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श्री नम्माऴ्वार (श्री शठकोप स्वामीजी) और मधुरकवि आऴ्वार

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

आण्डाल दादी व्यास और पराशर के लिए आऴ्वार के जीवन को समझाने की प्रक्रिया में हैं।

व्यास: दादी, हमने अब मुदल् आऴ्वार और थियरुमजस्साई आऴ्वार के बारे में सुना है, अगले आऴ्वार कौन है?

आण्डाल दादी: मैं आपको नम्माऴ्वार के बारे में बताति हूं जो आऴ्वार के बीच प्रमुख के रूप में माने जाते हैं | मैं आपको नम्मालवार के प्रिय शिष्य मधुरकवि आऴ्वार के बारे में कुछ बताऊंगा |

nammazhwar-madhurakavi

पराशर : ज़रूर दादी, हम उनके बारे में आप से सुनने के लिए उत्सुक हैं |

आण्डाल दादी: नम्माऴ्वार का तमिल में अर्थ है “हमारे आऴ्वार” |इस शीर्षक के साथ पेरुमल ने खुद उन्हें सम्मानित किया| नम्माऴ्वार का जन्म अलवार तिरुनगरि में मास विसाखा नक्षत्र को हुआ | वोह स्थानीय राजा / प्रशासक के बेटे के रूप में पैदा हुए थे, जिनका नाम कारि और उनकी पत्नी उदयनन्गै थे | कारि और उदयनन्गै के पास लंबे समय तक कोई बच्चा नहीं था | तो उन्होने एक बच्चे के लिए तिरुकुरुण्गुडी नंबी से प्रार्थना की | नंबी उन्हें आशीर्वाद देते है कि वह स्वयं बच्चे के रूप में उनके घर में जन्म लेंगे| कारि और उदयनन्गै आऴ्वार थिरुनगारी लौटते हैं और जल्द ही उदयनन्गै एक सुंदर बच्चे को जन्म देती हैं |वोह खुद को पेरुमल के एक अमसम के रूप में और कभी-कभी विश्वकसेन के एक अमसम के रूप में पुकारते हैं।

व्यास: ओह! बहुत अच्छा। तो, क्या वह खुद पेरूअल थे । ?

आण्डाल दादी: उनकि महिमा को देखते हुए, निश्चित रूप से हम यह कह सकते हैं। लेकिन जैसा कि हमारे आचार्य ने बताया, वोह खुद घोषित करते हैं कि वोह समय-समय पर विश्व में भटकते हुए जीव आत्माओं में से एक थे और भगवान् श्रीमन्नारायण ने उनके बिना शर्त अनुग्रह से दैवीय आशीर्वाद प्राप्त किया था। इसलिए, हम स्वीकार करते हैं कि वोह जो कुछ विशेष रूप से है, उन्हें भगवान विष्णु ने आशीर्वाद दिया था।

पराशर: हां, दादीजी, मुझे याद है कि शुरुआत में भगवान् श्रीमन्नारायण कुछ लोगों को पूर्ण ज्ञान के साथ आशीर्वाद देते हैं और उन्हें अलवर बनाते हैं ताकि वे कई भक्तों को भगवान विष्णु के प्रति ला सकें।

आण्डाल दादी: बिल्कुल सच पराशर | यह बहुत बढ़िया है कि आप इन महत्वपूर्ण बिंदुओं को अच्छी तरह से याद रखते हैं| इसलिए, वापस नम्माऴ्वार के जन्म के लिए, यद्यपि वोह एक सामान्य बच्चे की तरह पैदा हुए थे, उन्होने खाना, रोना या कुछ भी नहीं किया |उनके माता-पिता पहले से चिंतित थे और उन्होंने 12 वीं दिन उनहे अधि नाथा पेरुमल मंदिर में लाया और उन्हें पेरुमल के सामने रखा | अन्य बच्चों के जैसे ना हो कर उनकि विशिष्ट प्रकृति के कारण, उनका नाम मारन दिया गया था ( जिसक मतलब – जो अलग है)। उनकि अनूठी प्रकृति को देखकर, उसके माता-पिता ने उसे एक दिव्य व्यक्तित्व माना और उन्हें दिव्य इमली पेड़ के नीचे रखा जो कि मंदिर के दक्षिण की ओर स्थित है और उस पेड़ को महान सम्मान के साथ पूजा करते हैं। तब से वोह इमली पेड़ के नीचे एक शब्द बोले बिना 16 साल तक रहे।

व्यास: तो, वह हर समय क्या कर रहे थे? और क्य उन्होने उन्त मै कोइ बात की?

आण्डाल दादी: जन्म के समय में धन्य होने के नाते, वह पूरे समय पेरुमल पर गेहरे ध्यान में थे। अंत में, यह मधुरकवि आऴ्वार का आगमन था, जिनहोने उन्से बुलवाया।

पराशर: मधुरकवि आऴ्वार कौन थे? उन्होंने क्या किया?

आण्डाल दादी: मधुरकवि आऴ्वार चैत्र मास चैत्र नक्षत्रम पर थिरूकोलुरु में पैदा हुए थे। वोह एक महान विद्वान और भगवान् श्रीमन्नारायण के भक्त थे |वोह नम्माऴ्वार से आयु मे बहुत बडे थे और वोह अयोध्या तीर्थ स्थान में थे |उनहोने पहले से ही मारन के जीवन के बारे में सुना था। उस समय, वोह दक्षिण की ओर से एक चमकती रोशनी देखते हैं और वोह उस प्रकाश का अनुसरण करते है जो अन्त में उनहे आऴ्वार थिरुनगिरी मंदिर जहां मारन रहते हैं, तक पहुंच जाते हैं ।

व्यास: क्या नम्माऴ्वार मधुरकवि आऴ्वार से बात करते हैं?

