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Learn mumukshuppadi (முமுக்ஷுப்படி)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

Untitled3nArAyaNa rishi, nara rishi – badhrikASramam piLLai lOkAchAryar, maNavALa mAmunigaL – SrIperumbUthUr

mumukshuppadi is one of the fundamental granthams which should be learned by every SrIvaishNava who has undergone pancha samskAram (samASrayaNam), with proper guidance. This must be heard and learned after undergoing pancha samskAram only.

Author – piLLai lOkAchAryar

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

Part 1 – thaniyans and sUthrams 1 to 51

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து)
2 – Full sUthram (முழு ஸூத்ரம்)
step 3

Reference Material

Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

Simple explanation based on maNavALa mAmunigaL‘s vyAkyAnam

Introduction (அறிமுகம்)

thaniyans (தனியன்கள்) 

sUthrams (ஸூத்ரங்கள்)

sUthrams 1 to 4
sUthrams 5 to 7
sUthrams 8 to 21
sUthrams 22 to 30

बालपाठ – तिरुमऴिशै आऴ्वार (भक्तिसार मुनि)

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 2

thirumazhisaiazhwar

आण्डाल दादी तिरुवेळ्ळरै मंदिरके दर्शन के लिए पराशर और व्यास को साथ में ले जाती हैं । वे श्री रंगम के राजगोपुर के बाहर एक बस में बैठे हैं ।

पराशर: दादी, जबकि हम बस में हैं, क्या आप हमें चौथे आऴ्वार के बारे में बता सकते हैं?

आण्डाल दादी : ज़रूर, पराशर । मुझे हर्ष है कि आप यात्रा के दौरान आऴ्वार के दिव्य चरित्र के बारे में बात करना पसंद करते हैं।

पराशर और व्यास दादी के सामने मुस्कराए । बस श्री रंग से शुरू होता है ।

आण्डाल दादी : चतुर्थ (चौथे) आऴ्वार तिरूमऴिशै आऴ्वार है, जिन्हें प्यार से भक्तिसार कहा जाता था । आप श्री का प्रादुर्भाव थाई महीने के माघ नक्षत्र मे भार्गव मुनी और कणकांगी को चेन्नई के पास स्थित तिरूमऴिशै दिव्य क्षेत्र में हुआ । वह अकेले आऴ्वार थे जो इस दुनिया में सबसे लंबे समय तक जीवित रहे ।आप श्री लगभग ४७०० वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहे ।

पराशर और व्यास (आश्चर्य में) : अपने जबड़े ड्रॉप कर पूछते हैं “४७०० साल “???

आण्डाल दादी : हाँ, पेयआऴ्वार से मिलने से पहले, उन्होने अलग-अलग धर्मों का अवलबन किया था ।

व्यास: ओह ! उनसे (पेयआऴ्वार से) मिलने के बाद क्या हुआ ?

आण्डाल दादी : पेयआऴ्वार ने उन्हें भगवान विष्णु के बारे में विस्तार से पढ़ाया और तिरूमऴिशै आऴ्वार को श्री वैष्णव संप्रदाय में वापस लाया.

बस छतरम बस स्टैंड पहुंच गया।

आण्डाल दादी : उनकी विशेष रुचि अन्तरयामी भगवान् (वह पेरुमाळ् जो हमारे अन्तरंग मे है) के प्रति थी और (उनका) कुंभकोणम के अारावमुदन् अर्चा स्वरूप के प्रति इतना अनुरक्त थे कि पेरुमाळ् ने उनका नाम आऴ्वार के नाम से बदल दिया और वह (दानों) अारावमुदन् आऴ्वार और तिरूमऴिशै पिरान् के नाम से प्रसिद्ध हुए ।

पराशर: वाह, दादी ऐसा लगता है कि वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे ।

आण्डाल दादी : हाँ, वह पेरुमाळ् के अत्यनत सन्निकट थे थे । एक गांव में, जब वह यात्रा कर रहे थे, (उन्होने) उस गांव के मंदिर का दर्शन किया । पेरुमाळ् उनको बहुत प्यार करते थे, जिस दिशा में आऴ्वार चल रहे थे भगवान् विष्णु भी उस दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर दिये । इसी तरह, भागवत-प्रेमी (आऴ्वार-प्रेमी) अारावमुदन् भगवान् जो आऴ्वार के प्रति अनुरक्त थे (कि), आऴ्वार की विशेष प्रार्थना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार कर, भगवान् स्वशय्यावस्था से उठना शुरू कर दिए जब आऴ्वार के अलविदा होने की बात भगवान् ने सुनी ।

पराशर और व्यास (की आँखें विस्मय में बाहर आये) और पूछते हैं “फिर क्या हुआ दादी माँ?”

आण्डाल दादी : आऴ्वार चौंक गए और भगवान् विष्णु से अनुरोध किए कि वे स्वशय्यावस्था स्थिति में वापस आजाए । भगवान विष्णु दुविधा में थे और इसलिए वह अब भी अर्ध शयित स्थिति में है ।

व्यास: ओह दादी ! यह बहुत अच्छी है । एक दिन हमें भी (उन) भगवान् विष्णु के दर्शन के लिये जाना चाहिए ।

आण्डाल दादी : निश्चित रूप से, हम कुछ समय पर्यन्त वहां जायेंगे । वह लंबे समय तक वहाँ रहते है । वह अपने सभी कार्यों को कावेरी नदी में फेंककर केवल २ प्रबन्धों को प्रतिधारित करते है – तिरूच्छन्द-विरुत्तम् और नान्मुगन्-तिरुवन्दादि । उसके बाद वह अंततः परमपद वापस लौट आये और भगवान् विष्णु को परमपद में सनातन रूप से सेवा-संलग्न हुए ।

बस तिरुवेळ्ळरै तक पहुंचता है । वे मंदिर में प्रवेश करते हैं और माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का दर्शन करते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/11/beginners-guide-thirumazhisai-azhwar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

Learn yathirAja vimSathi (யதிராஜ விம்சதி)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

emperumAnAr – AzhwArthirunagari bhavishyadhAchAryan sannidhi

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

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1 – word-by-word (பதம் பிரித்து) 2 – One line (ஒரு வரி)

Meanings (அர்த்தங்கள்) in your favorite language

English Hindi Tamizh Telugu

Lectures (in thamizh) (Click on the links to download the MP3 files and listen)

Introduction (அறிமுகம்) SlOkams 1 to 5 SlOkams 6 to 10 SlOkams 11 to 20

Learner’s series

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

All existing santhai class schedule, recordings etc can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/06/dhivya-prabandham-santhai-recordings/ .

