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श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् के शिष्य – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<< आळवन्दार् शिष्य – भाग 1

जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

tirukkachinambi

गोश्टि पूर्ण और् कान्ची पूर्ण

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं ! वह अपने मित्र वेदवल्ली, अत्तुज़्हाय् और् श्रीवत्सांगन्. के साथ जाते हैं !

दादी (मुस्कराते हुए ) : आओ बच्चों | व्यास, आप तो सभी मित्रों को साथ लेकर आये हो जैसा मैंने कल कहा था |

व्यास : जी दादी, पराशर और मैं स्वामी रामानुज जी और उनके आचार्य की कहानी बता रहे थे श्रीवत्सांगन्. को और वह चाहता था की आज इसको आपसे सुने !!

दादी : यह तो बहुत बढ़िया है | आईए , बैठे | आज में आपको तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) और् तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में बताउंगी,  इन दोनों महान आचार्यो का हमारे सम्प्रदाय में बहुत विशेष स्थान है |

श्रीवत्सांगन् : दादी, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी का जनम चेन्नई के पास पूविरुन्तवल्लि में वहां हुआ था जो श्रीपेरुम्बूतूर् जाने के रास्ते में आता है| हम उस मंदिर में पिछले साल गर्मी की छुटियों में गए थे |

दादी : बहुत अद्धभुत | यह ठीक है | तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) श्री देव पेरुमाळ को पंखा करने की सेवा से जाने गए है और उसी कारण प्रसिद्ध भी हुए है । इसके अतिरिक्त वे भगवान श्री देव पेरुमाळ और स्वयं के बीच मे आम तौर पर होने वाले वार्तालाप से भी प्रसिद्ध हैं | जब रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम आये, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) प्रथम आचार्य थे जिनकी शरण में रामानुज स्वामी जी आये और उन्होंने ही रामानुज स्वामीजी को भगवान् जी के प्रथम कैङ्कर्य करने के लिए निर्देशत किया |

व्यास : दादी जी रामानुज स्वामी जी ने क्या कैङ्कर्य किये ?

दादी : श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) पास पहुँचे और उनके मार्गदर्शन के लिये निवेदन किया । नम्बि जी इळयाळ्वार को तिरुमंजन तीर्थ कैंकर्य सौंपते हैं ( निकट मे स्थित कुँए से लाया जाने वाला पानी जो भगवान के स्नान के लिये उपयोग किया जाता था ) । इळयाळ्वार खुशी खुशी स्वीकर किये और यह कैंकर्य वह प्रतिदिन करने लगे । शास्त्रों और भगवान के प्रति उनके प्यार के प्रति उनका ज्ञान उत्कृष्टता थी। तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के प्रति अत्यधिक आकर्शित होकर श्री इळयाळ्वार उनके चरण कमलों का आश्रय लेते हुए उनसे विनती करते हैं कि वो उन्हे पंञ्चसंस्कार दे और उन्हे शिष्य के रूप मे स्वीकार करे ।

पराशर : लेकिन दादी, क्या आपने नहीं कहा था की पेरिया नम्बि स्वामीजी ने रामानुज स्वामीजी का मधुरान्तकं में पञ्च संस्कार किया था ?

दादी : हाँ पराशर | मुझे प्रसन्नता है की तुम्हे सब याद है |परन्तु वेदों और शास्त्रों का निरूपण देते हुए कहते हैं कि वह कदाचित भी उन्हे पंञ्चसंस्कार दे नही सकते और उसके वो काबिल नही क्योंकि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) अब्राह्मण वर्ण के थे जिसके कारण वे नियमानुसार दीक्षाचार्य नही हो सकते (परन्तु वो श्री इळयाळ्वार को शिक्षा गुरु के तौर से उपदेश देने के सक्षम हैं और यहि कायम रखेंगे) । यह जानकर इळयाळ्वार बहुत निरुत्साहित हुए परन्तु वेदों और शास्त्रों मे दृध विश्वास होने की वजह से, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के निश्चित निर्णय को पूर्ण तरह से स्वीकार किये । तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी रामानुज स्वामीजी की हमारे सम्प्रदाय के प्रति शंकाओं और प्रशनो का निवारण करते है | यह एक बहुत रोचक कहानी है की कैसे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी भगवान् जी के साथ वार्तालाप करते है जिससे रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान हो सके |

वेधावल्ली : क्या शंकायें थी दादी ? भगवान् जी ने क्या कहा ?