आण्डाल दादी: हाँ, उन्होंने किया। मधुरकवि आऴ्वार उनसे एक दिव्य बातचीत में संलग्न करते हैं और आख़िर बोलते हैं। अपनी महिमा को समझना, एक बार मधुरकवि आऴ्वार नम्माऴ्वार के शिष्य बन जाते है और सभी आवश्यक सिद्धांतों को सीखते हैं। वोह पूरी तरह से नम्माऴ्वार की सेवा करते हैं और अपने पूरे जीवन के लिए उसकी देखभाल करते हैं |

पराशर:वाह, बहुत अच्छा। इसलिए, ऐसा लगता है कि सच्चा ज्ञान सीखने की बात आती है तो उम्र कोई मानदंड नहीं है। यहाँ, भले ही मधुरकवि आऴ्वार नम्माऴ्वार से आयु में बडे थे, उन्होंने इन सिद्धांतों को नम्माऴ्वार से सीख लिया था।

आण्डाल दादी: बहुत अच्छा अवलोकन पराशर | हाँ, किसी व्यक्ति से सीखने के लिए विनम्र होना चाहिए, भले ही उस व्यक्ति आयु की तुलना में युवा हो। |यह श्रीवैष्णव की सच्ची गुणवत्ता है और अच्छी तरह से मधुरकवि आऴ्वार द्वारा यहाँ प्रदर्शन किया गया है | कुछ साल बाद, 32 वर्ष की आयु में, नम्माऴ्वार परमपदम में जाने का फैसला करते हैं क्योंकि वह पेरुमल से अलग होने में असमर्थ थे | अपने चार प्रबन्धों में पेरूमल की महिमा गाते हुए, अर्थात् थिरूविरथथम, तिरुव अभिरियाम, पेरिया थिरुवन्त अदी और थिरूवमूझी, पेरुमल की कृपा से, वह वहां परमपदम को चले जाते हैं जहां वोह भगवान विष्णु को अनन्त कैंकर्य में लगे हुए हैं।

व्यास:दादी नम्माऴ्वार परम पदम में जाने के लिये बहुत छोटे थे |

आण्डाल दादी हाँ। लेकिन वोह हमेशा के लिए आनंदित होना चाहता था और पेरूमल उनहे नित्यलोक में रखना चाहते थे | तो, उन्होंने इस दुनिया को छोड़ दिया और श्री वैकुण्ठ पहुंच गए। मधुरकवि आऴ्वार ने नम्माऴ्वार के दिव्य अर्चा विग्रह की स्थापना की, जो नदी के पानी को उबालने पर प्राप्त किया गया था और इस दिव्य देसम में नम्माऴ्वार की उचित पूजा की व्यवस्था की थी। उन्होंने नम्माऴ्वार की पूर्ण प्रशंसा में “कन्निनुन चिरूथंबू” नामक एक प्रबंधम बनाया। उन्होंने हर जगह नम्माऴ्वार की महिमा भी फैल दी और पूरे क्षेत्र में नम्माऴ्वार की महानता की स्थापना की।

पराशर: इसलिए, यह मधुरकवि आऴ्वार की वजह से है, हम पूरी तरह से नम्माऴ्वार की महिमा समझते हैं।

आण्डाल दादी: हाँ। वह पूरी तरह से नम्माऴ्वार के लिए समर्पित थे और उन्होंने खुद को नम्माऴ्वार के समर्पण के कारण महिमा किया था। देखें, पेरुमल के भक्त पेरुमल की तुलना में अधिक महिमावान हैं। तो, पेरूमेल के भक्तों की महिमा को पेरूमेल की महिमा करने से बहुत अधिक माना जाता है। हमें जब भी संभव हो तो पेरूअल के भक्तों की सेवा करने की कोशिश करनी चाहिए।

व्यास और पराशर: निश्चित रूप से दादी मां, हम उस मन को रखेंगे और ऐसे अवसरों की आशा करेंगे।

आण्डाल दादी: इस के साथ हमने नम्माऴ्वार और मधुरकवि आऴ्वार के जीवन को देखा है।  आइए हम नम्माऴ्वार के मंदिर में जाकर उसकी पूजा करें।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/11/beginners-guide-nammazhwar-and-madhurakavi-azhwar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

Learn upadhESa raththina mAlai (உபதேச ரத்தின மாலை)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

mamunigal-srirangammaNavALa mAmunigaL – SrIrangam

Author – maNavALa mAmunigaL

mUlam (text) – thamizh

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) – http://pillai.koyil.org/index.php/2017/06/dhivya-prabandham-santhai-recordings/

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

Part 1 – thaniyan and pAsurams 1 to 37
1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – One line (ஒரு வரி)
3 – Two lines (இரண்டு வரிகள்)
4 – Full pAsuram (முழு பாசுரம்)
Part 2 – pAsurams 38 to 73 and additional pAsuram
1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – One line (ஒரு வரி)
3 – Two lines (இரண்டு வரிகள்)
.

