெருமானுக்குக் கைங்கர்யம் செய்வதை விட அவன் அடியார்களுக்கு அவர்கள் திருவுள்ளம் உகக்கும்படி நாம் கைங்கர்யங்கள் செய்ய வேண்டும். {இதற்கு உதாரணம்} எம்பெருமான் ஸ்ரீராமனுக்கு லக்ஷ்மணன் அனைத்துவித கைங்கர்யங்களையும் செய்தான் (பகவத் கைங்கர்யம்). ஆனால் சத்ருக்னன் எம்பெருமான் ஸ்ரீராமனின் அடியவனான பரதாழ்வானுக்குக் கைங்கர்யம் செய்தான் (பாகவத கைங்கர்யம்). {மற்றொரு உதாரணம்} நம்மாழ்வார் உண்ணும் சோறும், பருகும் நீரும் , திண்ணும் வெற்றிலை எல்லாம் கண்ணன் எம்பெருமான் என்றிருந்தார். ஆனால் மதுரகவி ஆழ்வாரோ தேவுமற்றறியேன் குருகூர் நம்பி என நம்மாழ்வாரைத் தவிர வேறொன்றும் அறியாதவராக வாழ்ந்தார். இதன் மூலமாக அவன் அடியவர்களுக்கு அடியவர்களாய் இருப்பதே எம்பெருமானின் திருவுள்ளத்தை மகிழ்விக்கும் எனத் தெளிவாகிறது.

அத்துழாய்: நீங்கள் சொன்னதைப் போல எம்பெருமானின் அடியவர்களுக்கு அடியவர்களாய் நாங்கள் இருந்து எம்பெருமானின் திருவுள்ளத்தை உகக்கச் செய்வோம் பாட்டி. அவர்களுக்கு எவ்வாறு கைங்கர்யம் செய்ய வேண்டும்?

பாட்டி: எம்பெருமானுடைய அடியவர்கள் நம் குடிசைக்கு (தங்கள் அகத்தை குடிசை என்று கூறுவது ஸ்ரீவைஷ்ணவர்களின் மரபு) எழுந்தருளும்போது அவர்களைச் சேவித்து வரவேற்க வேண்டும். அவர்களுக்கு வேண்டிய உதவிகளை மிகவும் பணிவுடன் செய்ய வேண்டும். அவர்களிடமிருந்து எம்பெருமான் , ஆழ்வார் , ஆசார்யர்களின் வைபவங்களைக் கேட்டுத் தெரிந்து கொள்வது மிகவும் சிறப்பாகும். இது போன்ற பல வழிகளில் நாம் எம்பெருமானுடைய அடியவர்களுக்குக் கைங்கர்யம் செய்யலாம்.

அத்துழாய்: தாங்கள் கூறியதை நினைவில் கொண்டு எம்பெருமானுடைய அடியவர்களின் கைங்கர்யங்களில் எங்களை நிச்சயமாக ஈடுபடுத்திக் கொள்வோம் பாட்டி

மற்ற மூவரும் ஆம் என்றனர்.

பாட்டி: மிக நல்லது குழந்தைகளே. நீங்கள் ஆர்வமாக நான் சொல்வதைக் கேட்பது மிக்க மகிழ்ச்சி அளிக்கிறது☺️.

வேதவல்லி : நீங்கள் கூறுவதைக் கேட்பதற்கு மிகவும் சுவாரசியமாக இருக்கிறது. மேலும் சொல்லுங்களேன் பாட்டி.

பாட்டி: நீங்கள் அடுத்தமுறை வரும்போது எம்பெருமானிடமும் , அவன் அடியவர்களிடமும் செய்யக் கூடாத அபச்சாரங்களைப் பற்றிக் கூறுகிறேன். இப்போது இருட்டி விட்டதால் உங்கள் அகத்திற்குப் புறப்படுங்கள்.

குழந்தைகள் பாட்டி கூறியதை எண்ணியவாறு தங்கள் அகத்திற்குப் புறப்பட்டனர்.

அடியேன் ஸாரநாயகி ராமானுஜ தாசி 🙏

ஆதாரம் :  http://pillai.koyil.org/index.php/2018/10/beginners-guide-kainkaryam/

வலைத்தளம் – http://pillai.koyil.org/

ப்ரமேயம் (குறிக்கோள்) – http://koyil.org
ப்ரமாணம் (க்ரந்தங்கள்) – http://granthams.koyil.org
ப்ரமாதா (ஆசார்யர்கள்) – http://acharyas.koyil.org
ஸ்ரீவைஷ்ணவக் கல்வி வலைத்தளம் – http://pillai.koyil.org/

Beginner’s guide – vEdhAnthAchAryar

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

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ANdAL pAtti was wreathing a garland and watching the passersby walking to the temple, from her home. She caught the children running to her home by the corner of her eye and smiled to herself. She adorned periya perumAL and thAyAr’s picture with the garland and welcomed them.

pAtti: Come in children. Do you know whom are we going to discuss about today?