Learn kaNNinuN chiRuth thAmbu (கண்ணி நுண் சிறுத் தாம்பு)

SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:nammAzhwAr and madhurakavi AzhwAr

Santhai (Learning) classes (ஸந்தை வகுப்புகள்)

Steps (Click the links to download the MP3 files and listen)

1 – word-by-word (பதம் பிரித்து) 2 – One line (ஒரு வரி) 3 – Two lines (இரண்டு வரிகள்) 4 – Full pAsuram (முழு பாசுரம்)

Meanings (அர்த்தங்கள்)

Lectures (in thamizh) (Click the links to download the MP3 files and listen)

Introduction (அறிமுகம்) thaniyans and pAsurams (தனியன்கள் மற்றும் பாசுரங்கள்)

vyAkyAnams (Commentaries)

kaNNinuN chiRuth thAmbu – English kaNNinuN chiRuth thAmbu – Telugu

Recital (சேவாகால முறை)

Full rendering

thaniyans (தனியன்கள்)

thaniyan 1 – avidhitha

thaniyan 2 – vERonRum

pAsurams (பாசுரங்கள்)

pAsuram 1 – kaNNinuN chiRuth thAmbinAl
pAsuram 2 – nAvinAl naviRRu
pAsuram 3 – thirithanthAgilum
pAsuram 4 – nanmaiyAl mikka
pAsuram 5 – nambinEn
pAsuram 6 – inRu thottum
pAsuram 7 – kaNdu koNdu
pAsuram 8 – aruL koNdAdum
pAsuram 9 – mikka vEdhiyar
pAsuram 10 – payan anRAgilum
 pAsuram 11 – anban thannai

बालपाठ – मुदल् आऴ्वार – भाग 2

श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< मुदल् आऴ्वार – भाग 1

mudhalAzhwargaL-thirukkovalur-with-perumAL

आण्डाल दादी: व्यास और पराशर मुदल् आऴ्वार सन्निधि से बाहर निकलते हैं ।

पराशर: दादी, मुदल् आऴ्वार को देखकर अच्छा लगा । दादी क्या ये 3 आऴ्वार सदैव एक साथ रहते हैं?

आण्डाल दादी: यह अच्छा सवाल है । उनका एक साथ रहने का एक कारण है । मुझे कृपया समझाने दो । एक दिन भगवान की दिव्य योजना से, वे तिरुक्कोवलूर में एक के बाद एक पहुंचे। प्रचण्ड वायु का वह दिन था । उस दिन भारी वर्षा भी हुई थी । वहां एक ऋषि थे, जिनका नाम मृकर्ण्डु था, जिनका तिरुक्कोवलूर में एक आश्रम था । अपने आश्रम के सामने, एक छोटा सा शाला था । पहले पोईगै आऴ्वार शाला में पहुंचे और वर्षा से स्वयं को बचाने के लिए शाला में शरण लिए । थोड़ी देर के लिए पोईगै आऴ्वार शाला में लेटकर शयन किए ।

पराशर: केवल अकेले? उनको डर नहीं लगा?

आण्डाल दादी: नहीं पराशर । वह निर्भय है क्योंकि वह हमेशा प्रभु का चिन्तन करते हैं । उस समय, भूतद् आऴ्वार वर्षा में वहां पहुंचते हैं और शाला में प्रवेश करने की अनुमति का अनुरोध करते हैं । पोईगै आऴ्वार कहते है कि, “यहां सीमित स्थान है एक व्यक्ति शयन कर सकता है लेकिन दो व्यक्ति बैठ सकते हैं । कृपया पधारें । ” भूतद् आऴ्वार खुशी से प्रवेश करते है और वे दोनों अगल-बगल मे बैठते हैं । तत्पश्चात, वर्षा में भागते हुए पेयाऴ्वार, आश्रय इच्छुक, शाला में प्रवेश करने की अनुमति मांगते है । पोईगै आऴ्वार कहते हैं, “ठीक है, यहां सीमित स्थान है। एक व्यक्ति नीचे लेट सकता है, दो व्यक्ति बैठ सकते हैं और तीन व्यक्ति खड़े हो सकते हैं । कृपया पधारें । हम सभी खड़े हो सकते हैं । ” यह सुनते ही पेय-आऴ्वार, खुशी से शाला में प्रवेश करते है और वे सभी वर्षा के ठंडक में कंधे से कंधा मिलाकर बैठते हैं । वे एक-दूसरे से बात करना शुरू करते हैं, एक-दूसरे के बारे में जानते हैं और सार्वजनिक हित के बारे में जानकर बहुत प्रसन्न होते हैं, वे भगवान् के सुंदर नाम, रूप, गुण, आदि के बारे में चर्चा करना प्रारम्भ करते हैं।

व्यास: वाह! यह बहुत अच्छा है। वास्तव में ईश्वरीय है । लेकिन दादी, यह और अच्छा होता, अगर भगवान् भी वहां उपस्थित होते, ठीक उसी तरह, जैसे ही वह हमें देखने के लिए यहां परिय पेरुमाळ् के रूप में है ।

आण्डाल दादी: रुको, घटना यहाँ समाप्त नहीं होती है । आपने अगले अनुक्रम को बहुत अच्छी तरह से अनुमान लगाया है । इस घटना क्रम में अधिक देवत्व है, अपने प्रिय भक्तों की सभा को देखकर, अब पेरूमाळ् भी इस का हिस्सा बनना चाहते है । पेरुमाळ् भी शाला में प्रवेश कर स्वयं को विवश करते है । अंधेरे होने और अचानक आश्रय शाला मे स्वयं को क्षेत्राभाव मे विवश मानकर, तीन आऴ्वार सोचते हैं – क्या हो रहा है यहाँ और किसने उनके ज्ञान के बिना शाला में प्रवेश किया । पहले पोईगै आऴ्वार “वय्यम् तगलिया” पासुर का गान शुरू करते हैं – जगत् को दीपक के रूप में देखते हैं । उसके बाद, फिर, भूतद् आऴ्वार “अन्बे तगलिया” गाते है – उनका प्रेम को ही एक दीपक के रूप में कल्पना करते है । इन दीपकों के प्रकाश से, शाला ज्योतिर्मय होता है, और पेय-आऴ्वार पहले श्रीमन्नारायण और श्रीमहालक्ष्मीजी के दिव्य रूप को शाला के बीच में देखते है । वह “तिरुकण्डेन्” पासुरगान प्रारम्भ करते है … (श्रीमहालक्ष्मीजी के साथ मुझे श्रीमन्नारायण, उनके दिव्य / सुंदर स्वर्ण रूप, उनका दिव्य शंख और चक्र) का दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ है । सभी आऴ्वार एक साथ भगवान् और श्रीमहालक्ष्मी की दिव्य दृष्टि का आनंद लेते हैं ।

पराशर: यह इतना महान है, अवश्य उनको अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ होगा ।

आण्डाल दादी: हां – वे बहुत खुश थे । श्रीभगवान् और श्रीलक्ष्मीजी भी बहुत खुश थे। इस अद्भुत घटना के बाद, उन्होंने एक साथ दिव्य अर्चा विग्रह वाले अन्य मंदिरों का दिव्य दर्शन किया । वह शेषकालपर्यन्त तक एक साथ रहे और अंततः परमपद पधारे ताकि प्रभु का सान्निध्य प्राप्त करें और उनकी सेवा करें ।

व्यास और पराशर: यह वृत्तांत सुनने के लिए बहुत अद्भुत  है । क्या हम अगले आऴ्वारोें के जीवन के बारे में अब सुनेंगे?

