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Srivaishnava Pracharaka Development Program – Dec 2022

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

A quick look at the upcoming English Session Dates in December:

  • SESSION-14 Scheduled on 2.12.2022 Friday 7:30 PM IST
  • SESSION 15 – Scheduled on 6.12.2022 Tuesday
  • SESSION 16 Scheduled on 9.12.2022 Friday
  • SESSION 17 – Scheduled on 13.12.2022 Tuesday
  • SESSION 18 Scheduled on 16.12.2022 Friday
  • SESSION 19 – Scheduled on 20.12.2022 Tuesday
  • SESSION 20 – Scheduled on 23.12.2022 Friday
  • SESSION 21 – Scheduled on 27.12.2022 Tuesday
  • SESSION 21 – Scheduled on 30.12.2022 Friday

For Nov Session Details: 

Recording (Session 13): 

SESSION-14 Scheduled on 2.12.2022 Friday

Divya prabhandamGuruparamparaiMumukshuppadi
sUtram 14,15
Divya prabhandam introduction –

– thirunedunthAndagam, mudhal and irandAm thiruvandhAdhigal
Sri. AndAlmumukshuppadi
sUtram 16,17
Mentor:
Presenter: Smt. Vidhya
Mentor:
Presenter: Shri. Kannan
Mentor:
Presenter: Shri.Venkatesh
Video Link:

https://youtu.be/eXU33T0RNeA
https://youtu.be/m43vDKvv9dE
Audio-Video links ( English)
https://onedrive.live.com/?authkey=%21AIu4sN8acbxY%5FrU&id=DEC12760D88D9D81%21355&cid=DEC12760D88D9D81&parId=root&parQt=sharedby&parCid=9909D788CF93528C&o=OneUp

https://youtu.be/t9iPbhck1UA

Audio-Video links ( Tamizh)
https://onedrive.live.com/?authkey=%21AGhQCss%2DApqBU2g&id=DEC12760D88D9D81%21354&cid=DEC12760D88D9D81&parId=root&parQt=sharedby&parCid=9909D788CF93528C&o=OneUp

https://youtu.be/GlvK7ZCDMXk
Text link – English:

https://guruparamparai.wordpress.com/2012/12/16/andal/

Text link – Tamizh:

https://guruparamparaitamil.wordpress.com/2015/07/18/andal/
Video link (English):
https://youtu.be/WunwSTqREFg

Audio link (English):
https://1drv.ms/u/s!AnOSadexHn4jg2tNNZ2-HrQ3LEya?e=yOKhKM

Video link (Tamizh):
https://youtu.be/eIHCL0ut3O8


Audio link (Tamizh):


https://1drv.ms/u/s!AiNzc-LF3uwyhHrKijqDAZrb2ktH



Text Links (English):
https://srivaishnavagranthams.wordpress.com/2020/06/11/mumukshuppadi-suthrams-16-20/

Recording ( Session 14):

SESSION-15 Scheduled on 6.12.2022 Friday

Divya prabhandamGuruparamparaiMumukshuppadi
Divya prabhandam introduction –guruparamparaimumukshuppadi sutram –
Mentor:
Presenter:
Mentor:
Presenter:
Mentor:
Presenter:
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Divya prabhandamGuruparamparaiMumukshuppadi
Divya prabhandam introduction –guruparamparaimumukshuppadi sutram –
Mentor:
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Mentor:
Presenter:
Mentor:
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ஸ்ரீ: ஸ்ரீமதே சடகோபாய நம: ஸ்ரீமதே ராமாநுஜாய நம: ஸ்ரீமத் வரவரமுநயே நம:

Session-15 Scheduled on 04.12.2022 Sunday (No class)

Upcoming Tamil Session Dates:

  • Session-16 Scheduled on 07.12.2022 Wednesday
  • Session-17 Scheduled on 11.12.2022 Sunday
  • Session-18 Scheduled on 14.12.2022 Wednesday
  • Session-19 Scheduled on 18.12.2022 Sunday
  • Session-20 Scheduled on 21.12.2022 Wednesday
  • Session-21 Scheduled on 25.12.2022 Sunday
  • Session-22 Scheduled on 28.12.2022 Wednesday

For Dec English Session Details:

SESSION-16 Scheduled on 07.12.2022 Wednesday

  • Recording:
  • Notes/Presentation:
திவ்யப்ரபந்தம்குருபரம்பரைமுமுக்ஷுப்படி
Podhu ThaniyangalRecap Session: Perumal, Pirati, Nammarwar, Nathamunigalமுமுக்ஷுப்படி ஸூத்ரம் – 17, 18
Mentor: Sri. Shreenath
Presenter: Ramesh
Mentor: Sri. Shreenath
Presenter: Dharanidharan C
Mentor: Sri. Shreenath
Presenter: Smt. Jayashree
Video Link: Tamil –

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Learn bhagavath vishayam – thiruvAimozhi (திருவாய்மொழி) – Centum 3

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SrI: SrImathE SatakOpAya nama: SrImathE rAmAnujAya nama: SrImath varavaramunayE nama:

Mahavishnu-universes

Author – nammAzhwAr

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .

thiruvAimozhi – Full Series

Meanings (discourses)

Lectures (in thamizh)

Learn Arththi prabandham (ஆர்த்தி ப்ரபந்தம்)

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SrI:  SrImathE SatakOpAya nama:  SrImathE rAmAnujAya nama:  SrImath varavaramunayE nama:

ramanuja-srirangam SrI rAmAnuja – SrIrangam

mamunigal-srirangammaNavALa mAmunigaL – SrIrangam

Arththi prabandham is a beautiful literature where mAmunigaL presents the state of an adhikAri (qualified person) who craves for eternal servitude towards bhagavath rAmAnuja.

Author – maNavALa mAmunigaL

Santhai class schedule, joining details, full audio recordings (classes, simple explanations (speeches) etc) can be seen at http://pillai.koyil.org/index.php/2017/11/learners-series/ .


Part 1-thaniyans and pAsurams 1 to 10
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 2-pAsurams 11 to 20
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 3-pAsurams 21 to 30
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
step 4 of 4
Part 4-pAsurams 31 to 40
step 1 of 4
step 2 of 4
step 3 of 4
Part 5-pAsurams 41 to 50
step 1 of 4
step 2 of 4
Part 6-pAsurams 51 to 60
step 1 of 4
step 2 of 4

Santhai Recordings

Meanings (discourses)

Lectures  (விரிவுரை) in thamizh based on vyAkyAnam of piLLai lOkam jIyar

முன்னுரை
தனியன்கள்
அவதாரிகை
பாசுரம் 1
பாசுரம் 2
பாசுரம் 3
பாசுரம் 4
பாசுரம் 5
பாசுரம் 6-10
பாசுரம் 11
பாசுரம் 12
பாசுரம் 13
பாசுரம் 14
பாசுரம் 15-18
பாசுரம் 19-21
பாசுரம் 22
பாசுரம் 23
பாசுரம் 24
பாசுரம் 25-26
பாசுரம் 27-28
பாசுரம் 29
பாசுரம் 30
பாசுரம் 31-32
பாசுரம் 33
பாசுரம் 34
பாசுரம் 35
பாசுரம் 36-40
பாசுரம் 41-43
பாசுரம் 44-45
பாசுரம் 46
பாசுரம் 47
பாசுரம் 48-51
பாசுரம் 52

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Meanings (translation)

श्रीवैष्णव – बालपाठ- वेदांताचार्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी एक माला बना रही थी और आने जाने वालो को अपने घर से मंदिर जाते हुए देख रही थी। उन्होंने अपनी आंखों के एक कोने से अपने घर में भाग रहे बच्चों को पकड़ा और खुद मुस्कुराई। उन्होंने पेरिया पेरुमाल और थायार की तस्वीर को माला से सजाया और उनका स्वागत किया।

दादी : आओ बच्चों । क्या आप जानते हैं कि आज हम किसके बारे में चर्चा करने वाले हैं?