Meanings (அர்த்தங்கள்)

Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

Introduction (அறிமுகம்)
thaniyan and first 3 pAsurams
pAsurams 4 to 13
pAsurams 14 to 20
pAsurams 21 to 26
pAsurams 27 to 37
pAsurams 38 to 40
pAsurams 41 to 47
pAsurams 48 to 49
pAsuram 50
pAsurams 51 to 52
pAsurams 53 to 59
pAsurams 60 to 64
pAsurams 65 to 70
pAsurams 71 to 73 and concluding pAsuram of eRumbi appA

vyAkyAnams (commentaries)English Translation

Recital (சேவாகால முறை) Full rendering

Learn thiruppaLLiyezhuchchi (திருப்பள்ளியெழுச்சி)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

periya perumAL (srIranganAthan) – SrIrangam thondaradipodi-azhwar-mandangudithoNdaradippodi AzhwAr – thirumaNdangudi

Author – thoNdaradippodi AzhwAr

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Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – One line (ஒரு வரி)
3 – Two lines (இரண்டு வரிகள்)
4 – Full pAsuram (முழு பாசுரம்)

Meanings (அர்த்தங்கள்)

Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

thiruppaLLiyezhuchchi

vyAkyAnams (commentaries)

Recital (சேவாகால முறை)

Full Rendering

Learn mumukshuppadi (முமுக்ஷுப்படி)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Untitled3nArAyaNa rishi, nara rishi – badhrikASramam piLLai lOkAchAryar, maNavALa mAmunigaL – SrIperumbUthUr

mumukshuppadi is one of the fundamental granthams which should be learned by every SrIvaishNava who has undergone pancha samskAram (samASrayaNam), with proper guidance. This must be heard and learned after undergoing pancha samskAram only.

Author – piLLai lOkAchAryar

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Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

Part 1 – thaniyans and sUthrams 1 to 51

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – Full sUthram (முழு ஸூத்ரம்)
3 – Multiple sUthrams

Part 2 – sUthrams 52 to 115

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – Full sUthram (முழு ஸூத்ரம்)
3 – Multiple sUthrams

Part 3 – sUthrams 116 to 184

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
.

Reference Material

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Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

Simple explanation based on maNavALa mAmunigaL‘s vyAkyAnam

Introduction (அறிமுகம்)

thaniyans (தனியன்கள்) 

sUthrams (ஸூத்ரங்கள்)

thirumanthra prakaraNam

sUthrams 1 to 4
sUthrams 5 to 7
sUthrams 8 to 21
sUthrams 22 to 30
sUthrams 31 to 39
sUthrams 40 to 51
sUthrams 52 to 57
sUthrams 58 to 63
sUthrams 64 to 74
sUthrams 75 to 85
sUthrams 86 to 94
sUthrams 95 to 101
sUthrams 102 to 111
sUthrams 102 to 111
thirumanthram summary

dhvaya prakaraNam

Introduction (அறிமுகம்)

sUthram 116
.

बालपाठ – तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 2

thirumazhisaiazhwar

आण्डाल दादी तिरुवेळ्ळरै मंदिरके दर्शन के लिए पराशर और व्यास को साथ में ले जाती हैं । वे श्री रंगम के राजगोपुर के बाहर एक बस में बैठे हैं ।

पराशर: दादी, जबकि हम बस में हैं, क्या आप हमें चौथे आऴ्वार के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी : ज़रूर, पराशर । मुझे हर्ष है कि आप यात्रा के दौरान आऴ्वार के दिव्य चरित्र के बारे में बात करना पसंद करते हैं।

पराशर और व्यास दादी के सामने मुस्कराए । बस श्री रंग से शुरू होता है ।

आण्डाल दादी : चतुर्थ (चौथे) आऴ्वार तिरूमऴिशै आऴ्वार है, जिन्हें प्यार से भक्तिसार कहा जाता था । आप श्री का प्रादुर्भाव थाई महीने के माघ नक्षत्र मे भार्गव मुनी और कणकांगी को चेन्नई के पास स्थित तिरूमऴिशै दिव्य क्षेत्र में हुआ । वह अकेले आऴ्वार थे जो इस दुनिया में सबसे लंबे समय तक जीवित रहे ।आप श्री लगभग ४७०० वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे ।

पराशर और व्यास (आश्चर्य में) : अपने जबड़े ड्रॉप कर पूछते हैं “४७०० साल “???

आण्डाल दादी : हाँ, पेयआऴ्वार से मिलने से पहले, उन्होने अलग-अलग धर्मों का अवलबन किया था ।

व्यास: ओह ! उनसे (पेयआऴ्वार से) मिलने के बाद क्या हुआ ?

आण्डाल दादी : पेयआऴ्वार ने उन्हें भगवान विष्णु के बारे में विस्तार से पढ़ाया और तिरूमऴिशै आऴ्वार को श्री वैष्णव संप्रदाय में वापस लाया.

बस छतरम बस स्टैंड पहुंच गया।

आण्डाल दादी : उनकी विशेष रुचि अन्तरयामी भगवान् (वह पेरुमाळ् जो हमारे अन्तरंग मे है) के प्रति थी और (उनका) कुंभकोणम के अारावमुदन् अर्चा स्वरूप के प्रति इतना अनुरक्त थे कि पेरुमाळ् ने उनका नाम आऴ्वार के नाम से बदल दिया और वह (दानों) अारावमुदन् आऴ्वार और तिरूमऴिशै पिरान् के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पराशर: वाह, दादी ऐसा लगता है कि वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे ।

आण्डाल दादी : हाँ, वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे थे । एक गांव में, जब वह यात्रा कर रहे थे, (उन्होने) उस गांव के मंदिर का दर्शन किया । पेरुमाळ् उनको बहुत प्यार करते थे, जिस दिशा में आऴ्वार चल रहे थे भगवान् विष्णु भी उस दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर दिये । इसी तरह, भागवत-प्रेमी (आऴ्वार-प्रेमी) अारावमुदन् भगवान् जो आऴ्वार के प्रति अनुरक्त थे (कि), आऴ्वार की विशेष प्रार्थना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर, भगवान् स्वशय्यावस्था से उठना शुरू कर दिए जब आऴ्वार के अलविदा होने की बात भगवान् ने सुनी ।

पराशर और व्यास (की आँखें विस्मय में बाहर आये) और पूछते हैं “फिर क्या हुआ दादी माँ?”

