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Posters – thiruvAimozhi nURRandhAdhi

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Posters – திருவாய்மொழி நூற்றந்தாதி

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Learn Arththi prabandham (ஆர்த்தி ப்ரபந்தம்)

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

ramanuja-srirangam SrI rAmAnuja – SrIrangam

mamunigal-srirangammaNavALa mAmunigaL – SrIrangam

Arththi prabandham is a beautiful literature where mAmunigaL presents the state of an adhikAri (qualified person) who craves for eternal servitude towards bhagavath rAmAnuja. This must be heard and learned after undergoing pancha samskAram only.

Author – maNavALa mAmunigaL

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .


Part 1-thaniyans and pAsurams 1 to 10
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 2-pAsurams 11 to 20
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 3-pAsurams 21 to 30
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4

Santhai Recordings

Meanings (discourses)

Lectures  (விரிவுரை) in thamizh based on vyAkyAnam of piLLai lOkam jIyar

முன்னுரை
தனியன்கள்
அவதாரிகை
பாசுரம் 1
பாசுரம் 2
பாசுரம் 3
பாசுரம் 4
பாசுரம் 5
பாசுரம் 6-10
பாசுரம் 11
பாசுரம் 12
பாசுரம் 13
பாசுரம் 14
பாசுரம் 15-18
பாசுரம் 19-21
பாசுரம் 22
பாசுரம் 23
பாசுரம் 24
பாசுரம் 25-26
பாசுரம் 27-28

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Meanings (translation)

श्रीवैष्णव – बालपाठ- वेदांताचार्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी एक माला बना रही थी और आने जाने वालो को अपने घर से मंदिर जाते हुए देख रही थी। उन्होंने अपनी आंखों के एक कोने से अपने घर में भाग रहे बच्चों को पकड़ा और खुद मुस्कुराई। उन्होंने पेरिया पेरुमाल और थायार की तस्वीर को माला से सजाया और उनका स्वागत किया।

दादी : आओ बच्चों । क्या आप जानते हैं कि आज हम किसके बारे में चर्चा करने वाले हैं?

सभी बच्चे एक साथ बोलते है की वेदांताचार्य स्वामीजी के बारे में |

दादी: हाँ, क्या आप जानते हो की उनका यह नाम किसने दिया ?

व्यास : उनका ‘वेदांताचार्य’ नाम श्री रंगनाथ ने दिया | दादी, क्या यह सही है।

दादी : बिलकुल ठीक , व्यास । उनके जन्म का नाम वेंकटनाथन था। उनका जन्म कांचीपुरम में दिव्य दंपति अनंत सुरी और तोतारम्बाई से हुआ था।

पराशर : दादी हमें बताये ‘वेदांताचार्य’ स्वामी जी कैसे सम्प्रदाय में आये ?

दादी : जरूर पराशर | जब वेदांताचार्य छोटे थे, वे अपने मामा श्री किदाम्बी अप्पुलार के साथ श्री नदादूर अम्माल की कालक्षेप गोष्ठी में सम्मिलित होने गये थे। इसका उल्लेख करते हुए वेदांताचार्य कहते हैं कि श्री नदादूर अम्माल ने उन पर कृपा कर कहा कि सत्य की स्थापना करेंगे और विशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव सिद्धांत के सभी विरोधियों को समाप्त करेंगे।

अतुलाय : यकीनन , उनके आशीर्वाद से ही यह सब हुआ !

दादी (मुस्कराते हुए ) : हाँ अतुलाय | बड़ो का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता |

वेदवल्ली : मैंने सुना है की वेदांताचार्य स्वमीज श्रीनिवास् भगवान् की पवित्र घंटी के अवतार थे | सही न दादी जी ?

दादी : हाँ, आप सही कह रहे है अतुलाय | उन्होंने सौ से ज्यादा ग्रन्थ संस्कृत, तमिल एवं मणिप्रवाल भाषा में लिखे है |

व्यास : सच में सौ से ज्यादा ग्रन्थ ?

