श्रीवैष्णव – बालपाठ – तिरुवाइमोळि पिळ्ळै (श्रीशैलेश स्वामीजी)

श्रीः
श्रीमते शठकोपाय नमः
श्रीमते रामानुजाय नमः
श्रीमद्वरवरमुनये नमः
श्री वानाचलमहामुनये नमः

बालपाठ

पिछ्ला

आण्डाल दादी जी रसोई घर में खाना बनाने में व्यस्त थी जब बच्चे उनके घर में प्रवेश किये ताकि सब बच्चे लोकाचार्य स्वामीजी के शिष्यों के बारे में जान सके | आण्डाल दादी जी सभी बच्चो का मुस्कुराकर स्वागत करती है | दादीजी इस प्रतीक्षा में थी की श्रीरंगनाथ भगवान जी का प्रसाद बच्चो में वितरित कर सके |

दादी : आओ बच्चो | भगवान रंगनाथ जी का प्रसाद ग्रहण करे | आशा करती हूँ की आपको पूर्ववर्ती वाली चर्चा याद होगी |

व्यास : दादीजी , हमने कूर कुलोत्तम दासर्, विळान् चोलै पिल्लै, जी के बारे में सीखा और आचार्य अभिमान ही उठ्ठारगम के बारे में भी सीखा |

दादी : बहुत गर्व हुआ तुम पर बच्चो, आज में तुम्हें आचार्य पिळ्ळै लोकाचार्य के एक शिष्य के बारे में बतायूंगी जिनका नाम तिरुमलै आऴ्वार था |

अतुलहाय : दादी, मैंने सुना है कि तिरुमलै आऴ्वार जी को नाम आऴ्वार रचित तिरुवाय्मोऴि के प्रति लगाव के कारण मिला। क्या मैं सही हूं!

दादी : आप बिलकुल सही कह रही हो अतुलहाय | वे तिरुमलै आऴ्वार के रूप मे अवतरित होकर कई नामों जैसे – श्री शैलेशर , शठगोप दासर इत्यादि और अन्ततः तिरुवाय्मोऴि का प्रसार और प्रचार के कारण तिरुवाय्मोऴि पिळ्ळै के नाम से विख्यात हुए । तिरुमलै आऴ्वार के बाल्य अवस्था मे उनका पंञ्च संस्कार स्वयम पिळ्ळैलोकाचार्य ने किया । वे द्राविद भाषा के प्रख्यात विद्वान और उत्कृष्ट प्रभंधक हुए । वे संप्रदाय तत्वों पर भिन्न अभिप्राय रखते हुए संप्रदाय से अलग होकर मधुरै राज्य के मुख्य सलाहकार हुए जब राजा की मृत्यु अचानक कम उम्र मे हुई और उनके पुत्रों का पालन-पोषन की ज़िम्मेदारि आऴ्वार के हाथों रख दिया ।

व्यास : ओह ! दादी जी फिर तिरुमलै आऴ्वार को संप्रदाय में वापिस लेकर आये ?

दादी : बच्चो, में आपकी जिज्ञासा की प्रशंसा करती हूँ | पिळ्ळैलोकाचार्य अपने अंतकाल मे तिरुमलै आऴ्वार पर विशेष अनुग्रह होने के कारण से अपने शिष्य कूरकुलोत्तम दास को उपदेश देते हुए कहे – मेरे अन्य शिष्यों के साथ तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करें और सत्सांप्रदाय के अगले मार्ग दर्शक के रूप मे नियुक्त करें । अपने आचार्य का श्रीवचन का पालन करते हुए तिरुमलै आऴ्वार को परिवर्तन करने का ज़ोखिम कार्य उठायें ।

वेदवल्ली : दादी जी, कूरकुलोत्त्मदास जी ने तिरुमलै आऴ्वार को सुधारने के लिए क्या किया ? क्या आप हमें बता सकती है ?

