श्रीवैष्णव – बालपाठ – श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 2

श्री: श्रीमते शठकोपाये नमः श्रीमते रामानुजाये नमः श्रीमद्वरवरमुनये नमः

बालपाठ

<<श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी – भाग 1

पराशर, व्यास, वेदवल्ली और अथुलाय के साथ अंडाल दादी के घर में प्रवेश करते है |

पराशर : दादी, कल आपने हमसे कहा था की आप हमें रामानुज स्वामीजी और उनके शिष्यों के बारे में बताएंगी|

दादी : हाँ | रामानुज स्वामीजी के शिष्यों के बारे में बताने से पहले, हमें रामानुज स्वामीजी एक विशेष जानकारी होनी चाहिए | वह यह है की उनके अवतरण लेने से पहले ही श्री शठकोप स्वामी जी ने मधुरकवि आलवार स्वामीजी और नाथमुनि स्वामीजी को ५००० वर्ष पहले ही बता दिए थे | एक बहुत ही श्रेष्ट ग्रन्थ है चरमोपाय निर्णयम, जिसमे रामानुज स्वामीजी के वैभव के बारे में बताते है – इस ग्रन्थ में नम्माळ्वार स्वामीजी का नाथमुनि स्वामीजी के साथ वार्तालाप और रामानुज स्वामीजी का अवतार प्रकटीकरण पर बताते है | जो दिव्या विग्रह नम्माळ्वार स्वामीजी ने मधुरकवि आळ्वार स्वामीजी को अर्चन करने के लिए दिया था आज भी अलवारतिरुनगरी में भविष्यदाचार्य की दिव्य मूर्ति को संरक्षित उसका अर्चन आज भी सन्निधि में होता है |

रामानुज स्वामि – अलवारतिरुनगरी

व्यास: उत्कृष्ट | इसीलिए अलवार स्वामी जी और कुछ आचार्य जी रामानुज स्वामीजी के अवतार के बारे में पहले से जानते थे | यह तो बहुत उत्तम है दादी जी | दादी जी आप उनके जीवन के बारे प्रकाश जारी रखे |

दादी : हाँ, रामानुज स्वामीजी ने समस्त भारत का भ्रमण करते हुए श्री वैष्णव धर्म का प्रचार किए | चाहे उनको संघर्ष न करना पड़ा हो, लेकिन कोई न कोई विरोध किसी न किसी तरफ से अवश्य हुआ | रामानुज स्वामीजी ने सर्वजन का ह्रदय अपने ज्ञान और वात्सल्य से जीता | जब स्वामीजी कांचीपुरम में थे, उनका पाणिग्रहण थन्जाम्मा जी से हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने भगवान वरदराज की कृपा से सन्यास धारण किये | जब रामानुज स्वामीजी ने सन्यास धारण किया, तो उन्होंने अपनी सर्व निजी संपत्ति को त्याग दिया एक सिर्फ अपने भतीजे मुधलियांदान को छोड़ कर |

व्यास : दादी, उन्होंने विवाह क्यों किया और फिर सन्यास धारण कर लिए? उन्होंने गृहस्थ आश्रम क्यों नहीं स्वीकार किया और सर्व कैंकर्य उन्होंने क्यों नहीं किये ?

दादी : व्यास, इसके कई कारण है | एक, उनके अपनी पत्नी के बारे में कुछ विचारो को लेकर भेद था और दूसरा, आपको तत्पर रहना चाहिए बड़े मनोरथ को लेकर कुछ भी त्याग करने के लिए | जैसे हम सब जानते है की उनके कंधो पर दायित्व था सम्पूर्ण भारत वर्ष में श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का प्रचार कर सके | जैसे की हमारे देश के सिपाही हमारे देश की रक्षा करते है, अपने परिवार और सम्बन्धी जन को छोड़ कर क्यूंकि उनके ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है | अपने देश का रक्षण करना एक महान कार्य है | इसी तरह रामानुज स्वामीजी के मन में भी विशेष विचार था | उनको ज्ञात था की उनका उद्देश्य वेदो का सार प्रकाशित करने में है | इसीलिए उन्होंने सन्यास आश्रम धारण किये | एक महान सन्यासी बनने के बाद, मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी) और कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे महान विद्वान रामानुज स्वामीजी के शिष्य बने |

अथुलाय : क्या इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी लेना बोझ नहीं है? रामानुज स्वामी जी ने यह सब अकेले कैसे किया होगा ?

