श्रीवैष्णव – बालपाठ – आळवन्दार् के शिष्य – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाय नमः  श्रीमते रामानुजाय नमः  श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

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जय श्रीमन्नारायण ।
आळ्वार एम्पेरुमानार् जीयर् तिरुवडिगळे शरणं ।

tirukkachinambi

गोश्टि पूर्ण और् कान्ची पूर्ण

पराशर और व्यास आण्डाल दादी के घर में प्रवेश करते हैं ! वह अपने मित्र वेदवल्ली, अत्तुज़्हाय् और् श्रीवत्सांगन्. के साथ जाते हैं !

दादी (मुस्कराते हुए ) : आओ बच्चों | व्यास, आप तो सभी मित्रों को साथ लेकर आये हो जैसा मैंने कल कहा था |

व्यास : जी दादी, पराशर और मैं स्वामी रामानुज जी और उनके आचार्य की कहानी बता रहे थे श्रीवत्सांगन्. को और वह चाहता था की आज इसको आपसे सुने !!

दादी : यह तो बहुत बढ़िया है | आईए , बैठे | आज में आपको तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) और् तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में बताउंगी,  इन दोनों महान आचार्यो का हमारे सम्प्रदाय में बहुत विशेष स्थान है |

श्रीवत्सांगन् : दादी, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी का जनम चेन्नई के पास पूविरुन्तवल्लि में वहां हुआ था जो श्रीपेरुम्बूतूर् जाने के रास्ते में आता है| हम उस मंदिर में पिछले साल गर्मी की छुटियों में गए थे |

दादी : बहुत अद्धभुत | यह ठीक है | तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) श्री देव पेरुमाळ को पंखा करने की सेवा से जाने गए है और उसी कारण प्रसिद्ध भी हुए है । इसके अतिरिक्त वे भगवान श्री देव पेरुमाळ और स्वयं के बीच मे आम तौर पर होने वाले वार्तालाप से भी प्रसिद्ध हैं | जब रामानुज स्वामी जी कांचीपुरम आये, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) प्रथम आचार्य थे जिनकी शरण में रामानुज स्वामी जी आये और उन्होंने ही रामानुज स्वामीजी को भगवान् जी के प्रथम कैङ्कर्य करने के लिए निर्देशत किया |

व्यास : दादी जी रामानुज स्वामी जी ने क्या कैङ्कर्य किये ?

दादी : श्री इळयाळ्वार तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) पास पहुँचे और उनके मार्गदर्शन के लिये निवेदन किया । नम्बि जी इळयाळ्वार को तिरुमंजन तीर्थ कैंकर्य सौंपते हैं ( निकट मे स्थित कुँए से लाया जाने वाला पानी जो भगवान के स्नान के लिये उपयोग किया जाता था ) । इळयाळ्वार खुशी खुशी स्वीकर किये और यह कैंकर्य वह प्रतिदिन करने लगे । शास्त्रों और भगवान के प्रति उनके प्यार के प्रति उनका ज्ञान उत्कृष्टता थी। तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के प्रति अत्यधिक आकर्शित होकर श्री इळयाळ्वार उनके चरण कमलों का आश्रय लेते हुए उनसे विनती करते हैं कि वो उन्हे पंञ्चसंस्कार दे और उन्हे शिष्य के रूप मे स्वीकार करे ।

पराशर : लेकिन दादी, क्या आपने नहीं कहा था की पेरिया नम्बि स्वामीजी ने रामानुज स्वामीजी का मधुरान्तकं में पञ्च संस्कार किया था ?

दादी : हाँ पराशर | मुझे प्रसन्नता है की तुम्हे सब याद है |परन्तु वेदों और शास्त्रों का निरूपण देते हुए कहते हैं कि वह कदाचित भी उन्हे पंञ्चसंस्कार दे नही सकते और उसके वो काबिल नही क्योंकि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) अब्राह्मण वर्ण के थे जिसके कारण वे नियमानुसार दीक्षाचार्य नही हो सकते (परन्तु वो श्री इळयाळ्वार को शिक्षा गुरु के तौर से उपदेश देने के सक्षम हैं और यहि कायम रखेंगे) । यह जानकर इळयाळ्वार बहुत निरुत्साहित हुए परन्तु वेदों और शास्त्रों मे दृध विश्वास होने की वजह से, तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के निश्चित निर्णय को पूर्ण तरह से स्वीकार किये । तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी रामानुज स्वामीजी की हमारे सम्प्रदाय के प्रति शंकाओं और प्रशनो का निवारण करते है | यह एक बहुत रोचक कहानी है की कैसे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) जी भगवान् जी के साथ वार्तालाप करते है जिससे रामानुज स्वामीजी की शंकाओं का समाधान हो सके |

वेधावल्ली : क्या शंकायें थी दादी ? भगवान् जी ने क्या कहा ?