आण्डाल दादी: आपको उसके लिए अगली बार तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ।  मैं अब जाकर कुछ भगवान के लिए खाना बनाती हूं, जो हम आज रात को खा सकते हैं । अब आपके खेलने का समय है अतः अब आप बाहर मज़ा कर सकते हैं ।

व्यास और पराशर: ज़रूर दादी, हम कल आपसे और अधिक सुनने के लिए वापस आएँगे।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2014/11/beginners-guide-mudhalazhwargal-part-2/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

 

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம் – எம்பார்

ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமானுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

ஸ்ரீவைஷ்ணவம் – பால பாடம்

<< ராமானுஜர் – பகுதி – 2

பராசரன், வ்யாசன், வேதவல்லி, அத்துழாய் நால்வரும் ஆண்டாள் பாட்டியின் வீட்டிற்கு வருகிறார்கள்.

பாட்டி : வாருங்கள் குழந்தைகளே. கை கால்களை அலம்பிக் கொள்ளுங்கள். நான் உங்களுக்கு கொஞ்சம் ப்ரசாதம் தருகிறேன். நாளைய தினத்திற்கு என்ன சிறப்பு தெரியுமா? நாளைக்கு ஆளவந்தாரின் திருநக்ஷத்ரம் ஆகும், ஆடி, உத்ராடம். உங்களில் யாருக்கு ஆளவந்தாரை நினைவிருக்கிறது ?

அத்துழாய் : எனக்கு நினைவிருக்கிறது. அவர் தாம் ராமானுஜரை ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் அழைத்துவர தேவப் பெருமாளை ப்ரார்த்தித்தவர்.

வ்யாச : ஆமாம். மேலும், அவர் பரமபதத்தை அடைந்த பிறகு அவருடைய திருமேனியில் அவருடைய ஈடேறாத மூன்று ஆசைகளை குறித்தவாறு மடங்கியிருந்த அவருடைய மூன்று விரல்களைக் கண்டு ராமானுஜர் அவற்றை நிறைவேற்ற ப்ரதிக்ஞை செய்தார். ராமானுஜர் ப்ரதிக்ஞைகளை செய்தவுடன் அவ்விரல்கள் பிரிந்தன.

பராசர :  ராமானுஜருக்கும் ஆளவந்தாருக்கும் இடையே இருந்த உறவு மனத்தாலும் ஆன்மாவினாலும் இயைந்தது, தேஹத்திற்கு அப்பாற்பட்டது என்று நீங்கள் சொன்னதும் எங்களுக்கு நினைவிருக்கிறது பாட்டி.

பாட்டி : மிகச்சரி! நாளை அவருடைய திருநக்ஷத்ரம் ஆகும். இந்தாருங்கள், இப்பிரசாதங்களைப் பெற்றுக் கொள்ளுங்கள்.  ராமானுஜரை ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் கொணர்ந்த மஹாசார்யரை மறவாமல் நாளை நீங்கள் எல்லாரும் கோயிலுக்கு சென்று சேவிக்க வேண்டும். மேலே இன்று நம்முடைய அடுத்த ஆசார்யரான எம்பாரைப் பற்றித் தெரிந்து கொள்ளலாம். எம்பார் மதுரமங்கலத்தில் கமலநயன பட்டருக்கும் ஸ்ரீதேவி அம்மாளுக்கும் புதல்வராக அவதரித்தவர்.  பிறப்பில் அவருக்கு இட்ட பெயர் கோவிந்தப் பெருமாள் என்பதாகும். அவரை கோவிந்த பட்டர், கோவிந்த தாசர், ராமானுஜபதச் சாயையார் என்றும் அழைப்பார்கள்.  அவர் எம்பெருமானாருடைய (தாயாரின் தங்கையின் பிள்ளை) தம்பியாவார், ராமானுஜருக்கு ஏற்பட்ட ஆபத்திலிருந்து அவரைக் காப்பாற்றியவரும் அவர் தாம்.

வேதவல்லி : உயிருக்கு இருந்த ஆபத்தா? நான் ராமானுஜருக்கு ஒரு முறைதான் ஆபத்து ஏற்பட்டது, அதிலிருந்து அவரைக் கூரத்தாழ்வானும் பெரிய நம்பியும் தாம் காப்பாற்றினார்கள் என்று எண்ணியிருந்தேனே. அவருக்கு எத்தனை ஆபத்துகள் தான் நேர்ந்தன பாட்டி?

பாட்டி : பல தடவைகள்! அவற்றை நான் நேரம் வரும்பொழுது சொல்கிறேன். அவருடைய குருவான யாதவப்ரகாசர் தாம் முதலில் அவரை முதலில் கொல்ல எண்ணிணார். வேதங்களின் உட்பொருளைக் குறித்து ராமானுஜருக்கும் யாதவப்ரகாசருக்கும் கருத்து வேறுபாடுகள் இருந்து வந்தது. யாதவப்ரகாசர் வேதத்தின் சில வாக்கியங்களுக்கான பொருளை தவறாகவும் திரிபாகவும் கூறி வந்தார். ராமானுஜர், அவற்றைக் கேட்கும் பொழுது மிகவும் வருந்தி நம் விசிஷ்டாத்வைத ஸம்ப்ரதாயத்தில் கூறியுள்ள உண்மை கருத்தினை தெரிவிப்பார். யாதவப்ரகாசர் அத்வைதியாகையால், அவற்றுக்கு ராமானுஜர் கூறும் விளக்கங்களை ஒப்புக் கொண்டதில்லை. ராமானுஜர் கூறி வந்த பொருள் உண்மையென்று அறிந்தவராகையால் அவரைத் தமக்குப் போட்டியாகக் கருதத் தொடங்கினார்.   ஆசார்யர் என்ற நிலைக்கு ராமானுஜர் தமக்குப் போட்டியாக வந்து விடுவார் என்ற எண்ணம் அவருக்கு ஏற்பட்டது; ஆனால் ராமானுஜருக்கோ அது போன்ற நோக்கமே இல்லை.  இது யாதவப்ரகாசரின் மனத்தில் ராமானுஜர் மீது வெறுப்பும் பொறாமையும் கொள்ளக் காரணமாக அமைந்தது. அவர் வாரணாசிக்கு யாத்திரையாக தம் சிஷ்யர்களுடன் செல்லும் பொழுது ராமானுஜரைக் கொல்ல வேண்டும் என்று திட்டமிட்டார். இச்சூழ்ச்சியினை அறிந்த கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜரை அக்குழுவுடனான யாத்திரையினைத் தொடர்ந்து மேற்கொள்ள வேண்டாமென்று எச்சரித்தார்.  அவர் ராமானுஜரைத் தமது உயிரைக் காக்கும் பொருட்டு தெற்கில் காஞ்சிபுரம் நோக்கி செல்லுமாறு கேட்டுக் கொண்டார். ராமானுஜரும் அவ்வாறே செய்து அவரது குருவின் சூழ்ச்சியிலிருந்து தப்பித்தார். இவ்வாறு கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜரை ஆபத்திலிருந்து காத்தார்.

