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बालपाठ – मुदल् आऴ्वार – भाग 2

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बालपाठ

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आण्डाल दादी: व्यास और पराशर मुदल् आऴ्वार सन्निधि से बाहर निकलते हैं ।

पराशर: दादी, मुदल् आऴ्वार को देखकर अच्छा लगा । दादी क्या ये 3 आऴ्वार सदैव एक साथ रहते हैं?

आण्डाल दादी: यह अच्छा सवाल है । उनका एक साथ रहने का एक कारण है । मुझे कृपया समझाने दो । एक दिन भगवान की दिव्य योजना से, वे तिरुक्कोवलूर में एक के बाद एक पहुंचे। प्रचण्ड वायु का वह दिन था । उस दिन भारी वर्षा भी हुई थी । वहां एक ऋषि थे, जिनका नाम मृकर्ण्डु था, जिनका तिरुक्कोवलूर में एक आश्रम था । अपने आश्रम के सामने, एक छोटा सा शाला था । पहले पोईगै आऴ्वार शाला में पहुंचे और वर्षा से स्वयं को बचाने के लिए शाला में शरण लिए । थोड़ी देर के लिए पोईगै आऴ्वार शाला में लेटकर शयन किए ।

पराशर: केवल अकेले? उनको डर नहीं लगा?

आण्डाल दादी: नहीं पराशर । वह निर्भय है क्योंकि वह हमेशा प्रभु का चिन्तन करते हैं । उस समय, भूतद् आऴ्वार वर्षा में वहां पहुंचते हैं और शाला में प्रवेश करने की अनुमति का अनुरोध करते हैं । पोईगै आऴ्वार कहते है कि, “यहां सीमित स्थान है एक व्यक्ति शयन कर सकता है लेकिन दो व्यक्ति बैठ सकते हैं । कृपया पधारें । ” भूतद् आऴ्वार खुशी से प्रवेश करते है और वे दोनों अगल-बगल मे बैठते हैं । तत्पश्चात, वर्षा में भागते हुए पेयाऴ्वार, आश्रय इच्छुक, शाला में प्रवेश करने की अनुमति मांगते है । पोईगै आऴ्वार कहते हैं, “ठीक है, यहां सीमित स्थान है। एक व्यक्ति नीचे लेट सकता है, दो व्यक्ति बैठ सकते हैं और तीन व्यक्ति खड़े हो सकते हैं । कृपया पधारें । हम सभी खड़े हो सकते हैं । ” यह सुनते ही पेय-आऴ्वार, खुशी से शाला में प्रवेश करते है और वे सभी वर्षा के ठंडक में कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं । वे एक-दूसरे से बात करना शुरू करते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानते हैं और सार्वजनिक हित के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न होते हैं, वे भगवान् के सुंदर नाम, रूप, गुण, आदि के बारे में चर्चा करना प्रारम्भ करते हैं।

व्यास: वाह! यह बहुत अच्छा है। वास्तव में ईश्वरीय है । लेकिन दादी, यह और अच्छा होता, अगर भगवान् भी वहां उपस्थित होते, ठीक उसी तरह, जैसे ही वह हमें देखने के लिए यहां परिय पेरुमाळ् के रूप में है ।

आण्डाल दादी: रुको, घटना यहाँ समाप्त नहीं होती है । आपने अगले अनुक्रम को बहुत अच्छी तरह से अनुमान लगाया है । इस घटना क्रम में अधिक देवत्व है, अपने प्रिय भक्तों की सभा को देखकर, अब पेरूमाळ् भी इस का हिस्सा बनना चाहते है । पेरुमाळ् भी शाला में प्रवेश कर स्वयं को विवश करते है । अंधेरे होने और अचानक आश्रय शाला मे स्वयं को क्षेत्राभाव मे विवश मानकर, तीन आऴ्वार सोचते हैं – क्या हो रहा है यहाँ और किसने उनके ज्ञान के बिना शाला में प्रवेश किया । पहले पोईगै आऴ्वार “वय्यम् तगलिया” पासुर का गान शुरू करते हैं – जगत् को दीपक के रूप में देखते हैं । उसके बाद, फिर, भूतद् आऴ्वार “अन्बे तगलिया” गाते है – उनका प्रेम को ही एक दीपक के रूप में कल्पना करते है । इन दीपकों के प्रकाश से, शाला ज्योतिर्मय होता है, और पेय-आऴ्वार पहले श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य रूप को शाला के बीच में देखते है । वह “तिरुकण्डेन्” पासुरगान प्रारम्भ करते है … (श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ मुझे श्रीमन्नारायण, उनके दिव्य / सुंदर स्वर्ण रूप, उनका दिव्य शंख और चक्र) का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ है । सभी आऴ्वार एक साथ भगवान् और श्रीमहालक्ष्मी की दिव्य दृष्टि का आनंद लेते हैं ।

पराशर: यह इतना महान है, अवश्य उनको अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ होगा ।

आण्डाल दादी: हां – वे बहुत खुश थे । श्रीभगवान् और श्रीलक्ष्मीजी भी बहुत खुश थे। इस अद्भुत घटना के बाद, उन्होंने एक साथ दिव्य अर्चा विग्रह वाले अन्य मंदिरों का दिव्य दर्शन किया । वह शेषकालपर्यन्त तक एक साथ रहे और अंततः परमपद पधारे ताकि प्रभु का सान्निध्य प्राप्त करें और उनकी सेवा करें ।

व्यास और पराशर: यह वृत्तांत सुनने के लिए बहुत अद्भुत  है । क्या हम अगले आऴ्वारोें के जीवन के बारे में अब सुनेंगे?

आण्डाल दादी: आपको उसके लिए अगली बार तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।  मैं अब जाकर कुछ भगवान के लिए खाना बनाती हूं, जो हम आज रात को खा सकते हैं । अब आपके खेलने का समय है अतः अब आप बाहर मज़ा कर सकते हैं ।

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी, हम कल आपसे और अधिक सुनने के लिए वापस आएँगे।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/11/beginners-guide-mudhalazhwargal-part-2/

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