सभी बच्चे एक साथ बोलते है की वेदांताचार्य स्वामीजी के बारे में |

दादी: हाँ, क्या आप जानते हो की उनका यह नाम किसने दिया ?

व्यास : उनका ‘वेदांताचार्य’ नाम श्री रंगनाथ ने दिया | दादी, क्या यह सही है।

दादी : बिलकुल ठीक , व्यास । उनके जन्म का नाम वेंकटनाथन था। उनका जन्म कांचीपुरम में दिव्य दंपति अनंत सुरी और तोतारम्बाई से हुआ था।

पराशर : दादी हमें बताये ‘वेदांताचार्य’ स्वामी जी कैसे सम्प्रदाय में आये ?

दादी : जरूर पराशर | जब वेदांताचार्य छोटे थे, वे अपने मामा श्री किदाम्बी अप्पुलार के साथ श्री नदादूर अम्माल की कालक्षेप गोष्ठी में सम्मिलित होने गये थे। इसका उल्लेख करते हुए वेदांताचार्य कहते हैं कि श्री नदादूर अम्माल ने उन पर कृपा कर कहा कि सत्य की स्थापना करेंगे और विशिष्टाद्वैत श्रीवैष्णव सिद्धांत के सभी विरोधियों को समाप्त करेंगे।

अतुलाय : यकीनन , उनके आशीर्वाद से ही यह सब हुआ !

दादी (मुस्कराते हुए ) : हाँ अतुलाय | बड़ो का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता |

वेदवल्ली : मैंने सुना है की वेदांताचार्य स्वमीज श्रीनिवास् भगवान् की पवित्र घंटी के अवतार थे | सही न दादी जी ?

दादी : हाँ, आप सही कह रहे है अतुलाय | उन्होंने सौ से ज्यादा ग्रन्थ संस्कृत, तमिल एवं मणिप्रवाल भाषा में लिखे है |

व्यास : सच में सौ से ज्यादा ग्रन्थ ?

दादी : हाँ, उनके प्रमुख ग्रंथों में से कुछ निम्न है – तात्पर्य चन्द्रिका, (गीता भाष्य का व्याख्यान है), तत्वटीका (श्री भाष्य के एक खंड का व्याख्यान), न्याय सिद्धज्ञानं (हमारे संप्रदाय की सिद्धांत का विश्लेषण करता है), सदा दूषणी (अद्वैत सिद्धांत के विरुद्ध है), आहार नियम(अनुशंसित भोजन की आदतों पर एक तमिल लेख) |

परशार : दादीजी , मै आश्चर्य चकित होने से अपने आपको रोक नही पा रहा हु की कैसे स्वामीजी आहार नियम पर ग्रन्थ लिखा और कैसे एक ही समय में जटिल दार्शनिक टिप्पणियों के बारे में लिखें।

दादी : हमारे पूर्वाचार्यो का ज्ञान सागर के समान गहरा था | पराशर, इस में कोई संदेह नहीं, ‘सर्वतंत्र स्वतंत्र’ (सभी कला और शिल्प के स्वामी), यह नाम श्री रंग नाच्चियार (श्री महालक्ष्मी जी) ने प्रदान किया।

अतुलाय : दादी जी हमें और बताइये| उसके बारे में ये सारे तथ्य सुनना दिलचस्प है|

दादी : ‘वेदांताचार्य’ स्वामीजी को ‘कवितार्किक केसरी’ (कवियों के बीच शेर) नाम से भी जाना जाते थे| उन्होंने एक बार 18 दिनों की लंबी बहस के बाद कृष्णमिस्रा नामक एक अद्वैती पर जीत हासिल की। एक अहंकारी और खोखला कवि द्वारा चुनौती दिए जाने पर उन्होंने ‘पादुका सहस्रम’ की रचना की। यह एक 1008 पद्य कविता है जो भगवान श्री रंगनाथ की दिव्य चरण की प्रशंसा करते है।

srivedanthachariar_kachi_img_0065.jpg (376×501)
अवतार उत्सव के समय कञ्चि वेदन्ताचर्य

वेदवल्ली : यह गंभीर है! हम वास्तव में ऐसे महान आचार्यों के लिए धन्य हैं जो ऐसी अभूतपूर्व उपलब्धियों के बावजूद ऐसी विनम्रता रखते थे।

दादी : ठीक कहा वेदवल्ली | श्री वेदांताचार्य को भी, अपने पूर्वाचार्यों और समकालीन आचार्यों के प्रति गहरा प्रेम और सम्मान था, जिसका प्रमाण उनकी “अभितिस्तव्” में मिलता है, “कवचं रंगमुक्ये विभो ! परस्पर-हितैषीणाम् परिसरेशु माम् वर्त्य” , (हे भगवान! कृपया मुझे श्रीरंगम में उन महान भागवतों के चरणों में निवास प्रदान करे जो परस्पर एक दुसरे के शुभ चिन्तक हैं)। कई अन्य आचार्यों और विद्वानों ने जैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी), एऱुम्बि अप्पा, वादिकेसरी अऴगिय मणवाळ जीयर, चोलसिंहपुर (शोलिंगुर) के स्वामी डोड्डाचार्य  जी ने वेदांताचार्य के ग्रंथों पर व्याख्यान लिखा है या उनका उल्लेख अपनी रचनाओं में किया है । वेदांताचार्य ने पिल्लै लोकाचार्य की प्रशंसा में ‘लोकाचार्य पंचासत’ नामक एक सुंदर प्रबंध कि रचना की। वेदांताचार्य, पिल्लै लोकाचार्य से आयु में 50 वर्ष छोटे थे और वे उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे जिसे इस ग्रंथ के द्वारा आसानी से समझा जा सकता है; इस ग्रंथ का आज भी तिरुनारायणपुरम (मेलकोट, कर्नाटक) में नियमित रूप से पाठ किया जाता है।

पाराशर : वेदांताचार्य स्वामी जी ने श्री रामानुजार जी को कैसे मानते थे ?

दादी : श्री वेदांताचार्य की श्री रामानुज के प्रति भक्ति को सभी भली प्रकार जानते हैं; अपने ग्रंथ “न्यास तिलका” की प्रारंभिक कविता “उक्त्य धनंजय” में, वे संतुष्टी करते हैं कि भगवान परोक्ष रूप में उन्हें यह बताते हैं की उनके द्वारा मोक्ष दिए जाने की आवश्यकता नहीं है, क्यों कि श्री रामानुज के संबंध मात्र से ही उन्हें मोक्ष मिलने का निर्धारण हो गया है।

व्यास : दादी जी अपने सम्प्रदाय के आचार्यो के प्रति बहुत कुछ सीखने को है |

दादी : हाँ, एक रचना, वेदांताचार्य विजय (आचार्य चंपू) का उल्लेख करते हैं, जो गद्य और कविता के रूप में संस्कृत भाषा में महान विद्वान और कवि “कौशिक कवितार्किकसिंह वेदंताचार्य” द्वारा लिखी गयी है, जो लगभग 1717 AD के समय में हुए। इस रचना को वेदांताचार्य के जीवन का सबसे प्राचीन और सबसे प्रमाणिक अभिलेख माना जाता है।

अतुलाय : अति सुन्दर दादी जी , आज हमने वेदांताचार्य स्वामीजी के संस्कृत एवं तमिल ग्रंथो के बारे में जाना, उनकी विनम्रता और भक्ति के बारे में भी जाना | ऐसे महान उदाहरण का अनुसरण करने के लिए हम वास्तव में धन्य हैं।

दादी : हाँ बच्चो हम ऐसी महान आत्माओं को हमेशा याद करते हैं! हम कल फिर मिलेंगे। आप सभी के घर जाने का समय हो गया है।

बच्चे एक साथ दादी जी का धन्यवाद करते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2019/02/beginners-guide-vedhanthacharyar/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – अष्टदिग्गज शिष्यगण एवं अन्य

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श्रीः श्रीमते शठकोपाय नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

दादी : स्वागत बच्चो , आशा करती हुई की आप सबको पिछले समय की चर्चा याद होगी |

बच्चे (एक साथ ) : नमस्ते दादी जी, हमें सब याद है , और हम जहाँ आपसे अष्टदिग्गज शिष्यगण के बारे में जानना चाहते है |

दादी : अच्छा लगा, चलिए हम सब चर्चा शुरू करते है |

पराशर : दादी, अष्टदिग्गज का मतलब शिष्यगण| दादी, क्या में ठीक कह रही हूँ ?

