श्रीवैष्णव – बालपाठ – नन्जीयर् (श्री वेदांती स्वामीजी)

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< श्री पराशर भट्टर्

पराशर, व्यास वेदवल्ली और अतुलाय के साथ अण्डाल दादी माँ के घर में प्रवेश करते है |

दादी : सु : स्वागत बच्चो | आज हम अगले आचार्य जी जिनका नाम नन्जीयर् स्वामीजी है जो भट्टर स्वामीजी के शिष्य थे उनके बारे में जानेंगे | जैसे मैंने आपको पिछली बार बताया था की नन्जीयर् स्वामीजी जिनका जन्म श्रीमाधवार जी के रूप में हुआ उनको सम्प्रदाय में रामानुज स्वामीजी की दिव्या आज्ञा के अनुसार पराशर भट्टर स्वामीजी सम्प्रदाय में लेकर आये थे | हमनें देखा कैसे भट्टर स्वामीजी पहले तिरनेडुंदांडकम् की सहायता लेकर एम्पेरुमान की परत्वता की स्थापना करते हैं तत्पश्चात शास्त्रार्ध समझाते हैं । माधवाचार्यर् हार मानकर भट्टर् के श्री पद कमलों को आश्रय मान लेते हैं और उन्हें अपने आचार्य के स्थान में स्वीकार करते हैं । नन्जीयर माधवर के रूप मे जन्म लेकर अद्वैत तत्वज्ञान के प्रसिद्ध विद्वान बने । भविष्यकाल मे श्री पराशर भट्टर की असीम कृपा से वह नन्जीयर के नाम से प्रसिद्ध हुए | वह निगमान्त योगी और वेदान्ति के नाम से भी जाने गए ।

व्यास : दादी, अगर रामानुज स्वामी जी और भट्टर स्वामी जी जैसे आचार्य दूसरे सम्प्रदाय को मानाने वाले जैसे यादव प्रकाश (जो बाद में गोविन्द जीयर बने), गोविंदा पेरुमल ( जो एम्बार स्वामी जी कहलाएं), यज्ञ मूर्ति ( जो अरुळाळ पेरुमाळ् एम्पेरुमानार् (श्री देवराज स्वामीजी/ यज्ञमूर्ति) कहलायें) और माधवर (जो नन्जीयर स्वामीजी कहलाये), उन्होंने शैव मत के राजाओं को सुधारने की कोशिश क्यों नहीं की जिनके कारण उनको कठिनाईओं का सामना करना पड़ा? वह शैव राजाओं से दूर क्यों रहे ?

दादी : व्यास हमारे पूर्व आचार्य जानते थे की किसको सुधारा जा सकता है किसको नहीं? उक्त आचार्य के मामले में, एक बार जब वे जानते थे कि प्रतिद्वंद्वी सही था, तो उन्होंने गरिमा के साथ हार स्वीकार कर ली और न केवल उन्होंने हार स्वीकार कर ली, उन्होंने पेरिय तिरुमलई नम्बि, रामानुज स्वामी और श्री भट्टर स्वामी जी के चरण कमलो में समर्पण कर दिए और श्री वैष्णव संप्रदाय स्वीकार किये | हालाँकि, शैव राजा न तो एक उचित तर्क के लिए तैयार थे और न ही उन्होंने हार मानने के लिए पर्याप्त सम्मान दिया और श्रीमान नारायण की सर्वोच्चता के शाश्वत सत्य को महसूस किया | जैसा कि पुरानी कहावत है, “केवल जो सो रहा है उसे जगाना संभव है, जो सोने का बहाना कर रहा है उसे जगाना असंभव है”। हमारे पूर्वाचार्य जानते थे कि वास्तव में कौन सो रहा था और कौन केवल दिखावा कर रहा था। इसलिए उनके फैसले अलग-अलग थे। इसके अलावा, ऐसे व्यक्तियों के दोषों के बावजूद, हमारे पूर्वाचार्यों ने भी उनकी मदद करने के लिए वास्तव में प्रयास किया है, लेकिन बाद में दूसरी तरफ से बहुत अधिक प्रतिरोध छोड़ दिया।

पराशर : दादी, माधवार स्वामीजी को नन्जीयर नाम कैसे मिला |?