आण्डाल दादी : आऴ्वार चौंक गए और भगवान् विष्णु से अनुरोध किए कि वे स्वशय्यावस्था स्थिति में वापस आजाए । भगवान विष्णु दुविधा में थे और इसलिए वह अब भी अर्ध शयित स्थिति में है ।

व्यास: ओह दादी ! यह बहुत अच्छी है । एक दिन हमें भी (उन) भगवान् विष्णु के दर्शन के लिये जाना चाहिए ।

आण्डाल दादी : निश्चित रूप से, हम कुछ समय पर्यन्त वहां जायेंगे । वह लंबे समय तक वहाँ रहते है । वह अपने सभी कार्यों को कावेरी नदी में फेंककर केवल २ प्रबन्धों को प्रतिधारित करते है – तिरूच्छन्द-विरुत्तम् और नान्मुगन्-तिरुवन्दादि । उसके बाद वह अंततः परमपद वापस लौट आये और भगवान् विष्णु को परमपद में सनातन रूप से सेवा-संलग्न हुए ।

बस तिरुवेळ्ळरै तक पहुंचता है । वे मंदिर में प्रवेश करते हैं और माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दर्शन करते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/11/beginners-guide-thirumazhisai-azhwar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Learn yathirAja vimSathi (யதிராஜ விம்சதி)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

emperumAnAr – AzhwArthirunagari bhavishyadhAchAryan sannidhi

Author – maNavALa mAmunigaL

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) – http://pillai.koyil.org/index.php/2017/06/dhivya-prabandham-santhai-recordings/

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – One line (ஒரு வரி)

Meanings (அர்த்தங்கள்)

Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

Introduction (அறிமுகம்)
SlOkams 1 to 5
SlOkams 6 to 10
SlOkams 11 to 20

vyAkyAnams (commentaries) in your favourite Language

English Hindi Tamizh Telugu

Learner’s series

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

All existing santhai class schedule, recordings etc can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/06/dhivya-prabandham-santhai-recordings/ .

dhivya prabandham

thiruppallANdu (திருப்பல்லாண்டு) kaNNinuN chiRuth thAmbu (கண்ணி நுண் சிறுத் தாம்பு) thiruppaLLiyezhuchchi (திருப்பள்ளியெழுச்சி)
rAmAnusa nURRandhAdhi (இராமானுச நூற்றந்தாதி) amalanAdhipirAn (அமலனாதிபிரான்)

Others

mumukshuppadi (முமுக்ஷுப்படி) upadhESa raththina mAlai (உபதேச ரத்தின மாலை) yathirAja vimSathi (யதிராஜ விம்சதி)

Learn kaNNinuN chiRuth thAmbu (கண்ணி நுண் சிறுத் தாம்பு)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:nammAzhwAr and madhurakavi AzhwAr

Author – madhurakavi AzhwAr

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Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து) 2 – One line (ஒரு வரி)
3 – Two lines (இரண்டு வரிகள்) 4 – Full pAsuram (முழு பாசுரம்)

Meanings (அர்த்தங்கள்)

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Introduction (அறிமுகம்)
thaniyans and pAsurams (தனியன்கள் மற்றும் பாசுரங்கள்)

vyAkyAnams (Commentaries)

kaNNinuN chiRuth thAmbu – English kaNNinuN chiRuth thAmbu – Telugu

Recital (சேவாகால முறை)

Full rendering

thaniyans (தனியன்கள்)

thaniyan 1 – avidhitha

thaniyan 2 – vERonRum

pAsurams (பாசுரங்கள்)

pAsuram 1 – kaNNinuN chiRuth thAmbinAl
pAsuram 2 – nAvinAl naviRRu
pAsuram 3 – thirithanthAgilum
pAsuram 4 – nanmaiyAl mikka
pAsuram 5 – nambinEn
pAsuram 6 – inRu thottum
pAsuram 7 – kaNdu koNdu
pAsuram 8 – aruL koNdAdum
pAsuram 9 – mikka vEdhiyar
pAsuram 10 – payan anRAgilum
 pAsuram 11 – anban thannai

बालपाठ – मुदल् आऴ्वार – भाग 2

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 1

mudhalAzhwargaL-thirukkovalur-with-perumAL

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर मुदल् आऴ्वार सन्निधि से बाहर निकलते हैं ।

पराशर: दादी, मुदल् आऴ्वार को देखकर अच्छा लगा । दादी क्या ये 3 आऴ्वार सदैव एक साथ रहते हैं?

आण्डाल दादी: यह अच्छा सवाल है । उनका एक साथ रहने का एक कारण है । मुझे कृपया समझाने दो । एक दिन भगवान की दिव्य योजना से, वे तिरुक्कोवलूर में एक के बाद एक पहुंचे। प्रचण्ड वायु का वह दिन था । उस दिन भारी वर्षा भी हुई थी । वहां एक ऋषि थे, जिनका नाम मृकर्ण्डु था, जिनका तिरुक्कोवलूर में एक आश्रम था । अपने आश्रम के सामने, एक छोटा सा शाला था । पहले पोईगै आऴ्वार शाला में पहुंचे और वर्षा से स्वयं को बचाने के लिए शाला में शरण लिए । थोड़ी देर के लिए पोईगै आऴ्वार शाला में लेटकर शयन किए ।

पराशर: केवल अकेले? उनको डर नहीं लगा?