दादी : नहीं अथुलाय | यह कभी भी एक बोझ नहीं था | जब आप अपने कर्म को भावुकता से करते है तो आपको कभी यह बोझ नहीं लगेगा | इसके अतिरिक्त रामानुज स्वामीजी कभी भी एकमात्र नहीं थे | स्वामीजी हमेशा अपने मुख्य शिष्य जैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी),मुदलियान्डान् (श्री दाशरथि स्वामीजी),एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी),अनन्ताळ्वान् (श्री अनन्ताचार्य स्वामीजी),किडाम्बि आच्चान् (श्री प्रणतार्तिहर स्वामीजी),वडुग नम्बि (श्री आंध्रपूर्ण स्वामीजी),पिळ्ळै उऱन्गाविल्लिदासर् (श्री धनुर्दास स्वामीजी) जिन्होंने दिन रात स्वामीजी के सेवा करते है | उनके सभी शिष्य उनकी जीवन यात्रा में सदैव उनके साथ रहे | रामानुज स्वामीजी की जीवन यात्रा में उनको नुक्सान पहुंचाकर जहाँ तक की उनके प्राण तक लेने का बहुत बार प्रयत्न किया गया | ऐसे समय में एम्बार् (श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी) एवं कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जैसे शिष्यों ने अपने प्राण खतरे में डाल कर स्वामीजी के प्राणो का रक्षण किये | आप सब को जानकारी होगी की कैसे कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) एवं पेरिया नम्बि स्वामीजी शैव राजा के दरबार में चले गए और अपनी आँखे खो दी ? ऐसे महान शिष्यों उनके साथ रहते थे , रामानुज स्वामीजी ने बहुत निष्ठा पूर्वक सभी मंदिरो का प्रशासन को ठीक ढंग से चलने के लिए नियम रूपांतर किये |

रामानुज स्वामी – श्रीरंगम

वेदवल्ली : हाँ दादी जी , मैंने सुना है सभी मंदिरो की नियमावली और उत्सव जैसे श्रीरंगम मंदिर में और तिरुपति मंदिर में रामानुज स्वामीजी की द्वारा स्थापित किये गए | क्या आप हमें इसके बारे में विस्तार से बता सकते है ?

दादी : बिलकुल ठीक है वेदवल्ली | उन्होंने रीति-रिवाज को फिर से आगे बढ़ाया जैसा की वेदो में कहा गया है | उन्होंने देखा की सभी रीति-रिवाज इस तरह से पालन किये जाते है जैसे उन्होंने बताया और बहुत ध्यान पूर्वक उनका स्थापन किया| श्रीरंगम मंदिर पेरिया कोयिल नंबी द्वारा संरक्षित किया गया था। जैसा कि मैंने पहले कहा था, रामानुज स्वामीजी को मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन करने के लिए पेरिया कोयिल नंबी की तत्काल मंजूरी नहीं मिली थी। रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) को पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी के पास भेजा ताकि कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी को श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के मूल तत्व और मंदिर प्रशासन में आवश्यक परिवर्तन के लिए शिक्षित कर सके | कूरत्ताळ्वान् स्वामीजी के समझाने के बाद पेरिया कोयिल नम्बि स्वामीजी ने परिवर्तन स्वीकार करके रामानुज स्वामीजी की शरणागति की और बाद में तिरुवरन्गत्तु अमुदनार् (श्रीरंगामृत स्वामीजी) के नाम से सम्बोधित किये जाने लगे | बाद में श्रीरंगामृत स्वामीजी श्रीरामानुज स्वामीजी पर श्रीरामानुजनूत्तंदादि (१०८ पाशुर) लिखते हैं और उसे रंगनाथ भगवान और श्रीरामानुज स्वामीजी को अर्पण करते हैं। क्या आप जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित रामानुज स्वामीजी ही करते है और उस समय और भी मतावलम्बियों इस विष्णु भगवन जी अर्चा विग्रह को अपनी परिभाषा से सम्बोधित करते थे |

रामानुज स्वामी – तिरुमल

पराशर : क्या ? हम सभी जानते है तिरुवेन्गडमुडैयान और कोई नहीं स्वयं भगवान् श्री विष्णु जी ही है | उन सबको इस पर संशय कब हुआ ?