दादी : एक बार रामानुज स्वामी जी के दिमाग में कुछ भ्रम और संदेह हो गया । वह जानते थे कि तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) भगवान् पेरुमल से बातचीत करते है, उन्होंने एक बार फिर तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के मार्गदर्शन का अनुरोध किया। नम्बि भगवान के पास जाते है और सामान्य रूप से अपना कैंकर्य करते है और रामानुज स्वामी जी के अनुरोध को खोलने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करते है। भगवान नम्बि की हिचकिचाहट के बारे में पूछताछ करते है | नम्बि देव पेरुमाळ से वारतालाप के विषय मे अत्यधिक प्रसिद्ध माने गये हैं। इळयाळ्वार को विलंब करने वाले कुछ संदेहों का समाधान हेतु वे तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) के पास गए और विनम्रतापूर्वक इन संदेशों का प्रस्ताव किया और पूछे की वे ( तिरुक्कच्चि नम्बि ) इन संदेहों का समाधानों प्राप्त करे और उन्हे बताये । श्री रामानुजाचार्य जो साक्षात आदि शेष के अवतार हैं, हमारे पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर हमे यह जानना चाहिये कि श्री रामानुजाचार्य केवल नटन यानि अपने पात्र को भलि–भांति निभा रहे थे और वह इन संदेहों का समाधान भी जानते थे परन्तु प्रमाणों को भगवान और पूर्वाचार्यों के श्रीसूक्तियों के आधार पर प्रमाणित करना चाहते थे । उस रात , अपना कैंकर्य समाप्त कर श्री नम्बि भगवान को अती प्रेम से देखने लगे ।

सर्वज्ञ देव पेरुमाळ ने उनसे पूछा – नम्बि , क्या तुम मुझसे कुछ पूछना चाहते हो ? नम्बि थोडी देर सोचकर भगवान के समक्ष इळयाळ्वार के मन की मनोवेदना को व्यक्त किये और कहे – अब आप ही इन संदेहो का समाधान दीजिए । यह सुनकर भगवान ने कहा – जिस प्रकार मैने अपने श्री कृष्णावतार मे सान्दीपणि मुनि से शास्त्र सीखा, इळयाळ्वार ( जो अनन्त शेष के अवतार है , सर्वज्ञ है ) वो मुझसे इन संदेहों का समाधान पूछ रहे हैं। उसके पश्चात , भगवान ने स्वयम छे उपदेशों को नम्बि के सामने प्रस्तुत किया जो मेरे छे ईश्वरीय आदेश के नाम से प्रसिद्ध है वही भगवद्बन्धुवों के लिए प्रस्तुत है –

1) अहमेव परम तत्वम् – मै ( देव पेरुमाळ ) ही सर्वोच्छ (महान, श्रेष्ठ) हूँ

2) दर्शनम् भेदमेव – जिवात्मा और अचेतनम् ( अचेत ) मुझसे (मेरे दिव्य शरीर से) विभिन्न है

3) उपायम् प्रपत्ति – “मुझे ही अन्तिम शरण ( उपाय ) के रूप मे स्वीकर करना ” यानि केवल भगवान का शरण ही उपाय है और उससे ही भगवान की प्राप्ति हो सकती है

4) अन्तिम स्मृति वर्जनं – प्रपन्न भक्तों के लिये अन्तिम स्मरण ज़रूरी नही है क्योंकि श्री वराह भगवान ने वराह चरम श्लोक मे कहा है कि – भगवान स्वयम प्रप्पन्न भक्तों के अन्तिम काल मे उनका स्मरण करेंगे । आम तौर पर हमारे आचार्यों ने दर्शाया है की हमे अपने अन्तिम काल मे अपने आचार्य पर ध्यानकेन्द्रित करना चाहिये ।

5) देहवासने मुक्ति – भगवान ने कहा है – प्रपन्न भक्त उनके अन्त काल के बाद ( भौतिक शरीर का त्याग करना ) निश्चितरूप से परमपद की प्राप्ति होगी और उनको मोक्ष इस प्रकार से मिलेगा और वह भगवद्–भागवदकैंकर्य मे संलग्न होंगे ।

6) पूर्णाचार्य पदाश्रित – पेरियनम्बि (महापूर्ण) को अपना आचार्य मानो और उनका शरण लो