दादी : भट्टर स्वामी ने माधवर स्वामी को शास्त्रार्थ में पराजित किये और श्रीभट्टर उनके विनम्रता से प्रसन्न होकर कहा – माधवर तुम अरुळिच्चेयल् (दिव्यप्रभंध) , सत्साम्प्रदाय के ग्रन्थो मे निपुणता प्राप्त करो और फिर श्रीरंगम चले गए । श्रीभट्टर स्वामी जी के चले जाने के बाद, माधवर को अपने फैसले से कोई समर्थन नहीं मिला। श्रीमाधवर अपनी सत्पत्नियों की (उनके) कैंकर्य के प्रति प्रतिकूल व्यवहार से, आचार्यसंभन्ध के वियोग मे, परेशान/असंतुष्ट होकर संयास लेने की इच्छा से अपने आचार्य की सेवा करने हेतु श्रीरंगम चले गए । जाने से पेहले अपना धन–संपत्ति दोनो बिवियों को बराबर बाँट कर (शास्त्र कहता है – संयास लेने से पेहले बिवियों का देखभाल/खयाल/ध्यान रखने का इन्तेज़ाम करना चाहिए) । संयासाश्रम स्वीकार कर माधवर श्रीरंगम की ओर निकल पडे । भट्टर माधवर की उत्कृष्ट आचार्य–भक्ति और निष्टा से प्रसन्न होकर उनको स्वीकार कर “नम्–जीयर” से सम्भोधित करते है और तबसे नम्–जीयर के नाम से प्रसिध्द हुए । भट्टर और नन्जीयर् आचार्य–शिष्य संभन्ध के उपयुक्त/आदर्शस्वरूप उदाहरन है क्योंकि नन्जीयर् सब कुछ छोड़कर अपने आचार्य की सेवा मे जुट गए । उनकी आचार्य भक्ति की कोई सीमा नहीं थी | नन्जीयर् कहते थे – वह व्यक्ति तभी श्रीवैष्णव होगा अगर वह दूसरे श्रीवैष्णव के दुःख को समझने के काबिल हो और यह जानकर दुखित हो । यह सद्भावना और सम्मान नन्जीयर् को अपने काल के आचार्य और सभी श्रीवैष्णवों के प्रति था ।

नन्जीयर् – तिरुनारायणपुरं

अतुलाय : दादी, हमें नन्जीयर् स्वामीजी जी की भक्ति के बारे में कुछ कथा बताये ?

दादी : एक बार भट्टर अपनी पालकी पर सवार हुए थे तब नन्जीयर् अपने एक भुज पर त्रिदण्ड रखे हुए आचार्य की पालकी को अपने दूसरे भुज से सहारा दिए । तब भट्टर नन्जीयर् से कहे की नन्जीयर् आपको यह सन्यासाश्रम उचित नहीं लगता, आपको मुझे नहीं उठाना चाहिए | नन्जीयर् स्वामीजी कहते है अगर मेरा त्रिदण्डं मेरे कैंकर्य में रूकावट बन रहा है तो में इसे तोड़ देता हूँ और अपना सन्यासाश्रम छोड़ देता हूँ |

एक बार नन्जीयर के कुछ अनुचर (एकांगि) श्रीभट्टर के आगमन से उनके बगीचे मे मची उपद्रव को लेकर नन्जीयर् से शिकायत किए । नन्जीयर् ने कहा – यह बगीचा उनके आचार्य की सेवा के लिए है नाकि भगवान की सेवा के लिए और आगे से यह बात को अच्छी तरह ध्यान मे रखते हुए उनकी सेवा करें ।

आचार्य अपना मस्तक शिष्य के गोद मे रखकर सोने का व्यावहारिक प्रथा पौरानिक काल से प्रचलित है । इसी संदर्भ मे एक बार श्री भट्टर नन्जीयर् के गोद मे बहुत देर तक सो गए । जब भट्टर की निद्रावस्था सम्पूर्ण हुई उन्हे तब एहसास हुआ की उस दौरान नन्जीयर् स्थितप्रज्ञ / निश्चल रहे । उनकी निश्चलता और दृढ़ता को देखर श्रीभट्टर ने उन्हे वापस द्वयमहामंत्र का उपदेश फिर से किया ।

वेदवल्ली : अभी जो वार्तालाप हुआ क्या आपको पसंद आया ?

दादी (मुस्कुराते हुए ) : हाँ, हमारी चर्चा पसंद आयी लेकिन बहुत रोचक चर्चा थी |

एक बारे नन्जीयर स्वामीजी ने भट्टर स्वामीजी से पूछा – क्यों सारे आळ्वार भगवान श्री–कृष्ण के प्रती आकर्शित थे, उसका क्या कारण है ? भट्टर इसका उत्तर कुछ इस प्रकार देते है – जैसे साधारण मानव/मनुष्य हाल ही मे घटित संघटनो को याद रखते है उसी प्रकार आळ्वारों ने अभी–अभी अवतरित भगवान श्री कृष्ण और उन्की लीलाओं के प्रती विशेष आकर्शन था । इसके अलावा कुछ आळ्वारों का अविर्भाव भगवान श्री कृष्ण के समय मे हुआ परन्तु भगवान से मिल नही पाए और इस कारण भी वह सारे आकर्शित थे ।