दादी : हाँ, उनके प्रमुख ग्रंथों में से कुछ निम्न है – तात्पर्य चन्द्रिका, (गीता भाष्य का व्याख्यान है), तत्वटीका (श्री भाष्य के एक खंड का व्याख्यान), न्याय सिद्धज्ञानं (हमारे संप्रदाय की सिद्धांत का विश्लेषण करता है), सदा दूषणी (अद्वैत सिद्धांत के विरुद्ध है), आहार नियम(अनुशंसित भोजन की आदतों पर एक तमिल लेख) |

परशार : दादीजी , मै आश्चर्य चकित होने से अपने आपको रोक नही पा रहा हु की कैसे स्वामीजी आहार नियम पर ग्रन्थ लिखा और कैसे एक ही समय में जटिल दार्शनिक टिप्पणियों के बारे में लिखें।

दादी : हमारे पूर्वाचार्यो का ज्ञान सागर के समान गहरा था | पराशर, इस में कोई संदेह नहीं, ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’ (सभी कला और शिल्प के स्वामी), यह नाम श्री रंग नाच्चियार (श्री महालक्ष्मी जी) ने प्रदान किया।

अतुलाय : दादी जी हमें और बताइये| उसके बारे में ये सारे तथ्य सुनना दिलचस्प है|

दादी : ‘वेदांताचार्य’ स्वामीजी को ‘कवितार्किक केसरी’ (कवियों के बीच शेर) नाम से भी जाना जाते थे| उन्होंने एक बार 18 दिनों की लंबी बहस के बाद कृष्णमिस्रा नामक एक अद्वैती पर जीत हासिल की। एक अहंकारी और खोखला कवि द्वारा चुनौती दिए जाने पर उन्होंने ‘पादुका सहस्रम’ की रचना की। यह एक 1008 पद्य कविता है जो भगवान श्री रंगनाथ की दिव्य चरण की प्रशंसा करते है।

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अवतार उत्सव के समय कञ्चि वेदन्ताचर्य

वेदवल्ली : यह गंभीर है! हम वास्तव में ऐसे महान आचार्यों के लिए धन्य हैं जो ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धियों के बावजूद ऐसी विनम्रता रखते थे।

दादी : ठीक कहा वेदवल्ली | श्री वेदांताचार्य को भी, अपने पूर्वाचार्यों और समकालीन आचार्यों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था, जिसका प्रमाण उनकी “अभितिस्तव्” में मिलता है, “कवचं रंगमुक्ये विभो ! परस्पर-हितैषीणाम् परिसरेशु माम् वर्त्य” , (हे भगवान! कृपया मुझे श्रीरंगम में उन महान भागवतों के चरणों में निवास प्रदान करे जो परस्पर एक दुसरे के शुभ चिन्तक हैं)। कई अन्य आचार्यों और विद्वानों ने जैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी), एऱुम्बि अप्पा, वादिकेसरी अऴगिय मणवाळ जीयर, चोलसिंहपुर (शोलिंगुर) के स्वामी डोड्डाचार्य  जी ने वेदांताचार्य के ग्रंथों पर व्याख्यान लिखा है या उनका उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है । वेदांताचार्य ने पिल्लै लोकाचार्य की प्रशंसा में ‘लोकाचार्य पंचासत’ नामक एक सुंदर प्रबंध कि रचना की। वेदांताचार्य, पिल्लै लोकाचार्य से आयु में 50 वर्ष छोटे थे और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे जिसे इस ग्रंथ के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है; इस ग्रंथ का आज भी तिरुनारायणपुरम (मेलकोट, कर्नाटक) में नियमित रूप से पाठ किया जाता है।

पाराशर : वेदांताचार्य स्वामी जी ने श्री रामानुजार जी को कैसे मानते थे ?

दादी : श्री वेदांताचार्य की श्री रामानुज के प्रति भक्ति को सभी भली प्रकार जानते हैं; अपने ग्रंथ “न्यास तिलका” की प्रारंभिक कविता “उक्त्य धनंजय” में, वे संतुष्टी करते हैं कि भगवान परोक्ष रूप में उन्हें यह बताते हैं की उनके द्वारा मोक्ष दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, क्यों कि श्री रामानुज के संबंध मात्र से ही उन्हें मोक्ष मिलने का निर्धारण हो गया है।