दादी : पराशर, आप ठीक कह रहे हो | मणवाळ मामुनि स्वामीजी के अष्टदिग्गज 8 प्राथमिक शिष्य थे | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि), कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, प्रतिवादि भयंकरम अण्णन्, पत्तन्गि परवस्तु पट्टर्पिरान् जीयर्, एऱुम्बि अप्पा, अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार्, अप्पन् तिरुवेंकट रामानुज एम्बार् जीयर् | मणवाळ मामुनि (के समय / उनके बाद) जो महा श्रीवैष्णवाचार्य हुए है, उनके बाद हमारे संप्रदाय की वृद्धि में सबसे प्रभावशाली थे।

चलिए हम आगे बढ़ते हुए श्री पोन्नडिक्काल जीयर के जीवन की चर्चा करेंगे जो अपने आचार्य मनवाल मामुनिगल के प्राण सुकृत थे।

ponnadikkal-jiyar

दादी : पोन्नडिक्काल जीयर वानमामलै मे पैदा हुए और बचपन मे उनके माता–पिता ने उनका नाम अळगिय वरदर रखा ।

पराशर : दादी जी , उनको पोन्नडिक्काल जीयर क्यों कहा जाता था |

दादी : पोन्नडिक्काल  का मतलब है वो जिसने मामुनिगळ के शिष्य सम्पत की स्थापना की हो| | कहते हैं कि पोन्नडिक्काल जीयर के उत्कृष्ठ स्वभाव से सारे आचार्य उन्हें मणवाळमामुनि का उपागम (पुरुषाकार) समझते हैं और उन्ही के उपागम्यता से वे सारे, मणवाळमामुनि को पहुँच पाते थे । 

मामुनिगळ स्वामीजी ने अष्टदिग्गज शिष्यगण के लिए पोन्नडिक्काल जीयर स्वामीजी को चुना | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर जी को आदेश दिया की दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) श्री मणवाळमामुनि को श्री सेनैमुदलियार (विष्वक्सेन) के द्वारा एक संदेश भेजते हैं जिसमे कहते हैं कि वानामामलै दिव्यदेश मे पोन्नडिक्काल जीयर की सेवा कि ज़रूरत है । उसके अनन्तर मणवाळमामुनि उन्हें आदेश देते हैं कि वे तुरन्त वानमामलै जाए और वहाँ अपना कैंकर्य करें ।

व्यास : दादी , पोन्नडिक्कालजीयर स्वामीजी दैवनायकन एम्पेरुमान (वानमामलै भगवान) जी के ससुर थे , क्या में सही कह रहा हूँ ?

दादी : हाँ व्यास , बिलकुल सही | पोन्नडिक्काल जीयर उस समय वानमामलै मे श्रीवरमंगै नाचियार का उत्सव विग्रह नही था और उसी से परेशान थे पोन्नडिक्काल जीयर । एक बार भगवान (दैवनायकन) उनके स्वप्न मे आकर कहते हैं कि वे तिरुमलै से नाचियार का उत्सव विग्रह लाना चाहिए। भगवान की इच्छा पूरी करने हेतु वे तिरुमलै जाते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद उन्हें स्वप्न मे श्री नाचियार कहती है कि उन्हें वानमामलै तुरन्त ले जाए और उन्की शादी दैवपेरुमाळ से करवाई जाए । पोन्नडिक्काल जीयर नाचियार के पिता स्वरूप बनकर उन्का कन्यादान दैवनायकन पेरुमाळ भगवान को करते हैं। दैवनायनक पेरुमाल कहते हैं कि जैसे भगवान् पेरियपेरुमाळ के ससुरजी पेरिआळ्वार हुए वैसे ही पोन्नडिक्काल जीयर उनके ससुरजी हुए |

शिष्यों को कई सालों तक अपने महत्वपूर्ण निर्देशों की सूचना व्यक्त करने के पश्चात वह अपने आचार्य का ध्यान करते हुए अपने शरीर (चरम तिरुमेणि) का त्याग करते हैं और इस प्रकार उनको परमपदम की प्राप्ति होती है । वह अपने अगले उत्तराधिकारि (अगले जीयर वानमामलै मठ) को नियुक्त करते हैं और यह आचार्य परंपरा आज भी ज़ारी है ।

चलिये अब हम श्री पोन्नडिक्कालजीयर के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए उनसे प्रार्थना करें कि हम सभी भक्तों में उनके जैसा आसक्ति, हमारे वर्तमानाऽचार्य पूर्वाचार्य और श्री भगवान (एम्पेरुमान) में हो ।

दादी : हमारी अगली चर्चा कोयिल अण्णन स्वामीजी के बारे में होगी | वह अष्टदिग्गज शिष्यों में सबसे प्रिय शिष्ये थे | कोइल अण्णन के जीवन में एक दिलचस्प घटना घटी, जो उन्हें मामुनिगल की शरण में ले गई।

koilannan

पराशर : दादी, वह क्या घटना थी ??

दादी : आपकी जिज्ञासा प्रशंसनीय है पराशर | मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के महान पारिवारिक वंश में जन्मे, वह मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का आश्रय नहीं लेना चाहते थे। एक घटना ने उन्हें वापस मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के चरण कमलो के संपर्क में आये । | आप सभी श्री रामानुज स्वामीजी को जानते है जिन्होंने कोयिल अण्णन जी को मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी का शिष्य बनने का आदेश दिया | श्री रामानुज स्वामीजी ने कोयिल अण्णन का मार्गदर्शन किया और उनको आदेश दिया की आप अपना मुदलियाण्डान्/ दाशरथि स्वामीजी के साथ सम्बन्ध का सही इस्तेमाल करे |

एम्पेरुमानार जी ने कहा “मैं आदि शेष हूँ और पुनः मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के रूप में अवतार लिया है | आप और आपके रिश्तेदार मणवाल मामुनिगल/ श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के शिष्य बने और अपना उत्थान करें ”। बच्चों, पूरी घटना उनके सपने में हुई थी। स्वप्न टूटता है और स्वप्न से जागते है और पूरी तरह से हैरान हो जाते है । वह अपने भाइयों को बड़ी भावनाओं के साथ घटनाओं के बारे में व्याख्या करते है।

अण्णन स्वामीजी कन्दाडै वंश के आचार्यो के साथ मामुनिगळ स्वामीजी के मठ में प्रवेश करते है | मामुनिगळ स्वामीजी ने पोन्नडिक्काल जीयर स्वामी जी को सभी के लिए पंच संस्कार करने के लिए आवश्यक पहलुओं को तैयार करने का निर्देश दिया।

इसीलिए बच्चो , इस प्रकार हमने कोयिल कन्दाडै अण्णन् के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनी स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

आगे मैं मोर मुन्नार अय्यर (पत्तन्गि परवस्तु पट्टरपिरान् जीयर) के बारे में बताऊंगा। वह मामुनिगल के अष्टदिग्गज शिष्यों में से एक थे । वह सदैव मामुनिगळ स्वामीजी के साथ अलग हुए बिना ही उनके साथ रहे, जैसे गोविंदाचार्य स्वामीजी रामानुज स्वामीजी के साथ रहते थे ।

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वेदवल्ली : दादी जी , उनको मोर मुन्नार अय्यर के नाम से क्यों जाना जाता था ?