एक और बार नन्जीयर् स्वामी जी भट्टर स्वामीजी से पूछते है की राजा महाबली पाताल लोक में क्यों गए और उनके गुरु शुक्राचार्य जी की आँख कैसे खो गयी ?
भट्टर स्वामीजी कहते है जब उनके गुरु शुक्राचार्य जी राजा महाबली को उनका बचन पूर्ण करने के लिए रोकते है जो उन्होंने उस समय वामन भगवान जी से किया था, उसी कारण उनकी आँख चली गयी और जैसे राजा महाबली ने अपने आचार्य की आज्ञा नहीं मानी इसीलिए उन्हें पाताल लोक जाने का दंड मिला | इसलिए, यहाँ, भट्टर स्वामीजी इस बात पर जोर देते हैं कि किसी के अपने आचार्य का सम्मान करना कितना महत्वपूर्ण है। उनके बीच कई ऐसी दिलचस्प बातचीत हुई। इन वार्तालापों ने नन्जीयर् को उनके लिखित कार्यों में भी मदद की।

एक दिन नन्जीयर् स्वामीजी चाहते थे उनके लिखे हुए काम की प्रतियां बनायीं जाये और अपने शिष्यों से पूछा की कौन इस कैंकर्य को करने योग्य है | नम्बुर वरदराजार स्वामीजी का नाम प्रस्तावित किया | नन्जीयर् स्वामीजी ने पहले सम्पूर्ण तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान का कालक्षेप वरदराज स्वामीजी को दिए और फिर उन्हें व्याख्यान की मूल प्रति प्रधान की | वरदराज स्वामीजी ने निर्णय लिए की वह अपने मूल ग्राम जो कावेरी नदी की किनारे पड़ता था वहां जाकर लेखन पर ध्यान केंद्रित कर सके और इसे जल्दी से समाप्त कर सके । नदी पर करते समय अकस्मात बाढ़ आ गयी और वरधराजर स्वामीजी तैरने लगे । ऐसा करते समय, मूल ग्रन्थम उसके हाथ से फिसल जाता है और वह तबाह हो जाता है। अपने मूल स्थान पर पहुंचने के बाद, वह अपने अचर्यन और उसके द्वारा दिए गए अर्थों पर ध्यान देते है और तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान को फिर से लिखना शुरू करते है। चूंकि वे तमिल भाषा और साहित्य के विशेषज्ञ थे, इसलिए जहाँ भी उनको लगता, अच्छे अर्थ जोड़ते हैं और जब अंत में नन्जीयर् स्वामीजी के पास वापस लौटते हैं तो उनको हस्त लिखित ग्रन्थ प्रस्तुत करते हैं। नन्जीयर् स्वामीजी तिरुवाय्मोऴि 9000 पडि व्याख्यान देखकर समझ जाते है कि मूल ग्रन्थ से कुछ परिवर्तन हुआ है , और पूछते है यह कैसे हुआ ? वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वरदराजर पूरी घटना के बारे में बताते हैं और नन्जीयर् को सुनकर बहुत खुशी मिलती है। सच में वरदराजर की महिमा को समझने और उनके काम से प्रसन्न होकर, नन्जीयर् ने प्यार से उन्हें नम्पिळ्ळै कहा और उन्हें सम्प्रदाय का आने वाला प्रतिनिधि होगा । नन्जीयर् स्वामीजी ने भी नम्पिळ्ळै स्वामीजी की महिमा का गुणगान किये जब नम्पिळ्ळै स्वामीजी नन्जीयर स्वामीजी से बहुत सुन्दर बेहतर स्पष्टीकरण देते है तो नन्जीयर् स्वामीजी प्रसन्न होते है | यह नन्जीयर् स्वामीजी की महिमा को प्रकाशित करता है | भट्टर के निर्देशानुसार नन्जीयर् ने तिरुवाय्मोळि पर 9000 पाडि व्याख्यान की रचना किए । नन्जीयर् की विशेषता यह थी की उन्होने अपने सौ वर्षों के जीवनकाल मे तिरुवाय्मोळि पर सौ बार प्रवचन दिए ।

व्यास : दादी, हमें नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में बताइये |

दादी : में आपको नम्पिळ्ळै स्वामीजी की बारे में और उनकी महिमा की बारे में कल बताउंगी | अभी देरी हो रही है | अभी आपको घर चाहिए |

बच्चे भट्टर स्वामीजी, नन्जीयर् स्वामीजी और नम्पिळ्ळै स्वामीजी के बारे में चिंतन करते हुए घर जाते है |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-nanjiyar/

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