दादी : हाँ|अथुलाय | तिरुवेन्गडमुडैयान ही स्वमयं व्यक्त साक्षात् भगवान् विष्णु जी है | उस समय कुछ लोग ऐसे भी थे जो इसको अपने भगवान के नाम से कहते थे | कुछ पंडित जान कहते यह शिव है और कुछ विद्वान जन उनको कार्तिक स्वंय के नाम से कहते थे | एम्पेरुमानार तीर्थयात्रा पर निकलते है और अंत में तिरुमलै पहुँचते है, इतर मतावलम्बियों से विवाद में विजयी हो , तिरुवेन्गडमुडैयान को विष्णु स्वरूपमूर्ति घोषित करते है , स्वयं भगवान के आचार्य बन भगवान को शंख और चक्र धारण करवाते है । (तिरुमला में भगवद्रामानुजाचार्य ज्ञान मुद्रा से विराजमान होकर दर्शन देते है। ) इसीलिए तिरुपति में रामानुज स्वामीजी मंदिर प्रशासन स्थापित के अलावा और बहुत कुछ किया| उन्होंने तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् की पहचान की स्थापना की। तभी से तिरुवेन्गडमुडैयान भगवान् जी ने रामानुज स्वामीजी को आचार्य पद से उनका वैभव प्रकाशित किये | यह वही जगह है, जहां रामानुज स्वामी जी अपने मामा पेरिया थिरुमलाई नंबी स्वामीजी से रामायण का सार सीखते हैं। वह थिरुणारायण पुरम मंदिर के साथ अन्य प्रमुख मंदिरों में मंदिर कर्तव्यों को स्थापित करने के लिए आगे बढ़ते है |

रामानुज स्वामी – तिरुनारायणपुरं

अथुलाय : दादी, मैंने सुना है की उन दिनों जैन मतावलम्बियों ने रामानुज स्वामीजी के लिए समस्या खड़ी कर दी थी ?

व्यास : मैंने सुना है की थिरुनरायणा पुरम मंदिर के भगवान् जी का अर्चा विग्रह उस समय मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था |

दादी : यह सत्य है | रामानुज स्वामी जी को उन सुधारों के बारे में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जो वह मंदिरों और हमारे संप्रदायम के सुधार के लिए स्थापित करने के इच्छुक थे। हालांकि, परिवर्तन ऐसा कुछ था की ज्यादा तर विद्वान लोगो ने उन परिवर्तनों का स्वागत नहीं किया | सभी पुराने रीति-रिवाजों, चाहे वह सही हो या गलत में ही सुरक्षित महसूस करते थे और कभी भी बदलाव स्वीकार नहीं करते थे और न ही उस व्यक्ति को जो बहुत आवश्यक परिवर्तन लाने की कोशिश करता है। यह समाज का आम दृष्टिकोण है। आज का समय में भी, परिवर्तन मुश्किल है, इसलिए 1000 साल पहले कल्पना करें, जब रूढ़िवाद प्रथा और विश्वास इतने कठोर थे, रामानुज स्वामीजी को कोई सकारात्मक परिणाम लाने से पहले इतना प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जैन विद्वान हमारे विशिष्टाद्वैत सिद्धांत दर्शन के शाश्वत सत्य को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे। रामानुज स्वामीजी को 1000 जैन विद्वानों द्वारा 1000 प्रश्नों के उत्तर देने के लिए चुनौती दी गई थी। सहस्त्र फनो वाले आदि शेष भगवान् के रुप में रामानुज स्वामीजी अपना मूल रूप धारण करते है और सभी प्रश्नो का उत्तर देते है और एक साथ बहस जीतते हैं |

थिरुनरायण पुरम मंदिर के श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह मुस्लिम अक्रान्ताओ ने चुरा लिया था और यह विग्रह अक्रान्ताओ के राजा की पुत्री के महल के कक्ष में थी जो उस उत्सव विग्रह से खेलती और उससे अनुराग करती थी | जब रामानुज स्वामीजी श्री शेल्व पिल्लई स्वामीजी का उत्सव विग्रह को वापिस श्री मेलकोट मंदिर में ले जाने के लिए आये तब मुस्लिम राजा की पुत्री उस्तव विग्रह से अपना वियोग सहन न कर सकी |