दादी : बहुत सही लगता है ना | प्रतिदिन, उन्होंने मामुनिगल के शेष प्रसाद को (बचा हुआ ) को ग्रहण करते थे । अपने पुर्वाश्रम में 30 साल, उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का शेष प्रसाद ही ग्रहण किया। वे “मोर मुन्नार अय्यर” (अत्यंत सम्मानीय जिन्होंने पहले दद्ध्योदन ग्रहण किया) के नाम से प्रसिद्ध हुए। पारंपरिक भोजन में पहले दाल-चावल, सब्जियां आदि पाई जाती है। अंत में दद्ध्योदन के साथ समाप्त किया जाता है। पट्टरपिरान् जीयर, प्रसाद उसी केले के पत्तल पर पाते थे, जिसमें श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने प्रसाद ग्रहण किया था। श्री वरवरमुनि स्वामीजी दद्ध्योदन के साथ प्रसाद समाप्त करते थे और क्यूंकि गोविन्द दासरप्पन स्वाद को बदले बिना ही प्रसाद पाना चाहते थे (दद्ध्योदन से दाल तक), वे प्रतिदिन दद्ध्योदन से प्रारंभ करते थे। इस प्रकार वे “मोर मुन्नार अय्यर” के नाम से प्रसिद्ध हुए।

उन्होंने मामुनिगल स्वामीजी से शास्त्रों के सभी सार को सीखा और सतत उनकी सेवा की। मामुनिगल स्वामीजी परमपद प्रप्त होने के बाद, पट्टर्पिरान जीयर तिरुमला मे ही रह गय और उधर अनेक जीवात्माओ का उद्दार किया। अधिक आचार्य निष्ठा होने के कारण वे अंतिमोपाय निष्ठा नामक ग्रंथ भि लिखा। यह ग्रंथ में अपने आचर्य परंपरा की स्तुती और अपने पूर्वाचार्य कैसे उनके आचार्यो पर पूर्ण निर्भर रहते थे उसका वर्णन किया गया है। वे बडे विध्वन थे और मामुनिगल स्वामीजी के प्रिय शिश्य भि थे।

दादी : बच्चो , अब हम आपको एरुम्बी अप्पा स्वामीजी के बारे में बताएँगे | एरुम्बी अप्पा, श्री वरवरमुनि स्वामीजी के अष्ठ दिग्गजों में एक हैं (आठ प्रमुख शिष्य जिन्हें संप्रदाय के संरक्षण के लिए स्थापित किया)। उनका वास्तविक नाम देवराजन है | अपने गाँव में रहते हुए और धर्मानुसार कार्य करते हुए, एक बार एरुम्बी अप्पा ने श्री वरवरमुनि स्वामीजी के बारे में सुना और उनके प्रति आकर्षित हुए। श्री वरवरमुनि स्वामीजी के समय को हमारे पूर्वाचार्यों द्वारा नल्लदिक्काल (सुनहरा समय) कहा जाता है। एरुम्बी अप्पा ने कुछ समय के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के साथ रहकर, सभी रहस्य ग्रंथों कि शिक्षा प्राप्त की और फिर अपने पैतृक गाँव लौटकर, वहां अपना कैंकर्य जारी रखा।

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वे सदा अपने आचार्य का ध्यान किया करते थे और पूर्व और उत्तर दिनचर्या का संकलन कर (जिनमें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की दैनिक गतिविधियों का चित्रण किया गया था) एक श्रीवैष्णव द्वारा उन्हें श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को समर्पित किया। एरुम्बी अप्पा की निष्ठा देखकर श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अत्यंत प्रसन्न हुए और उनकी बहुत प्रशंसा की। वे एरुम्बी अप्पा को उनसे भेंट करने के लिए आमंत्रित करते हैं। एरुम्बी अप्पा कुछ समय अपने आचार्य के साथ रहते हैं और फिर नम्पेरुमाल के समक्ष श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के भागवत विषय कालक्षेप में भाग लेते हैं। तद्पश्चाद वे पुनः अपने गाँव लौट जाते हैं।

व्यास : दादीजी, जैसे पट्टर्पिरान जीयर, पोन्नडिक्काल जीयर, एरुम्बी अप्पा स्वामीजी भी अपने आचार्य के प्रति बहुत संलग्न थे | क्या यह ऐसा नहीं था दादी जी ?

दादी : सही व्यास | एरुम्बी अप्पा की महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय”। यह एरुम्बी अप्पा और उनके शिष्यों जैसे सेनापति आलवान आदि के बीच हुए वार्तालाप का संकलन है।

वेदवल्ली : दादी जी , “ विलक्षण मोक्ष अधिकारी निर्णय” क्या है ?

दादी : इस सुंदर ग्रंथ में एरुम्बी अप्पा, अत्यंत दक्षता से आळवार/ आचार्यों की श्रीसूक्तियों के मिथ्याबोध से उत्पन्न होने वाले संदेह को स्पष्ट करते हैं। उन्होंने पूर्वाचार्यों की श्रीसूक्तियों के आधार पर संसार में वैराग्य विकसित करने और पूर्वाचार्यों के ज्ञान और अनुष्ठान के प्रति अनुराग का महत्व बताया और हमारे द्वारा उसे जीवन में अपनाने के लिए जोर दिया है (उसके बिना यह मात्र सैद्धांतिक ज्ञान होता)।

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गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के पश्चाद, अण्णा ने तिरुवेंकटमुडैयाँ (भगवान वेंकटेश्वर) की सेवा के लिए तिरुमला प्रस्थान किया। अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) का वैभव सुनने के बाद अण्णा स्वामीजी ने निर्णय लिया की वह माणवळ मामुनिगळ स्वामीजी के शिष्या बनने का फैसला किया | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के आश्रित होने के लिए सकुटुंब श्रीरंगम की ओर प्रस्थान करते हैं। वह श्रीरंगम में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के मठ में जाते है | श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कालक्षेप कर रहे होते है और अण्णा स्वामीजी ने कालक्षेप सुना और उन्होंने शास्त्रों के विभिन्न क्षेत्रों में श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का वैभव जाना | उन्होंने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की शरण ली और उनके शिष्य बन गए |

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी कांचीपुरम, चोलसिंहपुरम, एरुम्बी आदि के जरिए तिरुमला की यात्रा पर प्रस्थान करते हैं। अण्णा भी यात्रा में उनके साथ ही जाते हैं। तिरुमला में तिरुवेंकटमुडैयाँ के लिए सुप्रभात के अभाव को देखते हुए, श्रीवरवरमुनि स्वामीजी अण्णा को भगवान के लिए सुप्रभात की रचना करने का निर्देश देते हैं। अण्णा, कृतज्ञता से अपने आचार्य के दिव्य विग्रह का ध्यान करते हुए, श्री वेंकटेश सुप्रभातम, स्तोत्रं, प्रपत्ति और मंगल श्लोकों की रचना करते हैं। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी, अण्णा की रचनाओं से बहुत प्रसन्न होते हैं और तिरुमला में भगवान की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उनका पाठ करने का निर्देश देते हैं।

दादी : बच्चो, हमारी अंतिम चर्चा अप्पिळ्ळै, अप्पिळ्ळार् स्वामीजी के बारे में होगी | उनके बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। वे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के प्रिय शिष्य थे और अष्ट दिग्गज में से एक थे । वे दोनों महान विद्धवान थे जिन्होंने भारत के उत्तरी भाग में कई विद्वानों को जीत लिया |

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यद्यपि उन्होंने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) के बारे में सुना, लेकिन उनके मन में उनके प्रति बहुत लगाव नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की महिमा के बारे में पता चला और यहां तक कि सुना कि कई महान हस्तियों जैसे कि कोयिल् कन्दाडै अण्णन्, एऱुम्बि अप्पा ने अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) की शरण ली ।

वेदवल्ली : दादी जी, वे कैसे अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) शिष्य बने ?