व्यास : दादी जी अपने सम्प्रदाय के आचार्यो के प्रति बहुत कुछ सीखने को है |

दादी : हाँ, एक रचना, वेदांताचार्य विजय (आचार्य चंपू) का उल्लेख करते हैं, जो गद्य और कविता के रूप में संस्कृत भाषा में महान विद्वान और कवि “कौशिक कवितार्किकसिंह वेदंताचार्य” द्वारा लिखी गयी है, जो लगभग 1717 AD के समय में हुए। इस रचना को वेदांताचार्य के जीवन का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमाणिक अभिलेख माना जाता है।

अतुलाय : अति सुन्दर दादी जी , आज हमने वेदांताचार्य स्वामीजी के संस्कृत एवं तमिल ग्रंथो के बारे में जाना, उनकी विनम्रता और भक्ति के बारे में भी जाना | ऐसे महान उदाहरण का अनुसरण करने के लिए हम वास्तव में धन्य हैं।

दादी : हाँ बच्चो हम ऐसी महान आत्माओं को हमेशा याद करते हैं! हम कल फिर मिलेंगे। आप सभी के घर जाने का समय हो गया है।

बच्चे एक साथ दादी जी का धन्यवाद करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2019/02/beginners-guide-vedhanthacharyar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Learn SrIvachana bhUshaNam (ஸ்ரீவசன பூஷணம்)

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunnama:

 piLLai lOkAchAryar, maNavALa mAmunigaL – SrIperumbUthUr

SrIvachana bhUshaNam is the most important granthantham which should be learned by every SrIvaishNava who has undergone pancha samskAram (samASrayaNam), with proper guidance. This must be heard and learned after undergoing pancha samskAram only.

Author – piLLai lOkAchAryar

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .


santhai

Part 1 – thaniyans
step 1 of 3
step 2 of 3
step 3 of 3
Part 2 – sUthrams 1 – 15
step 1 of 3
step 2 of 3
step 3 of 3
step 3 of 3
Part 3 – sUthrams 16 – 30
step 1 of 3

Audio (MP3 files)

Meanings (discourses)

Lectures  (விரிவுரை) in thamizh

அறிமுகம்
தனியன்கள்
அவதாரிகை-1
அவதாரிகை-2
அவதாரிகை-3
ஸுத்ரம் 1
ஸூத்ரம் 2 – 4
ஸூத்ரம் 5
ஸூத்ரம் 6
ஸூத்ரம் 7
ஸூத்ரம் 8
ஸூத்ரம் 9-10
ஸூத்ரம் 11-13
ஸூத்ரம் 14
ஸூத்ரம் 15-17
ஸூத்ரம் 18-21
ஸூத்ரம் 22
ஸூத்ரம் 23-27
ஸூத்ரம் 28-33
ஸூத்ரம் 34-38
ஸூத்ரம் 39-40
ஸூத்ரம் 41-44
ஸூத்ரம் 44-48
ஸூத்ரம் 49-50
ஸூத்ரம் 51-52

Lectures  (விரிவுரை) in English

SrIvachana bhUshaNam Introduction
SrIvachana bhUshaNam thaniyans
Srivachana bhUshaNam – sUthram 1
Srivachana bhUshaNam – sUthrams 2 – 4
Srivachana bhUshaNam – sUthram 5
Srivachana bhUshaNam – sUthram 6-7
Srivachana bhUshaNam – sUthram 8-9
Srivachana bhUshaNam – sUthram 10-13
Srivachana bhUshaNam – sUthram 14
Srivachana bhUshaNam – sUthram 15-17
Srivachana bhUshaNam – sUthram 18-22
Srivachana bhUshaNam – sUthram 23-27
Srivachana bhUshaNam – sUthram 28-31
Srivachana bhUshaNam – sUthram 32-36
Srivachana bhUshaNam – sUthram 37-39
Srivachana bhUshaNam – sUthram 40-43
Srivachana bhUshaNam – sUthram 44-48
Srivachana bhUshaNam – sUthram 49-52

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thamizh Lectures
English Lectures

श्रीवैष्णव – बालपाठ – तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी जी रसोई घर में खाना बनाने में व्यस्त थी जब बच्चे उनके घर में प्रवेश किये ताकि सब बच्चे लोकाचार्य स्वामीजी के शिष्यों के बारे में जान सके | आण्डाल दादी जी सभी बच्चो का मुस्कुराकर स्वागत करती है | दादीजी इस प्रतीक्षा में थी की श्रीरंगनाथ भगवान जी का प्रसाद बच्चो में वितरित कर सके |