வ்யாச : பாட்டி, கோவிந்தப் பெருமாளும் யாதவப்ரகாசரின் சிஷ்யரா?

எம்பார்மதுரமங்கலம்

பாட்டி : ஆமாம் வ்யாசா. ராமானுஜர், கோவிந்தப் பெருமாள் இருவருமே யாதவப்ரகாசரிடம் கல்வி பயின்று கொண்டிருந்தவர்கள். ராமானுஜர் தம்மைக் காத்துக் கொள்ளும் பொருட்டு தெற்கு திசையில் சென்றாலும், கோவிந்தப்பெருமாள் யாத்திரையில் தொடர்ந்து சென்று சிவபக்தராகி காளஹஸ்தி என்னும் இடத்தில் தங்கி உள்ளங்கை கொண்ட நாயனார் என்று அழைக்கப்படலானார். இதனை அறிந்த ராமானுஜர், கோவிந்தப் பெருமாளை திருத்தி நம் ஸம்ப்ரதாயத்தில் திருப்பும் பொருட்டு தம் மாமாவாகிய பெரிய திருமலை நம்பியை அனுப்பினார். பெரிய திருமலை நம்பியும் காளஹஸ்த்திக்கு சென்று நம்மாழ்வாருடைய பாசுரங்களையும் ஆளவந்தாருடைய ஸ்தோத்ர ரத்னத்தின் ச்லோகங்களையும் கொண்டு கோவிந்தப் பெருமாளைத் திருத்தினார். கோவிந்தப் பெருமாளும் தம் தவறை உணர்ந்து நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குத் திரும்பினார்.  ஆக குழந்தைகளே, ஆளவந்தார் பரமபதித்து விட்டாலும் ராமானுஜரை மட்டுமின்றி அவரது சகோதரராகிய கோவிந்தப் பெருமாளையும் நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் ஈர்க்கக் கருவியாக இருந்தார். நம் ஸம்ப்ரதாயத்திற்குள் அவரை ஈர்த்த பெரிய திருமலை நம்பியே அவருக்கு ஆசார்யராக பஞ்ச சம்ஸ்காரம் செய்து வைத்தார். பெரிய திருமலை நம்பியும் திருப்பதிக்கு திரும்ப செல்ல அவருடன் கோவிந்தப் பெருமாளும் சென்று தம் ஆசர்யருக்கு கைங்கர்யங்கள் செய்யலானார். இங்கு நாம் கவனிக்க வேண்டிய பொருள் என்னவென்றால் கோவிந்தப் பெருமாளை திருத்தும் பொருட்டு ராமானுஜரும் பெரிய திருமலை நம்பியுமே அவரிடத்தில் சென்றார்களேயன்றி, அவர்களை அவர் அணுகவேயில்லை. தம் சிஷ்யர்களின் மேன்மைக்காக இத்தகைய அக்கறை கொண்டு அவர்களிடம் சென்று திருத்துவோரை க்ருபா மாத்ர ப்ரசன்னாசார்யர்கள் என்பர். எம்பெருமான் போன்றே அளவற்ற அன்போடும் கருணையோடும் சிஷ்யர்களை நோக்கிச் செல்கின்றனர். கோவிந்தப் பெருமாளுக்கு ராமானுஜர், பெரிய திருமலை நம்பி இருவருமே க்ருபா மாத்ர ப்ரசன்னாசார்யர்கள்தாம்.

பராசர : பாட்டி, கோவிந்தப் பெருமாளைப் பற்றி மேலும் சொல்லுங்கள். அவர் என்ன கைங்கர்யங்கள் செய்தார்?

பாட்டி: கோவிந்தப் பெருமாள் தம் ஆசார்யர் பெரிய நம்பியினிடத்தில் கொண்டிருந்த அபிமானத்தைக் காட்ட பல சம்பவங்கள் உள்ளன. ஒரு தடவை தம் ஆசார்யருக்கான படுக்கையினைத் தயாரிக்கும் பொழுது அவரே அதில் படுத்துப் பார்த்தார். நம்பி கோவிந்தப் பெருமாளை அது குறித்து விசாரித்தார். கோவிந்தப் பெருமாள், அம்மாதிரிச் செய்வதனால் தம் ஆசார்யரின் படுக்கை பாதுகாப்பாகவும் சரியாகவும் இருத்தலே தம் நோக்கம் என்றும், அதனால் தாம்  நரகத்துக்கே போவதானாலும் பொருட்டில்லை என்றும் பதிலளித்தார். இதனைக் கொண்டு அவர் தம்மையே கருத்தில் கொள்ளாமல், ஆசார்யரிடத்தில் கொண்டிருந்த அபிமானத்தையும் ஆசார்யருடைய திருமேனியின் மீது அவர் கொண்டிருந்த கவனத்தையும் புரிந்து கொள்ளலாம். அக்காலகட்டத்தில் ராமானுஜர் ஸ்ரீராமாயணத்தின் சாரத்தை, பெரிய நம்பியிடமிருந்து கற்றுக்கொள்ள திருப்பதியில் இருந்தார். ஒரு வருட காலம் நம்பியிடமிருந்து கற்றுக்கொண்டு அவர் அங்கிருந்து புறப்பட ராமானுஜரைத் தம்மிடம் ஏதாவது பெற்றுக் கொள்ளுமாறு நம்பி கூறினார். ராமானுஜர் கோவிந்தப் பெருமாளைக் கேட்க, நம்பியும் உகப்புடன் ராமானுஜருக்குத் தொண்டு புரியும் பொருட்டு கோவிந்தப் பெருமாளைக் கொடுக்க ஒப்புக்கொள்கிறார். இதனை அறிந்த கோவிந்தப் பெருமாள், பெரிய திருமலை நம்பியிடமிருந்து பிரிவதை எண்ணிச் சோகமடைந்தார்.

வ்யாச : பாட்டி, நம்பி ஏன் கோவிந்தப் பெருமாளை ராமானுஜருடன் அனுப்பினார்? கோவிந்தப் பெருமாள் தம் ஆசார்யருக்கு அபிமானத்துடன் கைங்கர்யங்கள் புரிந்து கொண்டிருக்கும் பொழுது அவரை விட்டு ஏன் பிரிய வேண்டும்?