दादी : हाँ वेदवल्ली, अळगिय मनवाळ मामुनिगल (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी) ने ही एरुम्बि अप्पा जी को सूचित किया था आप आचार्य सम्बन्ध के लिए तैयार है | पोन्नडिक्काल् जीयर्/ वानान्द्रीयोगी स्वामीजी (श्री तोताद्रि मत् प्रथम स्वामि) जी ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से कहा की एरुम्बी अप्पा जी के साथ चर्चा करके वह धन्य है और एरुम्बी अप्पा जी आपका शिष्य बनने के लिए सभी योग्यताएं हैं | वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को बताते हैं कि वे आचार्य संबंध के लिए तत्पर हैं। उन दोनों ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से पूछा की आप हमें शिष्य रूप में स्वीकार करे और हमें आशीर्वाद प्रदान करें | इस तरह श्रीवरवरमुनि स्वामीजी ने अप्पिळ्ळै एवं अप्पिळ्ळार् जी का पञ्च संस्कार संपन्न किये |

अप्पिळ्ळार को जीयर मठ के दैनिक गतिविधियों जैसे तदियाराधन आदि के देखरेख का उत्तरदायित्व दिया गया था। जैसे किदम्बी अच्चान ने श्रीरामानुज स्वामीजी की सेवा के लिए मठ की देखरेख का उत्तरदायित्व लिया था, अप्पिळ्ळार ने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी की सेवा की।

श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के दिव्य आदेश पर अप्पिळ्ळै तिरुवंतादी पर व्याख्यान की रचना करते हैं और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी को उनके बहुत से दिव्य प्रबंध सम्बंधित कैंकर्य में सहायता करते हैं।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

इस तरह हमने अप्पिळ्ळै के गौरवशाली जीवन की कुछ झलक देखी। वे श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के बहुत प्रिय थे। हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अंतिम दिनों में, अप्पिळ्ळार और जीयर नारायण (श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के पुर्वाश्रम से उनके पौत्र) श्रीवरवरमुनि स्वामीजी से प्रार्थना करते हैं और उनसे विनती करते हैं कि वे उनकी दैनिक आराधना के लिए श्रीवरवरमुनि स्वामीजी के अर्चा विग्रह प्रदान करने की कृपा करे। श्रीवरवरमुनि स्वामीजी उन्हें एक सोम्बू (पात्र) प्रदान करते हैं जो वे नित्य उपयोग किया करते थे और उन्होंने उसके उपयोग से दो विग्रहों का निर्माण किया और श्रीवरवरमुनि स्वामीजी का एक-एक विग्रह अपने दैनिक पूजा के लिए रख लिया।

हम सब उनके श्री चरण कमलो में प्रार्थना करते हैं कि हम दासों को भी उनकी अंश मात्र आचार्य अभिमान की प्राप्ति हो।

बच्चो अब तक हमने श्रीवरवरमुनि स्वामीजी और उनके अष्ट दिग्गज शिष्यों के वैभव के बारे में चर्चा की |

पराशर : दादीजी हमने आज बहुत कुछ सीखा |

दादी : प्रिय बच्चो, अब में आपको कुछ महत्वपूर्ण बताने जा रही हूँ, उसे ध्यान से सुने |

मामुनिगल स्वामीजी के बाद, कई महान आचार्य हर शहर और गांव में भक्तों को आशीर्वाद देते रहे। आचार्यगण सभी दिव्या देशों, अभिमान स्थलों, आळ्वार / आचार्य अवतार स्थलों और दूसरे क्षेत्रो में निवास किये और सभी वैष्णव जन के साथ ज्ञान साझा किया और सभी में भक्ति का पोषण किया।

तिरुमलिसै अण्णावप्पंगार एवं श्रीपेरुम्बुदुर के पहले एम्बार जीयर हाल के अतीत (200 साल पहले) से थे और हमारे संप्रदाय के लिए उनके गहन अनुदानों और कैंकर्यो के माध्यम से महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जो भी ज्ञान मैंने आपके साथ साझा किया है, वह आचार्यों परम्परा के माध्यम से आया है। हमें हमेशा उनका कृतज्ञ रहना होगा। आशा है कि आप सभी का समय अच्छा होगा। हमारे मन, इंद्रियों और शरीर और ऐसे आचार्यों, आळ्वार और एम्पेरुमान के लिए कैंकर्य में लगे रहना चाहिए।

ठीक है, अब अंधेरा हो गया है। आइए हम आचार्यों के बारे में सोचते हैं और आज अपना सत्र पूरा करते हैं।

बच्चे : धन्यवाद दादीजी |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2018/07/beginners-guide-ashta-dhik-gajas-and-others/

प्रमेय (लक्ष्य) – http://koyil.org
प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)

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श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी जी रसोई घर में खाना बनाने में व्यस्त थी जब बच्चे उनके घर में प्रवेश किये ताकि सब बच्चे लोकाचार्य स्वामीजी के शिष्यों के बारे में जान सके | आण्डाल दादी जी सभी बच्चो का मुस्कुराकर स्वागत करती है | दादीजी इस प्रतीक्षा में थी की श्रीरंगनाथ भगवान जी का प्रसाद बच्चो में वितरित कर सके |

दादी : आओ बच्चो | भगवान रंगनाथ जी का प्रसाद ग्रहण करे | आशा करती हूँ की आपको पूर्ववर्ती वाली चर्चा याद होगी |

व्यास : दादीजी , हमने कूर कुलोत्तम दासर्, विळान् चोलै पिल्लै, जी के बारे में सीखा और आचार्य अभिमान ही उठ्ठारगम के बारे में भी सीखा |

दादी : बहुत गर्व हुआ तुम पर बच्चो, आज में तुम्हें आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के एक शिष्य के बारे में बतायूंगी जिनका नाम तिरुमलै आऴ्वार था |

अतुलहाय : दादी, मैंने सुना है कि तिरुमलै आऴ्वार जी को नाम आऴ्वार रचित तिरुवाय्मोऴि के प्रति लगाव के कारण मिला। क्या मैं सही हूं!

दादी : आप बिलकुल सही कह रही हो अतुलहाय | वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए । तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया ।

व्यास : ओह ! दादी जी फिर तिरुमलै आऴ्वार को संप्रदाय में वापिस लेकर आये ?

दादी : बच्चो, में आपकी जिज्ञासा की प्रशंसा करती हूँ | पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

वेदवल्ली : दादी जी, कूरकुलोत्त्मदास जी ने तिरुमलै आऴ्वार को सुधारने के लिए क्या किया ? क्या आप हमें बता सकती है ?

दादी : हाँ ! एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये ।

पराशर : दादी जी हमें बताएं तिरुमलै आऴ्वार जी ने कूरकुलोत्त्मदास से कैसे सीखा ?

