श्रीवैष्णव – बालपाठ – नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

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nathamunigal

व्यास और पराशर स्कूल के बाद घर आते हैं। वे अपने दोस्त अत्तुज़्हाइ को उनके साथ ले आए।

आण्डाळ दादी: आप किसके साथ आए हैं?

व्यासः दादी, यह हमारी दोस्त अत्तुज़्हाइ है। हमने इसे कुछ वैभवों के बारे में बताया जो आपने हमें बताया था, और इसको उन वैभवों को आपसे सुनने में दिलचस्पी (रुचि) थी, तो हम इसे साथ में ले आये।

आण्डाळ दादी: अभिवादन अत्तुज़्हाइ (आपका स्वागत है)| यह सुनकर खुशी है कि आप दोनों केवल सुन ही  नहीं रहे हैं, बल्कि अपने दोस्तों के साथ साझा भी कर रहे हैं।

पराशर : दादी, हम हमारे आचार्य के बारे में सुनने आए हैं।

आण्डाळ दादीः अच्छा। आज मैं आपको हमारे आचार्य के बारे में बताऊंगी, जिन्होंने हमारे संप्रदाय के गौरव को वापस लाया श्री शठकोप स्वामीजी (नम्माळ्ळवार) के दैवीय हस्तक्षेप के माध्यम से।

अत्तुज़्हाइ: दादी वह कौन थे ?

आण्डाळ दादी: अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर के लिए कुछ खानेवाले फल लाती हैं।

आण्डाळ दादी : वह हमारे अपने श्री नाथमुनि स्वामीजी (नाथमुनिगळ्) हैं| श्रीमन नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) का जन्म काट्टु मन्नार् कोयिल् (वीरनारायणपुरम) मे ईश्वरभट्टाळ्वार् के घर में हुआ। श्रीमन् नाथमुनि को श्रीरन्गनाथमुनि और नाथब्रह्म के नामों से भी जाना जाता है| श्रीमन् नाथमुनि अष्टांग योग और संगीत के विद्वान थे। यहि है जिन्होंने अरयर सेवा स्तम्भित किया, जिसे आज भी श्रीरंगम्, आळ्ळवार तिरुनगरि, श्रीविल्लिपुत्तूर् में अभी भी मनाया जाता है। [श्रीरंगम में भगवान अरंगनाथार (श्री रंगनाथजी) की अरयर सेवा ( अरयर सेवा याने , दिव्य प्रबंधों को संगीतमय ताल में नृत्य के साथ प्रस्तुत करना) की शुरुआत की थी, जो आज भी तिरुवरन्गम, आल्वार् तिरुनगरि , और श्री विल्लिपुत्तूर् मे उत्सव और अन्य दिनों में आज भी आयोजित होती है।]

पराशर: दादी हमने हमारे पेरुमल (श्री रंगनाथजी) के सामने अरयर सेवा को कई बार देखा है| यह बहुत खूबसूरत है जिस तरह से अरयर स्वामी अपने हाथों में थलम के साथ पाशुरों को गाते हैं।

आण्डाळ दादीः हाँ। एक दिन श्रीवैष्णवों का समूह मेल्नाडु (तिरुनारायणपुरम् क्षेत्र) से काट्टु मन्नार् कोयिल् दर्शन के लिये पहुचते हैं और “आरावमुदे…” ( तिरुवाइमोज़्हि से दशक) मन्ननार् ( काट्टु मन्नार् कोइल् मे एम्पेरुमान्) के सामने गाते हैं [यह एक द्रविड़ शब्द है, जिसका अर्थ है “रूचि के साथ” / “तन्मयता के साथ” भगवान को गाकर सुनाते हैं ]। नाथमुनि, उन पाशुरों के अर्थ से उत्साहित, उनके बारे में श्रीवैश्णवों से पूछते हैं, लेकिन वो श्रीवैश्णव उन ११ पाशुरों से परे कुछ भी नहीं जानते हैं। वे कहते हैं कि अगर नाथमुनि तिरुक्कुरुगूर् जाते हैं, तो इन्हें शेष पाशुरो की जानकारी प्राप्त हो सकती हैं। नाथमुनि मन्ननार् से अवकाश लेते हैं और आळ्ळवार तिरुनगरि पहुँचते हैं।