பாட்டி : வ்யாசா, கோவிந்தப் பெருமாள் ராமானுஜருக்குப் பல தொண்டுகள் புரிந்தே நம் ஸம்ப்ரதாயத்தில் முக்கிய இடம் பெற்றவர். அவருடைய குழந்தைப் பருவத்திலிருந்தே அவர் ராமானுஜரிடம் மிகுந்த அன்பும் பாசமும் கொண்டிருந்தார். ராமானுஜர் பரமபதத்திற்கு ஏகியதும், பராசர பட்டரையும் ராமானுஜரின் மற்ற சிஷ்யர்களையும் வழி நடத்தினார். அவருக்கு இத்தனை பொறுப்புகளும் ஆற்ற வேண்டிய கடமைகளும் இருந்ததாலேயே, தம் ஆசார்யர் பெரிய திருமலை நம்பியை விட்டு பிரியும் தியாகத்தைச் செய்து ராமானுஜரைத் தம் வழிகாட்டியாக ஏற்றுக் கொண்டார். பிற்காலதில் அவர் ராமானுஜரையே தம் அனைத்தாகவும் ஏற்றுக்கொண்டு, ராமானுஜரின் திருமேனி அழகைக் காட்டும் பாசுரம் ஒன்றையும் அருளினார். இதை “எம்பெருமானார் வடிவழகு பாசுரம்” என்று அழைப்பார்கள். நான் போன தடவை சொன்னது போலவே, ஸம்ப்ரதாய விஷயங்களில் பொதுவான நன்மையின் பொருட்டு, தியாகங்கள் செய்ய நீங்கள் தயாராக இருக்க வேண்டும். அதைத் தான் கோவிந்தப் பெருமாளும் செய்தார்.

அத்துழாய் : கோவிந்தப் பெருமாளுக்கு விவாகம் நடந்ததா? அவருக்குக் குழந்தைகள் இருந்தனரா?

பாட்டி : கோவிந்தப் பெருமாள் எல்லோரிடத்திலும் எப்பொருளிலும் எம்பெருமானையே காணுமளவுக்கு பகவத் விஷயத்தில் ஈடுபட்டிருந்தவர். அவருக்கு விவாகம் நடந்திருந்தாலும், கோவிந்தப் பெருமாள் பகவத் விஷயத்தில் கொண்டிருந்த ஈடுபாட்டைக் கண்டு, எம்பெருமானார் அவருக்கு ஸந்யாஸாச்ரமத்தில் ஈடுபடுத்தி அவருக்கு எம்பார் என்று பெயரும் இட்டார். அவருடைய இறுதி நாட்களில், எம்பார் இத்தகைய சிறந்த ஸ்ரீவைஷ்ணவ ஸம்ப்ரதாயத்தை மேலே நடத்திச் செல்லுமாறு பராசர பட்டரைப் பணித்தார். எக்காலத்திலும் எம்பெருமானாருடைய பாதக்கமலங்களை தியானித்து “எம்பெருமானார் திருவடிகளே சரணம்” என்று அனுசந்தித்துக் கொண்டு இருக்குமாறு அவர் பராசர பட்டரைப் பணித்தார். தம்முடைய ஆசார்யர் ராமானுஜரின் திருவடித் தாமரைகளை தியானித்த வண்ணம், தம்முடைய ஆசார்யரிடம் அவர் அளித்த ப்ரதிக்ஞையகளை நிறைவேற்றியபின், தம்முடைய ஆசார்யருக்கு மேலும் கைங்கர்யங்கள் செய்யும் பொருட்டு எம்பார் பரமபதத்தை அடைந்தார். தம்முடைய ஆசார்யர் நடத்திய வழியில், பட்டரும் அப்பழுக்கற்ற குன்றாத மரபு கொண்ட நம் ஸம்ப்ரதாயத்தை மேலும் வழிநடத்தினார்.

வேதவல்லி : பட்டரைப் பற்றி இன்னும் சொல்லுங்கள் பாட்டி.

பாட்டி : பட்டரைப் பற்றி மேலும் நான் அடுத்த தடவை உங்களுக்குச் சொல்வேன். இப்பொழுது இருட்டி விட்டதால் உங்கள் வீடுகளுக்குச் செல்லுங்கள். நாளைய ஆளவந்தார் திருநக்ஷத்ர தினத்தில் கோயிலுக்கு மறவாமல் செல்லுங்கள்.

குழந்தைகள் ஆளவந்தார், பெரிய திருமலை நம்பி, ராமானுஜர், எம்பாரைப் பற்றி எண்ணியவாறு தங்கள் வீடுகளுக்குப் புறப்படுகின்றனர்.

அடியேன் கீதா ராமானுஜ தாசி

ஆதாரம்: http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-embar/

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बालपाठ – श्रीमन्नारायण कौन है ?

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्रीवैष्णव संप्रदाय से परिचय

आण्डाळ दादी पराशर और व्यास को साथ में श्रीरंगम मंदिर ले जाती है |

व्यास:  वाह  दादी, यह एक विशाल मंदिर है | हमने इससे पहले इतना बड़ा मंदिर नहीं देखा । हमने ऐसे विशाल महलों में रहने वाले राजाओं के बारे में सुना है। क्या हम एक ही राजा के दर्शन करने जा रहे हैं?

आण्डाळ दादी: हां, हम सभी के राजा, श्रीरंगराज को देखने जा रहे हैं| श्रीरंगराज (श्री रंगम के राजा), श्रीरंगम में उन्हें प्यार के साथ पेरिय पेरुमाळ और नम्पेरुमाळ (हमारे प्रभु) कहते हैं| भगवान् श्रीमन्नारायण शेष नारायण पर अर्धशायी स्थिति में आराम करते हुए अपनी सर्वोच्चता और स्वामित्व को उजागर करते हैं| वह अपने भक्तों की प्रतीक्षा करते है और जब भक्त उनसे मिलने जाते हैं तो उन्हें आशीर्वाद प्रदान करते है| जबकि नम्पेरुमाळ सुलभता (सौलभ्य) दर्शाते है, अर्थात् जो आसानी से प्राप्य है, वह भगवान अपने भक्तों की कठिनाइयों को समझते हैं, जो उन तक जाने में सक्षम न हो | इसलिए वह उन्हें अपने ब्रह्म-उत्सव (सावरी / जुलूस) (पुरप्पाडु) के भाग में दर्शन देते हैं। श्रीरंगम में लगभग सालभर, नम्पेरुमाळ अपने भक्तों को दर्शन देते हैं और उनको आशीर्वाद देते हैं।

पराशर : दादी, हमने सोचा कि श्रीमन्नारायण श्रीवैकुण्ठधाम में रहते है, लेकिन वह यहाँ भी है … यह कैसे