दादी : तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है, कूरकुलोत्तमदास जी ने देखा की तिरुमलै आऴ्वार पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी की तनियन पाठ करते हुए तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रबंधों का सारांश ज्ञान देने लगे । इसी दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशासनिक-कार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपना शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशासनिक-कार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरण कमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य जी का ध्यान करते हुए कूरकुलोत्त्मदास परमपद को प्राप्त हुए , तिरुमलैयाऴ्वार स्वामीजी ने ही कूरकुलोत्त्मदास स्वामीजी महारजा का चरम कैंकर्यं भव्य तरीके से (अंतिम क्रिया) किया |

व्यास : दादी जी, क्या तिरुमलै आऴ्वार हमारे सम्प्रदाय को आगे लेकर गए ?

दादी : नहीं व्यास, जैसे मैंने पहले कहा था की तिरुमलै आऴ्वार जी श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि सीखने गए थे | वह सभी पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना चाहता थे । तो श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै स्वामीजी ने उनको पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना के लिए थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी के पास भेजते है। दुर्भाग्य से उनके आगमन से ठीक पहले थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी परमपद को प्राप्त कर लेते है । तिरुमलै आऴ्वार बहुत परेशान हो जाते है और देव पेरुमल (काँची पुरम वरद स्वामीजी ) का मंगलाशाशनम करने का फैसला करते है।

पराशर : दादीजी , यह घटना रामानुज स्वामीजी की तरह ही है जब वह यामुनाचार्य स्वमीजी से मिलने गए थे, लेकिन इससे पहले कि रामानुजा स्वामजी आलवन्दार स्वामीजी से मिलते, आलवन्दार स्वामी जी परमपद प्राप्त कर लेते है । क्या मैं सही हूं?

दादीजी : बिलकुल सही कह रहे हो पराशर | तब वह देवपेरुमाळ स्वामीजी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, सभी उनका स्वागत करते है, देवपेरुमाळ स्वामीजी तिरुमलैयाऴ्वार जी को श्रीशठारी, माला, चन्दन का प्रसाद प्रदान करते है | देवपेरुमाळ स्वामीजी श्री नालूर पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है की वह तिरुमलैयाऴ्वार जी को दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सिखाये जिसमे तिरुवाय्मोऴि ईडुव्याख्यान जो की वह थिरुप्पुट्कुलि जीयर जी से नहीं सीख पाए |

श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने नालूरपिळ्ळै के पुत्र नालूर आच्चान पिळ्ळै को यह कार्य सौंपा । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे । नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मूल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै । तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है ।

व्यास : क्या अलवार तिरुनगरी नम्माऴ्वार की जन्मस्थली है ? मैंने सुना है की तिरुमलै आऴ्वार स्वमीजी ने ही अलवार तिरुनगरी को दुबारा बनाया था जब यह जीर्ण स्थिति में थी | कृपा करके हमें उस कथा के बारे में बताये दादीजी |

दादी : आप सही हो व्यास | जब तिरुमलै आऴ्वार अलवार तिरुनगरी में पहुँचते है | वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया)। इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरी लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरी के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरिक्त चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुक्त कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए । उनके बिना, हम उस आऴ्वार तिरुनगरी की कल्पना नहीं कर सकते जो आज हम देख रहे हैं और उसका आनंद ले रहे हैं।

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तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्ण प्रेम भक्ति भाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर मे श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है । अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरिय पेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के प्रयासों से हमें 36000 ईडु व्याख्यान का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो बाद में अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ द्वारा व्यापक रूप से महान ऊंचाइयों तक फैला । तो बच्चों, चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

बच्चों ने धन्य महसूस किया और विचार-विमर्श करके अण्डाल दादी के घर को छोड़ कर अपने घर को जाते है ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2018/05/beginners-guide-thiruvaimozhip-pillai/

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प्रमाण (शास्त्र) – http://granthams.koyil.org
प्रमाता (आचार्य) – http://acharyas.koyil.org
श्रीवैष्णव शिक्षा/बालकों का पोर्टल – http://pillai.koyil.org

श्रीवैष्णव – बालपाठ – अऴगिय मणवाळ मामुनि

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श्री:  श्रीमते शठकोपाये नमः  श्रीमते रामानुजाये नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

दादी बच्चो का स्वागत करती है और पूछती है की आचार्य श्री अऴगिय मणवाळ मामुनि के बारें में जानने और सुनने के लिए कौन कौन उत्साहित हैं ।

दादी : स्वागत बच्चो, आप सभी ने अपनी गर्मी की छुट्टी का आनंद कैसे लिया?

पराशर : गर्मी की छुट्टी तो अच्छी थी | अब हम अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामी जी के बारे में जानने के लिए उत्सक है | क्या हमें उनके बारे में बताएंगी ?

दादी : अवश्य बच्चो | अऴगिय मणवाळ मामुनि आऴ्वारतिरुनगरि मे श्री तिगळ किडन्तान्तिरुनावीरुडय पिरान और श्रीरंग नाचियार को श्रीआदिशेष और श्री यतिराज के पुनः अवतार के रूप मे प्रकट हुए । उनका नाम – अऴगिय मणवाळमामुनि (अऴगिय मणवाळ पेरुमाळनायनार) था | वे अपने पिताश्री से सामान्यज्ञान और वेदाध्ययन सीखते है ।

व्यास: क्या तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी) अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी के आचार्य थे ?

दादी : हाँ व्यास | तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगिय मणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और श्रीवरवरमुनि दिव्यप्रबंधो मे खास तौर पर तिरुवाय्मोऴि और ईडु व्याखायन के विशेषज्ञ हुए । वे ईडु व्याखायन पर आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित कर और उन सभी को लिखित प्रमाण मे लिखा था| उन्हें श्री रामानुज स्वामीजी से भी बहुत लगाव था और उन्होंने आऴ्वार तिरुनगरि में भविष्यदाआचार्य सानिध्य में सेवा करते थे । यतीन्द्र (श्री रामानुज स्वामीजी ) के प्रति उनके अत्यधिक लगाव के कारण, उन्हें “यतीन्द्रं प्रवण” (यतीन्द्र से बहुत लगाव रखने वाले) के रूप में जाना जाता था।

बाद में , उन्होंने आचार्य नियमम आधारित सारे पुष्टिकारक प्रमाणों को संग्रहित करके श्रीरंगम में सम्प्रदाय का प्रचार एवं प्रसार करने लगे | श्रीरंगम पहुँच कर उन्होंने सन्यास धर्म अपना लिया एवं अऴगिय मणवाळ मामुनि और पेरिया जीयर के नामो से लोकप्रिय हुए |

श्री वरवरमुनि स्वामीजी मुमुक्षुपडि, तत्त्व त्रय, श्रीवचन भूषणम जैसे महान ग्रन्थों में वेद , वेदांतम्, इतिहास , पुराण और अरुचिच्याल से कई संदर्भों के साथ सुंदर टीका लिखते थे ।

श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने रामानुज नूट्रन्दादि , ज्ञान सारम और प्रमेय सारम पर टिप्पणियां लिखते हैं जो चरम उपाय निष्ठा के बारे में बताती है (की आचार्य ही सब कुछ है) । श्री वरवरमुनि स्वामीजी ने कुछ श्रीवैष्णवों के अनुरोध के आधार पर तिरुवायमोली नुट्रन्दादि जो तिरुवायमोली के अर्थों पर प्रकाश डालती है ग्रन्थ को रचा | यहाँ तक कि उन्होंने हमारे पूर्वाचार्यों के मूल्यवान उपदेशों को भी लिख दिया जिसमें उपदेश रत्न माला में उन्होंने हमारे आलवारों के जन्म स्थान, तिरुनक्षत्रम , तिरुवायमोली और श्रीवचन भूषणम पर भी प्रकाश डाला ।

मामुनिगळ स्वामी जी दिव्या देशो की यात्रा भी करते है और सभी दिव्या देशो के पेरुमाल जी का मंगला शाशन भी करते है |