दादी : एक बार रामानुज स्वामी जी के दिमाग में कुछ भ्रम और संदेह हो गया । वह जानते थे कि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) भगवान् पेरुमल से बातचीत करते है, उन्होंने एक बार फिर तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के मार्गदर्शन का अनुरोध किया। नम्बि भगवान के पास जाते है और सामान्य रूप से अपना कैंकर्य करते है और रामानुज स्वामी जी के अनुरोध को खोलने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करते है। भगवान नम्बि की हिचकिचाहट के बारे में पूछताछ करते है | नम्बि देव पेरुमाळ से वारतालाप के विषय मे अत्यधिक प्रसिद्ध माने गये हैं। इळयाळ्वार को विलंब करने वाले कुछ संदेहों का समाधान हेतु वे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास गए और विनम्रतापूर्वक इन संदेशों का प्रस्ताव किया और पूछे की वे ( तिरुक्कच्चि नम्बि ) इन संदेहों का समाधानों प्राप्त करे और उन्हे बताये । श्री रामानुजाचार्य जो साक्षात आदि शेष के अवतार हैं, हमारे पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर हमे यह जानना चाहिये कि श्री रामानुजाचार्य केवल नटन यानि अपने पात्र को भलि–भांति निभा रहे थे और वह इन संदेहों का समाधान भी जानते थे परन्तु प्रमाणों को भगवान और पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर प्रमाणित करना चाहते थे । उस रात , अपना कैंकर्य समाप्त कर श्री नम्बि भगवान को अती प्रेम से देखने लगे ।

सर्वज्ञ देव पेरुमाळ ने उनसे पूछा – नम्बि , क्या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ? नम्बि थोडी देर सोचकर भगवान के समक्ष इळयाळ्वार के मन की मनोवेदना को व्यक्त किये और कहे – अब आप ही इन संदेहो का समाधान दीजिए । यह सुनकर भगवान ने कहा – जिस प्रकार मैने अपने श्री कृष्णावतार मे सान्दीपणि मुनि से शास्त्र सीखा, इळयाळ्वार ( जो अनन्त शेष के अवतार है , सर्वज्ञ है ) वो मुझसे इन संदेहों का समाधान पूछ रहे हैं। उसके पश्चात , भगवान ने स्वयम छे उपदेशों को नम्बि के सामने प्रस्तुत किया जो मेरे छे ईश्वरीय आदेश के नाम से प्रसिद्ध है वही भगवद्बन्धुवों के लिए प्रस्तुत है –

1) अहमेव परम तत्वम् – मै ( देव पेरुमाळ ) ही सर्वोच्छ (महान, श्रेष्ठ) हूँ

2) दर्शनम् भेदमेव – जिवात्मा और अचेतनम् ( अचेत ) मुझसे (मेरे दिव्य शरीर से) विभिन्न है

3) उपायम् प्रपत्ति – “मुझे ही अन्तिम शरण ( उपाय ) के रूप मे स्वीकर करना ” यानि केवल भगवान का शरण ही उपाय है और उससे ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है

4) अन्तिम स्मृति वर्जनं – प्रपन्न भक्तों के लिये अन्तिम स्मरण ज़रूरी नही है क्योंकि श्री वराह भगवान ने वराह चरम श्लोक मे कहा है कि – भगवान स्वयम प्रप्पन्न भक्तों के अन्तिम काल मे उनका स्मरण करेंगे । आम तौर पर हमारे आचार्यों ने दर्शाया है की हमे अपने अन्तिम काल मे अपने आचार्य पर ध्यानकेन्द्रित करना चाहिये ।

5) देहवासने मुक्ति – भगवान ने कहा है – प्रपन्न भक्त उनके अन्त काल के बाद ( भौतिक शरीर का त्याग करना ) निश्चितरूप से परमपद की प्राप्ति होगी और उनको मोक्ष इस प्रकार से मिलेगा और वह भगवद्–भागवदकैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