दादी : आओ बच्चो | भगवान रंगनाथ जी का प्रसाद ग्रहण करे | आशा करती हूँ की आपको पूर्ववर्ती वाली चर्चा याद होगी |

व्यास : दादीजी , हमने कूर कुलोत्तम दासर्, विळान् चोलै पिल्लै, जी के बारे में सीखा और आचार्य अभिमान ही उठ्ठारगम के बारे में भी सीखा |

दादी : बहुत गर्व हुआ तुम पर बच्चो, आज में तुम्हें आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के एक शिष्य के बारे में बतायूंगी जिनका नाम तिरुमलै आऴ्वार था |

अतुलहाय : दादी, मैंने सुना है कि तिरुमलै आऴ्वार जी को नाम आऴ्वार रचित तिरुवाय्मोऴि के प्रति लगाव के कारण मिला। क्या मैं सही हूं!

दादी : आप बिलकुल सही कह रही हो अतुलहाय | वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए । तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया ।

व्यास : ओह ! दादी जी फिर तिरुमलै आऴ्वार को संप्रदाय में वापिस लेकर आये ?

दादी : बच्चो, में आपकी जिज्ञासा की प्रशंसा करती हूँ | पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

वेदवल्ली : दादी जी, कूरकुलोत्त्मदास जी ने तिरुमलै आऴ्वार को सुधारने के लिए क्या किया ? क्या आप हमें बता सकती है ?

दादी : हाँ ! एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये ।

पराशर : दादी जी हमें बताएं तिरुमलै आऴ्वार जी ने कूरकुलोत्त्मदास से कैसे सीखा ?

दादी : तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है, कूरकुलोत्तमदास जी ने देखा की तिरुमलै आऴ्वार पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी की तनियन पाठ करते हुए तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रबंधों का सारांश ज्ञान देने लगे । इसी दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशासनिक-कार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपना शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशासनिक-कार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरण कमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य जी का ध्यान करते हुए कूरकुलोत्त्मदास परमपद को प्राप्त हुए , तिरुमलैयाऴ्वार स्वामीजी ने ही कूरकुलोत्त्मदास स्वामीजी महारजा का चरम कैंकर्यं भव्य तरीके से (अंतिम क्रिया) किया |

व्यास : दादी जी, क्या तिरुमलै आऴ्वार हमारे सम्प्रदाय को आगे लेकर गए ?

दादी : नहीं व्यास, जैसे मैंने पहले कहा था की तिरुमलै आऴ्वार जी श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि सीखने गए थे | वह सभी पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना चाहता थे । तो श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै स्वामीजी ने उनको पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना के लिए थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी के पास भेजते है। दुर्भाग्य से उनके आगमन से ठीक पहले थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी परमपद को प्राप्त कर लेते है । तिरुमलै आऴ्वार बहुत परेशान हो जाते है और देव पेरुमल (काँची पुरम वरद स्वामीजी ) का मंगलाशाशनम करने का फैसला करते है।

पराशर : दादीजी , यह घटना रामानुज स्वामीजी की तरह ही है जब वह यामुनाचार्य स्वमीजी से मिलने गए थे, लेकिन इससे पहले कि रामानुजा स्वामजी आलवन्दार स्वामीजी से मिलते, आलवन्दार स्वामी जी परमपद प्राप्त कर लेते है । क्या मैं सही हूं?

दादीजी : बिलकुल सही कह रहे हो पराशर | तब वह देवपेरुमाळ स्वामीजी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, सभी उनका स्वागत करते है, देवपेरुमाळ स्वामीजी तिरुमलैयाऴ्वार जी को श्रीशठारी, माला, चन्दन का प्रसाद प्रदान करते है | देवपेरुमाळ स्वामीजी श्री नालूर पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है की वह तिरुमलैयाऴ्वार जी को दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सिखाये जिसमे तिरुवाय्मोऴि ईडुव्याख्यान जो की वह थिरुप्पुट्कुलि जीयर जी से नहीं सीख पाए |

श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने नालूरपिळ्ळै के पुत्र नालूर आच्चान पिळ्ळै को यह कार्य सौंपा । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे । नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मूल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै । तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है ।