वेदवल्ली : दादीजी, मामुनिगळ स्वामी जी के बारे में सुन कर बहुत अद्भुत लगा और उन्होंने हमारे संप्रदाय आगे लेने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की ।

दादी : हाँ वेदवल्ली, जहाँ तक नम्पेरुमाळ जी स्वयं नम्माळ्वार स्वामीजी की 36000 ईडुव्याख्यान वाली तिरुवायमोली का अऴगिय मणवाळ मामुनि द्वारा कालक्षेप सुनने में रूचि रखते | अऴगिय मणवाळ मामुनि स्वामीजी ने बहुत प्रसन्न होकर 10 महीने तक कालक्षेप किया और अंत में आनि तिरुमुलम पर इसकी साट्ट्रुमुरै सम्पूर्ण किये |

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साट्ट्रुमुरै के सम्पूर्ण होने के बाद, नम्पेरुमाळ एक अरन्गनायकम् नाम के बालक का रूप धारण किये । हलांकि घोष्टि ने इस बालक को रोकने की कोशिश किया परन्तु घोष्टि के समक्ष आकर (अंजलि मुद्रा) प्रणाम करते हुए कहा – “श्रीशैलेश दयापात्रम्” और रुक गया । प्रत्यक्ष श्रीवैष्णव पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “धीभक्त्यादिगुणार्णवम्” । फिर पूछे – आगे क्या ? बालक बोला – “यतीन्द्रप्रणवम् वन्दे रम्यजामातरम् मुनिम्” । इतना कह कर बालक भाग गया । प्रत्यक्ष शिष्यों ने इस श्लोक को ताम्र पत्र पर लिपिबद्ध किया । फिर उस बालक को वापस पकडकर ले आये । फिर उस बालक से पूछा गया – कि क्या यह श्लोक तुमने पढा ? क्या फिरसे इसे दोहरा सकते हो ? बालक टीक से बोल भी नही पाया और श्लोक तो पढा ही नही गया उससे । इस घटना से परिचत सभी श्री वैष्णवों ने यही समझा कि साक्षात श्रीरंगनाथ भगवान इस बालक के रूप मे प्रकट होकर अपने आचार्य को तनियन प्रस्तुत कर उन्हे गौरान्वित किया ।

पराशर: बहुत अद्भुत दादी जी, नम्पेरुमाळ जी द्वारा सम्मानित होकर कितना अच्छा लगा होगा | दादी , यही कारण है कि हम इस तनियन के साथ अपने सभी कैंकर्य शुरू करते हैं?

दादी : हाँ पराशर | कहते है, तिरुवेंकटमुदायन, तिरुमालिरुन्चोलै अऴगर इत्यादि दिव्यदेश के पेरुमाळ घोषणा करते है कि यह गौरवनीय श्लोक (तनियन) का पाठ अरुळिचेयळ के अनुसन्धान के शुरुवात और अन्त मे होना चाहिये । इसी प्रकार अन्य दिव्यदेश जैसे बद्रिकाश्रम दिव्यदेश को यही संदेशा मिलता है की वरवरमुनि की स्तुति करे ।

अपने अंतिम दिनों के दौरान, मामुनिगळ स्वामीजी बड़ी मुश्किल से आचार्य हृदयम पर व्याख्यान लिख पाते है ।अंत में वह अपनी थिरुमेनि (दिव्य रूप) को त्याग कर परमपद धाम जाने का फैसला करते है। वह आर्ति प्रबंधं का पाठ करते हुए एम्पेरुमानार जी से आर्त विनती करते है की उनको स्वीकार करे और उन्हें इस भौतिक क्षेत्र से मुक्त हुए। इसके बाद, मामुनिगळ स्वामीजी एम्पेरुमानार जी के कृपा से परमपद को प्रस्थान करते है | पोन्नडिक्काळ जीयर वडनाट्टुदिव्यदेश के यात्रा से लौटते है और मामुनि के सारे चरम कैंकर्य स्वयम करते है ।

अतुळाय : दादी जी , उनके बारे में बोलने से हम सभी को बहुत फायदा हुआ। मामुनिगल के दिव्य चरित्र को हमारे साथ साझा करने के लिए धन्यवाद।

दादी : मुझे भी अच्छा लगा, कम से कम वह पेरिया पेरुमल द्वारा आचार्य के रूप में स्वीकार किया गए , वह आचार्य रत्न हार को पूरा करते है और ओराण वाली गुरु परंपरा जो स्वयं पेरिया पेरुमाल जी से शुरू हुई ।

हम अपनी अगली चर्चा में मामुनिगळ स्वामीजी के अष्ट दिक गज शिष्यों के बारे में चर्चा करेंगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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श्रीवैष्णव – बालपाठ – पिळ्ळै लोकाचार्य शिष्य

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श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाय नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

पराशर और व्यास दादी माँ के घर में वेदवल्ली और अतुळाय के साथ
पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के शिष्यों के बारे में जानने की जिज्ञासा के साथ प्रवेश करते हैं।

दादी : सुस्वागतम बच्चो, आप सब कैसे है ? मैं आप सभी के चेहरे पर उत्साह देख रही हूँ ।

व्यास : नमस्कार दादी जी, हम अच्छे हैं! दादी जी आप कैसे हैं? आप सही हैं हम बेसब्री से पिळ्ळै लोकाचार्य (श्री लोकाचार्य स्वामीजी) के बारे में सुनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

दादी : हाँ बच्चों, यहाँ तक कि मैं भी आप सभी के साथ साझा करने की प्रतीक्षा कर रही थी | आशा है कि आप सभी को हमारी पिचला चर्चा याद होगी। क्या कोई मुझे उनके शिष्यो के नाम बता सकता है?

अतुळाय : दादीजी से , मुझे नाम याद है | कूर कुलोत्तम दास, विळान चोलै पिळ्ळै, तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै, मणप्पाक्कतु नम्बि, कोट्टुरण्णर, तिरुप्पुट्कुऴि जीयर, तिरुकण्णन्गुडि पिळ्ळै, कोल्लि कावलदास इत्यादि |

दादी : अतुळाय बहुत सुन्दर , अच्छा लगा की आपको नाम स्मरण है ! अब हम इनके बारे में विवरण से चर्चा करते है | पहले में आपको कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में बताती हूँ |

सब बच्चे : अबश्य दादी जी |

दादी : कूर कुलोत्तम दास का जन्म श्रीरंगम में हुआ और वे कूर कुलोत्तम् नायन् के नाम से भी जाने जाते थे। | कूर कुलोत्तम दासर् ने तिरुमलै आलवार (तिरुवायमोली पिल्लै/ शैलेश स्वामीजी) को फिर से संप्रदाय में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पिल्लै लोकाचार्य के निकट सहयोगियों में से एक हैं और उन्होंने उनके साथ तिरुवरंगन उला (नम्पेरुमाल की कलाब काल की यात्रा) के दौरान यात्रा की थी। 