6) पूर्णाचार्य पदाश्रित – पेरियनम्बि (महापूर्ण) को अपना आचार्य मानो और उनका शरण लो

तिरुक्कच्चि नम्बि इळयाळ्वार के पास जाकर स्वयम भगवान के छे आदेशों ( जो इळयाळ्वर के संदेशों के समाधान ) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। इळयाळ्वर यह सुनकर बहुत खुश होते हैं और इस अनुग्रह (सहायता) के लिये उनकी प्रशंसा और अभिवादन करते हैं। यह बताने के बाद नम्बि इळयाळ्वर से पूछते हैं – क्या वे भी यही सोच रहे थे .. इसके जवाब मे रामानुजाचार्य कहे – जी हा स्वामि , मै भी यही सोच रहा था .. तिरुक्कच्चि नम्बि को तब एहसास हुआ की भगवान और श्री रामानुजाचार्य का तिरुवुळ्ळम् (मनोभावना) एक ही है यह जानकर वे अती प्रसन्न हुए । अब यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि रामानुज को शम शर्यणम के लिए पेरिया नंबी से संपर्क करना चाहिए, वह तिरुक्कच्चि नम्बि के आशीर्वाद लेते हैं और पेरिया नम्बि से मिलने के लिए श्री रंगम को छोड़ देते हैं और हम सभी बाकी की कहानी जानते हैं, बच्चे क्या यह नहीं हैं?

व्यास : हाँ दादी, हमें याद है |

दादी : श्रीवैष्णवों के महत्वपूर्ण गुणों में से एक गुण विनम्रता है , जिसे नेच्या भावम कहते है या हमारे सम्प्रदाय में दूसरे श्री वैष्णवों की उपस्थिति में अपने आपको विनम्र समझना | पेरिया नम्बि नम्रता का एक जीवंत उदाहरण थे जो वास्तव में उनके दिल से आई थी और केवल उनके मुंह से शब्द नहीं थे। पेरिया नम्बि बहुत नम्र थे और हमेशा महान सम्मान के साथ अन्य श्रीविष्णवों का इलाज करते थे। एक बहुत ही रोचक घटना हुई जो यह साबित करती है। मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे । एक बार एक महान आचार्य मारनेरी नम्बि चाहते थे कि उनके अंतिम संस्कार श्रीवैष्णव द्वारा किया जाए और पेरिया नंबी से उनकी देखभाल करने का अनुरोध किया जाए। पेरिया नंबी खुशी से इस बात से सहमत थे और शहर में स्थानीय लोगों के क्रोध का सामना करने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने के लिए जाति के द्वारा पेरिया नंबी से कम है और इस प्रकार शास्त्र के खिलाफ जा रहे है। जब पूछा गया , पेरिया नम्बि स्वामीजी कहते है की वह तो सिर्फ श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी ने उन्हें सिखाया है जो कहते है की भागवत कैंकर्यं बहुत ही शुद्ध और महत्वपूर्ण कैंकर्यं है | एक भागवत को उनकी जाती या जन्म देखे बिना उन सभी को एक समान कैंकर्यं करना चाहिए | नाच्य भाव सैद्धांतिक नहीं था लेकिन पेरिया नम्बि द्वारा अभ्यास में डाल दिया गया था। वह वास्तव में विश्वास करते थे कि सभी श्री वैष्णव भगवान के लिए प्रिय हैं और सम्मानित होना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्राट के एक सच्चे भक्त अपने आखिरी पलों को कैसे बिताते हैं, सम्राट उन्हें श्री वैकुंठम में कन्यार्यम का अनन्त आनंद देता है, जैसा कि भगवान पेरुमल द्वारा तिरुक्कच्चि नम्बि को आश्वासन दिए थे । वह एक महान आचार्य थे जो अपने आचार्य, अलवंधर और श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी की शिक्षाओं के दौरान अपने जीवन भर में रहते थे। क्या यह आज के लिए पर्याप्त है या आप तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) के बारे में भी सुनना चाहते हो?

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वेदवल्ली : क्या आप के पास उनके बारे में भी कहानी है ?