व्यास : क्या अलवार तिरुनगरी नम्माऴ्वार की जन्मस्थली है ? मैंने सुना है की तिरुमलै आऴ्वार स्वमीजी ने ही अलवार तिरुनगरी को दुबारा बनाया था जब यह जीर्ण स्थिति में थी | कृपा करके हमें उस कथा के बारे में बताये दादीजी |

दादी : आप सही हो व्यास | जब तिरुमलै आऴ्वार अलवार तिरुनगरी में पहुँचते है | वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया)। इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरी लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरी के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरिक्त चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुक्त कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए । उनके बिना, हम उस आऴ्वार तिरुनगरी की कल्पना नहीं कर सकते जो आज हम देख रहे हैं और उसका आनंद ले रहे हैं।

Image result for manavala mamuni

तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्ण प्रेम भक्ति भाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर मे श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है । अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरिय पेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के प्रयासों से हमें 36000 ईडु व्याख्यान का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो बाद में अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ द्वारा व्यापक रूप से महान ऊंचाइयों तक फैला । तो बच्चों, चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

बच्चों ने धन्य महसूस किया और विचार-विमर्श करके अण्डाल दादी के घर को छोड़ कर अपने घर को जाते है ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2018/05/beginners-guide-thiruvaimozhip-pillai/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Posters – तिरुप्पळ्ळियेळुच्चि

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श्रीः  श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद् वरवरमुनये नमः

दिव्यप्रबन्धामृतम्

Thanks to Smt Vaishnavi for preparing the posters

श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य शिष्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ
पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के शिष्यों के बारे में जानने की जिज्ञासा के साथ प्रवेश करते हैं।

दादी : सुस्वागतम बच्चो, आप सब कैसे है ? मैं आप सभी के चेहरे पर उत्साह देख रही हूँ ।

व्यास : नमस्कार दादी जी, हम अच्छे हैं! दादी जी आप कैसे हैं? आप सही हैं हम बेसब्री से पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के बारे में सुनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

दादी : हाँ बच्चों, यहाँ तक कि मैं भी आप सभी के साथ साझा करने की प्रतीक्षा कर रही थी | आशा है कि आप सभी को हमारी पिचला चर्चा याद होगी। क्या कोई मुझे उनके शिष्यो के नाम बता सकता है?

अतुळाय : दादीजी से , मुझे नाम याद है | कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि |

दादी : अतुळाय बहुत सुन्दर , अच्छा लगा की आपको नाम स्मरण है ! अब हम इनके बारे में विवरण से चर्चा करते है | पहले में आपको कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में बताती हूँ |

सब बच्चे : अबश्य दादी जी |

दादी : कूर कुलोत्तम दास का जन्म श्रीरंगम में हुआ और वे कूर कुलोत्तम् नायन् के नाम से भी जाने जाते थे। | कूर कुलोत्तम दासर् ने तिरुमलै आलवार (तिरुवायमोली पिल्लै/ शैलेश स्वामीजी) को फिर से संप्रदाय में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पिल्लै लोकाचार्य के निकट सहयोगियों में से एक हैं और उन्होंने उनके साथ तिरुवरंगन उला (नम्पेरुमाल की कलाब काल की यात्रा) के दौरान यात्रा की थी। 