अथुलाय : ठीक वैसे जैसे की अंडाल अम्मा जी ( श्री गोदम्बा माता जी ) भगवान् श्री कृष्ण जी से अपना वियोग सहन न कर सके |

दादी : हाँ जैसे अंडाल अम्मा जी जैसे | एम्पेरुमानार तिरुनरायणपुरम मंन्दिर के उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै को एक मुस्लिम राजा की बेटी से प्राप्त कर तिरुनारायणपुरम मे उनकी स्थापना करते है उत्सव पेरुमाळ सेल्वपिळ्ळै के प्रेम में मगन मुस्लिम राजकुमारी के उत्सव पेरुमाळ के पीछे तिरुनारायणपुरम आने के बाद सेल्वपिळ्ळै और मुस्लिम राजकुमारी का विवाह सम्पन्न करवाते है । यह भक्ति की पराकाष्ठा है और वह अपने परम प्रभु जी के प्रति प्रेम जो न जाती देखता है न पंथ (मज़हब) |

कूरत्ताळ्वान् – रामानुज स्वामी – मुदलियान्डान

व्यास : दादी, अपने हमें कभी यह नहीं बताया की रामानुज स्वामीजी ने आलवन्दार स्वामीजी के ३ मनोरथ कैसे पूर्ण किये |

दादी : कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) जी के दो पुत्र रतन हुए | रामानुज स्वामीजी ने दोनों का नाम व्यास और पराशर रख कर दो महान ऋषियों की महानता को स्वीकार करते हुए आलवन्दार स्वामी जी का पहला वचन पूरा करते है | श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी जिनको बाद में एम्बार् के नाम से जाने जाना लगा, एम्बार के भाई सिरियगोविन्दपेरुमाळ को एक पुत्र की प्राप्ति होती है और उसका नाम एम्पेरुमानार परांकुशनम्बि रखकर आळवन्दार के दूसरा वचन पूरा करते है । बाद में रामानुज स्वामीजी श्री भास्यम लिखकर आलवन्दार स्वामीजी का तीसरा वचन पूर्ण करते है | श्री भास्यम लिखने के लिए रामानुज स्वामीजी ने कूरत्ताळ्वान् (श्री कूरेश स्वामीजी) के साथ कश्मीर तक यात्रा की |

दादी : रामानुज स्वामीजी कश्मीर की यात्रा करते है जिससे उनको एक पुराणी लिखा ग्रन्थ जिसका नाम बोधायनवृत्ति था लेकर श्रीभाष्य ग्रन्थ लिख सके | राजा को प्रसन्न कर बोधायनवृत्ति ग्रन्थ प्राप्त कर, वापस श्रीरंगम की लिये प्रस्थान करते है, किसी आशंका के चलते कश्मीरी विद्वान अपने अनुचरों के सहायता से यह ग्रंथ रामानुज स्वामीजी से वापस ले लेते है ।

व्यास : कितना निर्दयी |

दादी : हाँ | बुरे लोगो द्वारा ग्रन्थ वापिस लेने से पहले कुरेशा स्वामी जी ने ग्रन्थ को इस तरह से कंठस्त कर लिया था की श्री भास्यम ग्रन्थ लिख सके |

व्यास : क्या पूरा ग्रन्थ कंठस्त कर लिया था ? यह कैसे संभव है दादी ? इच्छा है कि मैं भी अपनी पूरी विषय की पुस्तकों को याद कर सकता!