आण्डाळ दादी : हाँ पराशर, जो आपने सुना वह सही है। पेरूमाळ (श्रीमन्नारायण) वैकुण्ठ में हैं और वह यहां हमारे साथ भी हैं। मुझे यकीन है कि आपने जल के विभिन्न रूपों के बारे में सुना होगा : तरल, भाप और बर्फ | इसी तरह श्रीमन्नारायण के पांच रूप हैं, वे पररूप (श्री वैकुण्ठ में भगवान का रूप), व्यूहरूप (भगवान विष्णु क्षीरसागर के रूप में), विभेद/विभाव रूप (राम, कृष्ण, मत्स्य आदि के रूप में अवतार), सर्वज्ञ (भगवान ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण में निवास करते है) और मंदिरों में दिव्य मंगल विग्रह (अर्चाविग्रह) के रूप में रहते हैं। श्रीमन्नारायण भगवान जी ने श्रीरंगम में दिव्य मूर्ति रूप में उपस्थित हैं। अवतार का मतलब है नीचे उतरना या अवरोहण करना। जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था, हम इस दुनिया में हर किसी की भलाई के लिए प्रार्थना करते हैं। श्रीमन्नारायण भगवान हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर स्वरूप में यहां पधारे है । हम सभी के प्रति भगवान् को अत्यन्त प्रीति है और हमारे साथ रहने के लिए पसंद करते हैं, यह भी एक कारण है कि भगवान श्री रंगनाथ के रूप में हमारे साथ यहाँ रहते है।

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इस पवित्र स्थल मे निवास करने वाले भगवान् का सन्दर्शन और पूजा कर, दादी ने व्यास और पराशर सहित प्रथान किया ।

व्यास: दादीजी, हमने आपसे उनके बारे में सुनने के बाद, उन्हें पसंद करना शुरू कर दिया है । दादी, इसके अलावा, वह हमारे जैसे दिखते है|

आण्डाळ दादी : वह न सिर्फ हम में से एक जैसे दिखते है, अपितु वह भी हम जैसे ही रहें है। विभेद (विभव) रूप में, उन्होंने हमारे साथ रहने के लिए अपने सर्वोच्च श्रीवैकुण्ठ छोड़ दिया और भगवान, श्री राम और कृष्ण के रूप में अवतार लिया और हमारी तऱह ही रहें। हम में से बहुत से लोग श्री राम या श्री कृष्ण को पसंद करते हैं, इसलिए उन्होनें हमारे साथ पेरिय पेरुमाळ रूप में कृष्ण के रूप में बने रहने का फैसला किया और नाम श्रीमन्नारायण के रूप में श्री राम के रूप में जाने का फैसला किया। पेरिय पेरुमाळ हमेशा एक गहरे विचार में बैठते हुए देखा जाते है, अपने भक्तों के बारे में सोच रहे हैं और श्रीमान नारायण हमेशा हमारे बीच में हैं, अपने भक्तों द्वारा दिखाए प्रेम का आनंद लेते हैं।

सभी अपने घर पहुंचते हैं।

व्यास और पराशर : ठीक है दादी, हम अब खेल के मैदान जा रहे हैं |

आण्डाळ दादी : बच्चों ध्यान से खेलना और याद रहें कि आप अपने मित्रों के सङ्गत मे जितना संभव हो उतना श्रीमन्नारायण के विषय पर अवश्य चर्चा करें ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन्

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బాల పాఠము – శ్రీ మహాలక్ష్మి వారి సహజమైన తల్లి గుణము

శ్రీః
శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః
శ్రీమతే రామానుజాయ నమః
శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః

శ్రీ వైష్ణవం – బాల పాఠము

<<బాల పాఠము – శ్రీమన్నారాయణుడి దివ్యమైన అర్చారూపములు మరియు గుణములు

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మరుసటి రోజు, ఆణ్డాళమ్మగారు పరాశరుని మరియు వ్యాసుని శ్రీ రంగం ఆలయానికి ఉత్తర వీధి ద్వారా తీసుకువెళ్ళుతుంది. పిల్లలు ఇద్దరు వారి కుడి వైపున ఉన్న ఒక సన్నిధిని కనుగొనెను.

వ్యాస~: పాట్టి, ఇది ఎవరి సన్నిధి?

ఆణ్డాల్ పాట్టి~: వ్యాస, ఇది శ్రీ రంగనాయకి తాయార్ సన్నిధి.

పరాశర~: పాట్టి, కానీ నిన్న ఊరేగింపులో మనము కేవలము శ్రీ రంగనాథునినే చూసాము.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అవును, పరాశర. నువ్వు అన్నది నిజమే. ఎందుకంటే, శ్రీ రంగనాయకి తాయార్ తన సన్నిద్ధి నుండి బయటకు రాదు. ఆకరికి శ్రీ రంగనాథుడు అంతటి వాడికే ఆవిడను చూడాలని అనిపించినప్పుడు, తనే స్వయముగా తాయార్ సన్నిధికి వెళ్ళ వలసి ఉంటుంది.

పరాశర~: ఆహా, సరే పాట్టి. అట్లా అయితే, మనము ప్రతిసారి ఆవిడ సన్నిధికి వెళ్ళి ఆమెను సేవించుకోవాలి. అయితే ఇప్పుడు, మనము శ్రీ రంగంలో ఉన్నప్పుడు అల్లా, ఆలయానికి వెళ్ళడానికి మరో కారణం దొరికింది.

తాయార్ దర్శనం అయ్యాక, వాళ్ళు సన్నిధి నుండి బయటకు వచ్చిరి.

ఆండాళ్ పాట్టి~: నేను మీద్దరిని ఒక ప్రశ్న అడుగుతాను. మీరు సాయంత్రంపూట ఆటలు ఆడుకొని ఆలస్యంగా ఇంటికి వచ్చినప్పుడు, మీ తండ్రి ఎట్లా స్పందిస్తారు? మిమ్మల్ని ఏమని అంటారు?

వ్యాస~: పాట్టి, ఆయన ఆ సమయంలో చాలా కోప్పడతారు.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అప్పుడు మీ నాన్న గారు మిమ్మల్ని ఇద్దరిని శిక్షిస్తార?

పరాశర~: అయ్యో, పాట్టి, మేము చాలా అరుదుగా శింక్షించబడతాము. ఎందుకంటే, నాన్నగారికి కోపం వచ్చినప్పుడల్లా, మా అమ్మ మమ్మల్ని నాన్న గారి చేత శిక్షించబడకుండా ఆపుతూ ఉంటుంది.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అదే విధముగా, పెరుమాళ్ కి అయిష్టకరమైన పనులు మనము తెలిసో తెలియకో చేస్తూ ఉంటాం కదా? ఆ సమయాలలో, స్వామికి మన మీద కోపం వచ్చినప్పుడల్లా, తాయార్ స్వామితో మాట్లాడి మనని ఎన్నో శిక్షల నుండి రక్షిస్తూ ఉంటుంది.