तिरुक्कच्चि नम्बि इळयाळ्वार के पास जाकर स्वयम भगवान के छे आदेशों ( जो इळयाळ्वर के संदेशों के समाधान ) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करते हैं। इळयाळ्वर यह सुनकर बहुत खुश होते हैं और इस अनुग्रह (सहायता) के लिये उनकी प्रशंसा और अभिवादन करते हैं। यह बताने के बाद नम्बि इळयाळ्वर से पूछते हैं – क्या वे भी यही सोच रहे थे .. इसके जवाब मे रामानुजाचार्य कहे – जी हा स्वामि , मै भी यही सोच रहा था .. तिरुक्कच्चि नम्बि को तब एहसास हुआ की भगवान और श्री रामानुजाचार्य का तिरुवुळ्ळम् (मनोभावना) एक ही है यह जानकर वे अती प्रसन्न हुए । अब यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि रामानुज को शम शर्यणम के लिए पेरिया नंबी से संपर्क करना चाहिए, वह तिरुक्कच्चि नम्बि के आशीर्वाद लेते हैं और पेरिया नम्बि से मिलने के लिए श्री रंगम को छोड़ देते हैं और हम सभी बाकी की कहानी जानते हैं, बच्चे क्या यह नहीं हैं?

व्यास : हाँ दादी, हमें याद है |

दादी : श्रीवैष्णवों के महत्वपूर्ण गुणों में से एक गुण विनम्रता है , जिसे नेच्या भावम कहते है या हमारे सम्प्रदाय में दूसरे श्री वैष्णवों की उपस्थिति में अपने आपको विनम्र समझना | पेरिया नम्बि नम्रता का एक जीवंत उदाहरण थे जो वास्तव में उनके दिल से आई थी और केवल उनके मुंह से शब्द नहीं थे। पेरिया नम्बि बहुत नम्र थे और हमेशा महान सम्मान के साथ अन्य श्रीविष्णवों का इलाज करते थे। एक बहुत ही रोचक घटना हुई जो यह साबित करती है। मारनेरि नम्बि आळवन्दार् के प्रिय शिष्य थे । चौथे वर्ण में पैदा हुए स्वामि, पेरिया पेरुमाळ और उनके आचार्य आळवन्दार् के प्रति लगाव के कारण श्री रंगम् में जाने जाते थे । एक बार एक महान आचार्य मारनेरी नम्बि चाहते थे कि उनके अंतिम संस्कार श्रीवैष्णव द्वारा किया जाए और पेरिया नंबी से उनकी देखभाल करने का अनुरोध किया जाए। पेरिया नंबी खुशी से इस बात से सहमत थे और शहर में स्थानीय लोगों के क्रोध का सामना करने वाले व्यक्ति के अंतिम संस्कार करने के लिए जाति के द्वारा पेरिया नंबी से कम है और इस प्रकार शास्त्र के खिलाफ जा रहे है। जब पूछा गया , पेरिया नम्बि स्वामीजी कहते है की वह तो सिर्फ श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी ने उन्हें सिखाया है जो कहते है की भागवत कैंकर्यं बहुत ही शुद्ध और महत्वपूर्ण कैंकर्यं है | एक भागवत को उनकी जाती या जन्म देखे बिना उन सभी को एक समान कैंकर्यं करना चाहिए | नाच्य भाव सैद्धांतिक नहीं था लेकिन पेरिया नम्बि द्वारा अभ्यास में डाल दिया गया था। वह वास्तव में विश्वास करते थे कि सभी श्री वैष्णव भगवान के लिए प्रिय हैं और सम्मानित होना चाहिए। उन्होंने यह भी माना कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सम्राट के एक सच्चे भक्त अपने आखिरी पलों को कैसे बिताते हैं, सम्राट उन्हें श्री वैकुंठम में कन्यार्यम का अनन्त आनंद देता है, जैसा कि भगवान पेरुमल द्वारा तिरुक्कच्चि नम्बि को आश्वासन दिए थे । वह एक महान आचार्य थे जो अपने आचार्य, अलवंधर और श्री शटकोप (नम्माज़्ह्वार्) स्वामीजी की शिक्षाओं के दौरान अपने जीवन भर में रहते थे। क्या यह आज के लिए पर्याप्त है या आप तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) के बारे में भी सुनना चाहते हो?

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वेदवल्ली : क्या आप के पास उनके बारे में भी कहानी है ?

