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बालपाठ – तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

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श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

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thirumazhisaiazhwar

आण्डाल दादी तिरुवेळ्ळरै मंदिरके दर्शन के लिए पराशर और व्यास को साथ में ले जाती हैं । वे श्री रंगम के राजगोपुर के बाहर एक बस में बैठे हैं ।

पराशर: दादी, जबकि हम बस में हैं, क्या आप हमें चौथे आऴ्वार के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी : ज़रूर, पराशर । मुझे हर्ष है कि आप यात्रा के दौरान आऴ्वार के दिव्य चरित्र के बारे में बात करना पसंद करते हैं।

पराशर और व्यास दादी के सामने मुस्कराए । बस श्री रंग से शुरू होता है ।

आण्डाल दादी : चतुर्थ (चौथे) आऴ्वार तिरूमऴिशै आऴ्वार है, जिन्हें प्यार से भक्तिसार कहा जाता था । आप श्री का प्रादुर्भाव थाई महीने के माघ नक्षत्र मे भार्गव मुनी और कणकांगी को चेन्नई के पास स्थित तिरूमऴिशै दिव्य क्षेत्र में हुआ । वह अकेले आऴ्वार थे जो इस दुनिया में सबसे लंबे समय तक जीवित रहे ।आप श्री लगभग ४७०० वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे ।

पराशर और व्यास (आश्चर्य में) : अपने जबड़े ड्रॉप कर पूछते हैं “४७०० साल “???

आण्डाल दादी : हाँ, पेयआऴ्वार से मिलने से पहले, उन्होने अलग-अलग धर्मों का अवलबन किया था ।

व्यास: ओह ! उनसे (पेयआऴ्वार से) मिलने के बाद क्या हुआ ?

आण्डाल दादी : पेयआऴ्वार ने उन्हें भगवान विष्णु के बारे में विस्तार से पढ़ाया और तिरूमऴिशै आऴ्वार को श्री वैष्णव संप्रदाय में वापस लाया.

बस छतरम बस स्टैंड पहुंच गया।

आण्डाल दादी : उनकी विशेष रुचि अन्तरयामी भगवान् (वह पेरुमाळ् जो हमारे अन्तरंग मे है) के प्रति थी और (उनका) कुंभकोणम के अारावमुदन् अर्चा स्वरूप के प्रति इतना अनुरक्त थे कि पेरुमाळ् ने उनका नाम आऴ्वार के नाम से बदल दिया और वह (दानों) अारावमुदन् आऴ्वार और तिरूमऴिशै पिरान् के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पराशर: वाह, दादी ऐसा लगता है कि वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे ।

आण्डाल दादी : हाँ, वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे थे । एक गांव में, जब वह यात्रा कर रहे थे, (उन्होने) उस गांव के मंदिर का दर्शन किया । पेरुमाळ् उनको बहुत प्यार करते थे, जिस दिशा में आऴ्वार चल रहे थे भगवान् विष्णु भी उस दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर दिये । इसी तरह, भागवत-प्रेमी (आऴ्वार-प्रेमी) अारावमुदन् भगवान् जो आऴ्वार के प्रति अनुरक्त थे (कि), आऴ्वार की विशेष प्रार्थना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर, भगवान् स्वशय्यावस्था से उठना शुरू कर दिए जब आऴ्वार के अलविदा होने की बात भगवान् ने सुनी ।

पराशर और व्यास (की आँखें विस्मय में बाहर आये) और पूछते हैं “फिर क्या हुआ दादी माँ?”

आण्डाल दादी : आऴ्वार चौंक गए और भगवान् विष्णु से अनुरोध किए कि वे स्वशय्यावस्था स्थिति में वापस आजाए । भगवान विष्णु दुविधा में थे और इसलिए वह अब भी अर्ध शयित स्थिति में है ।

व्यास: ओह दादी ! यह बहुत अच्छी है । एक दिन हमें भी (उन) भगवान् विष्णु के दर्शन के लिये जाना चाहिए ।

आण्डाल दादी : निश्चित रूप से, हम कुछ समय पर्यन्त वहां जायेंगे । वह लंबे समय तक वहाँ रहते है । वह अपने सभी कार्यों को कावेरी नदी में फेंककर केवल २ प्रबन्धों को प्रतिधारित करते है – तिरूच्छन्द-विरुत्तम् और नान्मुगन्-तिरुवन्दादि । उसके बाद वह अंततः परमपद वापस लौट आये और भगवान् विष्णु को परमपद में सनातन रूप से सेवा-संलग्न हुए ।

बस तिरुवेळ्ळरै तक पहुंचता है । वे मंदिर में प्रवेश करते हैं और माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दर्शन करते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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