आण्डाल दादी: नहीं पराशर । वह निर्भय है क्योंकि वह हमेशा प्रभु का चिन्तन करते हैं । उस समय, भूतद् आऴ्वार वर्षा में वहां पहुंचते हैं और शाला में प्रवेश करने की अनुमति का अनुरोध करते हैं । पोईगै आऴ्वार कहते है कि, “यहां सीमित स्थान है एक व्यक्ति शयन कर सकता है लेकिन दो व्यक्ति बैठ सकते हैं । कृपया पधारें । ” भूतद् आऴ्वार खुशी से प्रवेश करते है और वे दोनों अगल-बगल मे बैठते हैं । तत्पश्चात, वर्षा में भागते हुए पेयाऴ्वार, आश्रय इच्छुक, शाला में प्रवेश करने की अनुमति मांगते है । पोईगै आऴ्वार कहते हैं, “ठीक है, यहां सीमित स्थान है। एक व्यक्ति नीचे लेट सकता है, दो व्यक्ति बैठ सकते हैं और तीन व्यक्ति खड़े हो सकते हैं । कृपया पधारें । हम सभी खड़े हो सकते हैं । ” यह सुनते ही पेय-आऴ्वार, खुशी से शाला में प्रवेश करते है और वे सभी वर्षा के ठंडक में कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं । वे एक-दूसरे से बात करना शुरू करते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानते हैं और सार्वजनिक हित के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न होते हैं, वे भगवान् के सुंदर नाम, रूप, गुण, आदि के बारे में चर्चा करना प्रारम्भ करते हैं।

व्यास: वाह! यह बहुत अच्छा है। वास्तव में ईश्वरीय है । लेकिन दादी, यह और अच्छा होता, अगर भगवान् भी वहां उपस्थित होते, ठीक उसी तरह, जैसे ही वह हमें देखने के लिए यहां परिय पेरुमाळ् के रूप में है ।

आण्डाल दादी: रुको, घटना यहाँ समाप्त नहीं होती है । आपने अगले अनुक्रम को बहुत अच्छी तरह से अनुमान लगाया है । इस घटना क्रम में अधिक देवत्व है, अपने प्रिय भक्तों की सभा को देखकर, अब पेरूमाळ् भी इस का हिस्सा बनना चाहते है । पेरुमाळ् भी शाला में प्रवेश कर स्वयं को विवश करते है । अंधेरे होने और अचानक आश्रय शाला मे स्वयं को क्षेत्राभाव मे विवश मानकर, तीन आऴ्वार सोचते हैं – क्या हो रहा है यहाँ और किसने उनके ज्ञान के बिना शाला में प्रवेश किया । पहले पोईगै आऴ्वार “वय्यम् तगलिया” पासुर का गान शुरू करते हैं – जगत् को दीपक के रूप में देखते हैं । उसके बाद, फिर, भूतद् आऴ्वार “अन्बे तगलिया” गाते है – उनका प्रेम को ही एक दीपक के रूप में कल्पना करते है । इन दीपकों के प्रकाश से, शाला ज्योतिर्मय होता है, और पेय-आऴ्वार पहले श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य रूप को शाला के बीच में देखते है । वह “तिरुकण्डेन्” पासुरगान प्रारम्भ करते है … (श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ मुझे श्रीमन्नारायण, उनके दिव्य / सुंदर स्वर्ण रूप, उनका दिव्य शंख और चक्र) का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ है । सभी आऴ्वार एक साथ भगवान् और श्रीमहालक्ष्मी की दिव्य दृष्टि का आनंद लेते हैं ।

पराशर: यह इतना महान है, अवश्य उनको अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ होगा ।

आण्डाल दादी: हां – वे बहुत खुश थे । श्रीभगवान् और श्रीलक्ष्मीजी भी बहुत खुश थे। इस अद्भुत घटना के बाद, उन्होंने एक साथ दिव्य अर्चा विग्रह वाले अन्य मंदिरों का दिव्य दर्शन किया । वह शेषकालपर्यन्त तक एक साथ रहे और अंततः परमपद पधारे ताकि प्रभु का सान्निध्य प्राप्त करें और उनकी सेवा करें ।

व्यास और पराशर: यह वृत्तांत सुनने के लिए बहुत अद्भुत  है । क्या हम अगले आऴ्वारोें के जीवन के बारे में अब सुनेंगे?

आण्डाल दादी: आपको उसके लिए अगली बार तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।  मैं अब जाकर कुछ भगवान के लिए खाना बनाती हूं, जो हम आज रात को खा सकते हैं । अब आपके खेलने का समय है अतः अब आप बाहर मज़ा कर सकते हैं ।

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी, हम कल आपसे और अधिक सुनने के लिए वापस आएँगे।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – எம்பார்

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

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பராசரன், வ்யாசன், வேதவல்லி, அத்துழாய் நால்வரும் ஆண்டாள் பாட்டியின் வீட்டிற்கு வருகிறார்கள்.

பாட்டி : வாருங்கள் குழந்தைகளே. கை கால்களை அலம்பிக் கொள்ளுங்கள். நான் உங்களுக்கு கொஞ்சம் ப்ரசாதம் தருகிறேன். நாளைய தினத்திற்கு என்ன சிறப்பு தெரியுமா? நாளைக்கு ஆளவந்தாரின் திருநக்ஷத்ரம் ஆகும், ஆடி, உத்ராடம். உங்களில் யாருக்கு ஆளவந்தாரை நினைவிருக்கிறது ?