तिरुमलै आलवार को सुधारने के लिए किये गए उनके अनेक प्रयासों और पिल्लै लोकाचार्य से सीखे हुए दिव्य ज्ञान को तिरुमलै आलवार तक पहुंचाने में, उनके द्वारा की गयी असीम कृपा के कारण मामुनिगल, उनकी महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें “कूर कुलोत्तम् दासं उदारं” से संबोधित करते हैं (वह जो बहुत ही दयालु और उदार है)। रहस्य ग्रंथ कालक्षेप परंपरा में उनका एक महत्वपूर्ण स्थान है और उनकी महिमा का वर्णन रहस्य ग्रंथों की कई तनियों में किया गया है। श्री वचन भूषण दिव्य शास्त्र में, यह निर्णय किया गया है कि एक शिष्य के लिए “आचार्य अभिमानमे उत्थारगम्”। इसके व्याख्यान में मामुनिगल समझाते हैं कि एक प्रपन्न के लिए जिसने सभी अन्य उपायों का त्याग किया है, आचार्य कि निर्हेतुक कृपा और श्री आचार्य का यह विचार कि “यह मेरा शिष्य है“ ही मोक्ष का एक मात्र मार्ग है। पिल्लै लोकाचार्य, कूर कुलोत्तम दासर् और तिरुवाय्मोळि पिल्लै के चरित्र में हम यह स्पष्ट देख सकते हैं। यह पिल्लै लोकाचार्य का तिरुवाय्मोळि पिल्लै के प्रति अभिमान और कूर कुलोत्तम दासर् का अभिमान और अथक प्रयास है, जिन्होंने संप्रदाय को महान आचार्य तिरुवाय्मोळि पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) को दिए, जिन्होंने फिर संप्रदाय को अलगिय मणवाल मामुनिगल को दिए।| यह बिल्कुल कूर कुलोत्तम दासर और तिरुमलै आऴ्वार के लिए अनुकूल होता है । चलो आइए हम सब कूर कुलोत्तम दासर् का स्मरण करें जो सदा-सर्वदा पिल्लै लोकाचार्य स्वामीजी के चरण कमलों का आश्रय लेते है।

वेदवल्ली : दादीजी , हम सब को कूर कुलोत्तम दास जी के बारे में सुनकर बहुत प्रसनता हुई | हम सभी ने यह सीखा की शिष्य को कैसे अपने आचार्य का सम्मान करना चाहिए |

दादी : वेदवल्ली सबको “आचार्य अभिमानमे उतरागम ” स्मरण रहना चाहिए | अब हम पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी के दूसरे शिष्ये विळान चोलै पिळ्ळै जी के बारे में जानेंगे |

viLAnchOlai piLLai

व्यास : दादी, मैं यह पहले से जानता हुँ की उनको विळान चोलै पिळ्ळै नाम से क्यों जाना जाता था? क्यूंकि वह विल्लम वृक्ष पर चढ़कर पद्मनाभ स्वामी तिरुवनंतपुरम मंदिर का गोपुरम देखते थे | उनका जन्म ईलव कुल में हुआ था। अपने कुल के कारण वे मंदिर के अंदर नहीं जा सकते थे, इसलिए तिरुवनंतपुरम के अनंत पद्मनाभ मंदिर के गोपुर के दर्शन और मंगलाशासन के लिए वे अपने गाँव के विलम वृक्ष पर चढ़ जाया करते थे। विळान् चोलै पिल्लै ने ईदू, श्री भाष्य, तत्वत्रय और अन्य रहस्य ग्रंथ, अलगिय मणवाल पेरुमाल नायनाराचार्य से सीखा, जो श्री पिल्लै लोकाचार्य के अनुज थे।

उन्होंने श्री वचन भूषण अपने आचार्य श्री पिल्लै लोकाचार्य से सीखा और वे उसके अर्थों में विशेषज्ञ (अधिकारी) माने जाते थे।

श्री विळान् चोलै पिल्लै ने “सप्तगाथा” कि रचन की जिस में उनके आचार्य के “श्री वचन भूषण” के सार तत्व का वर्णन है।

पराशर : विळान् चोलै पिल्लै के आचार्यत्व के प्रति लगाव को देखकर हम बहुत हैरान हैं।

दादी : हाँ पराशर ! अपने आचार्य के प्रति सबसे बड़े कैंकर्य स्वरुप, उन्होंने आचार्य द्वारा दिए हुए अंतिम निर्देशों का पालन किया – श्री पिल्लै लोकाचार्य चाहते थे कि उनके शिष्य, तिरुवाय्मोली पिल्लै (तिरुमलै आलवार/ शैलेश स्वामीजी) के समक्ष जायें और उन्हें इस सुनहरी वंशावली के अगले आचार्य के रूप में तैयार करें; श्री पिल्लै लोकाचार्य, विळान् चोलै पिल्लै को तिरुमलै आलवार को श्री वचन भूषण के अर्थ सिखाने के निर्देश देते हैं। बच्चो अब मैं विळान् चोलै पिल्लै के जीवन में घटित एक महत्वपूर्ण घटना को साझा करना चाहूंगी।

अतुलहाय : दादी , उस घटना के बारे में हमें बताएं |

दादी : मुझे ज्ञात है की आप सब बहुत उत्सुकता से उस घटना के बारे में जानना चाहते है और यह मेरा कर्त्तव्य है की में आपके साथ सतविषय के बारे में आपको बताऊँ, इसलिए ध्यान से सुने |

एक दिन नम्बूध्री, अनंत पद्मनाभ भगवान की आराधना करते हुए देखते हैं कि विळान् चोलै पिल्लै पूर्वी द्वार से मंदिर में प्रवेश करते हैं, ध्वज स्तंभ और नरसिंह भगवान की सन्निधि को पार करते हुए वे उत्तर द्वार से गर्भ गृह में प्रवेश करते हुए “ओर्रै कल मण्डप” के समीप से सीढियाँ चढते हैं और भगवान के सेवा दर्शन देने वाली तीन खिडकियों में से उस खिड़की के समीप खड़े होते हैं जहाँ से भगवान के चरण कमलों के दर्शन होता है।

जब नम्बूध्री यह देखते हैं, वे सन्निधि के द्वार बंद करके मंदिर से बाहर आते हैं क्योंकि उस समय की रीती के अनुसार विळान् चोलै पिल्लै अपने कुल के कारण मंदिर के गर्भ गृह में प्रवेश नहीं कर सकते थे।

उसी समय, विळान् चोलै पिल्लै के कुछ स्थानीय शिष्य मंदिर में पहुंचकर यह बताते हैं कि उनके आचार्य विळान् चोलै पिल्लै ने अपने आचार्य पिल्लै लोकाचार्य के चरणों में प्रस्थान किया!! और वे लोग विळान् चोलै पिल्लै के दिव्य विग्रह के लिए तिरु पारियट्टम और भगवान की फूल माला चाहते थे !! वे लोग मंदिर प्रवेश द्वार के समीप खड़े होकर रामानुज नूत्तन्दादि इयल आदि का पाठ करते हैं।

जब नमबूधिरी यह देखते हैं, उनके पूर्व में हुई गर्भगृह की घटना से बहुत अचंभा होते है और वे सभी को इसके बारे में बताते हैं!

जिस प्रकार तिरुप्पणालवार (योगिवाहन स्वामीजी) पेरिय कोइल में पेरिय पेरुमाल के श्री चरण कमलों में पहुंचे, उसी प्रकार यहाँ विळान् चोलै पिल्लै ने अनंत पद्मनाभ भगवान के श्री चरणों में प्रस्थान किया!

वेदवल्ली : दादी मैं विळान् चोलै पिल्लै के अंतिम क्षणों के बारे में सुनकर मेरे रोन्ते खडे होगये है ।

व्यास : जी हाँ, मेरी आँखों से ख़ुशी के आँसू बह रहे है । यह वास्तव में बताता है कि कैसे “ईलव कुल” से एक व्यक्ति को हमारे संप्रदाय में महिमा मिलती है।

दादी : ठीक है बच्चों, आप सभी के साथ यह एक अच्छा समय था। आशा है कि आप सभी को याद होगा कि हमने आज क्या चर्चा की। अगली बार, मैं आपको तिरुवाय्मोली पिल्लै (शैलेश स्वामीजी) के बारे में विस्तार से बताउंगी , जल्द ही आप से मिलेंगे ।

सभी बच्चों ने पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ चर्चा करके दादी जी के घर को छोड़ दिया।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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