दादी : हाँ, बहुत |

अत्तुज़्हाय् : फिर हमें तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी :आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

व्यास : ॐ नमो नारायणाय मंत्र को तिरुमंत्र कहते है |

श्रीवत्सांगन् : सर्व धर्मं परित्यज्य मामेकं शरणमं व्रजा; अहम् तवा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ सुचा: इसको चरम श्लोक कहते है |

दादी : बहुत अद्भुत | अब यह तीन श्लोक का बहुत गहरा और गंभीर अर्थ है जो की किसी आचार्य के द्वारा ही सीखा जा सकता है |

वेधावल्ली : लेकिन दादी, हमें इन श्लोको का अर्थ जानना है |

दादी: हाँ, हम सभी इन तीन श्लोक का अर्थ जानते है लेकिन हमारे सम्प्रदाय में यह हर एक मंत्र बहुत प्रभावशाली है जो की एक आचार्य के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के बिना पूरी तरह से इसे जानने की क्षमता से परे है। यही कारण है कि तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) को रामानुज को इन छंदों के अर्थों को पढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य दिया गया था |

अत्तुज़्हाय् : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामी जी को १८ बार तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी के पास जाना पड़ा थिरुमन्त्रम सीखने के लिए | क्या यह सत्य है ? उनको इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ा ?

दादी : हाँ, यह सब सत्य है | इसे हमारे संप्रदायम के बारे में सीखने में रामानुज भागीदारी और ईमानदारी का परीक्षण करने के लिए तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) द्वारा उपयोग किए जाने वाले तरीके के रूप में लिया जा सकता है और इसे रामानुज स्वामी की दृढ़ता और धैर्य की गवाही के रूप में भी लिया जा सकता है।

व्यास : दादी, तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी दिखने में बहुत सख्त थे | वह रामानुज स्वामी जी के प्रति उद्धार हो सकते थे |

दादी : यह तो सभी को सीखने के बाद इस घटना के बारे में बहुत गलत धारणा है | यह सही नहीं है | उनके मन में सदैव रामानुज स्वामी जी क्या कल्याण करने का मन करता था और ऐसे तो वह बाहर से बहुत सख्त थे | एक अच्छे पिता का कर्तव्य होता है की बेटे के साथ सख्त रहे और अपने बेटे के लिए किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहे |याद है , कल जब हम तिरुमलै अण्डाण जी के बारे में बात कर रहे थे , मैंने कहा था की अण्डाण और रामानुज स्वामीजी के विचारो में कुछ मतभेद था | यह तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ही थे जिन्होंने मध्यस्था करके दोनों में विरोध खत्म किया सिर्फ रामानुज स्वामीजी के लिए | जहाँ तक की वह रामानुज स्वामीजी का श्री वैष्णवों के प्रति अनुराग देखकर बहुत प्रभाबित हुए की उन्होंने रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमणार नाम से सम्बोधित किया (मन्नाथ ) | इस तरह से रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमानार सुन्दर नाम मिला | जब रामानुज स्वामीजी श्री रंगम में उनके दुश्मनो ने जहर देकर मारने की कोशिश की, तब तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ने समय पर आकर किदाम्बी अचान को रामानुज स्वामीजी के लिए खाना बनाने के लिए नियुक्त किये ताकि रामानुज स्वामीजी सुरक्षित रह सके | तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी एक पिता की तरह सदैव रामानुज स्वामीजी के कल्याण करने के बारे में सोचते रहते | यहाँ और भी बहुत सी कहानियां उनके महानता के बारे में की वह उनसे पिता की तरह अनुराग रखते थे, ज्ञान के सागर एवं उनका उनके आचार्य आलवन्दार स्वामीजी के प्रति श्रद्धा| मे चाहती हूँ की आपको कहानियां सुनाती जाऊ और मुझे विश्वास है की आप भी सुनना पसंद करोगे लेकिन क्या आप नहीं सोचेंगे की आपके माता पिता चिंतत होंगे आप सभी देरी से हो | अब आप यह फल लो और घर जाईये | अगली बार में आपको और बहुत सारी कहानियां बताउंगी अपने आचार्य के बारे में |

बच्चो ने फल फूल लिए, और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी, पेरिया नम्बि स्वामीजी और तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में सोचने लगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers – Who is Rāmānuja?