दादी : हाँ, बहुत |

अत्तुज़्हाय् : फिर हमें तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामीजी के बारे में बताइये |

दादी :आळवन्दार (यामुनाचार्य स्वामीजी) ने अपने पांच प्रमुख शिष्यों को रामानुज को संप्रदाय के विभिन्न सिद्धांतों के अध्यापन का निर्देश दिया था। इनमें से तिरुक्कोष्टियूर नम्बी को रहस्य त्रय – तिरुमंत्र , द्वय मंत्र और चरम श्लोक सिखाने का उत्तरदायित्व दिया गया था।

व्यास : ॐ नमो नारायणाय मंत्र को तिरुमंत्र कहते है |

श्रीवत्सांगन् : सर्व धर्मं परित्यज्य मामेकं शरणमं व्रजा; अहम् तवा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि माँ सुचा: इसको चरम श्लोक कहते है |

दादी : बहुत अद्भुत | अब यह तीन श्लोक का बहुत गहरा और गंभीर अर्थ है जो की किसी आचार्य के द्वारा ही सीखा जा सकता है |

वेधावल्ली : लेकिन दादी, हमें इन श्लोको का अर्थ जानना है |

दादी: हाँ, हम सभी इन तीन श्लोक का अर्थ जानते है लेकिन हमारे सम्प्रदाय में यह हर एक मंत्र बहुत प्रभावशाली है जो की एक आचार्य के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के बिना पूरी तरह से इसे जानने की क्षमता से परे है। यही कारण है कि तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) को रामानुज को इन छंदों के अर्थों को पढ़ाने का महत्वपूर्ण कार्य दिया गया था |

अत्तुज़्हाय् : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामी जी को १८ बार तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी के पास जाना पड़ा थिरुमन्त्रम सीखने के लिए | क्या यह सत्य है ? उनको इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ा ?

दादी : हाँ, यह सब सत्य है | इसे हमारे संप्रदायम के बारे में सीखने में रामानुज भागीदारी और ईमानदारी का परीक्षण करने के लिए तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) द्वारा उपयोग किए जाने वाले तरीके के रूप में लिया जा सकता है और इसे रामानुज स्वामी की दृढ़ता और धैर्य की गवाही के रूप में भी लिया जा सकता है।

व्यास : दादी, तिरुक्कोष्टियुर नम्बी (गोष्ठीपूर्ण स्वामीजी) स्वामी जी दिखने में बहुत सख्त थे | वह रामानुज स्वामी जी के प्रति उद्धार हो सकते थे |

दादी : यह तो सभी को सीखने के बाद इस घटना के बारे में बहुत गलत धारणा है | यह सही नहीं है | उनके मन में सदैव रामानुज स्वामी जी क्या कल्याण करने का मन करता था और ऐसे तो वह बाहर से बहुत सख्त थे | एक अच्छे पिता का कर्तव्य होता है की बेटे के साथ सख्त रहे और अपने बेटे के लिए किसी भी प्रकार के बलिदान के लिए तैयार रहे |याद है , कल जब हम तिरुमलै अण्डाण जी के बारे में बात कर रहे थे , मैंने कहा था की अण्डाण और रामानुज स्वामीजी के विचारो में कुछ मतभेद था | यह तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ही थे जिन्होंने मध्यस्था करके दोनों में विरोध खत्म किया सिर्फ रामानुज स्वामीजी के लिए | जहाँ तक की वह रामानुज स्वामीजी का श्री वैष्णवों के प्रति अनुराग देखकर बहुत प्रभाबित हुए की उन्होंने रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमणार नाम से सम्बोधित किया (मन्नाथ ) | इस तरह से रामानुज स्वामीजी को एम्पेरुमानार सुन्दर नाम मिला | जब रामानुज स्वामीजी श्री रंगम में उनके दुश्मनो ने जहर देकर मारने की कोशिश की, तब तिरुक्कोष्टियुर नम्बी स्वामीजी ने समय पर आकर किदाम्बी अचान को रामानुज स्वामीजी के लिए खाना बनाने के लिए नियुक्त किये ताकि रामानुज स्वामीजी सुरक्षित रह सके | तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी एक पिता की तरह सदैव रामानुज स्वामीजी के कल्याण करने के बारे में सोचते रहते | यहाँ और भी बहुत सी कहानियां उनके महानता के बारे में की वह उनसे पिता की तरह अनुराग रखते थे, ज्ञान के सागर एवं उनका उनके आचार्य आलवन्दार स्वामीजी के प्रति श्रद्धा| मे चाहती हूँ की आपको कहानियां सुनाती जाऊ और मुझे विश्वास है की आप भी सुनना पसंद करोगे लेकिन क्या आप नहीं सोचेंगे की आपके माता पिता चिंतत होंगे आप सभी देरी से हो | अब आप यह फल लो और घर जाईये | अगली बार में आपको और बहुत सारी कहानियां बताउंगी अपने आचार्य के बारे में |

बच्चो ने फल फूल लिए, और तिरुक्कच्चि नम्बि (कान्ची पूर्ण) स्वामीजी, पेरिया नम्बि स्वामीजी और तिरुक्कोश्टियूर् नम्बि (गोश्टि पूर्ण) स्वामीजी के बारे में सोचने लगे |

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

आधार – http://pillai.koyil.org/index.php/2016/08/beginners-guide-alavandhars-sishyas-2/

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