अत्तुज़्हाइ, व्यास और पराशर जल्द ही अपने भोजन को खत्म करते हैं और नाथमुनिगळ् (श्री नाथमुनि स्वामीजी) के बारे में बेसब्री से सुनना जारी रखते हैं।

आण्डाळ दादी: उनकी मुलाकात मधुरकवि आळ्ळवार के शिष्य परांकुश दास से होती है। परांकुश दास उन्हें कण्णिनुण् चिरुत्ताम्बु सिखाते हैं और इसे १२००० बार तिरुप्पुज़्हियाळ्ळवार (इमली का वह पेड़ जिसमें नम्माळ्वार रेहते थे) के सामने बिना किसी अवरोध के जप करने को केहते हैं। परांकुश दास के बताये हुए क्रम के अनुसार नाथमुनि स्वामीजी (जो अष्टांग योग के अधिकारी हैं) जप आरम्भ करते हैं। नाथमुनि के इस जप से प्रसन्न होकर नम्माळ्वार उनके सामने प्रकट होते हैं । उन्हे अष्टांग योग का परिपूर्ण ज्ञान और आळ्वार संतो द्वारा रचित ४००० दिव्य प्रबंध पाशुर (अरूलिचेयल्) अर्थ सहित प्रदान करते हैं ।

व्यास: अतः, ‘आरावमुदे’ गान, ४००० दिव्य प्रबंध (दिव्य साहित्य) का एक हिस्सा है?

आण्डाळ दादी : हाँ। ‘आरावमुदे’ गान तिरुक्कुडन्तै आरावमुतन् एम्पेरुमान् (भगवान) के बारे में है।. नाथमुनि काट्टु मन्नार् कोयिल् पहुँच , मन्ननार् को ४००० पाशुर सुनाते हैं | प्रसन्न होकर मन्ननार् ४००० पाशुरों को विभजित करके प्रचार – प्रसार करने का आदेश देते हैं | वह आरुळिच्चेयल् में संगीत जोड़ते हैं और उसे अपने भतीजे किज़्ज़्ह् अगत्ताज़्ह्वान् और मेलै अगत्ताज़्ह्वान् के लिए सिखाते हैं और उनके माध्यम से प्रचार करते हैं। [मन्ननार् के आदेश अनुसार ४००० पाशुरो को नाथमुनि स्वामीजी, लय, सुर और ताल के सम्मिश्रण कर ४ भाग कर, अपने दोनों भांजे कीळैयगताळ्वान् और मेलैयागताळ्वान् पर अनुग्रह कर दिव्यप्रबन्ध का ज्ञान देकर इनके द्वारा इन दिव्य प्रबंधों का प्रचार – प्रसार करते हैं|] [अपने दिव्य ज्ञान , अपने अष्टांगयोग की साधना से भविष्य को देखते हुये, अपने पौत्र का आगमन देखते है ।]इतना ही नहीं, अपने अष्टांग योग सिद्द् के माध्यम से, उन्होंने हमारे संप्रदाय के एक और महान आचार्य की उपस्थिति को पूर्ववत किया। अगली बार, मैं आपको उनके बारे में और बताउंगी।

समूह में बच्चे: ज़रूर दादी | हम इसके बारे में सुनने के लिए उत्सुक हैं अत्तुज़्हाइ आण्डाळ दादी से आशीर्वाद लेती हैं और अपने घर जाती हैं, जबकि व्यास और पराशर अपने स्कूल के पाठों का अध्ययन करने जाते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार –  http://pillai.koyil.org/index.php/2015/06/beginners-guide-nathamunigal/

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