Śrīḥ  Śrīmathē Śatakōpāya namaḥ  Śrīmathē Rāmānujāya namaḥ  Śrīmath Varavaramunayē namaḥ

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This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

Rāmānuja (Rāmānujāchārya) is a pivotal Āchārya (teacher) in our tradition. He war born in the year 1017 in Sriperumbudur, a town near Chennai (formerly Madras), south India. He was at the same time a first-class philosopher and theologian who dominated the intellectual landscape of his time, a very humble devotee of God and a devoted servant of his godbrothers and sisters as well as humanity as a whole.

Rāmānuja fought excesses of the caste system by allowing people of all castes and groups into temples and was open to accepting them as his disciples – more than 950 years ago. He implemented a strong sense of mutual respect and service amongst his followers, which crosses all boundaries of society and is very much alive until today.

Rāmānuja corrected misinterpretations of the Vedic literature and proved that every letter of Veda is authentic and authoritative, there no need to create secondary meanings in order to solve seeming contradictions. This was common practice before him. The philosopher Shankara (Śankarāchārya), who lived about 150 years before Rāmānuja, had classified the Veda into significant and less significant parts, claiming that some verses mean something very different from what they say in the Word. This was based on very complicated grammatical arguments, which were however widely accepted by intellectuals before Rāmānuja.

The correction was made possible by Rāmānuja’s refinement and systematization of the Vishishtadvaita philosophy. Our tradition and academic researchers agree that Vishishtadvaita existed long before Rāmānuja, but in a less organized form. Vishishtadvaita perfectly reconciles the testimony of an impersonal-monistic God with the testimony of a personal-dualistic God we both find in the Veda.

In spite of his great merit, Rāmānuja is hardly known to the western world in general and is unknown even to most sincere spiritual seekers in the western world. This is in stark contrast to the interest of the indological research. Amongst others, the Austrian Academy of Sciences has issued a seven volume series of academic books centered around Rāmānuja and his tradition.

Academic research has clearly shown that Rāmānuja’s philosophical / theological work is of the highest intellectual quality and has been an important factor in shaping the debates of Indian scholars over the centuries. One can imagine Rāmānuja’s position in the Indian intellectual history as a pivot, maybe similar to Kant in the European intellectual history. He has laid the intellectual foundations for the so called Bhakti movement, which proposed a very personal, intimate and relatively informal relation to God. Note that the direct followers of Rāmānuja do not see themselves as Bhaktas (people practicing Bhakti). The Bhakti movement was a major factor that shaped modern Hinduism, it produced dozens of offshoots over the centuries all over India. The Hare Krishna movement is probably the most prominent Bhakti group in the west.

But in contrast to European philosophers like Kant, Rāmānuja was an Āchārya, i.e. a teacher who lived what he taught at the highest standards. For while in our modern culture it is quite conceivable that someone holds lectures on ethics and at the same time deceives his wife, this would be inconceivable for an Āchārya.

Thus, Rāmānuja is an embodiment of perfection, somebody who was perfected not only in his intellect but also in all aspects of his practice. In today’s time, when so many people are spiritually searching and sadly so often filled with spiritual junk food or barely digestible fragments, perhaps even deceived or exploited, the living tradition of Rāmānuja represents a lighthouse in the fog of commerce and confusion. Rāmānuja and his successors pursue philosophy and theology at the highest intellectual level, at the same time living practice, both spiritually and in social cohesion. They are willing to hand down invaluable treasures of knowledge and practice to everybody who sincerely seeks to be a follower of Rāmānuja.

Further Reading:

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

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ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers – Our Philosophy

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This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

Emergence and relation to other vedic philosophies

Our philosophy is called Vishishtadvaitam, which is commonly translated as “qualified monism”. In the testimony of the Veda and more generally in the testimony of true mystics and seers of all religions, we find both the experience of unity with God, one-ness, and the experience of duality, other-ness, in relation to God.

These seemingly contradictory testimonies have been a source of long standing debate within the Vedic tradition and too often violent persecution of “heresy” in the Abrahamic religions. Over the millennia, there have been many attempts to reconcile the two testimonies within the Vedic tradition. Unfortunately, many treatises which could shed light on the development of thought on these issues have been lost during the Muslim invasion of India, where many universities and libraries were destroyed. From the few sources that survived the destruction, we can infer that India had a very rich spiritual landscape in the first millennium C.E., with many teachers and traditions of thinking that were in constant debate and exchange of ideas.

