बालपाठ – तिरुमङ्गै आऴ्वार (श्री परकाल स्वामीजी)

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बालपाठ

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आण्डाल दादी, पराशर और व्यास उरैयूर से घर वापस आ रहें हैं।

आण्डाल दादी: पराशर और व्यास, ऐसा लगता है कि आप दोनों ने उरैयूर में एक अद्भुत समय बिताया|

पराशर और व्यास: हां, दादी माँ वहां तिरुप्पाणाळ्वार (श्री योगिवाहन स्वामीजी) को देख कर इतना अच्छा लगा। हमें दिव्य देशम जाना बहुत् अच्छा लगता है और जाकर अर्चाविग्रह भगवान की पूजा करना भी।

आण्डाल दादी: अब मैं आपको तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) के बारे में बताऊंगा जो इतने सारे दिव्य देशम की महिमा का खुलासा करने में सहायक है। उनका जन्म कार्तिक मास पर कार्तिक नक्षत्र में तिरुक्कुरैयलूर् में तिरुन्नागुर के पास हुआ था। उन्होंने 6 दिव्य प्रबन्धमों का निर्माण किया था, जो हैं पेरियतिरुमोळि , तिरुक्कुरुदाण्डकम्, तिरुवेळुकूत्तिरुक्कै, शिरिय तिरुमडल , पेरिय तिरुमडल, और तिरूनेदुंताण्डकम। उनका मूल नाम नीलन था (क्योंकि वोह नीच रंग के थे)।

पराशर: वोह उन दिनो में दिव्य देशे कि यात्रा कैसे करते थे??

आण्डाल दादी: उनके पास अदलमा नाम का घोड़ा था जो बहुत शक्तिशाली था और वह उस घोड़े में हर जगह यात्रा करते थे।

व्यास: उनकी विशेषता क्या हैं दादी?

आण्डाल दादी: तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) के कई अनूठे पेहलुएं हैं | शुरू में, वोह एक महान योद्धा थे और एक छोटे से राज्य पर राज्य करते थे। उस समय वोह कुमुद्धवल्ली नचियार से मिलते हैं और वह उससे शादी करना चाहता हैं । कुमुदवल्ली नचियार उन्हे केहती हैं कि वोह केवल पेरुमल के एक भक्त से शादी करेंगी जो भागवतो की सेवा के साथ भागवतो का काफि देखभाल भी करता हो। तिरुमंगै-आळ्वार (श्री परकाल स्वामीजी) सहमत हुए और पेरूमल के भक्त बन जाते हैं और इस तरह वे एक दूसरे से शादी करते हैं। आलवार ने कई श्री वैष्णवों को भोजन का प्रसाद प्रदान किया। लेकिन अंततः, उनका धन खतम हो जाता है। इसलिए वह अमीर लोगों को लूटने लगते हैं जो पास के जंगल से गुजरते हैं और दूसरों की सेवा करने में धन का उपयोग करते हैं।

पराशर: ओह! क्या हम चुरा सकते हैं?

आण्डाल दादी: नहीं! हमें ऐसा कभी नहीं करना चाहिए | लेकिन क्यों कि श्री परकाल स्वामीजी भागवतो की सेवा करने के लिए इतने बेताब थे, इस कारण उन्होंने अमीर लोगों को लूटना शुरू कर दिया। वैसे भी, पेरुमल उनहे पूर्ण ज्ञान देना चाहता थे और उनहे पूरी तरह से सुधारना चाहता थे।। एम्पेरुमान अपने देवियों के साथ आळ्वार को अनुग्रहित करने के लिये उनकी राह में नए दूल्हा दुल्हन की तरह , सुन्दर आभूषणों से सज़-दज़ बारात में वायळालिमणवालन के रूप मे निकल पडे । बड़ी मात्रा मे लूटने का मौका देखकर आळ्वार जोश में आ जाते हैं और एम्पेरुमान और उनकी बारात को घेर लेते हैं और सब कुछ लूट लेते हैं । लेकिन पेरुमल के अनुग्रह से, वह अंततः महसूस करते है कि पेरुमेल खुद आ चुका है। पेरुमल उनहें पूरी तरह आशीर्वाद देते हैं और उनहें सुधार देते हैं और बेहद शुद्ध बना देते हैं। (आखिर में आळ्वार एम्पेरुमान के श्री पाद में लगी हुई बिछिया को क़तर देते हैं । उनकी शूरता पे एम्पेरुमान आश्चर्य चकित हो जाते हैं और “नम् कलियनो ” कहकर सम्बोधित करते है, अर्थात क्या आप हमारे कलियन हो ? (महान शौर्यवान को कलियन कहा जाता हैं)। वह भी परकाल के रूप में जाना जाता है (जो सर्वोच्च भगवान खुद से डरता है)) चूंकि उनहोने खुद को आशीर्वाद देने के लिए पेरुमल को मजबूर किया, पेरुमल ने उनहे “कलियन” नाम दिया जो कि बहुत ही भव्य / अभिमानी है। वोह पराकाल के रूप में भी जाने जाते हैं (जिससे सर्वोच्च भगवान खुद डरता है)।

व्यास: वाह! यह अद्भुत है दादी| उसके बाद उनहोने क्या किया?

आण्डाल दादी: महान भावनाओं से अभिभूत होकर, उन्होंने पूरी तरह से पेरुमल को आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद, उन्होंने भारत देश की लंबाई और चौड़ाई की यात्रा की, उन्होंने कई दिव्य देश (८० से अधिक) और वहां गौरवशाली प्रभु पेरुमल की महिमा गायी। वह भी, उन्होंने विशेष रूप से ४० से अधिक पेरुमल के बारे में गाया है जो किसी भी अन्य आळ्वार नहीं गा सके – इस प्रकार उन दिव्य देश को हमारे लिए खुलासा किया।
पराशर: ओह! यह हमारा महान भाग्य है – उनके कारण, हम अब इन क्रियाशील देवताओं की पूजा कर रहे हैं। हम हमेशा उनके आभारी रहेंगे ।

आण्डाल दादी: उन्होंने हमारे श्री रंगम में कई कैंकर्य किये, मंदिर के आसपास के किले के निर्माण, आदि। अपने जीवनकाल के दौरान, पेरुमल श्री परकाल स्वामीजी के भाई को आळ्वार के विग्राहम बनाने और उसकी पूजा करने का आदेश देते हैं। कुछ समय बाद, तिरुमंगै-आळ्वार तिरुककुरुंगुडी दिव्य देश को जाता हैं, कुछ समय में नाम्बी सम्राट की पूजा करते हैं। अंत में, भगवान पर ध्यान केंद्रित करते हुए, वह परम पदम में सदैव भगवान के
कैंकर्य के लिए चले जाते हैं ।

व्यास: हम अर्चावतार पेरुमल और उनके भक्तों आळ्वार जीवन के कैंकर्य के महत्व को दादी से समझ चुके हैं।

आण्डाल दादी: हाँ, यह हमारे संप्रदाय का सार है। इसके साथ, आपने सभी आळ्वार के बारे में सुना है मैं आपको अगली बार हमारे आचार्य के बारे में बताऊंगी।

पराशर और व्यास: ठीक दादी! हम उत्सुकता से इसके लिए इंतजार कर रहे हैं

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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