तिरुमलै आलवार को सुधारने के लिए किये गए उनके अनेक प्रयासों और पिल्लै लोकाचार्य से सीखे हुए दिव्य ज्ञान को तिरुमलै आलवार तक पहुंचाने में, उनके द्वारा की गयी असीम कृपा के कारण मामुनिगल, उनकी महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें “कूर कुलोत्तम् दासं उदारं” से संबोधित करते हैं (वह जो बहुत ही दयालु और उदार है)। रहस्य ग्रंथ कालक्षेप परंपरा में उनका एक महत्वपूर्ण स्थान है और उनकी महिमा का वर्णन रहस्य ग्रंथों की कई तनियों में किया गया है। श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, यह निर्णय किया गया है कि एक शिष्य के लिए “आचार्य अभिमानमे उत्थारगम्”। इसके व्याख्यान में मामुनिगल समझाते हैं कि एक प्रपन्न के लिए जिसने सभी अन्य उपायों का त्याग किया है, आचार्य कि निर्हेतुक कृपा और श्री आचार्य का यह विचार कि “यह मेरा शिष्य है“ ही मोक्ष का एक मात्र मार्ग है। पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर् और तिरुवाय्मोळि पिल्लै के चरित्र में हम यह स्पष्ट देख सकते हैं। यह पिल्लै लोकाचार्य का तिरुवाय्मोळि पिल्लै के प्रति अभिमान और कूर कुलोत्तम दासर् का अभिमान और अथक प्रयास है, जिन्होंने संप्रदाय को महान आचार्य तिरुवाय्मोळि पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) को दिए, जिन्होंने फिर संप्रदाय को अलगिय मणवाल मामुनिगल को दिए।| यह बिल्कुल कूर कुलोत्तम दासर और तिरुमलै आऴ्वार के लिए अनुकूल होता है । चलो आइए हम सब कूर कुलोत्तम दासर् का स्मरण करें जो सदा-सर्वदा पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के चरण कमलों का आश्रय लेते है।

वेदवल्ली : दादीजी , हम सब को कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में सुनकर बहुत प्रसनता हुई | हम सभी ने यह सीखा की शिष्य को कैसे अपने आचार्य का सम्मान करना चाहिए |

दादी : वेदवल्ली सबको “आचार्य अभिमानमे उतरागम ” स्मरण रहना चाहिए | अब हम पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी के दूसरे शिष्ये विळान चोलै पिळ्ळै जी के बारे में जानेंगे |

viLAnchOlai piLLai

व्यास : दादी, मैं यह पहले से जानता हुँ की उनको विळान चोलै पिळ्ळै नाम से क्यों जाना जाता था? क्यूंकि वह विल्लम वृक्ष पर चढ़कर पद्मनाभ स्वामी तिरुवनंतपुरम मंदिर का गोपुरम देखते थे | उनका जन्म ईलव कुल में हुआ था। अपने कुल के कारण वे मंदिर के अंदर नहीं जा सकते थे, इसलिए तिरुवनंतपुरम के अनंत पद्मनाभ मंदिर के गोपुर के दर्शन और मंगलाशासन के लिए वे अपने गाँव के विलम वृक्ष पर चढ़ जाया करते थे। विळान् चोलै पिल्लै ने ईदू, श्री भाष्य, तत्वत्रय और अन्य रहस्य ग्रंथ, अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनाराचार्य से सीखा, जो श्री पिल्लै लोकाचार्य के अनुज थे।

उन्होंने श्री वचन भूषण अपने आचार्य श्री पिल्लै लोकाचार्य से सीखा और वे उसके अर्थों में विशेषज्ञ (अधिकारी) माने जाते थे।

श्री विळान् चोलै पिल्लै ने “सप्तगाथा” कि रचन की जिस में उनके आचार्य के “श्री वचन भूषण” के सार तत्व का वर्णन है।

पराशर : विळान् चोलै पिल्लै के आचार्यत्व के प्रति लगाव को देखकर हम बहुत हैरान हैं।

दादी : हाँ पराशर ! अपने आचार्य के प्रति सबसे बड़े कैंकर्य स्वरुप, उन्होंने आचार्य द्वारा दिए हुए अंतिम निर्देशों का पालन किया – श्री पिल्लै लोकाचार्य चाहते थे कि उनके शिष्य, तिरुवाय्मोली पिल्लै (तिरुमलै आलवार/ शैलेश स्वामीजी) के समक्ष जायें और उन्हें इस सुनहरी वंशावली के अगले आचार्य के रूप में तैयार करें; श्री पिल्लै लोकाचार्य, विळान् चोलै पिल्लै को तिरुमलै आलवार को श्री वचन भूषण के अर्थ सिखाने के निर्देश देते हैं। बच्चो अब मैं विळान् चोलै पिल्लै के जीवन में घटित एक महत्वपूर्ण घटना को साझा करना चाहूंगी।

अतुलहाय : दादी , उस घटना के बारे में हमें बताएं |

दादी : मुझे ज्ञात है की आप सब बहुत उत्सुकता से उस घटना के बारे में जानना चाहते है और यह मेरा कर्त्तव्य है की में आपके साथ सतविषय के बारे में आपको बताऊँ, इसलिए ध्यान से सुने |