All children in Chorus: vEdhAnthAchAryar

pAtti: Yes. Do you know who named him so?

vyAsA: periya perumAL named him as vEdhAnthAchAryar. Is that right pAtti?

pAtti: Right, vyAsA. His birth name was vEnkatanAthan. He was born in kAnchIpuram to the divine couple anantha sUri and thOthArambai.

parAsaran: Tell us more about his initiation into our sampradAyam, pAtti.

pAtti: Sure, parAsara. In the kAlakshEpa ghoshti of NadaadUr Ammal, there was a a famous Srivaishnava named kidAmbi appuLLAr. When vEdhAnthAchAryar was young he went with his maternal uncle (Sri kidAmbi appuLAr) to attend Sri nadAdhUr ammAL’s kAlakshEpa goshti. Sri nadAdhUr ammAL had blessed him at that time that he will establish well and clear all the oppositions of viSishtAdhvaitha Srivaishnava sidhdhAntham.

aththuzhAy : Wow! Indeed his blessing came true!

pAtti (with a beaming smile): Yes, aththuzhAy. The blessings of elders will never go unfulfilled.

vEdhavalli: I heard he is an incarnation of the holy bell of thiruvEnkadamudaiyAn. Is that right, pAtti?

pAtti: Yes, you are right, aththuzhAy. He has written more than a hundred granthams in samskrutham, thamizh and maNipravALam.

vyAsAn: Wow! A hundred ?

pAtti: Yes, some of the important ones are thAthparya chandhrikai (a commentary on SrI bhagavath gIthA), thathvateekai, nyAya sidhdhAnjanam, Satha dhUshani and AhAra niyamam (a commentary on food habits).

parAsaran: PAtti, I cannot stop wondering about how can one person write basic granthams for eating habits and also write about complex philosophical commentaries at the same time.

pAtti: Our pUrvAchAryas’ knowledge was as deep as the ocean, parASara! No wonder, he was conferred the title ‘sarva-thanthra-svathanthra’ (master of all arts and crafts) by our own thAyAr (SrI ranganAachchiyAr).

aththuzhAy : Tell us more, pAtti. It is interesting to hear all these facts about him

pAtti: vEdhAnthAchAryar was also known as ‘kavithArkika kEsari’  (lion amongst poets). He once won over an advaithi named krishNamiSra after a long debate of 18 days. He composed ‘pAdhuka sahasram’ when challenged by a vain Poet. This is a 1008 verse poem praising the divine sandals of Lord ranganAtha.

srivedanthachariar_kachi_img_0065.jpg (376×501)
kAnchi thUppuL vEdAnthAchAryar during avathAra uthsavam

vEdhavalli: That is impressive! We are indeed blessed to have such noble Acharyas who had such humility despite such phenomenal accomplishments.

pAtti: Well said, vEdhavalli. vEdhAntha dhESikan and many other contemporary Acharyas had mutual love and reverence for each other. In his abhithistavamhe asks Lord ranganAtha “Oh Lord! let me reside in SrIrangam at the feet of the great ones who are mutual well-wishers’. maNavALa mAmunigaL, eRumbi appA, vAdhikESari azhagiya maNavALa jIyar, dhoddAcharyar of choLasimhapuram (Sholingur) have all quoted his granthams in their works. vEdhAntha dhESikan himself had great admiration for piLLai lOkAchAryar , which can be easily understood from the grantham he composed called “lOkAchArya panchAsath”. This grantham is recited regularly in thirunArAyaNapuram (Melkote, Karnataka).

parAsaran: How did vEdhAnthAchAryar regard Sri Ramanujar?

pAtti: Sri vEdhAnthAchAryar’s devotion to Sri rAmanujar is very well known; in his ‘nyAsa thilakA’ in the verse starting ‘ukthya dhananjaya…’ he pacifies perumAL for having indirectly told him that mOksham need not be granted by Him, as it had already been guaranteed to him by his connection with Sri rAmAnujar.

vyAsa: There is so much to learn about our AcharyAs, pAtti!

pAtti: Yes, vEdhAnthAchArya Vijaya’ also known as ‘AchArya-champu’, written in Sanskrit in the form of prose and verse, by a great scholar and poet named ‘kouSika kavithArkikasimha vEdanthAcharyar’, who lived around 1717 CE gives a good glimpse into the life and works of vEdhAntha dhESikan

aththuzhAy : Oh, nice! pAtti, today we learnt about vEdhAnthAchAryar’s literary prowess in samskrutham and thamizh, his humility and bhakthi. We are truly blessed to follow such a great example.

pAtti: Yes, children. Let us remember such great souls always! We will meet again tomorrow. Its time for you all to go home.