Rāmānuja made his first appearance in this landscape with a text named Vedārtha Saṅgrahaḥ, which means “Summary of the meaning of Vedas”. The text debates the standpoints of rival schools of thinking in a very sophisticated way and, by doing this, gives a precise description of Vishishtadvaitam philosophy.

The starting point of Rāmānuja and his contemporaries is a very interesting philosophical problem: All scriptures state that God has infinite perfections. But the world we see is not perfect. So how does it relate to God? Philosophers before Rāmānuja have solved this problem either with the philosophy of Advaitam (non duality) or early variants of the Dvaitam (duality) philosphoy. The Advaitam philosophers argued that God is a monolithic entity of knowledge and perfection, but his perfection is covered by ignorance. The goal of spiritual seekers is thus to remove this ignorance in order to see that they are this monolithic entity, that they are non different from God. Dvaitam philosophers argued that the world and the living entities are strictly distinct from God, so their imperfections are nothing surprising.

Rāmānuja points out several logical inconsistencies in Advaitam philosophy, amongst others the issue that this ignorance must then be stronger than God’s perfection and knowledge, i.e. the most powerful entity in reality is not God but ignorance. If this would be really what Advaitam means, it would be both conflicting with many statements in the Veda and would produce a myriad of logical problems – like, if ignorance is so strong, how can a simple human being break it by gaining knowledge?

But also the early forms of Dvaitam were criticised by Rāmānuja as this philosophy implies irreconcilable logical problems if one also accepts God omnipresence and omniscience – which is emphasized by the Vedic scriptures.

Outline of the philosophy

Vishishtadvaitam solves the philosophical problem with the argument that God has modifications. These modifications are matter and spiritual entities, i.e the individual souls. Modification is meant in a grammatical sense. In Sanskrit, the standard language for philosophical research and debate in India for millennia, words are constructed from a root that is modified. With these modifications, a single root can create a vast number of different words and meanings. In the same way, God is the root and with modifications, he constitutes the vastness and diversity of the world as we perceive it.

The problem with this analogy from Sanskrit grammar is that, even though it is the most perfect, it is not entirely accessible to the common man of modern days. A modern but less perfect analogy is that of a computer: A computer can run a near infinite variety of computer programs. While each program seems distinct and can create certain pictures and sounds on the machine, all programs have a common base, which is the operating system in combination with the physical machine. So our relation to God is roughly comparable to the relation a computer program has to the operating system plus physical machine. We are in a certain sense distinct from God, as a computer program is distinct from the operating system and the machine, but in another sense also not distinct and totally dependent on God, as a computer program can only exist and function if operating system and machine are present. This analogy even helps to understand the role of an Āchārya. The operating system and the components of the machine offer various tools and interfaces to access its possibilities. Similarly, God’s grace and power can be accessed trough an Āchārya.

The philosophy of Vishishtadvaitam is thus perfectly able to reconcile the conflict between the two testimonies we mentioned in the beginning. Rāmānuja explained that the relation of the soul (jīvāthmā) to God is similar to the relation our body has to the jīvāthmā. So the innermost core of our jīvāthmā, our existence, is none other than God, which can produce the mystical experience of oneness. On the other hand, a jīvāthmā has “layers”, which are modifications and thus distinct from God.

The totality of existence that is unfolded by this is structured into three ontological categories (the three reals):

  • Chit – conscious entities, i.e. the jīvāthmās.
  • Achit – unconscious entities, i.e. the material of which the physical world is made of.
  • Īśvara, God – the owner and controller of Chit an Achit

Our Āchāryas have spend quite a bit of effort to analyze the relation between these entities, as this is the very basis for all practical applications of our philosophy.

So Vishishtadvaitam is philosophically sound, absolutely consistent with both the testimony of the Veda and of mystics from within and outside our religion and is applicable in daily life. We are eternally indebted to the unbroken line of our Āchāryas who formulated, refined and preserved this treasure of knowledge and insight for more than thousand years.