दादी : हाँ ! एक बार जब तिरुमलै आऴ्वार पालकी पर भ्रमण कर रहे थे, उसी समय उनकी मुलाकात कूरकुलोत्त्मदास से होती है जो तिरुविरुत्तम् का पाठ करते हुए जा रहे थे । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य के कृपापात्र तिरुमलै आऴ्वार कूरकुलोत्त्मदास के विशिष्ट वैभव को समझकर पालकी से उतरकर उनसे विनम्रतापूर्वक तिरुविरुत्तम् और उसके अर्थ सीखने की इच्छा व्यक्त किये ।

पराशर : दादी जी हमें बताएं तिरुमलै आऴ्वार जी ने कूरकुलोत्त्मदास से कैसे सीखा ?

दादी : तिरुमलै आऴ्वार की मुलकात कूरकुलोत्तमदास से होती है, कूरकुलोत्तमदास जी ने देखा की तिरुमलै आऴ्वार पिल्लई लोकाचार्य स्वामीजी की तनियन पाठ करते हुए तिलक धारण कर रहे थे । यह देखकर उन्हे बहुत खुशी हुई और प्रसन्न होकर उन्हे दिव्यप्रबंधों का सारांश ज्ञान देने लगे । इसी दौरान तिरुमलैयाऴ्वार फिर से प्रशासनिक-कार्यों की वजह से सीखने नही आये और इससे निराश श्री दासजी ने उनसे हर रोज़ मिलने का कार्य स्थगित कर दिया । तिरुमलैयाऴ्वार यह जानकर श्री दासजी से फिर से विनम्र्तापूर्वक निवेदन किये की उन्हे वापस प्रशिक्षण दे और क्षमा करे । श्रीदासजी ने उनके निवेदन को स्वीकर किया और उनको अपना शेष प्रशाद दिया । उसके पश्चात उन्होने प्रशासनिक-कार्य राजकुमार को सौंपकर श्रीदासजी के चरण कमल का आश्रय लिया और उनकी सेवा मे जुट गए ।

अपने अन्तिम काल मे श्रीदासजी ने तिरुमलैयाऴ्वार को उपदेश दिया की वे श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि और श्री विळान्चोलै पिळ्ळै से रहस्यग्रंथ सीखे । उसके पश्चात उन्होने श्री तिरुमलैयाऴ्वार को ओराण्वळि के अन्तर्गत अगले आचार्य के रूप मे नियुक्त किये । श्रीपिळ्ळैलोकाचार्य जी का ध्यान करते हुए कूरकुलोत्त्मदास परमपद को प्राप्त हुए , तिरुमलैयाऴ्वार स्वामीजी ने ही कूरकुलोत्त्मदास स्वामीजी महारजा का चरम कैंकर्यं भव्य तरीके से (अंतिम क्रिया) किया |

व्यास : दादी जी, क्या तिरुमलै आऴ्वार हमारे सम्प्रदाय को आगे लेकर गए ?

दादी : नहीं व्यास, जैसे मैंने पहले कहा था की तिरुमलै आऴ्वार जी श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै से तिरुवाय्मोऴि सीखने गए थे | वह सभी पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना चाहता थे । तो श्री तिरुक्कण्णन्गुडि पिळ्ळै स्वामीजी ने उनको पाशुरमो का अर्थ विस्तार से जानना के लिए थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी के पास भेजते है। दुर्भाग्य से उनके आगमन से ठीक पहले थिरुप्पुट्कुळि स्वामीजी परमपद को प्राप्त कर लेते है । तिरुमलै आऴ्वार बहुत परेशान हो जाते है और देव पेरुमल (काँची पुरम वरद स्वामीजी ) का मंगलाशाशनम करने का फैसला करते है।

पराशर : दादीजी , यह घटना रामानुज स्वामीजी की तरह ही है जब वह यामुनाचार्य स्वमीजी से मिलने गए थे, लेकिन इससे पहले कि रामानुजा स्वामजी आलवन्दार स्वामीजी से मिलते, आलवन्दार स्वामी जी परमपद प्राप्त कर लेते है । क्या मैं सही हूं?