दादी ( मुस्कराते हुए ) : कुरेशा स्वामी जी रामानुज स्वामीजी के एक आम शिष्य नहीं थे | वह एक महान संपत्ति और रामानुज स्वामीजी के लिए एक आशीर्वाद थे | जब सभी जन अपने उद्धार के लिए रामानुज स्वामी जी की शरणागति ले रहे थे उस समय रामानुज स्वामीजी ने स्वंयम कहा की उनका उद्धार कुरेशा स्वामी जी से जुड़ने से हुआ है | इस तरह के एक महान विद्वान होने के बावजूद, कुरेश आलवार के शुद्ध दिल में अहंकार का एक भी हिस्सा नहीं था जिसमे रामानुज स्वामीजी निवास करते है। श्रीकूरत्ताळ्वान की सहायता से श्रीएम्पेरुमानार आळवन्दार को दिए हुए वचन ( श्री भाष्यं के ब्रह्मसूत्रों पर टिप्पणि) पूरी करते है । श्री रंगम में शैव राजा के देहांत के बाद रामानुज स्वामीजी श्री रंगम वापिस आ गए |

अंततः, वैकुण्ठ धाम पहुंचने से पहले और लीला विभूति को छोड़ने से पहले, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने किया था, रामानुज स्वामीजी ने निर्णय लिया की उनके जाने के बाद कौन आचार्य हमारे सम्प्रदाय का ध्यान रखेंगे, उन्होंने कुरेश स्वामीजी के यशस्वी पुत्र पराशर भट्टर को सम्प्रदाय का आचार्य घोषित किया | रामानुज स्वामीजी ने पराशर भट्टर और कुछ शिष्यों को निर्देशित किया की एम्बार (गोविन्दाचार्य स्वामीजी) की शरण में जाये और सम्प्रदाय सिधान्तो को सीखने के लिए उनका मार्ग दर्शन ले | उन्होंने शिष्यों को आज्ञा किये वह पराशर भट्टर स्वामीजी का भी वैसे ही आदर सम्मान करे जैसे वह एम्पेरुमानार का करते है | उन्होंने पराशर भट्टर स्वामीजी को भी आज्ञा किये की नन्जीयर स्वामीजी को सम्प्रदाय में ले आये, जैसे आलवन्दार स्वामीजी ने पेरिया नम्बि जी को दायित्व दिया था रामानुज स्वामीजी को सम्प्रदाय में लाने का | अपने आचार्य श्री चरणों का ध्यान करते हुए, पेरियनम्बि स्वामीजी और आलवन्दार स्वामीजी का , एम्पेरुमान स्वामीजी इस लीला विभूति को छोड़ते है ताकि स्वामीजी श्रीमन्न नारायण का कैंकर्य नित्य वैकुण्ठ धाम में कर सके | उसी समय रामानुज स्वामीजी से वियोग को न सहते हुए गोविन्दाचार्य स्वामीजी भी वैकुण्ठ धाम को चले जाते है |

पराशर : दादी, मैंने सुना है की रामानुज स्वामीजी का पार्थिव शरीर आज भी श्री रंगम मंदिर में संरक्षित किया हुआ है | क्या यह सत्य है ?

दादी : हाँ! पराशर, यह सत्य है और जब हम अपने महान आचार्यो के बारे में बात करते है, हमें उनके श्री शरीर का वैसे ही स्मरण करना है जैसे हम भगवान् जी के श्री दिव्या विग्रह का करते है | यह वास्तव में सच है कि रामानुज स्वामीजी की थिरुमेनी श्री रंगम मंदिर के अंदर संरक्षित है, जो कि रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के ठीक नीचे है। आज हम जो रामानुज स्वामीजी की सन्निधि के रूप में देखते हैं, वे एक समय श्रीरंगम में श्री रंगनाथन भगवान जी का वसंत मंडप था | अब हम भगवान श्री रामानुज स्वामीजी के श्री चरणों में और भगवान श्री रंगनाथ अब, हम सभी हमारे आचार्यों और उनकी महिमाओं के बारे में और जानने के लिए श्री रामानुज स्वामीजी और भगवान श्री रंगनाथ के श्री चरणों में प्रार्थना करते हैं। अब, आप सभी को छोड़ना चाहिए क्योंकि आपको देर हो रही है । अगली बार जब हम मिलेंगे, मैं आपको रामानुज स्वामीजी के विभिन्न शिष्यों के बारे में , उनकी महिमा और रामानुज स्वामीजी की विजय यात्रा में उनके योगदान के बारे में बताउंगी |

बच्चे रामानुज स्वामीजी के बारे में उनके विभिन्न कैंकर्य में आने वाली विभिन्न कठिनाइयों और कैसे हमारे संप्रदायम के महान आचार्य के रूप में उभरे, के बारे में सोचते हैं।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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