Children (in chorus): Thank you pAtti!

adiyen bhArgavi rAmAnuja dasi

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – அனுஷ்டானம்

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ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

<< அஷ்டதிக்கஜங்கள் மற்றும் சில ஆசார்யர்கள்

பராசரன் வ்யாசன் வேதவல்லி அத்துழாய் நால்வரும் ஆண்டாள் பாட்டியின் அகத்திற்கு வருகிறார்கள்.

பாட்டி : வாருங்கள் குழந்தைகளே. கை கால்களை அலம்பிக் கொள்ளுங்கள். நான் உங்களுக்கு பெருமாள் அமுது செய்த பழங்களைத் தருகிறேன். இந்த மாதத்தின் சிறப்பு என்னவென்று தெரியுமா?

வேதவல்லி : நான் சொல்கிறேன் பாட்டி. நீங்கள் எங்களுக்கு சொல்லியது
நினைவிருக்கிறது. சூடிக்கொடுத்த சுடர்க்கொடியான ஆண்டாள் நாச்சியார்
அவதரித்த மாதம் இது. ஆடி மாதம் பூரம் திருநக்ஷத்திரம் .
பராசரன் : ஆமாம். மேலும் ஸ்வாமி நாதமுனிகளின் திருப்பேரன் ஆளவந்தாரும்
இதே மாதத்தில் தான் அவதரித்தார். ஆடி மாதம் உத்திராடம் திருநக்ஷத்ரம். சரியா
பாட்டி ?
பாட்டி : மிகச்சரியாகச் சொன்னீர்கள். அடுத்ததாக தினசரி நாம் கடைப்பிடிக்க
வேண்டிய அனுஷ்டானங்களைப் பற்றித் தெரிந்து கொள்ளலாம்.
அத்துழாய் : அனுஷ்டானம் என்றால் என்ன பாட்டி ?
பாட்டி : சாஸ்த்ரம் நமக்கு விதிக்கப்பட்டுள்ள விதிமுறைகளைக் கடைப்பிடிப்பதே
அனுஷ்டானம். உதாரணத்திற்கு நாம் அதிகாலையில் எழுந்து நீராடவேண்டும் என்று
சாஸ்த்ரம் விதித்துள்ளது. இதனை ஆண்டாள் நாச்சியாரும் தன் திருப்பாவையில்
நாட்காலே நீராடி என்று குறிப்பிட்டுள்ளாள்.
வியாசன் : ஆம் பாட்டி எனக்கு நினைவிருக்கிறது. திருப்பாவை இரண்டாவது
பாசுரத்தில் நாட்காலே நீராடி என்ற வரி வருகிறது.
பாட்டி : மிகச்சரி ! அதிகாலையில் நாம் எழுந்து எம்பெருமானுடைய
திருநாமங்களைச் சொல்லுவதால் மனம் தூய்மை அடையும். நற்பண்புகளும்
வளரும். மிக முக்கியமாக அதிகாலையில் நீராடிய பிறகு திருமண்காப்பை
சாற்றிக்கொண்டு உபநயனம் ஆனவர்கள் ஸந்த்யாவந்தனம் முதலான நித்ய
கர்மானுஷ்டானங்களைச் செய்தல் வேண்டும்.
பராசரனும் வ்யாஸனும் : நீங்கள் சொல்லியபடி தவறாமல் நித்ய
கர்மானுஷ்டானங்களைக் கடைப்பிடிப்போம் பாட்டி.
பாட்டி : மிக்க மகிழ்ச்சி.
வேதவல்லி : நாங்கள் திருமண்காப்பை மிகவும் விருப்பத்துடன்
சாற்றிக்கொள்கிறோம் பாட்டி. மேலும் திருமண் காப்பு சாற்றிக்கொள்வதின்
மகத்துவத்தைச் சொல்லுங்கள் பாட்டி. கேட்க ஆவலாக இருக்கிறது.