दादीजी : बिलकुल सही कह रहे हो पराशर | तब वह देवपेरुमाळ स्वामीजी का मंगलाशाशनम करने के लिए पहुँचते है, सभी उनका स्वागत करते है, देवपेरुमाळ स्वामीजी तिरुमलैयाऴ्वार जी को श्रीशठारी, माला, चन्दन का प्रसाद प्रदान करते है | देवपेरुमाळ स्वामीजी श्री नालूर पिळ्ळै स्वामीजी को आदेश देते है की वह तिरुमलैयाऴ्वार जी को दिव्यग्रंथ को मूल और अर्थ सहित सिखाये जिसमे तिरुवाय्मोऴि ईडुव्याख्यान जो की वह थिरुप्पुट्कुलि जीयर जी से नहीं सीख पाए |

श्री नालूरपिळ्ळै भगवान श्री देवपेरुमाळ से कहे – वे वृद्ध होने के कारण वे सिखाने मे असक्षम है । अतः आप कोई अन्य व्यक्ति को इस कार्य के लिये नियुक्त करे । यह सुनकर श्री देवपेरुमाळ ने नालूरपिळ्ळै के पुत्र नालूर आच्चान पिळ्ळै को यह कार्य सौंपा । यह दिव्याज्ञा सुनकर श्री नालूर पिळ्ळै तिरुमलैयाऴ्वार को श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै के पास लाकर उनको महाग्रंथ को सिखाने लगे । नालूर आच्चान (जो देवराज के नाम से सुप्रसिद्ध है) शब्दार्थ सहित श्री तिरुमलैयाऴ्वार को तिरुवाय्मोऴि सिखाने लगे । इन घटनाओं को जानकर श्री तिरुनारायणपुरतु आयि, तिरुनारायणपुरतु पिळ्ळै इत्यादि उनसे निवेदन करते है ईडु महाग्रंथ का कालक्षेप तिरुनारायणपुरम् मे करे जिसके माध्यम से वे भी इस ग्रंथ का लाभ उठा सके । निवेदन स्वीकर कर, श्री नालूर आच्चान और तिरुमलैयाऴ्वार तिरुनारायणपुरम् पहुँचकर श्री एम्पेरुमान, श्री एम्पेरुमानार, यतुगिरि नाच्चियार, शेल्वपिळ्ळै, तिरुनारणन् इत्यादियों का मंगलाशासन के बाद कालक्षेप का आरंभ किये । तिरुनारायणपुरम् मे श्री तिरुमलैयाऴ्वार ने पूर्ण रूप से मूल और शब्दार्थ सहित इस ग्रंथ को सीखा और उनके सेवाभाव को देखकर श्री नालूर आच्चान पिळ्ळै ने उनको इनवायर् तलैयवर् तिरुवाराधन पेरुमाळ को भेट के रूप मे प्रदान किया । इस प्रकार से ईडु महाग्रंथ का प्रचार नालुर आच्चान् पिळ्ळै के विद्वान शिष्य परंपरा के माध्यम से हुआ – तिरुमलै आऴ्वार, तिरुनारायणपुरतुजीयार, तिरुनारायणपुरतुपिळ्ळै । तिरुमलैयाऴ्वार सीखने के पश्चात आऴ्वार तिरुनगरि के लिये रवान होते है और वही निवास करने का निश्चय लेते है ।

व्यास : क्या अलवार तिरुनगरी नम्माऴ्वार की जन्मस्थली है ? मैंने सुना है की तिरुमलै आऴ्वार स्वमीजी ने ही अलवार तिरुनगरी को दुबारा बनाया था जब यह जीर्ण स्थिति में थी | कृपा करके हमें उस कथा के बारे में बताये दादीजी |