Further Reading:

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

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This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

Many spiritual teachers and groups active around the world put a lot of emphasis on meditation. In many Buddhist traditions, meditation is even at the very core. The Hare Krishna movement requires its devotees to chant the Hare Krishna mantra 16 x 108 times each day as a meditation.

In contrast, our tradition puts a lot of emphasis on the worship of deities, both at home and in the temple, and engaging in services in association with devotees.

Deity worship

Deity worship is probably the most misunderstood practice of Santana Dharma (Hinduism). People from Judeo-Christian-Muslim religions reject this practice as idol worship. Atheistic intellectuals view our deities generally as images of human subconsciousness processes and structures.

Both views are equally mistaken. The general notion of idol worship is that the idol worshipper is declaring some material object as God and worships it. If this would be the case, we would reject it too! In actuality, the best analogy of a deity in Santana Dharma is probably that of a portal.

By simple logic we can see that God, the source of the totality of existence, must be at least as complex as the latter. No means, neither words nor images nor sculptures can describe God fully. Because of this, our Āchāryas argue, God makes himself available in specific ways to us, the deity being one of them. Each way appears to be a subset, giving us a specific aspect of God. Yet, as an arbitrary subset of a full infinity (like the realm of real numbers in Mathematics) is still infinite, God can be experienced fully through each specific way.

The deities we worship are by no means arbitrary creations of the human mind, merely showing us our subconsciousness. Their geometry, ornaments, positions of arms, legs, their material and many other things are predefined in the revealed scriptures and relate in complex ways to the geometry and shape of temples they are installed in, as well as position and context of the whole divine place in the landscape. If a deity is installed with the proper mantras and rituals and worshipped in proper ways, it is akin to a vortex or portal, where the omnipresent God makes himself especially available to his devotees.

A more simple kind of deity worshipped at many Śrī Vaiṣṇavas homes are Salagrams. At the surface, these are fossils / fossilized stones found in a very specific region in Nepal. Esoterically, these are self manifested aniconic representations of God, as they naturally posses the symbols of God (conch, chakra etc). Because of this, Salagrams do not need an installation with mantras and rituals, they are worshipped as deities right away. Depending on their physical features, they are linked to a specific aspect of God.

Our tradition emphasizes emphatically that the process of worship must not be a mere formal process, a ritual. Rather, it is a meditation in action where the worshipper recites and acts with absolute focus and dedication knowing that he is in direct contact with God.

Divine literature

Another important practice is the learning and recitation of the divine literature of the Āḻvārs and hymns composed by our Āchāryas. Such literatures should be recited in the language the composition was made (Sanskrit or Tamil), having in mind the deep esoteric meanings of the literature. These meanings are taught in confidential lectures of the Āchāryas, whose attendance / study is yet another important aspect of our practice. Closely related to this is the service to and great reverence for our Āchāryas. Āchāryas are honored even more than one’s own parents, as the grace and knowledge channeled trough them is of immeasurable value to us.

Sanctified food

An activity which is inseparably linked to our worship of deities is the preparation of pure lacto vegetarian food which is offered to the deity in the process of worship. After offering, this food has become what is called Prasadam in Sanskrit, which literally means grace or mercy. Śrī Vaiṣṇavas seek to consume only Prasadam. Traditionally, Śrī Vaiṣṇavas also keep orchards, where flowers to prepare garlands and other flower offerings are grown.

Association with other devotees

As other Vaiṣṇava traditions, our tradition puts great emphasis on “Sādhu Sanga”, the association with saintly persons / devotees from the tradition. In practise, there are two services performed by Śrī Vaiṣṇavas which are usually done in Sangam, i.e. in association with others:

  • The learning and recitiation of the aforementioned divine literature of the Āḻvārs, which is done in temples on a daily basis by groups of Śrī Vaiṣṇavas. Also, the hymns of the Āchāryas are learned and recited together.
  • Performing physical services in the temple, in processions and the like.

So we see that the path of Śrī Vaiṣṇavam is a very active one. It involves activities from growing flowers to learning confidential esoteric knowledge. All these activities are seen as complementing parts in the practice of a Śrī Vaiṣṇavam. Thus, Śrī Vaiṣṇavam is a holistic path that involves a gradual purification and God-centering of all aspects of the seeker’s life and activities.