அத்துழாய் : எனக்கு நினைவிருக்கிறது. அவர் தாம் ராமானுஜரை ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் அழைத்துவர தேவப் பெருமாளை ப்ரார்த்தித்தவர்.

வ்யாச : ஆமாம். மேலும், அவர் பரமபதத்தை அடைந்த பிறகு அவருடைய திருமேனியில் அவருடைய ஈடேறாத மூன்று ஆசைகளை குறித்தவாறு மடங்கியிருந்த அவருடைய மூன்று விரல்களைக் கண்டு ராமானுஜர் அவற்றை நிறைவேற்ற ப்ரதிக்ஞை செய்தார். ராமானுஜர் ப்ரதிக்ஞைகளை செய்தவுடன் அவ்விரல்கள் பிரிந்தன.

பராசர :  ராமானுஜருக்கும் ஆளவந்தாருக்கும் இடையே இருந்த உறவு மனத்தாலும் ஆன்மாவினாலும் இயைந்தது, தேஹத்திற்கு அப்பாற்பட்டது என்று நீங்கள் சொன்னதும் எங்களுக்கு நினைவிருக்கிறது பாட்டி.

பாட்டி : மிகச்சரி! நாளை அவருடைய திருநக்ஷத்ரம் ஆகும். இந்தாருங்கள், இப்பிரசாதங்களைப் பெற்றுக் கொள்ளுங்கள்.  ராமானுஜரை ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் கொணர்ந்த மஹாசார்யரை மறவாமல் நாளை நீங்கள் எல்லாரும் கோயிலுக்கு சென்று சேவிக்க வேண்டும். மேலே இன்று நம்முடைய அடுத்த ஆசார்யரான எம்பாரைப் பற்றித் தெரிந்து கொள்ளலாம். எம்பார் மதுரமங்கலத்தில் கமலநயன பட்டருக்கும் ஸ்ரீதேவி அம்மாளுக்கும் புதல்வராக அவதரித்தவர்.  பிறப்பில் அவருக்கு இட்ட பெயர் கோவிந்தப் பெருமாள் என்பதாகும். அவரை கோவிந்த பட்டர், கோவிந்த தாசர், ராமானுஜபதச் சாயையார் என்றும் அழைப்பார்கள்.  அவர் எம்பெருமானாருடைய (தாயாரின் தங்கையின் பிள்ளை) தம்பியாவார், ராமானுஜருக்கு ஏற்பட்ட ஆபத்திலிருந்து அவரைக் காப்பாற்றியவரும் அவர் தாம்.

வேதவல்லி : உயிருக்கு இருந்த ஆபத்தா? நான் ராமானுஜருக்கு ஒரு முறைதான் ஆபத்து ஏற்பட்டது, அதிலிருந்து அவரைக் கூரத்தாழ்வானும் பெரிய நம்பியும் தாம் காப்பாற்றினார்கள் என்று எண்ணியிருந்தேனே. அவருக்கு எத்தனை ஆபத்துகள் தான் நேர்ந்தன பாட்டி?

பாட்டி : பல தடவைகள்! அவற்றை நான் நேரம் வரும்பொழுது சொல்கிறேன். அவருடைய குருவான யாதவப்ரகாசர் தாம் முதலில் அவரை முதலில் கொல்ல எண்ணிணார். வேதங்களின் உட்பொருளைக் குறித்து ராமானுஜருக்கும் யாதவப்ரகாசருக்கும் கருத்து வேறுபாடுகள் இருந்து வந்தது. யாதவப்ரகாசர் வேதத்தின் சில வாக்கியங்களுக்கான பொருளை தவறாகவும் திரிபாகவும் கூறி வந்தார். ராமானுஜர், அவற்றைக் கேட்கும் பொழுது மிகவும் வருந்தி நம் விசிஷ்டாத்வைத ஸம்ப்ரதாயத்தில் கூறியுள்ள உண்மை கருத்தினை தெரிவிப்பார். யாதவப்ரகாசர் அத்வைதியாகையால், அவற்றுக்கு ராமானுஜர் கூறும் விளக்கங்களை ஒப்புக் கொண்டதில்லை. ராமானுஜர் கூறி வந்த பொருள் உண்மையென்று அறிந்தவராகையால் அவரைத் தமக்குப் போட்டியாகக் கருதத் தொடங்கினார்.   ஆசார்யர் என்ற நிலைக்கு ராமானுஜர் தமக்குப் போட்டியாக வந்து விடுவார் என்ற எண்ணம் அவருக்கு ஏற்பட்டது; ஆனால் ராமானுஜருக்கோ அது போன்ற நோக்கமே இல்லை.  இது யாதவப்ரகாசரின் மனத்தில் ராமானுஜர் மீது வெறுப்பும் பொறாமையும் கொள்ளக் காரணமாக அமைந்தது. அவர் வாரணாசிக்கு யாத்திரையாக தம் சிஷ்யர்களுடன் செல்லும் பொழுது ராமானுஜரைக் கொல்ல வேண்டும் என்று திட்டமிட்டார். இச்சூழ்ச்சியினை அறிந்த கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜரை அக்குழுவுடனான யாத்திரையினைத் தொடர்ந்து மேற்கொள்ள வேண்டாமென்று எச்சரித்தார்.  அவர் ராமானுஜரைத் தமது உயிரைக் காக்கும் பொருட்டு தெற்கில் காஞ்சிபுரம் நோக்கி செல்லுமாறு கேட்டுக் கொண்டார். ராமானுஜரும் அவ்வாறே செய்து அவரது குருவின் சூழ்ச்சியிலிருந்து தப்பித்தார். இவ்வாறு கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜரை ஆபத்திலிருந்து காத்தார்.