பாட்டி : சொல்கிறேன் கேளுங்கள். திருமண்காப்பு / காப்பு என்பதற்க்கு ரக்ஷை
என்று பொருள். எம்பெருமானும் , பிராட்டியும் நம்முடன் நித்ய வாஸம் செய்து
நம்மை பாதுகாக்கின்றனர். மேலும் திருமண்காப்பை சாற்றிக்கொள்வதன் மூலமாக
எம்பெருமானுக்கும் , பிராட்டிக்கும் நாம் தாஸபூதர்கள் என்பது உறுதியாகிறது.
ஆதலால் அதை சாற்றிக்கொள்ளும் பொழுது பக்தியுடனும் , பெருமையுடனும்
இருப்பது மிக அவசியமாகும் .
வேதவல்லி : திருமண்காப்பின் ஏற்றம் நன்கு விளங்கியது பாட்டி. கேட்பதற்கும்
இனிமையாக இருந்தது.
மற்ற மூவரும் ஆம் என்றனர் .
பாட்டி : மிகவும் நல்லது குழந்தைகளே. இது போல நம் நன்மைக்காக சாஸ்த்ரம்
பலவற்றை விதித்துள்ளது. அவற்றுள் சிலவற்றைக் கூறுகிறேன். கவனமாகக்
கேளுங்கள். நாம் உணவு உண்ணுவதற்கு முன்னும் பின்னும் கை கால்களை
அலம்பிக் கொண்டு தான் உணவு உட்கொள்ள வேண்டும். ஏனென்றால் நாம்
தூய்மையாக இருந்தால் தான் நம் உடல் ஆரோக்கியத்திற்கு நல்லது. மிக
முக்கியமாக பெருமாளுக்கு அமுது செய்த ப்ரசாதத்தை மட்டுமே உட்கொள்ள
வேண்டும். நாம் உண்ணும் உணவு தான் நம்முடைய குணத்தை நிர்ணயிக்கிறது.
பெருமாளுக்கு அமுது செய்த ப்ரசாதத்தை உண்ணுவதால் அவர் க்ருபையால் ஸத்வ
குணம் வளரும்.
பராசரன் : எங்கள் அகத்தில் அம்மா செய்யும் தளிகையை எங்கள் அப்பா
திருவாராதனத்தின் பொழுது கண்டருளப்பண்ணுவார். நாங்கள் பெருமாள் தீர்த்தம்
பெற்றுக் கொண்ட பிறகே பிரசாதத்தை உண்ணுவோம்.
பாட்டி : நல்ல பழக்கம். விடாமல் கடைப்பிடிக்க வேண்டும் குழந்தைகளே.
நால்வரும் சரி பாட்டி என்றனர்.
பாட்டி : மேலும் நாம் உணவு உட்கொள்ளுவதற்கு முன் ஆழ்வார் பாசுரம் சிலவற்றை
ஸேவிக்க வேண்டும். நம் வயிற்றிற்கு உணவு எம்பெருமானுக்கு அமுதுசெய்த
ப்ரசாதம். நம் நாவிற்கு உணவு என்னவென்று தெரியுமா?
அத்துழாய் : நாவிற்கு உணவா ? என்னவென்று சொல்லுங்கள் பாட்டி
பாட்டி : ஆம் எம்பெருமானுடைய திருநாமத்தைச் சொல்லுவதே நாவிற்கு உணவு. மதுரகவி ஆழ்வார் நம்மாழ்வாரையே தெய்வமாகக் கொண்டவர். அவர் தன்னுடைய
கண்ணிநுண் சிறுத்தாம்பு பாசுரத்தில் தென்குருகூர் நம்பி அதாவது ஆழ்வார்
திருநாமத்தைச் சொல்லும் பொழுது நாவிற்கு அமுதமாக இருக்கிறது என்கிறார்.

வேதவல்லி: மிக அழகாக விளக்கினீர்கள் பாட்டி. இனி நாங்களும் கண்ணிநுண்சிறுத்தாம்பு ஸேவித்தப் பிறகே உணவு உட்கொள்கிறோம். எங்கள் நாவிற்கும் உணவாகிவிடும் .

பாட்டி : மிக நல்லது வேதவல்லி
வியாசன் : நீங்கள் கூறுவதைக் கேட்பதற்கு மிகவும் சுவாரசியமாக இருக்கிறது
பாட்டி. மேலும் சொல்லுங்களேன்.
பாட்டி : நீங்கள் அடுத்த முறை வரும்பொழுது கைங்கர்யத்தின்
மேன்மையைப்பற்றிக் கூறுகிறேன். இப்பொழுது இருட்டி விட்டதால் உங்கள்
அகத்திற்குப் புறப்படுங்கள்.
குழந்தைகள் பாட்டி கூறியதை எண்ணியவாறு தங்கள் அகத்திற்குப் புறப்பட்டனர்.
அடியேன் ஸாரநாயகி ராமானுஜ தாசி

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