పరాశర~: నువ్వు అన్నది నిజమే, పాట్టి. తాయార్ మనకు అమ్మ లాంటిది.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: ఏ విధముగా నంపెరుమాళ్ మన రక్షణకై ఆయుధాలను ధరించి ఉంటాడో, మన అమ్మ తన యొక్క మృదువైన స్వభావమునకు గుర్తుగా ఏలప్పుడు తన చేతిలో పద్మాలని ధరించి ఉంటుంది. శ్రీ రంగనాథ సన్నిధిలో ఉన్న పెరుమాళ్ళను సేవించుకోవడానికి, మనము రంగ-రంగ గోపురమును, నాళికెత్తాన్ ద్వారమును, గరుడ సన్నిధిని, ఆ తరువాత ధ్వజాస్తంభమును దాటవలసి ఉంటుంది, కానీ మనము ఉత్తర వీధిని ప్రవేశించిన వెంటనే తాయార్ సన్నిధిలో ఉన్న అమ్మను దర్శించుకోవచ్చు. ఆమె మనకు అంత దగ్గరగా ఉంటుంది.

వ్యాస~: ఓహో, అలాగా పాట్టి.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: మన అమ్మ సీతా దేవి రూపములో ఉన్నప్పుడు కూడా, తను శ్రీరాముని నుండి కాకాసరుని కాపాడింది. ఇంద్రుని కుమారుడైన కాకాసరుడు ఆ నాడు ఒక కాకిలా రూపుదాల్చి, సీతా దేవిని ఇబ్బంది పెట్టాడు. అప్పుడు శ్రీ రాముడు అతన్ని శిక్షించబోతుంటే, మన అమ్మ ఎంతో దయతో కాకాసరుడిని శ్రీ రాముడు నుండి కాపాడింది. అదే విధంగా, శ్రీ రాముడు రావణుని అంతం చేసిన తరువాత, సీతా దేవి అశోక వనములో ఉన్న రాక్షసులని కూడా కాపాడింది. సితా దేవి అమ్మను ఇబ్బంది పెట్టించిన రాక్షసులపై మన హనుమంతుడుకి వాళ్ళను అంతం చేయాలని అనిపించే అంత కోపం వచ్చింది. కానీ అప్పుడు మన అమ్మ దయతో వాళ్ళను కాపాడి, వాళ్ళ యొక్క నిస్సహాయ పరిస్థితి వల్ల ఆ రాక్షసులు రావణుడి ఆదేశాలను అమలపరచవలసి వచ్చిందని హనుమంతునికి వివరించింది. ఈ విధంగా, ఓ తల్లిలా మన అమ్మ మనని ఏల్లప్పుడూ కాపాడుతునే ఉంటుంది.

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సీతా దేవి కాకాసరుని కాపాడుట

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రాక్షసుల మధ్య సీతా దేవి

పరాశర మరియు వ్యాస~: మనని కూడా ఆ తల్లి ఎల్లప్పుడు కాపాడుతుందని ఆశిస్తున్నాము, పాట్టి.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: తప్పకుండా కాపాడుతుంది. ఆమె ఎల్లప్పుడూ మన గురుంచి పెరుమాళ్ళుకు పురుషకారముచే (సిఫార్సు) చేసి, మనని రక్షించమని చెపట్టమే తన యొక్క మొదటి మరియు ముఖ్యమైన విధి.

పరాశర~: ఆమె కేవలము స్వామితో మనకు అనుకూలంగా మాట్లాడమేన, లేద ఇంకేమైన చేస్తుందా, పాట్టి?

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: స్వామి మనను క్షమించేవరకు మనకు అనుకూలంగా మాట్లాడుతునే ఉంటుంది. ఎప్పుడు స్వామి మనను అంగీకరిస్తాడో, అప్పుడు మన అమ్మ స్వామితో పాటుగ మన భక్తిని మరియు సేవని అనందంగా స్వీకరిస్తుంది.

వ్యాస~: అదెట్లా, పాట్టి?

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: ఓ, అది అర్థం చేసుకోవడము బహు తేలిక. మీరు మీ తల్లిదండ్రులను ఆరాధించేటప్పుడు, మీరు కేవలము మీ నాన్నగారిని ఒక్కరినే ఆరాధిస్తారా?

పరాశర~: కాదు పాట్టి. మేము ఇద్దరిని సమానముగా ప్రేమిస్తాము మరియు ఇద్దరికి సేవ చేయాలని అనుకుంటాము.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అవును…ఇప్పుడు మీకు అర్థమయింది. అదే విధముగా, తాయార్ మనము స్వామిని చేరే అంతటి వరకు, మనకు అనుకూలంగా స్వామితో మాట్లాడుతుంది. పెరుమాళ్ళను మనము చేరుకున్న తరువాత, స్వామితో పాటుగా మన ప్రేమని, భక్తిని అందుకుంటుంది.

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తాయర్ మరియు నంపెరుమాళ్ – పంగుని  ఉత్తరము(ఉత్రం) రోజున

పరాశర మరియు వ్యాస~: ఆహా, చాలా తేలికగా అర్థమయ్యేటట్టు చేప్పావు, పాట్టి. మళ్ళీ తరువాత కూడా, ఇంకా విని తెలుసుకోవాలని ఆశిస్తున్నాము. ఇప్పుడు బయటకు వెళ్ళి, కాశేపు ఆడుకుంటాము, పాట్టి.

పరాశర మరియు వ్యాస ఆడుకోవటానికి బయటకు పరుగెట్టిరి!

అడియేన్ : తేజశ్రీ రామానుజ దాసి

మూలము: http://pillai.koyil.org/index.php/2014/08/beginners-guide-sri-mahalakshmis-motherly-nature/

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శ్రీవైష్ణవ విద్య / పిల్లల కోసం– http://pillai.koyil.org

బాల పాఠము – శ్రీమన్నారాయణుడి దివ్యమైన అర్చారూపములు మరియు గుణములు

శ్రీః
శ్రీమతే శఠకోపాయ నమః
శ్రీమతే రామానుజాయ నమః
శ్రీమత్ వరవరమునయే నమః

శ్రీ వైష్ణవం – బాల పాఠము

<< బాల పాఠము – శ్శ్రీమన్నారయణుడు ఎవరు?

వ్యాస మరియు పరాశర ఆడుకొని తిరిగి ఆణ్డాళ్ పాట్టి ఇంటికి వచ్చేసరికి, ఆణ్డాళ్ పాట్టి పూలు, ఫలములు ఒక పళ్ళెములో పెట్టడము గమనించారు.

వ్యాస~: పాట్టి, ఎవరి గురించి ఈ పూలు మళ్ళీ ఈ పండ్లు?