एक दिन नम्बूध्री, अनंत पद्मनाभ भगवान की आराधना करते हुए देखते हैं कि विळान् चोलै पिल्लै पूर्वी द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं, ध्वज स्तंभ और नरसिंह भगवान की सन्निधि को पार करते हुए वे उत्तर द्वार से गर्भ गृह में प्रवेश करते हुए “ओर्रै कल मण्डप” के समीप से सीढियाँ चढते हैं और भगवान के सेवा दर्शन देने वाली तीन खिडकियों में से उस खिड़की के समीप खड़े होते हैं जहाँ से भगवान के चरण कमलों के दर्शन होता है।

जब नम्बूध्री यह देखते हैं, वे सन्निधि के द्वार बंद करके मंदिर से बाहर आते हैं क्योंकि उस समय की रीती के अनुसार विळान् चोलै पिल्लै अपने कुल के कारण मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते थे।

उसी समय, विळान् चोलै पिल्लै के कुछ स्थानीय शिष्य मंदिर में पहुंचकर यह बताते हैं कि उनके आचार्य विळान् चोलै पिल्लै ने अपने आचार्य पिल्लै लोकाचार्य के चरणों में प्रस्थान किया!! और वे लोग विळान् चोलै पिल्लै के दिव्य विग्रह के लिए तिरु पारियट्टम और भगवान की फूल माला चाहते थे !! वे लोग मंदिर प्रवेश द्वार के समीप खड़े होकर रामानुज नूत्तन्दादि इयल आदि का पाठ करते हैं।

जब नमबूधिरी यह देखते हैं, उनके पूर्व में हुई गर्भगृह की घटना से बहुत अचंभा होते है और वे सभी को इसके बारे में बताते हैं!

जिस प्रकार तिरुप्पणालवार (योगिवाहन स्वामीजी) पेरिय कोइल में पेरिय पेरुमाल के श्री चरण कमलों में पहुंचे, उसी प्रकार यहाँ विळान् चोलै पिल्लै ने अनंत पद्मनाभ भगवान के श्री चरणों में प्रस्थान किया!

वेदवल्ली : दादी मैं विळान् चोलै पिल्लै के अंतिम क्षणों के बारे में सुनकर मेरे रोन्ते खडे होगये है ।

व्यास : जी हाँ, मेरी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह रहे है । यह वास्तव में बताता है कि कैसे “ईलव कुल” से एक व्यक्ति को हमारे संप्रदाय में महिमा मिलती है।

दादी : ठीक है बच्चों, आप सभी के साथ यह एक अच्छा समय था। आशा है कि आप सभी को याद होगा कि हमने आज क्या चर्चा की। अगली बार, मैं आपको तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) के बारे में विस्तार से बताउंगी , जल्द ही आप से मिलेंगे ।

सभी बच्चों ने पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ चर्चा करके दादी जी के घर को छोड़ दिया।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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Learn periya thirumozhi (பெரிய திருமொழி) – 6th centum

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SrI:  SrImathE Satak6OpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Thirunaraiyur, Sugandhagiri or Nachiyar Koil. Thirumangai Alwar composed  100 pasurams on this Kshetram. | Alwar, Fair grounds, Painting

Author – thirumangai AzhwAr (திருமங்கை ஆழ்வார்)

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .


periya thirumozhi (பெரிய திருமொழி)

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Part 1 – 6.1
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 2 – 6.2
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 3 – 6.3
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 4 – 6.4
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step 3 of 4
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Part 5 – 6.5
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Part 6 – 6.6
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step 3 of 4
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Part 7 – 6.7
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step 3 of 4
step 4 of 4
Part 8 – 6.8
step 1 of 4
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step 3 of 4
step 4 of 4
Part 9 – 6.9
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step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 10 – 6.10
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4

Audio

Meanings

Lectures  (விரிவுரை) in thamizh

6.1 அவதாரிகை மற்றும் பாசுரம் 6.1.1
பாசுரங்கள் 6.1.2 – 6.1.3
பாசுரங்கள் 6.1.4 – 6.1.6
பாசுரங்கள் 6.1.7 – 6.1.10
6.2 அவதாரிகை
பாசுரம் 6.2.1
பாசுரம் 6.2.2
பாசுரம் 6.2.3
பாசுரங்கள் 6.2.4 – 6.2.5
பாசுரங்கள் 6.2.6 – 6.2.7
பாசுரம்
6.2.8