दादी : आप सही हो व्यास | जब तिरुमलै आऴ्वार अलवार तिरुनगरी में पहुँचते है | वहाँ जाकर उन्हे पता चलता है कि नम्माऴ्वार के बाद आऴ्वार तिरुनगरि एक विशाल जंगल की तरह हो चुका है । यह जानकर सबसे पहले आऴ्वार तिरुनगरि को जंगल के झाडियाँ और लकडियों से मुक्त करते है । इसी कारण वे काडुवेट्टिगुरु के नाम से सुप्रसिद्ध हुए (क्योंकि वे पहले एक मात्र आचार्य थे जिन्होने इस जंगल का साफ़ किया और इस क्षेत्र को सुन्दर रूप मे रूपान्तर किया)। इसके पश्चात वे नम्माऴ्वार को तिरुक्कनम्बि से आऴ्वार तिरुनगरी लाते है और भगवदार्चन की स्थापना करते है । वे श्री रामानुजाचार्य के लिये आऴ्वार तिरुनगरी के दक्षिण भाग मे एक छोटा देवस्थान की स्थापना करते है ( भविष्यदाचार्य का तिरुमेनि यानि नाम श्री नम्माऴ्वार ने अपने तिरुवाय्मोऴि मे प्रतिपादित किये है ) और इसके अतिरिक्त चतुर्वेदि मंगलम् (यानि चार रास्तों) का निर्माण और दस परिवारों के साथ एक वृद्ध विधवा श्रीवैष्णव माताश्री को नियुक्त कर उन्हे भगवद्-भागवत् कैंकर्य मे संलग्न करते है । श्री तिरुमलैयाऴ्वार सदैव श्री नम्माऴ्वार के वैभव का गुणगान किया करते थे और तिरुवाय्मोऴि का पाठ कराने और सिखाने के कारण वे तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै से प्रसिद्ध हुए । उनके बिना, हम उस आऴ्वार तिरुनगरी की कल्पना नहीं कर सकते जो आज हम देख रहे हैं और उसका आनंद ले रहे हैं।

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तिरुवाय्मोऴि के वैभव को सुनकर श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार आऴ्वार तिरुनगरि जाकर उनके शिष्य बनते है और उनकी सेवा करने लगते है और उनके मार्गदर्शन मे वे अरुळिच्चेयल और अन्य ग्रंथों का कालक्षेप करते है । श्री तिरुवाय्मोऴि के मार्गदर्शन के माध्यम से श्री अऴगियमणवाळपेरुमाळ नायनार भविष्यदाचार्य की आराधना परिपूर्ण प्रेम भक्ति भाव से करते है और यतिराज की महिमा का वर्णन करते हुए यतिराजविंशति नामक स्तोत्र की रचना करते है । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य यह समझने का प्रयास करते है की उनके आचार्य को यह बलाक ( श्री वरवरमुनि ) से क्यों उतना प्रेम और लगाव है ? इसके उत्तर मे श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै कहते है की यह बालक साक्षात श्री रामानुजाचार्य, श्री आदिशेष है जिन्होने यह रूप धारण किया है । अपने अन्त काल श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै को अगले उत्तराधिकारी की चिन्ता होती है जो इस सत्साम्प्रदाय का प्रचार प्रसार करें । उस समय श्री अऴगिय मणवाळ पेरुमाअळ् नायनार प्रतिज्ञा लेते है की वे उनके उत्तराधिकारी होंगे और इस कार्य को भलि-भांति करेंगे और इस प्रकार से उन्होने अपने आचार्य के दिव्यवचनों का पालन किया । अती प्रसन्न होकर श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै ने अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ नायनार को कहा की उन्हे श्रीभाष्य सीखना चाहिये और सीखने के पश्चात वे श्री पेरिय पेरुमाळ का मंगलाशासन करते हुए तिरुवाय्मोऴि और इस दिव्यप्रबन्ध के व्याख्यान पर ही ध्यान केंद्रित करे । तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने शिष्यों को बताते है की वे सारे अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ का सम्मान करे और समझे की वे एक विषेश अवतार है । इसके पश्चात श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ और कई अन्य तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के शिष्य उनका चरमकैंकर्य दिव्यभव्य रूप से करवाते है ।

श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै अपने आचार्य पिळ्ळैलोकाचार्य का ध्यान करते हुए अपना देह त्यागकर परमपद को प्रस्थान हुए । श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के प्रयासों से हमें 36000 ईडु व्याख्यान का ज्ञान प्राप्त हुआ है जो बाद में अऴ्गियमणवाळपेरुमाळ द्वारा व्यापक रूप से महान ऊंचाइयों तक फैला । तो बच्चों, चलिये अब हम श्री तिरुवाय्मोऴिपिळ्ळै के चरणकमलों का आश्रय लेते हुए प्रार्थना करें की हमे भी भगवान श्री रामानुजाचार्य और अपने आचार्य के प्रती लगाव प्रेम भक्ति हो ।

बच्चों ने धन्य महसूस किया और विचार-विमर्श करके अण्डाल दादी के घर को छोड़ कर अपने घर को जाते है ।

अडियेन् रोमेश चंदर रामानुजन दासन

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