Based on the long history of our tradition, it is not surprising that there have been many different moods behind the activities in our tradition. Here is some further reading on exalted personalities and their “anubhavam”, which means means “experience of” or “appearance” – http://ponnadi.blogspot.de/p/archavathara-anubhavam.html .

Further Reading:

On divya prabandhams, the divine literature of the Āḻvārs:
http://divyaprabandham.koyil.org

Recordings of divya prabandham classes:
http://pillai.koyil.org/index.php/2017/06/dhivya-prabandham-santhai-recordings/

A brief but very deep and beautiful hymn of Yāmunāchārya, a very important Āchārya
http://divyaprabandham.koyil.org/index.php/2015/12/chathu-sloki/

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

archived in http://pillai.koyil.org

pramēyam (goal) – http://koyil.org/
pramāṇam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
pramāthā (preceptors) – http://acharyas.koyil.org
ŚrīVaiṣṇava education/kids portal – http://pillai.koyil.org

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers – Our Tradition

Śrīḥ  Śrīmathē Śatakōpāya namaḥ  Śrīmathē Rāmānujāya namaḥ  Śrīmath Varavaramunayē namaḥ

ŚrīVaiṣṇavam for Newcomers

This article is part of the newcomer series, a set of brief articles which give an outline of our sampradaya for people with no previous exposure to our tradition.

The ŚrīVaiṣṇava Sampradaya (spiritual tradition) exists since time immemorial. The “recent” history of our tradition begins with the Āḻvārs (a Tamil term, which means somebody deeply immersed in God-Love). Āḻvārs started to appear roughly 5000 years ago.

The Āḻvārs composed divine literature which contains the knowledge of the Veda, but in a more condensed and accessible form. However, this divine literature was nearly lost in the first centuries C.E.. Nāthamuni, the first of our early Āchāryas (teachers) heard a single verse from the Āḻvārs’ literature, pretty much all that was left at his time, and was so enchanted by it that he took a lot of hardship to regain the rest of this literature.

Nāthamuni and the Āchāryas after him were teaching the divine literature of the Āḻvārs and highlights from the huge canon of Vedic literature side by side. The line of our early Āchāryas was crowned by the appearance of Rāmānuja in the 11thcentury CE, who holds a pivotal role in our tradition.

Rāmānuja and his successors spread the tradition over the whole Indian subcontinent. However, a few centuries after Rāmānuja, in the early 14thcentury CE, Muslim invaders reached even the strongholds of our tradition in South India and occupied Śrīrangam, the main temple of our tradition. Numerous ŚrīVaiṣṇavas lost their life and the huge treasure of scriptures and commentary works were partly destroyed and partly scattered in attempts to rescue these invaluable works.

In the 15thcentury, Muslims were driven out of Śrīrangam and our tradition had to recover from the destruction. The Āchārya Manavāḷa Māmunigaḷ holds a central role in this process, as he collected and personally copied texts from the tradition wherever he found them. Manavāḷa Māmunigaḷ’s behavior and practices are well documented and serve as ideal example for the conduct of a Śrī Vaiṣṇava to this very day. Manavāḷa Māmunigaḷ had eight disciples who successfully completed the return of our tradition to its old glories.

Today, nearly every major town in India holds at least one Śrī Vaiṣṇava temple, their total number accounts to more than hundred. There are numerous Āchāryas initiating into the tradition all over India. Two temples, the Śrīrangam temple and the Thirumala Veṅkaṭēśvara temple are major pilgrimage sites which sometimes attract more than a million visitors in a single month.

There are also ŚrīVaiṣṇava temples and many religious activities going on in the US and Australia. In Europe, the UK has a number of very active ŚrīVaiṣṇavas and hosted the first Śrī Yāgam ever conducted in Europe in 2017. A Śrī Yāgam is a sophisticated Vedic ritual dedicated to divine mother Lakṣmi (name giveing to our tradition, as Śrī is the short name for Lakṣmi). In Germany, a group of Śrī Vaiṣṇavas is active in the Munich area and conducts events on a regular basis.

Further Reading:

Adiyen Mādhava Rāmānuja Dasan

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pramāṇam (scriptures) – http://granthams.koyil.org
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ŚrīVaiṣṇava education/kids portal – http://pillai.koyil.org