வ்யாச : பாட்டி, கோவிந்தப் பெருமாளும் யாதவப்ரகாசரின் சிஷ்யரா?

எம்பார்மதுரமங்கலம்

பாட்டி : ஆமாம் வ்யாசா. ராமானுஜர், கோவிந்தப் பெருமாள் இருவருமே யாதவப்ரகாசரிடம் கல்வி பயின்று கொண்டிருந்தவர்கள். ராமானுஜர் தம்மைக் காத்துக் கொள்ளும் பொருட்டு தெற்கு திசையில் சென்றாலும், கோவிந்தப்பெருமாள் யாத்திரையில் தொடர்ந்து சென்று சிவபக்தராகி காளஹஸ்தி என்னும் இடத்தில் தங்கி உள்ளங்கை கொண்ட நாயனார் என்று அழைக்கப்படலானார். இதனை அறிந்த ராமானுஜர், கோவிந்தப் பெருமாளை திருத்தி நம் ஸம்ப்ரதாயத்தில் திருப்பும் பொருட்டு தம் மாமாவாகிய பெரிய திருமலை நம்பியை அனுப்பினார். பெரிய திருமலை நம்பியும் காளஹஸ்த்திக்கு சென்று நம்மாழ்வாருடைய பாசுரங்களையும் ஆளவந்தாருடைய ஸ்தோத்ர ரத்னத்தின் ச்லோகங்களையும் கொண்டு கோவிந்தப் பெருமாளைத் திருத்தினார். கோவிந்தப் பெருமாளும் தம் தவறை உணர்ந்து நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குத் திரும்பினார்.  ஆக குழந்தைகளே, ஆளவந்தார் பரமபதித்து விட்டாலும் ராமானுஜரை மட்டுமின்றி அவரது சகோதரராகிய கோவிந்தப் பெருமாளையும் நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் ஈர்க்கக் கருவியாக இருந்தார். நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் அவரை ஈர்த்த பெரிய திருமலை நம்பியே அவருக்கு ஆசார்யராக பஞ்ச சம்ஸ்காரம் செய்து வைத்தார். பெரிய திருமலை நம்பியும் திருப்பதிக்கு திரும்ப செல்ல அவருடன் கோவிந்தப் பெருமாளும் சென்று தம் ஆசர்யருக்கு கைங்கர்யங்கள் செய்யலானார். இங்கு நாம் கவனிக்க வேண்டிய பொருள் என்னவென்றால் கோவிந்தப் பெருமாளை திருத்தும் பொருட்டு ராமானுஜரும் பெரிய திருமலை நம்பியுமே அவரிடத்தில் சென்றார்களேயன்றி, அவர்களை அவர் அணுகவேயில்லை. தம் சிஷ்யர்களின் மேன்மைக்காக இத்தகைய அக்கறை கொண்டு அவர்களிடம் சென்று திருத்துவோரை க்ருபா மாத்ர ப்ரசன்னாசார்யர்கள் என்பர். எம்பெருமான் போன்றே அளவற்ற அன்போடும் கருணையோடும் சிஷ்யர்களை நோக்கிச் செல்கின்றனர். கோவிந்தப் பெருமாளுக்கு ராமானுஜர், பெரிய திருமலை நம்பி இருவருமே க்ருபா மாத்ர ப்ரசன்னாசார்யர்கள்தாம்.

பராசர : பாட்டி, கோவிந்தப் பெருமாளைப் பற்றி மேலும் சொல்லுங்கள். அவர் என்ன கைங்கர்யங்கள் செய்தார்?

பாட்டி: கோவிந்தப் பெருமாள் தம் ஆசார்யர் பெரிய நம்பியினிடத்தில் கொண்டிருந்த அபிமானத்தைக் காட்ட பல சம்பவங்கள் உள்ளன. ஒரு தடவை தம் ஆசார்யருக்கான படுக்கையினைத் தயாரிக்கும் பொழுது அவரே அதில் படுத்துப் பார்த்தார். நம்பி கோவிந்தப் பெருமாளை அது குறித்து விசாரித்தார். கோவிந்தப் பெருமாள், அம்மாதிரிச் செய்வதனால் தம் ஆசார்யரின் படுக்கை பாதுகாப்பாகவும் சரியாகவும் இருத்தலே தம் நோக்கம் என்றும், அதனால் தாம்  நரகத்துக்கே போவதானாலும் பொருட்டில்லை என்றும் பதிலளித்தார். இதனைக் கொண்டு அவர் தம்மையே கருத்தில் கொள்ளாமல், ஆசார்யரிடத்தில் கொண்டிருந்த அபிமானத்தையும் ஆசார்யருடைய திருமேனியின் மீது அவர் கொண்டிருந்த கவனத்தையும் புரிந்து கொள்ளலாம். அக்காலகட்டத்தில் ராமானுஜர் ஸ்ரீராமாயணத்தின் சாரத்தை, பெரிய நம்பியிடமிருந்து கற்றுக்கொள்ள திருப்பதியில் இருந்தார். ஒரு வருட காலம் நம்பியிடமிருந்து கற்றுக்கொண்டு அவர் அங்கிருந்து புறப்பட ராமானுஜரைத் தம்மிடம் ஏதாவது பெற்றுக் கொள்ளுமாறு நம்பி கூறினார். ராமானுஜர் கோவிந்தப் பெருமாளைக் கேட்க, நம்பியும் உகப்புடன் ராமானுஜருக்குத் தொண்டு புரியும் பொருட்டு கோவிந்தப் பெருமாளைக் கொடுக்க ஒப்புக்கொள்கிறார். இதனை அறிந்த கோவிந்தப் பெருமாள், பெரிய திருமலை நம்பியிடமிருந்து பிரிவதை எண்ணிச் சோகமடைந்தார்.