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: వ్యాస, ఇప్పుడు శ్రీరంగనాదుడు పుఱప్పాడు(తిరువీధి) నకు వచ్చు సమయము.ఎవరైనా అతిదులు వచ్చినప్పుడు, ముఖ్యముగా పెద్దవారు విచ్చేసినప్పుడు, వారికి సపర్యలు చేయడము మన ధర్మము. ముఖ్యముగా భూలోకమునకే రాజైన స్వామి విచ్చేస్తున్నపుడు వారిని గౌరవించడము తర్వాత ఆనందింపచేయడము మన కర్తవ్యము. వారికి ఎటువంటి లోటు రానివ్వకొండ జాగ్రత్తగ చూసుకోవలి.

పరాశర~: ఓహ్ తప్పకుండా పాట్టి. అయితే, నేను శ్రీరంగనాదుడికి పళ్ళని సమర్పిస్తాను.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: తప్పకుండ పరాశర. రండి, వారి రాకకై ద్వారము దగ్గర నుంచోని ఎదురుచూద్దాము.

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నమ్పెరుమాళ్ (శ్రీరంగనాదన్) ఆణ్డాళ్ పాట్టి ఇంటి ముందుకు విచ్చేసిరి. పరాశరుడు చాలా సంతోషముతో పూలు, పళ్ళను శ్రీరంగనాదుడికి సమర్పించాడు.

పరాశర ~: పాట్టి, స్వామి తన ఎడమ చేతియందు ఏమి పట్టుకొన్నాడు?

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చక్రము కుడిచేతియందు, శంఖు ఎడమచేతియందు– తన భుజములపై,
అభయ హస్తము (ఆశ్రయమునకు గుర్తుగా) కుడిచేతి, గద ఎడమ చేతియందు– భుజమునకు క్రిందగా

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: స్వామి గదను తన ఎడమచేతి యందు పట్టుకొనెను, పరాశర. అర్చావతారమునందు శ్రీరంగనాదుడు నాలుగు హస్తములను కలిగిఉన్నారు, ఇంకొక ఎడమచేతియందు భజమునకు పైన శంఖమును, సుదర్శన చక్రమును కుడి భుజమునకు పైన ఉన్న చేతియందు ధరించినారు. మన యొక్క భాదలను నిర్మూలించడమునకై వారు తమ యొక్క ఆయుదములను ధరించి మనలను ఎల్లపుడూ కాపాడుతానని గుర్తుచేస్తున్నారు.

వ్యాస~: మరి కుడి చేతికి గల ప్రాముఖ్యత ఏమిటి పాట్టి?

namperumAL-abhayahasthamఅభయ హస్తము – ఆశ్రయించువారికి నేనున్నానని గుర్తుగా

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: చాలా మంచి ప్రశ్న. తన అభయ హస్తము “ఎల్లప్పుడూ నేనున్నాను మిమ్మలని కాపాడుటకై, భయపడనవసరము లేదు” మరియు మనతో ఉన్న అనుబంధమునకు, మనపై గల తన వాత్సల్యమునకు గుర్తు. ఉదాహరణకు, ఓ దూడకి తన తల్లి అవసరం వచ్చినప్పుడు, ఆ తల్లి, అంటే ఆవు, పరుగు పరుగున వచ్చి తన బిడ్డని ఆదుకుంటుందే కాని, ఆ దూడ యొక్క ఇదువరుకటి ప్రవర్తనను (లేదా తప్పులను) మనుసులో పెట్టుకొని ప్రవర్తించదు. తన తక్షన కర్తవ్యం తన బిడ్డ యొక్క బాధను తగ్గించి సంతోషపరచడం. ఆలాంటి గొప్ప అనుబంధం మనకీ ఆయనకి మధ్య. దూడలం మనం ఐతే, ఆయన ఆవు అవుతాడు.

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పెద్ద కీరీటము (ఆదిపత్యమునకు)మరియు చిరు దరహాసము(నిరాడంభరము)

వ్యాస~: పాట్టి, స్వామి తలపైన ఉన్నది ఏమిటది?

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అది కీరీటము, వ్యాస. అది ప్రపంచములో అన్నింటికినీ తానే సార్వభౌముడను అను విషయమును తెలియచేస్తుంది.

పరాశర~: కీరీటము చాలా అందముగా ఉంది పాట్టి. అది తన ఆరాధనీయమైన ముఖమునకు సరిగ్గా సరిపోయినది.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అవును, తను చాలా పూజ్యమైన ముఖ వర్చస్సును కలిగి ఉంటారు. స్వామికి మనతో ఉండడము చాలా సంతోషము, మరీముఖ్యముగా మీవంటి పిల్లలమధ్యన ఉన్నప్పుడు ఇంకా ఎక్కువ సంతోషముగా ఉంటారు.

పరాశర~: అవును పాట్టి. నేను చాలా దగ్గరినుండి చూసాను, వారి దరహాసమును మరియు వారి పాదములను.

ఆణ్డాళ్ పాట్టి~: అరె, మంచిది, పరాశర. సాధారణంగా, వారి యొక్క పాదములను మనము “పాదపద్మములు” అని అంటాము. ఎందుకంటే, అవి సహజముగానే సుకుమారమైనవి మరియు అందమైనవి. వారి ముఖముపై ఆ చెదరని నవ్వు ఆయన అనందముగా కేవలం మనకోసం ఆ వైకుంఠం నించి క్రిందకి దిగి వచ్చాడని సూచిస్తుంది. అలాగే, వారు వారి పాదపద్మములను ధృడముగా మళ్ళీ స్థిరముగా ఆ కమల పీఠము పై వుంచి మనకి ఏమని తెలియపరుస్తున్నాడంటే, ఆయన మనకోసమే వచ్చాడని మళ్ళీ మనని ఎప్పడికీ వదిలి వేళ్ళే ప్రశక్తే లేదు అని. అయితే, నేడు, ఆ స్వామి యొక్క అనేక మంగళకరమైన గుణములలో, కొన్ని శ్రెష్ఠమైన గుణములను వారి అర్చావతార రూపములో చూడగలిగాము, అవి: వాత్సల్యము (తల్లికి సహజముగా ఉండే సహనము – మన రక్షణ కొరకై చూపే వారి శ్రీ హస్తము), స్వామిత్వము (శ్రెష్ఠత్వము/ఆధిపత్యము – పెద్ద కిరీటము), శౌశీల్యము (ఎలాంటి భేధ భావము లేకుండ మనతో కలసిపోగలడం – వారి ముఖముపై చెదరని చిరునవ్వు), మరియు సౌలభ్యము (వారిని మనము సులభముగా చేరుకోవడం – వారి పాదపద్మములను తేలికగా ఆశ్రయించే వీలు).

వ్యాస మరియు పరాసర విస్మయంతో నిలబడి, ఆ ఊరేగింపును కళ్ళార్పకుండా అనుసరించారు.

అడియేన్ : రఘు వంశీ రామానుజ దాసన్

మూలము : http://pillai.koyil.org/index.php/2014/08/beginners-guide-sriman-narayanas-divine-archa-form-and-qualities/

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