அவதாரிகை 6.3,பாசுரம் 6.3.1
பாசுரம்
6.3.2

பாசுரங்கள் 6.3.3 – 6.3.4
பாசுரம்
6.3.5-6.3.7

பாசுரங்கள் 6.3.8 – 6.3.10
6.4 அவதாரிகை,பாசுரங்கள் 6.4.1 – 6.4.2
பாசுரங்கள் 6.4.3 – 6.4.6
பாசுரங்கள் 6.4.7 – 6.4.10
6.5 அவதாரிகை,6.5.1
பாசுரங்கள் 6.5.2 – 6.5.4
பாசுரங்கள் 6.5.5 – 6.5.7
பாசுரங்கள் 6.5.8-6.5.10
6.6 அவதாரிகை,6.6.1 – 6.6.3
பாசுரங்கள் 6.6.4-6.6.6
பாசுரங்கள் 6.6.7 – 6.6.10
6.7 அவதாரிகை,6.7.1 – 6.7.2
பாசுரங்கள் 6.7.3 – 6.7.5
பாசுரங்கள் 6.7.6- 6.7.7
பாசுரங்கள் 6.7.8 – 6.7.10
6.8 அவதாரிகை,6.8.1 – 6.8.3
பாசுரங்கள் 6.8.4- 6.8.5
பாசுரங்கள் 6.8.6- 6.8.10
6.9 அவதாரிகை, பாசுரம் 6.9.1
பாசுரங்கள் 6.9.2- 6.9.4
பாசுரங்கள் 6.9.5-6.9.8
பாசுரங்கள் 6.9.9- 6.9.10
6.10 அவதாரிகை,6.10.1 – 6.10.3
பாசுரங்கள் 6.10.4- 6.10.7
பாசுரங்கள் 6.10.8 – 6.10.10

Audio

Full Recital

பெரிய திருமொழி ஆறாம் பத்து/periya thirumozhi 6th centum – பாராயணம்/recital

Learn nAchchiyAr thirumozhi (நாச்சியார் திருமொழி)

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SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImath varavaramunayE nama:ANdAl_srIvilliputhur_pinterest.com_sreedevi_balaji

Author – ANdAL (ஆண்டாள்)

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .


Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

nAchchiyAr thirumozhi (நாச்சியார் திருமொழி)

Part 1 – padhigam 1- thaniyan
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 2 – padhigam 2
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 3 – padhigam 3
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 4 – padhigam 4
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 5 – padhigam 5
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 6 – padhigam 6
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4

Audio Downloads (Click the links to download the MP3 files and listen)

Meanings (thamizh discourses)

முன்னுரை
தனியன்கள்
பாசுரங்கள் 1.1 – 1.3

பாசுரம் 1.4
பாசுரம் 1.5

பாசுரங்கள் 1.6 – 1.10
பதிகம் 2 – அவதாரிகை

பாசுரங்கள் 2.1 – 2.2

பாசுரம் 2.3

பாசுரங்கள் 2.4 – 2.6

பாசுரங்கள் 2.7 – 2.10

பதிகம் 3 அவதாரிகை,3.1

பாசுரங்கள் 3.2 – 3.3

பாசுரங்கள் 3.4 – 3.6

பாசுரங்கள் 3.7 – 3.10

பதிகம் 4 அவதாரிகை,4.1 – 4.3

பாசுரங்கள் 4.4 – 4.5

பாசுரங்கள் 4.6- 4.8

பாசுரங்கள் 4.9 – 4.11

பதிகம் 5 அவதாரிகை,5.1

பாசுரம் 5.2

பாசுரங்கள் 5.3 – 5.5

பாசுரம் 5.6

பாசுரம் 5.7

பாசுரம் 5.8

பாசுரம் 5.9

பாசுரம் 5.10-5.11

பதிகம் 6 அவதாரிகை,6.1

பாசுரம் 6.2-6.3

பாசுரம் 6.4-6.7

பாசுரம் 6.8-6.11

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