வ்யாச : பாட்டி, நம்பி ஏன் கோவிந்தப் பெருமாளை ராமானுஜருடன் அனுப்பினார்? கோவிந்தப் பெருமாள் தம் ஆசார்யருக்கு அபிமானத்துடன் கைங்கர்யங்கள் புரிந்து கொண்டிருக்கும் பொழுது அவரை விட்டு ஏன் பிரிய வேண்டும்?

பாட்டி : வ்யாசா, கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜருக்குப் பல தொண்டுகள் புரிந்தே நம் ஸம்ப்ரதாயத்தில் முக்கிய இடம் பெற்றவர். அவருடைய குழந்தைப் பருவத்திலிருந்தே அவர் ராமானுஜரிடம் மிகுந்த அன்பும் பாசமும் கொண்டிருந்தார். ராமானுஜர் பரமபதத்திற்கு ஏகியதும், பராசர பட்டரையும் ராமானுஜரின் மற்ற சிஷ்யர்களையும் வழி நடத்தினார். அவருக்கு இத்தனை பொறுப்புகளும் ஆற்ற வேண்டிய கடமைகளும் இருந்ததாலேயே, தம் ஆசார்யர் பெரிய திருமலை நம்பியை விட்டு பிரியும் தியாகத்தைச் செய்து ராமானுஜரைத் தம் வழிகாட்டியாக ஏற்றுக் கொண்டார். பிற்காலதில் அவர் ராமானுஜரையே தம் அனைத்தாகவும் ஏற்றுக்கொண்டு, ராமானுஜரின் திருமேனி அழகைக் காட்டும் பாசுரம் ஒன்றையும் அருளினார். இதை “எம்பெருமானார் வடிவழகு பாசுரம்” என்று அழைப்பார்கள். நான் போன தடவை சொன்னது போலவே, ஸம்ப்ரதாய விஷயங்களில் பொதுவான நன்மையின் பொருட்டு, தியாகங்கள் செய்ய நீங்கள் தயாராக இருக்க வேண்டும். அதைத் தான் கோவிந்தப் பெருமாளும் செய்தார்.

அத்துழாய் : கோவிந்தப் பெருமாளுக்கு விவாகம் நடந்ததா? அவருக்குக் குழந்தைகள் இருந்தனரா?

பாட்டி : கோவிந்தப் பெருமாள் எல்லோரிடத்திலும் எப்பொருளிலும் எம்பெருமானையே காணுமளவுக்கு பகவத் விஷயத்தில் ஈடுபட்டிருந்தவர். அவருக்கு விவாகம் நடந்திருந்தாலும், கோவிந்தப் பெருமாள் பகவத் விஷயத்தில் கொண்டிருந்த ஈடுபாட்டைக் கண்டு, எம்பெருமானார் அவருக்கு ஸந்யாஸாச்ரமத்தில் ஈடுபடுத்தி அவருக்கு எம்பார் என்று பெயரும் இட்டார். அவருடைய இறுதி நாட்களில், எம்பார் இத்தகைய சிறந்த ஸ்ரீவைஷ்ணவ ஸம்ப்ரதாயத்தை மேலே நடத்திச் செல்லுமாறு பராசர பட்டரைப் பணித்தார். எக்காலத்திலும் எம்பெருமானாருடைய பாதக்கமலங்களை தியானித்து “எம்பெருமானார் திருவடிகளே சரணம்” என்று அனுசந்தித்துக் கொண்டு இருக்குமாறு அவர் பராசர பட்டரைப் பணித்தார். தம்முடைய ஆசார்யர் ராமானுஜரின் திருவடித் தாமரைகளை தியானித்த வண்ணம், தம்முடைய ஆசார்யரிடம் அவர் அளித்த ப்ரதிக்ஞையகளை நிறைவேற்றியபின், தம்முடைய ஆசார்யருக்கு மேலும் கைங்கர்யங்கள் செய்யும் பொருட்டு எம்பார் பரமபதத்தை அடைந்தார். தம்முடைய ஆசார்யர் நடத்திய வழியில், பட்டரும் அப்பழுக்கற்ற குன்றாத மரபு கொண்ட நம் ஸம்ப்ரதாயத்தை மேலும் வழிநடத்தினார்.

வேதவல்லி : பட்டரைப் பற்றி இன்னும் சொல்லுங்கள் பாட்டி.

பாட்டி : பட்டரைப் பற்றி மேலும் நான் அடுத்த தடவை உங்களுக்குச் சொல்வேன். இப்பொழுது இருட்டி விட்டதால் உங்கள் வீடுகளுக்குச் செல்லுங்கள். நாளைய ஆளவந்தார் திருநக்ஷத்ர தினத்தில் கோயிலுக்கு மறவாமல் செல்லுங்கள்.

குழந்தைகள் ஆளவந்தார், பெரிய திருமலை நம்பி, ராமானுஜர், எம்பாரைப் பற்றி எண்ணியவாறு தங்கள் வீடுகளுக்குப் புறப்படுகின்றனர்.

அடியேன் கீதா ராமானுஜ தாசி

ஆதாரம்: http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-embar/

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